मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
चतुर्थोऽङ्कः २८७
प्रकोष्ठे सुश्लिष्ट-विहङ्गवाटी-सुखनिषण्णानि अन्योन्यचुम्बनपराणि सुखमनुभवन्ति पारावतमिथुनानि। दधिभक्तपूरितोदरो ब्राह्मण इव सूक्तं पठति पञ्जरशुकः। इयमपरा स्वामिसम्माननालब्धप्रसुरा इव गृहदासी अधिकं कुरकुरायते मदनसारिका। अनेकफलरसास्वादप्रतुष्टकण्ठा कुम्भदासीव कूजति परपुष्टा। आलम्बिता नागदन्तेषु पञ्जरपरम्पराः। योध्यन्ते लावकाः। आलाप्यन्ते पञ्जरकपिञ्जलाः।
शब्दार्थः— सुश्लिष्टविहङ्गवाटीसुखनिषण्णानि=सुन्दर चिड़िया घर में आराम से बैठे हुये, अन्योन्यचुम्बनपराणि=एक दूसरे के चूमने में लगे हुये, पारावत-मिथुनानि=कबूतरों के जोड़े, अनुभवन्ति=अनुभव कर रहे हैं। दधिभक्तपूरितोदरः=दही भात से भरे हुये पेट वाला, पञ्जरशुकः = पिंजड़े का तोता, सूक्तम्=अच्छी अच्छी बातें, स्वामिसम्माननालब्धप्रसरा=मालिक द्वारा किये गये सम्मान के कारण बढ़ी हुयी अर्थात् मुँह लगी, मदनसारिका=मैना, अनेकफलरसास्वादप्रहृष्ट-कण्ठा=अनेकफलों के रसों को चखने से खिले हुये कण्ठवाली, कुम्भदासी=कुट्टिनी, परभृता=कोयल, नागदन्तेषु=खूँटियों पर। लावकाः=बटेर। कपिञ्जलाः=गौरवर्ण के तीतर पक्षी, विविधमणिचित्रितम्=अनेक मणियों से जटिल, रविकिरणसन्तप्तम्=सूर्य की किरणों से सन्तप्त, विधुवृति=हवा कर रहा है। चन्द्रपादाः=चन्द्रमा की किरणें, वृद्धमहल्लका=बड़े बुड़े पुरुष, गृहसारसाः=पालतू सारस ।
अर्थ—विदूषक— (प्रवेश करके और देखकर) अरे ! आश्चर्य है, यहाँ सातवें प्रकोष्ठ (भवनखण्ड) में भी सुन्दर बने हुये चिड़ियाघर में आराम से बैठे हुये, परस्पर चुम्बन करने वाले कबूतरों के जोड़े आनन्द का अनुभव कर रहे हैं। दही भात (खाने) से भरे हुये पेट वाले ब्राह्मण के समान पिंजरे का तोता सूक्त=अच्छी-अच्छी बातें बोल रहा है। दूसरी, यह मैना, अपने मालिक के अधिक आदर पाने से मुँह लगी नौकरानी के समान, कुर कुर शब्द कर रही है। अनेक फलों के रसों को चखने से प्रहृष्ट=विकसित कण्ठवाली यह कोयल कुट्टिनी स्त्री के समान कूक रही है। खूँटियों पर पिंजड़ों की पंक्तियाँ लटक रहीं हैं। बटेर लड़ाई जा रही है। तित्तिर पक्षियों से बात की जा रही है। पिंजड़े के कबूतर उड़ाये जा रहे हैं। आनन्द से नाचता हुआ, विभिन्न प्रकार की मणियों से चित्रित सा यह पालतू मोर, सूरज की किरणों से गर्म हुये भवन को अपने पंखों को फड़फड़ाने से, मानों हवा कर रहा है। (दूसरी ओर देख कर) इधर, एकत्रित की गई चन्द्रमा की किरणों के समान ऊँची जाति के हंसों के जोड़े सुन्दर स्त्रियों के पीछे पीछे अच्छी चाल सीखते हुये इधर घूम रहे हैं। दूसरे ये पालतू सारस पक्षी बहुत बूढ़ें पुरुषों के समान इधर उधर घूम रहे हैं। अरे ! आश्चर्य है, इस वेश्या ने तो अनेक प्रकार के पक्षिसमूहों से (घर) भर रखा है। सचमुच मुझे वेश्या का यह घर (इन्द्र
२८८ मृच्छकटिकम्
प्रेष्यन्ते पञ्जरकपोताः । इतस्ततो विविधमणिचित्रित इवायं सहर्षं नृत्यन् रविकिरणसन्तप्तं पक्षोत्क्षेपैर्विधुवतीव प्रासादं गृह्मयूरः । इतः पिण्डीकृता इव चन्द्रपादाः पदगतिं शिक्षमाणानीव कामिनीनां पश्चात् परिभ्रमन्ति राजहंसमिथुनानि । एते अपरे वृद्धमहल्लका इव इतस्ततः संचरन्ति गृहसारसाः । आश्चर्यं भोः ! प्रसारणं कृतं गणिकाया नानापक्षिसमूहैः । यत्सत्यं खलु नन्दनवनमिव मे गणिकागृहं प्रतिभासते । आदिशतु भवती । )
**चेटी--**एदु एदु अज्जो । इमं अट्ठमं पओट्ठं पविसदु अज्जो । ( एतु एतु आर्यः । इमम् अष्टमं प्रकोष्ठं प्रविशतु आर्यः । )
विदूषकः--( प्रविश्यावलोक्य च ) भोदि ! को एसो पट्टपावारअप्राउदो अधिअदरं अच्छब्भुद-पुणरुत्तालङ्कारालङ्किदो अङ्गभङ्गेहिं परिक्खलन्तो इदो तदो परिब्भमदि । (भवति ! क एष पट्टप्रावारकप्रावृतः अधिकतरमत्यद्भुत-पुनरुक्तालंकारालङ्कृतः अङ्गभङ्गैः परिस्खलन्नितस्ततः परिभ्रमति ? )
के ) नन्दनवन के समान प्रतीत हो रहा है। श्रीमती ! आप ( आगे का मार्ग ) बतलाइये ।
**टीका--**सुश्लिष्टां=सुनिर्मिता, या विहङ्गमानाम्=पक्षिणाम्, वाटी=शाला, तस्याम्, सुखेन=आनन्देन, निषण्णानि=उपविष्टानि, अन्योन्यम्=परस्परम्, चुम्बन-पराणि = चुम्बनसंसक्तानि, पारावतमिथुनानि = कपोतयुगलानि, दध्ना मिश्रितेन भक्तेन=ओदनेन, पूरितम्=परिपूणम् उदरं यस्य सः, पञ्जरशुकः=पञ्जरस्थः शुकः, सूक्तम्=सद्वचनम् । स्वामिनः सम्मानना=अभ्यादरः, तया, लब्धः=प्राप्तः, प्रसरः=प्रभावः, यया सा, कुरकुरायते=कुर कुर इति शब्दं करोति । अनेकफलानाम्=विविधफलानाम्, रसानाम्, आस्वादेन=पानेन, भक्षणेन वा, प्रहृष्टः=उत्कृष्टः, कण्ठः=कण्ठस्वरः यस्याः सा, कुम्भदासी इव=कुट्टिनी इव, नागदन्तेषु=भित्त्यादिषु स्थितेषु काष्ठखण्डेषु, । लावकाः = पक्षिविशेषाः 'बटेर' इति हिन्दीभाषायाम् । पञ्जरकपिञ्जलाः पञ्जरस्थाः गौरतित्तिराः । पक्षोत्क्षेपैः = पक्षाणां सञ्चालनैः, विधुवति=कम्पयति इव। चन्द्रपादाः=चन्द्रकिरणाः, वृद्धमहल्लकाः=गृहस्य वृद्धपुरुषाः, प्रसारणम्=व्यापनम्, नन्दनवनम्=इन्द्रवनम्, गणिकागृहम्=वसन्तसेनाभवन म्।
**चेटी--**आर्य ! आइये, आइये। इस आठवें प्रकोष्ठ ( भवनखण्ड ) में आप प्रवेश करिये ।
विदूषक--( घुस कर और देखकर ) श्रीमत्तिके ! यह कौन है, जो रेशमी दुपट्टे को ओढ़े हुये, अत्यन्त विलक्षण, एक ही प्रकार के लगने वाले आभूषणों से सजा हुआ, अङ्गों को टेढ़ा मेढ़ा चलाता हुआ इधर उधर खूब घूम रहा है ।
चतुर्थोऽङ्कः
२८६
चेटी--अज्ज ! एसो अज्जआए भादा भोदि । ( आर्ये ! एष आर्य्याया भ्राता भवति ।)
विदूषकः-केत्तिअं तवच्चरणं कदुअ वसन्तसेणाए भादा भोदि । अथवा मा दाव, जइ वि एसो उज्जलो सिणिद्धोअ सुअन्धोअ । तहवि ससाणवीधीए जादो विअ चम्पअरुक्खो अणहिगमणीओ लोअस्स । २६।
( अन्यतोऽवलोक्य ) भोदि ! एसा उण का ? फुल्लपावारअपाउदा उवाह-जुअलणिक्खित्ततेल्ल-चिक्कणेहि पादेहि उच्चासणे उवविट्ठा चिट्ठटि ? ( कियत् तपश्चरणं कृत्वा वसन्तसेनाया भ्राता भवति । अथवा मा तावत्, यद्यप्येष उज्ज्वलः स्निग्धश्च सुगन्धश्च । तथापि-श्मशानवीथ्यां जात इव चम्पकवृक्षोऽनभिगमनीयो लोकस्य ।। २६ ।।
चेटी—आर्य ! यह आर्या वसन्तसेना का भाई लगता है ।
विदूषक--कितनी तपस्या करके वसन्तसेना का भाई बनता है । अथवा--
अन्वयः--मा, तावत्, यद्यपि एषः, उज्ज्वलः, स्निग्धः, च, सुगन्धः, च, ( अस्ति ), तथापि श्मशानवीथ्याम्, जातः, चम्पकवृक्षः, इव, लोकस्य, अनभिगमनीयः ( अस्ति ) ।। २९ ।।
शब्दार्थ--मा तावत् = [ इसके विषय में मुझे इतना अच्छा ] नहीं [ सोंचना चाहिये ]; यद्यपि = यद्यपि, एषः = यह, उज्ज्वलः = उज्वल, च = और, स्निग्धः = चिकना, च = और, सुगन्धः = सुगन्धियुक्त है; तथापि = फिर भी, श्मशानवीथ्याम् = मरघट की गली ( मार्ग ) में, जातः = उत्पन्न हुये, चम्पकवृक्षः इव = चम्पा के पौधे के समान, लोकस्य = लोगों के लिये, अनभिगमनीयः = त्याज्य है ।। २६ ।।
अर्थ—ऐसी बात नहीं है [ अर्थात् मुझे इसके विषय में इतना अच्छा नहीं सोंचना चाहिये । ] यद्यपि यह साफ, चिकना और सुगन्धित है । फिर भी मरघट की गली में उत्पन्न चम्पा के पौधा के समान यह लोगों के लिये त्याज्य है ।। २६ ।।
टीका--तपश्चरणेन वसन्तसेनाया भ्रातृपदं लभ्यते इति मम चिन्तनं नोपयुक्तमिति तस्य त्याज्यत्वं निरूपयन्नाह—मा तावदिति । यद्यपि, एषः = सम्मुखीनः वसन्तसेनाभ्राता, उज्ज्वलः = स्वच्छः, गौरवर्ण इति भावः, स्निग्धः = तैलादिभिः चिक्कणः, च, सुगन्धः = सौगन्धिकद्रव्यैः समलङ्कृतश्चास्ति; तथापि, श्मशानवीथ्याम् = श्मशानमार्गे, जातः = उत्पन्नः, चम्पकवृक्षः = चम्पानामक-पुष्पविशेषवृक्षः, इव = यथा, लोकस्य = सामाजिकस्य, अनभिगमनीयः = स्पर्शायोग्यः, अग्राह्य इति भावः, भवति, तथैव वेश्याजातत्वादयमपि समाजे अस्वीकार्यः ।। २६ ।।
विमर्शः—प्रस्तुत अंश का कुछ संस्करणों में गद्य के रूप में भी प्राप्त होता है । परन्तु शैली के अनुसार इसे पद्य ही मानना ठीक है ।।२६।।
१६ मृ०
२९० || मृच्छकटिकम्
भवति ! एषा पुनः का फुल्लप्रावारकप्रावृता उपानद्युगलक्षिप्त-तैल-चिक्कणाभ्यां पादाभ्यामुच्चासनोपविष्टा तिष्ठति ? )
चेटी—अज्ज ! एसा क्खु अम्हाणं अज्जआए अत्तिआ । ( आर्ये ! एषा खल्वस्माकम् आर्याया माता । )
विदूषकः—अहो ! से अपवितडाइणीए पोट्टवित्थारो ता किं एदं पवेसिअ महादेवं विअ दुआरसोहा इह घरे णिम्मिदा ? । ( अहो ! अपवित्रडाकिन्या उदरविस्तारः । तत् किम् एतां प्रवेश्य महादेवमिव द्वारशोभा इह गृहे निर्मिता ? )
चेटी—हदास ! मा एव्वं उवहस अम्हाणं अतिअं । एसा क्खु चाउत्थिएण पीडिअदि । ( हताश ! मैवमुपहस अस्माकं मातरम् । एषा खलु चातुर्थिकेन पीड्यते । )
विदूषकः—( सपरिहासम् ) भववं चाउत्थिअ ! एदिणा ऊवआरेण मं वि वम्हणं आलोएहि । ( भगवन् चातुर्थिक ! एतेनोपकारेण मामपि ब्राह्मणमालोकय । )
शब्दार्थ— फुल्लप्रावारकवृता=फूले हुये या फूलों की आकृति से युक्त कढ़ाई वाली चादर ओढ़े हुये, उपानद्-युगल-निक्षिप्त-तैल-चिक्कणाभ्याम्=दोनों जूतियों में डाले गये तेल से चिकने, पादाभ्याम् = पैरों से । आर्यायाः=वसन्तसेना की । अपवित्रडाकिन्याः = अपवित्र डाइन का, कहीं कहीं कपर्दडाकिन्याः = दूषित डाइन का -- यह पाठ है । हताश=मूर्ख । प्रवेश्य=प्रवेश कराकर । चातुर्थिकेन=चौथिया, चार चार दिन पर होने वाले बुखार से । शूनपीनजठरः=बढ़े एवं मोटे पेटवाला ।
अर्थ—( दूसरी ओर देखकर ) श्रीमती जी ! यह कौन है जो फूलोंवाली चादर ओढ़े हुये, दोनों जूतों में तेल डालने से चिकने पैरों वाली ऊँचे आसन पर बैठी है ।
चेटी—आर्ये ! ये हम लोग की आर्या ( मालकिन वसन्तसेना ) की माता जी हैं।
विदूषक—ओह ! इस गन्दी डाइन के पेट का फैलाव । तो क्या महादेव के समान इसको पहले ( घर में ) प्रवेश कराकर यहाँ घर में सुन्दर दरवाजों की शोभा बनाई गयी होगी । [ दरवाजे बन जाने के बाद इतने बड़े पेटवाली इसको घर में घुसा सकना कठिन होता । ]
चेटी—मूर्ख ! हम लोगों की माताजी की हंसी मत उड़ाओ । यह तो चौथिया बुखार से पीड़ित है ।
विदूषक—भगवन् चातुर्थिक ! इसी उपकार की दृष्टि से मुझ ब्राह्मण को भी देखिये ।
चतुर्थोऽङ्कः २९१
चेटी-- हदास ! मरिस्ससि । ( हताश ! मरिष्यसि । )
विदूषकः-- (सपरिहासम्) दासीए धोए ! वरं ईदिसो सून-पीण-जठरो मुदो ज्जेव । ( दास्याः पुत्रि ! वरम् ईदृशः शूनपीनजठरो मृत एव । )
सीहु-सुरासव-मत्तिआ एआवत्थ गदा हि अत्तिआ ।
जइ मरइ एत्थ अत्तिआ भोदि सिआल-सहस्स-जत्तिआ ॥ ३० ॥
( सीधुसुरासवमत्ता एतावदवस्थां गता हि माता ।
यदि म्रियतेऽत्र माता भवति शृगालसहस्रयात्रा ॥ ३० ॥ )
भोदि ! किं तुम्हाणं जाणवत्ता वहन्ति ? (भवति ! किं युष्माकं यानपात्राणि वहन्ति ? )
**चेटी--**मूर्ख ! मारे जाओगे ।
विदूषक-- ( हँसी से ) दासी की बच्ची ! बढ़े हुये और मोटे पेटवाला व्यक्ति मरा हुआ ही अच्छा है ।
**अन्वयः--**सीधुसुरासवमत्ता, माता, एतदवस्थाम्, गता, हि, अत्र, यदि, माता, म्रियते, शृगालसहस्रयात्रा, भवति ॥ ३० ॥
**शब्दार्थ--**सीधुसुरासवमत्ता=सीधु, सुरा और आसव [ इन तीन प्रकार की मदिराओं ] से मत्त, माता = वसन्तसेना की माँ, एतावदवस्थाम्=इस प्रकार की मोटापा की दशा को, गता=प्राप्त कर चुकी है, हि=निश्चित, यदि=यदि, माता=माता, म्रियते=मर जाती है, तो, शृगालसहस्रयात्रा=हजारों सियारों की जीवन-यात्रा=भोजन, भवति=हो जाये ॥ ३० ॥
**अर्थ--**सीधु, सुरा और आसव —इन तीन प्रकार की मदिराओं के पीने से मतवाली यह माता इस [ मोटापा की ] हालत को प्राप्त हुयी हैं, यदि ये माता मर जाती हैं तो हजारों सियारों की यात्रा=जीवनयात्रा=भोजन बन जायगी ॥ ३० ॥
**टीका--**वसन्तसेनायाः मातुः स्थौल्यं विलोक्य जीवनापेक्षया तस्य मरणमुप-कारकमिति प्रतिपादयति —सीधुसुरेति । सीधु-सुरासवैः = त्रिविधैः मदिराविशेषैः, तासां भृशं पानेनेत्यर्थः, मत्ता=मदयुक्ता, माता=वसन्तसेनायाः माता, एतावदवस्थाम्=एतादृशीं स्थूलावस्थाम्, गता=प्राप्ता, माता, यदि, म्रियते=निधनं प्राप्नोति, तदा, शृगालसहस्राणाम्, यात्रा=जीवनयात्रा, भोजनमिति भावः, भवति=सम्पद्यते । एवञ्च जीवनान् मरणं श्रेयः । आर्या वृत्तम् ॥ ३० ॥
**विमर्श--**अन्न, फल आदि से बननेवाली तीनों मदिराओं को यहाँ लिखा है । शृगालसहस्रयात्रा-के स्थान पर कहीं-कहीं 'शृगालसहस्रपर्याप्तिका' यह पाठ है । अभिप्राय समान है ॥ ३० ॥
**अर्थ--**आर्ये ! क्या [ व्यापारादि के लिये ] आप लोगों की गाड़ियाँ चलती हैं ?
२९२ मृच्छकटिकम्
**चेटी—**अज्ज ! णहि णहि । ( आर्य ! नहि नहि । )
**विदूषकः—**किंवा एत्थ पुच्छीअदि । तुम्हाणं क्खु पेम्मणिम्मलजले मअण-समुद्दे त्थण-णिअम्ब-जहणा-ज्जेव जाणवत्ता मणहरणा । एव्वं बसन्तसेणाए पहुवृत्तन्तं अट्टपओट्ठं भवणं पेक्खिअ, जं सच्चं जाणामि, एकत्थं विअ तिविट्ठवं दिट्ठं । पसंसिदुं णत्थि मे वाआविहवो । किं दाव गणिआघरो ? अथवा कुबेरभवणपरिच्छेदेा ति ? । कहिं तुम्हाणं अज्जआ ? ( किंवा अत्र पृच्छयते ? युष्माकं खलु प्रेमनिर्मलजले मदनसमुद्रे स्तननितम्बजघनान्येव यानपात्राणि मनोहराणि। एवं वसन्तसेनाया बहुवृत्तान्तम् अष्टप्रकोष्ठं भवनं प्रेक्ष्य, यत् सत्यं जानामि; एकस्थमिव त्रिविष्टपं दृष्टम् । प्रशंसितुं नास्ति मे वाचाविभवः । किं तावत् गणिकागृहम्, अथवा कुबेरभवनपरिच्छेद इति । कस्मिन् युष्माकमार्या ? )
**चेटी—**अज्ज ! एसा रुक्खवाडिआए चिट्ठदि । ता पविसदु अज्जो । ( आर्य ! एषा वृक्षवाटिकायां तिष्ठति । तत् प्रविशतु आर्य्यः । )
चेटी—आर्य ! नहीं, नहीं ।
शब्दार्थ — प्रेमनिर्मलजले=प्रेमरूपी निर्मल जलवाले, मदनसमुद्रे=कामदेवरूपी सागर में, यानपात्राणि=वाहन हैं। बहुवृत्तान्तम्=बहुत वर्णनीय, एकस्थम्=एकही स्थान में स्थित, त्रिविष्टपम् = स्वर्ग, कुबेरभवनपरिच्छेदः=कुबेर के भवन का एक भाग है ।
अर्थ — विदूषकः——अथवा इसमें पूछने की क्या बात ? आप लोगों के प्रेमरूपी निर्मल जलवाले, कामरूपी समुद्र में, स्तन, नितम्ब और जाँघें ही सुन्दर यानपात्र=वाहन हैं । वसन्तसेना के इस प्रकार के बहुत प्रशंसनीय, आठ खण्डों वाले भवन को देखकर यह सच समझता हूँ कि मानों स्वर्ग एक ही स्थान पर एकत्रित होकर है । प्रशंसा करने के लिये मेरी वाणी की शक्ति नहीं है । तो क्या यह वेश्या का घर है अथवा धनाधिपति कुबेर के प्रासाद का एक हिस्सा है । तुम्हारी आर्या [ स्वामिनी वसन्तसेना ] कहाँ हैं ?
टीका——यानपात्राणि = व्यापारार्थं वाहनादीनि, प्रेम एव निर्मलम् = स्वच्छं जलं यस्मिन् तस्मिन्, बहुवृत्तान्तम् = बहूनि वृत्तान्तानि = वर्णनानि यस्य तत्, बहु प्रशंसनीयमिति भावः, एकस्थम् = एकस्मिन् स्थाने स्थितम्, त्रिविष्टपम्=स्वर्गम्, वाचाविभवः=वाणीशक्तिः, कुबेरस्य=धनाधिपतेः, भवनस्य=प्रासादस्य, परिच्छेदः=भागविशेषः ।
अर्थ—चेटी—आर्य ! ये वृक्षवाटिका में बैठीं हैं । इसलिये आप प्रवेश करें ।
चतुर्थोऽङ्कः
२६३
विदूषकः— ( प्रविश्य दृष्ट्वा च ) ही ही भो ! रुक्खवाड़िआए सस्सि-रीअदा । अच्छरीदि-कुसुमपत्थारा रोविदा अणेअपाददा णिरन्तर-पाद-वतल-णिम्मिदा जुवदिजण-जहणप्पमाणा पट्टदोला, सुवण्णजूधिआ-सेहालिआ-मालई-मल्लिआ-णोमालिआ-कुरवआ-अदिमोत्तञ-प्पहुदिकुसुमेहि सयं णिवड़िदेहिं जं सच्चं लघु करेदि विअ गन्दणवणस्स सरिसरीअदं । ( अन्यतोऽवलोक्य ) इदो अ उदअन्त-सूरसमप्पहेहिं कमलरत्तोप्पलेहिं । संज्झाइदि विअ दीहिआ । ( आश्चर्यं भोः ! अहो वृक्षवाटिकायाः सश्रीकता ! अच्छरीतिकुसुमप्रस्ताराः रोपिता अनेकपादपाः, निरन्तर-पादपतल-निर्मिता युवति-जन-जघनप्रमाणा पट्टदोला, सुवर्णयूथिका-शेफालिका-मालती-मल्लिका-नवमल्लिका-कुरबकातिमुक्तकप्रभृतिकुसुमैः स्वयं निपतितैर्यत्सत्यं लघूकरोतीव नन्दनवनस्य सश्री-कताम् । इतश्च उदयत्-सूर्य-समप्रभैः कमलरक्तोत्पलैः सन्ध्यायते इव दीर्घिका । )
शब्दार्थ —सश्रीकतां=सौन्दर्यम् । अच्छरीतिकुसुमप्रस्तारा=सुन्दर ढंग से फूलों के फैलाववाले, रोपिताः=लगाये गये, निरन्तर-पादपतलनिर्मिता=घने पेड़ों के नीचे बनीं हुयीं, युवतिजनजघनप्रमाणा=युवतियों के पृष्ठ भाग=नितम्ब के समान प्रमाण-वाली, पट्टदोला=रेशम से बने हुये झूले हैं, नन्दनवनस्य=इन्द्र के उपवन को, लघू-करोतीव=मानों तुच्छ कर रहा है । उदयत्-सूर्यसमप्रभैः=उदित होनेवाले सूर्य के समान, कमलरक्तोत्पलैः = सफेद कमल और लाल कमलों से, दीर्घिका = बावड़ी, सन्ध्यायते इव=सन्ध्या के समान लग रही है ।
अर्थ—विदूषक—( प्रवेश करके और देखकर ) अरे आश्चर्य है । अहो ! इस वृक्ष वाटिका की सुन्दरता [ अपूर्व है ] ! अच्छे ढंग से फैले हुये फूलों के विस्तार वाले अनेक पेड़ लगे हैं, घने पेड़ों के नीचे बने हुये, युवतियों की जघन [ कटि अधोभाग ] के समान प्रमाणवाले, रेशमी झूले हैं। अपने आप गिरे हुये, सुवर्ण-यूथिका, शेफालिका, मालती, मल्लिका, नवमल्लिका, कुरबक, अतिमुक्तक आदि के फूलों से सचमुच इन्द्रवन की सुन्दरता को कम कर रहा है । ( दूसरी ओर देखकर ) और इधर उदित होते हुये सूर्य के समान कान्तिवाले श्वेत और लाल कमलों से यह वापी सन्ध्या के समान लग रही है । [ इस की शोभा सन्ध्याकाल के समान लग रही है । ]
टीका—अच्छरीत्या = शोभनप्रकारेण, कुसुमानाम् = पुष्पाणाम्, प्रस्तारः= विस्तारः, येषु ते तादृशाः, रोपिताः=आरोपिताः; निरन्तराः=अन्तरशून्याः सघनाः ये पादपाः=वृक्षाः तेषां तले=अधोभागे, निर्मिता=रचिता, युवतिजनानां जघनम्= कटितटाधोभागः, प्रमाणं यस्याः सा, तादृशी, पट्टस्य=क्षौमस्य, दोला=प्रेङ्खा, स्वयं निपतितैः=समयप्रवाहेण स्वयं भूमौ पतितैः, नन्दनवनस्य=इन्द्रवनस्य, सश्रीकताम्=
२९४ | मृच्छकटिकम्
अवि अ ( अपि च )—
एसो असोअबुच्छो णवणिग्गअ-कुसुम-पल्लवो भादि ।
सुभडो व्व समरमज्झे घण-लोहिद-पङ्क-चच्चिचक्को ॥ ३१ ॥
( एषोऽशोकवृक्षो नवनिर्गतकुसुमपल्लवो भाति ।
सुभट इव समरमध्ये घनलोहितपङ्कचर्चितः ॥ ३१ ॥ )
भोदु, ता कहिं तुम्हाणं अज्जा ? ( भवतु। तत् कस्मिन् युष्माकमार्या ? )
चेटी—अज्ज ! ओणमेहि दिट्ठिं; पेक्ख अज्जअं । ( आर्य्य ! अवनमय दृष्टिम्, प्रेक्षस्व आर्य्याम् । )
विदूषकः—( दृष्ट्वा उपसृत्य ) सोत्थि भोदिए । ( स्वस्ति भवत्यै । )
सुन्दरताम्, लघूकरोतीव=अलघु लघु करोति । उदयन् सूरः=सूर्य, तत्समप्रभैः=तत्तुल्यकान्तिभिः, कमलैः=सामान्यपंकजैः, रक्तोत्पलैः=कुवलयैः, च, दीर्घिका=वापी, सन्ध्यायते=सन्ध्या इवाचरति ।
**अन्वयः—**नवनिर्गतकुसुमपल्लवः, एषः, अशोकवृक्षः, समरमध्ये, घनलोहित-पंकचर्चितः, सुभटः, इव, भाति ॥ ३१ ॥
**शब्दार्थ—**नवनिर्गतकुसुमपल्लवः=नये निकले हुये फूलों एवं पत्तोंवाला, एषः=यह, अशोकवृक्षः=अशोक का पेड़, समरमध्ये=युद्धक्षेत्र में, घनलोहितपंक-चर्चितः=गाढ़े खूनरूपी कीचड़ से लिप्त, सुभटः=योद्धा, इव=के समान, भाति=शोभित हो रहा है ॥ ३१ ॥
**अर्थ—**नये निकले हुये फूलों एवं पत्तोंवाला यह [ यह सामने स्थित ] अशोक का पेड़, युद्धक्षेत्र में गाढ़े खूनरूपी कीचड़ से लिप्त योद्धा के समान शोभित हो रहा है ॥ ३१ ॥
**टीका—**अशोकवृक्षस्य सौन्दर्यं निरूपयति—नवनिर्गताः=नवीनोत्पन्नाः, कुसुम-पल्लवाः पुष्पाणि पत्राणि च यस्य सः, एषः=पुरो दृश्यमानः, अशोकवृक्षः=तन्नामकः पादपः समरमध्ये=युद्धभूमौ, घनैः=प्रगाढैः, लोहितैः=रक्तैः एव पङ्कः=रुधिर-रूपिपङ्कः, चर्चितः=लिप्तः, सुभटः=योद्धा, इव, भाति=शोभते । उपमालंङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥ ३१ ॥
**विमर्श—**अशोक वृक्ष के विकसित होने के लिये सुन्दर स्त्रियों के पैरों का प्रहार होना चाहिये—'पादाघातादशोकः विकसति।' इससे वहाँ अनेक सुन्दर नायिकाओं का अस्तित्व सिद्ध होता है ॥ ३१ ॥
**अर्थ—**अच्छा तो आपकी स्वामिनी कहाँ है ?
**चेटी—**आर्य ! दृष्टि नीचे की ओर कीजियें और आर्या का दर्शन करिये ।
विदूषक—( देख कर और समीप जाकर ) आपका कल्याण हो ।
चतुर्थोऽङ्कः
२६५
वसन्तसेना—( संस्कृतमाश्रित्य ) अये ! मैत्रेयः । ( उत्थाय ) [स्वागतम् । इदमासनम्, अत्रोपविश्यताम् ।
विदूषकः—उवविसदु भोदी । ( उपविशतु भवती ।)
( उभावुपविशतः )
वसन्तसेना—अपि कुशलं सार्थवाहपुत्रस्य ?
विदूषकः—भोदि ! कुसलं । ( भवति ! कुशलम् । )
वसन्तसेना—आर्य्य मैत्रेय ! अपीदानीम्—
गुणप्रवालं विनयप्रशाखं विश्रम्भमूलं महनीयपुष्पम् ।
तं साधुवृक्षं स्वगुणैः फलाढ्यं सुहृद्विहङ्गाः सुखमाश्रयन्ति ? ॥ ३२ ॥
वसन्तसेना—( संस्कृत में ) अरे मैत्रेय ! ( उठ कर ) आपका स्वागत हैं। यह आसन है। इस पर बैठिये।
विदूषक—आप बैठिये।
( दोनों बैठते हैं ।)
वसन्तसेना—आर्य चारुदत्त कुशल तो हैं ?
विदूषक—हाँ, कुशल हैं।
अन्वयः—गुणप्रवालम्, विनयप्रशाखम्, विश्रम्भमूलम्, महनीयपुष्पम्, स्वगुणैः, फलाढ्यम्, तम्, साधुवृक्षम्, सुहृद्विहङ्गाः, सुखम्, आश्रयन्ति ? ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ—गुणप्रवालम्=गुणरूपी नवपल्लवों=कोपलों वाले, विनयप्रशाखम्=विनम्रतारूपी शाखाओंवाले, विश्रम्भमूलम्=विश्वासरूपी जड़वाले, महनीयपुष्पम्=बड़प्पनरूपी फूलोंवाले, स्वगुणैः=अपने गुणों से, फलाढ्यम्=फलों से परिपूर्ण, तम्=उस, साधुवृक्षम्=सज्जनरूपी वृक्ष पर, सुहृद्विहङ्गाः=मित्ररूपी पक्षीगण, सुखम्=सुखपूर्वक, आश्रयन्ति=बैठते हैं ॥ ३२ ॥
अर्थ—वसन्तसेना—अरे मैत्रेय ! इस समय भी क्या—
गुण ही जिसके नवपल्लव हैं, विनम्रता ही शाखायें है, विश्वास ही जड़ें हैं, बड़प्पन ही फूल हैं, अपने गुणों से फलपरिपूर्ण ऐसे उस सज्जनरूपी ( चारुदत्त ) वृक्ष पर मित्ररूपीपक्षी सुखपूर्वक आश्रय लेते हैं अर्थात् अभी भी मित्रगण उनके पास आते हैं ? ॥ ३२ ॥
टीका—विभववन्तमेव बन्धुम्मन्याः सेवन्ते इति लोके दृश्यते, भवान् निर्धन-मपि चारुदत्तं किं पूर्ववत् सेवते ? इति जिज्ञासायामाह—गुणप्रवालमिति। गुणाः=दयादाक्षिण्यादय एव प्रवालाः=नवपल्लवाः यस्य तम्, विनयः = विनम्रता एव, प्रशाखाः-प्रकृष्टाः शाखाः यस्य तम्, विश्रम्भः=विश्वासः एव मूलं यस्य तम्, महनीयम्=पूजनीयचरित्रमेव पुष्पं यस्य तम्, स्वगुणैः=निजसद्गुणैः, फलाढ्यम्=
२६६ मृच्छकटिकम्
विदूषकः— (स्वगतम्) सुट्ठु उवलक्खिदं दुट्टविलासिणीए। (प्रकाशम्) अध इं। (सुष्ठु उपलक्षितं दुष्टविलासिन्या। अथ किम् ?)
वसन्तसेना— अये ! किमागमनप्रयोजनम् ?
विदूषकः— सुणादु भोदी। तत्तभवं चारुदत्तो सीसे अञ्जलिं कदुअ भोदिं विष्णवेदि। (शृणोतु भवती। तत्रभवान् चारुदत्तः शीर्षे अञ्जलिं कृत्वा भवतीं विज्ञापयति।)
वसन्तसेना— (अञ्जलि बद्ध्वा) किमाज्ञापयति ?
विदूषकः— मए तं सुवण्णभण्डअं विस्सम्भादो अत्तणकेरकेत्ति कदुअ जूदे हारिदं। सो अ सहिओ राजवात्थहारी ण जाणिअदि कहिं गदो त्ति। (मया तत् सुवर्णभाण्डं विस्रम्भादात्मीयमिति कृत्वा द्यूते हारितम्। स च सभिको राजवार्ताहारी न ज्ञायते कुत्र गत इति।)
चेटी— अज्जए ! दिट्ठिआ वड्ढसि। अज्जो जूदिअरो संवृत्तो। (आर्ये ! दिष्ट्या वर्द्धसे। आर्यो द्यूतकरः संवृत्तः।)
वसन्तसेना— (स्वगतम्) कथं चोरेण अवहिदं पि सोण्डोरदाए जूदे हारिदं त्ति भणादि। अदो ज्जेव कामीअदि। (कथं चौरेणापहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।)
फलपरिपूर्णम् तम्=पूर्वोक्तम्, चारुदत्तरूपम् साधुवृक्षम्=सज्जनमहीरुहम्, सुहृदः=मित्राणि एव विहङ्गाः=पक्षिणः, सुखम्=सानन्दं यथा स्यात् तथा आश्रयन्ति=अवलम्बन्ते, किम् ? अत्र रूपकमलङ्कारः, उपजातिः वृत्तम् ॥ ३२ ॥
अर्थ—विदूषक— (अपने में) इस कुटिल वेश्या ने ठीक ही अनुमान किया है। (प्रकटरूप में) और क्या ? [अर्थात् मित्र अभी भी उनके साथ हैं।]
वसन्तसेना— अच्छा, आपके आने का उद्देश्य क्या है ?
विदूषक— आयें सुनिये, सम्माननीय चारुदत्त सिर पर अंजिल बाँध कर आपसे प्रार्थना करते हैं।
वसन्तसेना— (हाथ जोड़ कर) क्या आज्ञा देते हैं ?
विदूषक— मैं विश्वास करके अपना मानकर उस गहनों के पात्र को जुआ में हार गया हूँ। और राजाओं का सन्देश पहुँचाने वाला वह प्रधान जुआरी न जाने कहाँ चला गया है, यह मालूम नहीं है।
चेटी— आयें ! आपकी भाग्यवृद्धि हो रही है। आर्य जुआड़ी बन गये।
वसन्तसेना— (अपने में) क्या चोर द्वारा चुराये गये भी [आभूषणों के डब्बे], को उदारता के कारण जुआ में हार गया, ऐसा कह रहें हैं ? इसी कारण इन्हें चाहती हूँ।
चतुर्थोऽङ्कः २६७
विदूषकः--ता तस्स कारणादो गेण्हदु भोदी इमं रअणावलिं । (तत् तस्य कारणात् गृह्णातु भवती इमां रत्नावलीम् ।)
वसन्तसेना-- (आत्मगतम्) किं दसेमि तं अलङ्कारअं ? (विचिन्त्य) अथवा ण दाव । (किं दर्शयामि तमलङ्कारकम् ? अथवा न तावत् ।)
विदूषकः--किं दाव ण गेण्हदि भोदी एदं रअणावलिं ? (किं तावत् न गृह्णाति भवती एतां रत्नावलीम् ?)
वसन्तसेना-- (विहस्य सखीमुखं पश्यन्ती) मित्तेअ ! कथं ण गेण्हिस्सं रअणावलिं । (इति गृहीत्वा पार्श्वे स्थापयति। स्वगतम्) कथं झीणकुसुमादो वि सहआरपादवादो मअरन्दविन्दओ णिवडन्ति । (प्रकाशम्) अज्ज ! विण्णवेहि तं जूदिअरं मम वअणेण अज्जचारुदत्तं-‘अहं पि पदोसे अज्जं पेक्खिदुं आअच्छामि’ त्ति । (मैत्रेय ! कथं न ग्रहीष्यामि रत्नावलीम् ? कथं हीनकुसुमादपि सहकारपादपात् मकरन्दविन्दवो निपतन्ति । आर्य ! विज्ञापय तं द्यूतकरं मम वचनेन आर्यचारुदत्तम्—‘अहमपि प्रदोषे आर्यं प्रेक्षितुमागच्छामि’ इति)
विदूषकः-- (स्वगतम्) किं अण्णं तहिं गदुअ गेण्हिस्सदि । (प्रकाशम्) भोदि ! भणामि (स्वगतम्) णिअत्तीअदु गणिआसङ्गादो त्ति । (किमन्यत् तस्मिन् गत्वा ग्रहीष्यति । भवति ! भणामि । निवर्त्ततामस्माद् गणिकाप्रसङ्गात् इति ।)
(इति निष्क्रान्तः ।)
वसन्तसेना--हञ्जे ! गेण्ह एदं अलङ्कारअं चारुदत्तं अहिरमिदुं गच्छम्ह । (हञ्जे ! गृहाणैतमलङ्कारम्, चारुदत्तमभिरन्तुं गच्छामः ।)
विदूषक – इस कारण उसके बदले में आप इस रत्नावली को स्वीकार लें ।
वसन्तसेना-- (अपने में) क्या वह गहनों का डब्बा दिखा दूँ । (सोचकर) अथवा अभी नहीं ।
विदूषक – तो क्या आप इस रत्नावली को नहीं ले रही हैं ?
वसन्तसेना-- (हँस कर सखी का मुख देखती हुई) मैत्रेय ! रत्नावली क्यों नहीं लूँगी ? (इस प्रकार लेकर समीप में रख लेती है। अपने में) क्या पुष्प (मंजरी)-हीन आम के वृक्ष से भी मकरन्द की बूँदें गिरतीं हैं ? (प्रकाश) आर्य मेरी ओर से उस जुआड़ी चारुदत्त से कह देना–‘मैं भी शाम को आर्य का दर्शन करने के लिये आ रही हूँ।’
विदूषक-- (अपने में) क्या वहाँ जाकर और दूसरी चीज लेगी ? (प्रकाश) श्रीमती जी ! कह दूँगा–(अपने में) ‘इस वेश्या के साथ से अलग हो जाओ । (इसका साथ छोड़ दो)।’
(यह कह कर चला जाता है ।)
वसन्तसेना--सखि ! इस आभूषण को पकड़ो (रखो) । चारुदत्त के साथ अभिरमण=कामक्रीडा करने के लिये चलते हैं ।
२६८ मृच्छकटिकम्
चेटी—अज्जए ! पेक्ख पेक्ख, उण्णमदि अकालदुद्दिणं। (आय्ये! प्रेक्षस्व, प्रेक्षस्व, उन्नमति अकालदुर्द्दिनम्।)
वसन्तसेना—
उदयन्तु नाम मेघाः भवतु निशा, वर्षमविरतं पततु।
गणयामि नैव सर्वं दयिताभिमुखेन हृदयेन॥ ३३॥
हज्जे हारं गेण्हिअ लहुँ आअच्छ। (हञ्जे ! हारं गृहीत्वा लघु आगच्छ।)
इति निष्क्रान्ताः सर्वे।
इति मदनिका-शर्विलको नाम चतुर्थोऽङ्कः।
—: ० :—
चेटो-सखि देखो, देखो, असमय में ही दुर्दिन (मेघों से युक्त दिन) उमड़ रहा है।
अन्वयः—मेघाः, उदयन्तु, नाम; निशा, भवतु; अविरतम् वर्षम्, पततु; दयिताभिमुखेन, हृदयेन, सर्वम्, नैव, गणयामि॥ ३३॥
शब्दार्थ—मेघाः=बादल, (घटायें), उदयन्तु=उमड कर आजायें; निशा=रात, भवतु=हो जाय; अविरतम्=लगातार, वर्षम् = वर्षा, पततु=होती रहे; (किन्तु) दयिताभिमुखेन = प्रियसमासक्त-हृदयेन = हृदय के कारण, सर्वम्=इन सभी को, नैव=कुछ भी नहीं, गणयामि=गिनती हूँ॥ ३३॥
अर्थ—वसन्तसेना—घोर घटायें उमड़ कर आ जायें, रात हो जाय, लगातार वर्षा होती रहे; किन्तु प्रिय चारुदत्त में समासक्त चित्त के कारण इन सभी को कुछ भी नहीं गिनती हूँ॥ ३३॥
टीका—अयि अविज्ञातमच्चित्ते! मेघादीनां विभीषिकां मां किं दर्शयसि। साम्प्रतं कोपि मां चारुदत्तरमणात् प्रतिरोद्धुं न शक्नोति इत्यत आह—उदयन्त्विति। मेघाः = मेघघटाः, उदयन्तु = उद्गच्छन्तु, नाम इति स्वीकारे। निशा=रात्रिः, भवतु=अस्तु, अविरतम्=अनवरतम्, वर्षम् =वृष्टिः, पततु=क्षरतु, किन्तु दयितस्य=चारुदत्तस्य अभिमुखेन=तं प्रति गमनायोत्सुकेन, चित्तेन=हृदयेन, सर्वम् =पूर्वोक्तम्, नैव=न किञ्चिदपि, गणयामि=चिन्तयामि। एतत् सर्वमेकस्मिन्नदसरेऽपि आगत्य मामवरोद्धुं न समर्थमिति भावः। आर्या वृत्तम्॥ ३३॥
अर्थ—सखि! हार लेकर शीघ्र ही आ जाओ।
इस प्रकार सभी चले जाते हैं।
॥ इस प्रकार मदनिका और शर्विलक नामक चतुर्थ अंक समाप्त हुआ॥
॥ इस प्रकार जयशङ्करलाल-त्रिपाठि-विरचित 'भावप्रकाशिका' व्याख्या में मृच्छकटिक का चतुर्थ अङ्क समाप्त हुआ॥
पञ्चमोऽङ्कः (दुर्दिन - वर्षा वर्णन)
पञ्चमोऽङ्कः
( ततः प्रविशति आसनस्थः सोत्कण्ठश्चारुदत्तः । )
चारुदत्तः-- ( ऊर्ध्वमवलोक्य ) उन्नमत्यकालदुर्दिनम् । यदेतत्--
आलोकितं गृहशिखण्डिभिरुत्कलापैः
हंसैर्यियासुभिरपाकृतमुन्मनस्कैः ।
आकालिकं सपदि दुर्दिनमन्तरिक्ष-
मुत्कण्ठितस्य हृदयञ्च समं रुणद्धि ॥ १ ॥
(इसके बाद आसन पर बैठे हुये उत्कण्ठित (विरहकातर) चारुदत्त का प्रवेश ।)
अन्वयः--उत्कलापैः, गृहशिखण्डिभिः, आलोकितम्, यियासुभिः, उन्मनस्कैः, हंसैः, अपाकृतम्, आकालिकम्, दुर्दिनम्, सपदि, अन्तरिक्षम्, उत्कण्ठितस्य, हृदयम्, च, समम्, रुणद्धि ॥ १ ॥
शब्दार्थ--उत्कलापैः=पंखों को ऊपर फैलाये हुये, गृहशिखण्डिभिः=घरेलू=पालतू मोरों द्वारा, आलोकितम्=देखा गया; यियासुभिः=[ मानसरोवर ] जाने के इच्छुक, उन्मनस्कैः=खिन्न मनवाले, हंसैः=हंसों द्वारा, अपाकृतम्=तिरस्कृत किया गया, आकालिकम् = असमय में होनेवाला, दुर्दिनम्=मेघाच्छन्न दिन, सपदि=शीघ्र ही, अन्तरिक्षम् = आकाश को, च = और, उत्कण्ठितस्य = विरहातुर व्यक्ति के, हृदयम्=हृदय को, समम्=एक साथ, रुणद्धि=आवृत कर रहा है, ढंक ले रहा है ॥१॥
अर्थ--चारुदत्त--( ऊपर की ओर देखकर ) असमय में होनेवाला दुर्दिन ( मेघाच्छन्न दिन ) बढ़ता जा रहा है । जो यह ---
पंखों को ऊपर फैलाये हुये मोरों द्वारा देखा गया, ( मानसरोवर ) जाने के इच्छुक उदास हंसों द्वारा तिरस्कृत किया गया, असमय का यह दुर्दिन ( बादलों से घिरा हुआ दिन ) शीघ्र ही आकाश तथा विरही व्यक्ति के हृदय को एकही साथ आच्छादित कर ( ढक ) रहा है ॥ १ ॥
टीका--पूर्वं वसन्तसेनोक्तं दुर्दिनमेव चारुदत्त-कथनेनापि साधयन्नाह--आलोकितमिति । उत्कलापैः उत्=ऊर्ध्वं गताः कलापाः=पिच्छाः येषां ते तादृशैः, (मेघोदये कलापिनां हर्षपूर्वकं नृत्यं भवतीति लोके कविसम्प्रदाये च प्रसिद्धिः । ) गृहशिखण्डिभिः=गृहपरिपालितमयूरैः, आलोकितम्=सस्पृहं यथा स्यात् तथा विलोकितम्, यियासुभिः = मानसरोवरं जिगमिषुभिः, उन्मनस्कैः = उत्कण्ठितैः, हंसैः=मरालैः, अपाकृतम् = निराकृतम्, अनभिनन्दितमिति भावः, आकालिकम्=अकाले उत्पन्नम्, दुर्दिनम् = मेघाच्छन्नं दिनम्, वस्तुतस्तु लक्षणया दुर्दिनशब्दो मेघपर इति
३०० मृच्छकटिकम्
अपि च—
मेघो जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलो
विद्युत्प्रभा-रचित-पीत-पटोत्तरीयः ।
आभाति संहतबलाक-गृहीतशङ्खः
खं केशवोऽपर इवाक्रमितुं प्रवृत्तः ॥ २ ॥
जीवानन्दः, सपदि=सत्त्वरम्, अन्तरिक्षम्=गगनम्, उत्कण्ठितस्य=प्रियविरहव्याकुलस्य जनस्य, हृदयम्=मानसम्, च=तथा, समम्=एककालमेव, रुणद्धि=आवृणोति, विषयान्तरात् विमुखीकरोति चित्तमिति भावः। अत्र सहोक्तिरलङ्कारः, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १ ॥
**विमर्श—**कामप्रभाववृद्धि में वर्षा का विशेष योग रहता है। यहाँ छह श्लोकों में यही वर्णन है। 'मेघाच्छन्नं तु दुर्दिनम्' कोश के अनुसार बादलों से घिरा हुआ दिन 'दुर्दिन' होता है। परन्तु यहाँ केवल मेघ अर्थ करना चाहिये क्योंकि मेघ ही आकाश और चित्त दोनों को आच्छादित करता है ॥ १ ॥
अन्वय—जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः, विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः, संहतबलाकगृहीतशङ्खः, अपरः, केशवः, इव, खम्, आक्रमितुम्, प्रवृत्तः, मेघः, आभाति ॥२॥
शब्दार्थ—जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः = पानी से गीले किये गये भैंसे के पेट और भौंरे के समान नील (काले) वर्णवाला, विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः= बिजली की चमक से बने हुये पीले दुपट्टे वाला, **संहतबलाकगृहीतशङ्खः=**एक साथ चलनेवाले बगुलों की पंक्तिरूपी शंख को लेनेवाला, अपरः = दूसरे, **केशवः=**विष्णु के, **इव=**समान, खम् = आकाश को, **आक्रमितुम्=**लांघने के लिये, **प्रवृत्तः=**सन्नद्ध, तैयार, **मेघः=**बादल, **आभाति=**शोभित हो रहा है।
विष्णुपक्ष में—**जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः—**इसमें अर्थभेद नहीं है। परन्तु **विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः’—**बिजली की चमक के समान बने हुये पीतवस्त्र के दुपट्टे वाले—**और संहतबलाकगृहीतशङ्खः=**एकत्रित बगुलों की पंक्ति के समान पाञ्चजन्यनामक अपने शंख को धारण किये हुये—यह अर्थ है ॥ २ ॥
अर्थ—और भी—
पानी से गीले किये गये भैंसे के पेट और भौंरें के समान काला, बिजली की चमक से बने हुये पीतवस्त्र के दुपट्टे को धारण करनेवाला, (विष्णुपक्ष में—बिजली की कान्ति के समान बने हुये पीताम्बर के दुपट्टेवाले), एकत्रित बगुलों की पंक्तिरूपी शंखवाला (विष्णुपक्ष में—एकत्रित हुये बगुलों की पांत के समान शंख को धारण करनेवाले) दूसरे (वामनरूपधारी) विष्णु के समान, आकाश को लांघने के लिये तैयार मेघ शोभित हो रहा है। [यहाँ वामनरूपी विष्णु के साथ मेघ की सुन्दर उपमा है।] ॥ २ ॥
पञ्चमोऽङ्कः ३०१
अपि च—
केशवगात्रश्यामः, कुटिल-बलाकावली-रचित-शङ्खः । विद्युद्गुणकौशेयश्चक्रधर इवोन्नतो मेघः ॥ ३ ॥
टीका—मेघसौन्दर्यं वर्णयन्नाह—मेघ इति। जलेनाद्रं जलाद्रं च तन्महि- षोदरं च जलाद्रंमहिषोदरं भृङ्गश्च तद्वन्नीलः = श्यामः। महिषस्य स्वत एव श्यामत्वेऽपि जलाद्रंस्यातिश्यामलता ततोऽप्युदरदेशे नैल्याधिक्यमिति प्रतिपादनाय तथोक्तिः। विद्युत्प्रभया रचितं पीतपटवदुत्तरीयं यस्य सः। विष्णुपक्षे विद्युत्प्रभा इव रचितं पीतपटः=पीताम्बरमेव उत्तरीयं येन सः; संहता=पुञ्जीभूताः बलाकाः= बका एव गृहीतः शंखो येन सः, विष्णुपक्षे संहतबलाकवद् गृहीतः शङ्खः=पाञ्चजन्यो येन सः, वर्णेन साम्यम्; एतादृशः मेघः=घनः, अपरः=अन्यः, केशवः=विष्णुः, इव, खम् = आकाशम्, आक्रमितुम् = आच्छादयितुम्, विष्णुपक्षे पादविक्षेपेणाधिकर्तुम्, प्रवृत्तः=उद्युक्तः सन्, विभाति=शोभते। अत्र प्रसिद्धातिरिक्तस्य केशवस्याभेदेन मेघे उत्कटकोटिकसंशयादुत्प्रेक्षालङ्कारः। एवं प्रथमे पादे तादृशमहिषोदरभृङ्गाभ्यां मेघस्य अवैधर्म्यसाम्यकथनात् उपमा, द्वितीये च विद्युत्प्रभायां विषये तादात्म्येना- रोपितस्य पीतोत्तरीयस्य केशवसाम्यरूपप्रकृतार्थोपयोगित्वात् परिणामालंकारः, तृतीये च निरपह्नुतविषये बलाके शङ्खस्याभेदेनारोपात् रूपकम्—इत्येतेषाम- लङ्काराणां परस्परसापेक्षतया सङ्करः इति जीवानन्दाचार्यः। वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ २ ॥
विमर्श—इसमें मेघ का वर्णन वामनरूपधारी विष्णु के समान किया गया है। पौराणिक कथानुसार वामनरूप में विष्णु ने आकाशपर्यन्त पैर से नाप लिया था। इसमें संकर अलङ्कार की छटा संस्कृत टीका में देखें ॥ २ ॥
अन्वयः—केशवगात्रश्यामः, कुटिलबलाकावलीरचितशङ्खः, विद्युद्गुणकौशेयः, मेघः, चक्रधरः, इव, उन्नत:, [ दृश्यते ] ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—केशवगात्रश्यामः = भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर के समान श्याँवला, कुटिलबलाकावलीरचितशङ्खः = तिरछी बगुलियों की पंक्तिरूपी शङ्ख धारण करने वाला, विद्युद्गुणकौशेयः=बिजली रूपी सूत्रों से बने हुये रेशमी वस्त्रवाला, मेघः= बादल, चक्रधरः=चक्रधारी, विष्णु, इव=के समान, उन्नत:=उमड़ता हुआ [ दृश्यते= दिखाई दे रहा है । ] ॥ ३ ॥
अर्थ—और भी— भगवान् श्रीकृष्ण के समान श्याँवले रंगवाला, बगुलों की तिरछी पंक्तिरूपी शङ्ख धारण करने वाला, बिजलीरूपी सूत्रों से बने हुये रेशमी वस्त्र (पीताम्बर) वाला बादल चक्रधारी विष्णु के समान उमड़ता हुआ [ दिखाई ] दे रहा है ॥३॥
| ३०२ | मृच्छकटिकम् |
|---|
एता निषिक्तरजतद्रवसन्निकाशा धारा जवेन पतिता जलदोदरेभ्यः।
विद्युत्प्रदोषशिखया क्षणनष्टदृष्टाश्छिन्ना इवाम्बरपटस्य दशाः पतन्ति ॥४॥
टीका — पूर्वोक्तमेवार्थं पुनरार्यया प्रतिपादयति—केशवेति। केशवगात्रवत् = श्रीकृष्णशरीरमिव, श्यामः=नीलः, कुटिला=वक्रा या, बलाकानाम्=वकानाम् अवलो=पङ्क्तिः, सा एव रचितः = धृतः, शङ्खः - कम्बुः येन सः तादृशः, विद्युत्=तडित् एव, गुणः = सूत्रम्, तदेव कौशेयम्=चीनवस्त्रं यस्य सः तथोक्तः, मेघः = जलधरः, चक्रधरः=चक्रधारी विष्णुः, इव=यथा, उन्नतः=उदितः, दृश्यते इति शेषः। उपमा रूपकं चालंकारौ। आर्या वृत्तम् ॥ ३ ॥
विमर्श—इसमें द्वितीय श्लोक के भावार्थ की पुनरुक्ति है। अतः यह प्रक्षिप्त सा प्रतीत होता है ॥ ३ ॥
अन्वयः—निषिक्तरजतद्रवसन्निकाशाः, जलदोदरेभ्य, जवेन, पतिताः, विद्युत्प्रदीपशिखया, क्षणदृष्टनष्टाः, एताः, धाराः, अम्बरपटस्य, छिन्नाः, दशाः, इव, पतन्ति ॥ ४ ॥
शब्दार्थ—निषिक्तरजतद्रवसन्निकाशाः=टपकते हुये चाँदी के घोल के समान, जलदोदरेभ्यः=मेघों के पेटों से, जवेन=शीघ्रता से, पतिताः=गिरती हुयीं विद्युत्प्रदीपशिखया=बिजलीरूपीदीपक की शिखा (लौ) से, क्षणदृष्टनष्टाः=क्षणभर के लिये दिखाई देकर नष्ट = अदृश्य हो जानेवाली, एताः = ये, धाराः = जलधारायें, अम्बरपटस्य=आकाशरूपी वस्त्र की, छिन्नाः=टूटी हुई, दशाः=छोर, इव=के समान, पतन्ति=गिर रहीं हैं ॥ ४ ॥
अर्थ—टपकते हुये चाँदी के घोल के समान, मेघों के पेट (मध्यभाग) से जल्दी जल्दी गिरतीं हुयीं, बिजलीरूपी दीपक की शिखा से क्षणभर के लिये दिखाई देकर अदृश्य हो जानेवालीं ये पानी की धारायें आकाशरूपी वस्त्र के टूटे हुये छोर=सूत्रों के समान गिर रहीं हैं ॥ ४ ॥
टीका—दुर्दिनस्यैव वैचित्र्यं निरूपयति—एता इति। निषिक्ताः=क्षरिताः, ये रजतद्रवाः=द्रवीभूतरजतानीत्यर्थः, तेषां सन्निकाशाः=समानाः, जलदानाम्=मेघानाम्, उदरेभ्यः=जठरेभ्यः, पतिताः = निर्गताः, विद्युदेव=तडिदेव, प्रदीपशिखा=दीपकज्वाला, तया, क्षणेन=मुहूर्तम्, दृष्टाः=अवलोकिताः पश्चात् नष्टाः=अदर्शनं गताः, एताः = पुरो वर्तमानाः, धाराः = जलधाराः, अम्बरपटस्य = आकाशरूपवस्त्रस्य, छिन्नाः = त्रुटिताः, दशाः = प्रान्तभागाः, सूत्राणि, इव, पतन्ति = क्षरन्ति। यथा जीर्णवस्त्रात् सूत्राणि निःसृत्य पतन्ति तथैव आकाशात् जलधाराः क्षरन्तीति भावः। अत्र रूपकमुत्प्रेक्षा चालङ्कारौ वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽङ्कः ३०३
संसक्तैरिव चक्रवाकमिथुनैर्हंसैः प्रडीनैरिव
व्याविद्धैरिव मीनचक्रमकरैर्हर्म्यैरिव प्रोच्छ्रितैः ।
तैस्तैराकृतिविस्तरैरनुगतैर्मेघैः समभ्युन्नतैः
पत्रच्छेद्यमिवेह भाति गगनं विश्लेषितैर्वायुना ॥ ५ ॥
अन्वयः—संसक्तैः, चक्रवाकमिथुनैः, इव, प्रडीनैः, हंसैः, इव व्याविद्धैः, मीनचक्र-मकरैः, इव, प्रोच्छ्रितैः, हर्म्यैः, इव, तैः, तैः, आकृतिविस्तरैः, वायुना, विश्लेषितैः, अनुगतै, समभ्युन्नतैः, मेघैः, इह, गगनम्, पत्रच्छेद्यम्, इव, भाति ॥ ५ ॥
शब्दार्थः—संसक्तैः = आपस में सटे हुये, चक्रवाकमिथुनैः = चकवी चकवे के जोड़ों के, इव=समान, प्रडीनैः=उड़ते हुये, हंसैः=हंसों के, इव=समान, व्याविद्धैः=इधर उधर उछाले गये, मीनचक्रमकरैः=मछलियों के समुदाय और मकरों के, इव=समान, प्रोच्छ्रितैः=अत्यन्त ऊँचे, हर्म्यैः=महलों के, इव=समान, तैः तैः=उन-उन, आकृतिविस्तरैः = आकार से फैलनेवाले, वायुना=हवा से, विश्लेषितैः=अलग किये गये, अनुगतैः=एक दूसरे के पीछे आनेवाले, समभ्युन्नतैः=बहुत ऊँचे, मेघैः=बादलों से, इह=यहाँ, गगनम्=आकाश, पत्रच्छेद्यम्=चित्र के, इव=समान, भाति=शोभित हो रहा है ॥ ५ ॥
अर्थ—आपस में मिले हुये चकवीचकवे के जोड़े के समान, उड़ते हुये हंसों के समान, (समुद्रमन्थन के समय इधर उधर) उछाले गये मछलियों के समूह और मकरों के समान, अत्यन्त ऊँचे ऊँचे महलों के समान, उन उन [भिन्न भिन्न] आकारों के विस्तारवाले, हवा के [झोकों] द्वारा तितर बितर किये गये, एक दूसरे के पीछे आने वाले, ऊँचे ऊँचे बादलों से यहाँ आकाश चित्र के समान शोभित हो रहा है ॥ ५ ॥
टीका—दुर्दिनमेव भङ्ग्यन्तरेण साधयति—संसक्तैरिति । संसक्तैः=परस्पर-मिलितैः, चक्रवाकमिथुनैः=कोकयुगलैः, इव; प्रडीनैः=उड्डीयमानैः, हंसैः=मरालैः, इव; व्याविद्धैः=समुद्रमथनकाले समन्तात् विक्षिप्तैः, मीनानाम्=मत्स्यानाम्, चक्रैः=समूहैः, तथा मकरैः=एतन्नाम्ना प्रसिद्धैः जलजन्तुविशेषैः, इव; प्रोच्छ्रितैः=अत्युन्नतैः, हर्म्यैः=प्रासादैः इव; तैः तैः=तत्तद्दिगवस्थितैः, आकृतिभिः=आकृतिभेदेन, विस्तरैः =बहुलैः, वायुना=पवनेन, विश्लेषितैः=इतस्ततश्चालितैः, अनुगतैः=युक्तैः, समभ्युन्नतैः=अत्युन्नतैः, मेघैः=जलदैः, करणभूतैः, इह=एतद्देशावच्छिन्नम्, गगनम्=आकाश-तलम्, पत्रच्छेद्यम्=आलेख्यम्, चित्रम्, इव, भाति=शोभते । यथा चित्रं विविधाकृति-विशिष्टं भवति तथैवाकाशमपि वर्तते । अत्र वायुवेगविच्छिन्ने प्रकृते मेघे तत्तद्-विशेषणविशिष्टानां परेषां चक्रवाकमिथुनादीनामुत्कटकोटिकसंशयादुत्प्रेक्षालङ्कार इति तत्त्वविदः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ ५ ॥
| ३०४ | मृच्छकटिकम् |
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एतत्तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशं मेघान्धकारं नभो दृष्टो गर्जति चातिदर्पितबलो दुर्योधनो वा शिखी । अक्षद्यूतजितो युधिष्ठिर इवाध्वानं गतः कोकिलो हंसाः सम्प्रति पाण्डवा इव वनादज्ञातचर्यां गताः ॥ ६ ॥
अन्वयः—मेघान्धकारम्, एतत्, नभः, तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशम्, [ अस्ति ]; अतिदर्पितबलः, शिखी, दुर्योधनः, वा, दृष्टः [ सन् ], गर्जति; कोकिलः, अक्षद्यूत-जितः, युधिष्ठिरः, इव, अध्वानम्, गतः, सम्प्रति, हंसाः, पाण्डवाः, इव, वनात्, अज्ञातचर्याम्, गताः ॥ ६ ॥
शब्दार्थ—मेघान्धकारम् = मेघों के कारण अन्धकारयुक्त, एतत्=यह, नभः=आकाश, तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशम्=उस धृतराष्ट्र के मुख के समान, [ अस्ति=है ]; अतिदर्पितबलः=रूप के अति घमण्डवाला [ दुर्योधनपक्ष में—अत्यन्त अभिमानयुक्त सेनावाला ], शिखी=मोर, दुर्योधनः वा=दुर्योधन के समान, हृष्टः=हर्षित होता हुआ, गर्जति = चिल्ला रहा है; कोकिलः=कोयल, अक्षद्यूतजितः=पासे के खेल में पराजित, युधिष्ठिरः=ज्येष्ठ पाण्डव, इव=के समान, अध्वानम्=मौन [ अध्वानम् । युधिष्ठिर पक्ष में वनमार्ग ] को, गतः = चली गयी है, सम्प्रति=इस वर्षाकाल में, हंसाः=हंस पक्षी, पाण्डवाः=पाण्डवों के, इव=समान, वनात्=वनसे, अज्ञातचर्याम्=अज्ञातवास को, गताः=चले गये ॥ ६ ॥
अर्थ—[ दुर्योधन के कुशासन की तुलना वर्षा के साथ है । ] बादलों के कारण अन्धकारयुक्त यह आकाश धृतराष्ट्र ( दुर्योधन के पिता ) के मुख के समान है । [ आंखों से रहित धृतराष्ट्र का मुख और चन्द्रसूर्यरहित आकाश इन दोनों की समानता है । ] अपने रूप के घमण्डवाला मोर [ दुर्योधनपक्ष में अतिघमण्डी सेनावाला ] दुर्योधन के समान प्रसन्न होता हुआ शब्द कर रहा है । कोयल पांसे में हारे हुये युधिष्ठिर के समान मौन [ युधिष्ठिर पक्ष में—वनमार्ग ] को प्राप्त हो गयी है । इस वर्षाऋतु में हंस पाण्डवों के समान वन [ हंसपक्ष में पानी ] से अज्ञातवास को चले गये हैं [ अर्थात् वन से जैसे पाण्डव अज्ञातस्थान पर चले गये उसी प्रकार यहाँ के वन=जल को छोड़कर हंस मानसरोवर चले गये । ] ॥ ६ ॥
टीका—वर्षाकाले विविधप्राणिनां स्वाभाविकीं स्थितिं वर्णयति—एतदिति । मेघैः=अभ्रैः, अन्धकारः=तमो यत्र तत्, एतत्=दृश्यमानम्, नभः=गगनम्, तस्य=प्रसिद्धस्य महाभारतीस्य धृतराष्ट्रस्य=दुर्योधनजनकस्य, वक्त्रसदृशम्=आननतुल्यम्; सादृश्यञ्चोभयोः आलोकनासामर्थ्यरूपम्, यथा नेत्रशून्यतया धृतराष्ट्रोऽवलोकयितुं न समर्थः तथैव सूर्यचन्द्राभावात् गगनमपि प्रकाशशून्यमस्तीति भावः, अतिदर्पितबलः = मयूरपक्षे—मेघावलोकनजन्मानन्दाभिव्यञ्जकम्, बलम् = रूपम् यस्य
पञ्चमोऽङ्कः ३०५
( विचिन्त्य ) चिरं खलु कालो मैत्रेयस्य वसन्तसेनायाः सकाशं गतस्य, नाद्यापि आगच्छति ।
( प्रविश्य )
विदूषकः- अहो ! गणिआए लोभो अदक्खिणदा अ, जदो ण कधावि किदा अण्णा, अणाअरेण ज्जेव अभणिअ किंपि एवमेव गहिदा रअणावली । एत्तिआए ऋद्धीए ण तए अहं भणिदो, 'अज्ज मित्तअ ! वीसमीअदु मल्ल-
तादृशः, दुर्योधनपक्षे -अतिदर्पितम् = अतिगर्वितम्, बलम् = सैन्यम् यस्य तादृशः, शिखी = मयूरः, दुर्योधनः = ज्येष्ठकौरवः, वा = इव ( वा स्याद् विकल्पोपमयोरेवा- र्थेऽपि समुच्चये — इति विश्वः ) हृष्टः = प्रसन्नः, सन्, गर्जति = शब्दायते, पक्षे दर्पयुक्तं गर्जनं करोति; कोकिलः = पिकः, अक्षद्यूते = पाशक्रीडायाम्, निर्जितः= पराभूतः, युधिष्ठिरः = ज्येष्ठपाण्डवः, इव, अध्वानम् = ध्वानस्य = शब्दस्य अभावम्, मौनमित्यर्थः, पक्षे वनमार्गम्, गतः=प्राप्तः, कोकिलः मौनोऽभूत्, पराज- यात् युधिष्ठिरो वनं जगाम; सम्प्रति = अस्मिन् वर्षाकाले, हंसाः = मरालाः, पाण्डवाः = पाण्डुपुत्राः, इव, वनात् = जलात् 'जीवनं भुवनं वनम्' इत्यमरः, पक्षे सर्वविदित- वनात्, यद्वा ल्यब्लोपे पञ्चमी, वनं परित्यज्येत्यर्थः अज्ञाते = लोकैरविदिते विराटराज्ये इत्यर्थः, हंसपक्षे अज्ञाते = लोकैरविदिते मानसरोवराख्ये, चर्याम् = गमनम्, गताः = प्राप्ताः, वर्षातौ हंसा मानसरोवरं यान्तीति प्रसिद्धिः । अत्रोपमालङ्कारः, शार्दूल- विक्रीडितं वृत्तम् '। ६ ।।
विमर्श- जन्मान्ध धृतराष्ट्र और चन्द्रसूर्यरहित आकाश की सुन्दर उपमा है । कोकिल शब्द पुल्लिङ्ग है । ध्वान = शब्द, न ध्वानम् = अध्वानम् अर्थात् मौन । युधिष्ठिरपक्ष में अध्वानम् = मार्ग द्वितीयान्त एकवचन है। अज्ञातचर्याम् के स्थान पर अज्ञातचर्यम्-यह भी पाठ है। 'वा' शब्द इव के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है- 'वा स्याद्विकल्पोपमयोरेवार्थेऽपि समुच्चये । विश्वकोष । यहाँ चारों पादों में उपमायें हैं ।। ६ ।।
अर्थ- ( सोंचकर ) मैत्रेय को वसन्तसेना के पास गये हुये बहुत समय बीत चुका है, अभी भी नहीं [ वापस ] आया है ।
शब्दार्थ- अदक्षिणता = उदार न होना । मल्लकेन = मिट्टी आदि के बर्तन से । अकन्दसमुत्थिता = बिना जड़ के पैदा होने वाली । अकलहः = झगड़ारहित, ग्राम-समागमः = गाँव वालों की सभा । गणिकाप्रसङ्गात् = वेश्या के सम्पर्क से ।
( प्रवेश करके )
अर्थ-विदूषक- अहो ! वसन्तसेना का लोभ और अनुदारता ( देखो ) । ( रत्नावली लेने के ) अतिरिक्त दूसरी बात ही नहीं कही । उपेक्षापूर्वक बिना
२० मृ०
३०६ मृच्छकटिकम्
केण पाणीअं पि पिविय गच्छीअदु त्ति । ता मा दाव दासीए धीआए गणि- आए मुहं पि पेक्खिस्सं । ( सनिर्वेदम् ) सुट्ठु क्खु वुच्चदि 'अकन्दसमुत्थिदा पउमिणी, अवञ्चओ वाणिओ अचोरो सुवण्णआरो, अकलहो गामसमागमो अलुद्धा गणिआ' त्ति, दुक्करं एदे संभावीअन्ति । ता पिअवअस्सं गदुअ इमादो गणिआ-पसङ्गादो णिवत्तावेमि । ( परिक्रम्य दृष्ट्वा ) कथं पिअव- अस्सो रुक्खदाडिआए उपविट्ठो चिट्ठदि; ता जाव सप्पामि । ( उपसृत्य ) सोत्थि भगदे, वड्ढदु भवं । ( अहो ! गणिकाया लोभोऽदक्षिणता च यतो न कथाऽपि कृता अन्या । अनादरेणैव अभणित्वा किमपि एवमेव गृहीता रत्नावली । एतावत्या ऋद्ध्या न तया अहं भणितः 'आर्य मैत्रेय ! विश्रम्यताम्, मल्लकेन पानीयमपि पीत्वा गम्यता'मिति । तत् मा तावत् दास्याः पुत्र्या गणिकाया मुखमपि प्रेक्षिष्ये । सुष्ठु खलु उच्यते-'अकन्दसमुत्थिता पद्मिनी, अवञ्चको वणिक्, अचौरः सुवर्णकारः,अकलहो ग्रामसमागमः, अलुब्धा गणिका' इति, दुष्करमेते सम्भाव्यन्ते । तत् प्रियवयस्य गत्वा अस्मात् गणिकाप्रसङ्गात् निवर्त्तयामि । कथं प्रियवयस्यो वृक्ष- वाटिकायामुपविष्टस्तिष्ठति; तद्यावदुपसर्पामि । स्वस्ति भवते, वर्द्धतां भवान् । )
चारुदत्तः—( विलोक्य ) अये ! सुहृन्मे मैत्रेयः प्राप्तः । वयस्य ! स्वाग- तम्, आस्यताम् ।
कुछ कहे हुये यों ही रत्नावली ले ली । इतनी सम्पन्न होने पर भी उसने यह नहीं कहा —'आर्य मैत्रेय ! आराम कर लीजिये, मिट्टी के पात्र से पानी भी पीकर जाइये ।' इसलिये अब इस वेश्या की बच्ची का मुह भी नहीं देखूँगा । ( कष्ट- पूर्वक ) यह ठीक ही कहा जाता है--मूल के विना उत्पन्न होने वाली कमलिनी, न ठगने वाला बनिया, चोरी न करने वाला सुनार, झगड़ा-रहित ग्रामसभा ( गाँववालों की सभा ), निर्लोभ वेश्या--ये सभी होना कठिन हैं । इसलिये प्रिय मित्र के पास चल कर इस वेश्या के संसर्ग से छुड़वाता हूँ। ( घूम कर देख कर ) क्या प्रिय मित्र बगीचे में बैठे हुये हैं। तो इनके पास चलता हूँ। ( पास जाकर ) आपका कल्याण हो । आपकी वृद्धि हो ।
टीका—अदक्षिणता=दाक्षिण्यस्याभावः, कृपणता, अन्या = रत्नावलीग्रहणा- तिरिक्ता । अनादरेणैव = उपेक्ष्यैव । मल्लकेन = मृदादिनिर्मितपात्रेण । कन्दात्= मूलात्, समुत्थिता=उत्पन्ना, तथा न भवतीति भावः । अविद्यमानः कलहः यस्मिन् तादृशः । ग्रामशब्दो लक्षणया ग्रामवासिनां बोधकः, ग्रामवासिनां, सम्मेलनं कलहशून्यं न भवतीति । गणिकाप्रसङ्गात्=वेश्यासंसर्गात्, निवर्तयामि=दूरीकरोमि ।
अर्थ—चारुदत्त—( देखकर ) अरे ! मेरे मित्र मैत्रेय आ गये । मित्र ! स्वागत है, बैठिये ।