भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

३०० मृच्छकटिकम्

अपि च—

मेघो जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलो
विद्युत्प्रभा-रचित-पीत-पटोत्तरीयः ।
आभाति संहतबलाक-गृहीतशङ्खः
खं केशवोऽपर इवाक्रमितुं प्रवृत्तः ॥ २ ॥

जीवानन्दः, सपदि=सत्त्वरम्, अन्तरिक्षम्=गगनम्, उत्कण्ठितस्य=प्रियविरहव्याकुलस्य जनस्य, हृदयम्=मानसम्, च=तथा, समम्=एककालमेव, रुणद्धि=आवृणोति, विषयान्तरात् विमुखीकरोति चित्तमिति भावः। अत्र सहोक्तिरलङ्कारः, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १ ॥

**विमर्श—**कामप्रभाववृद्धि में वर्षा का विशेष योग रहता है। यहाँ छह श्लोकों में यही वर्णन है। 'मेघाच्छन्नं तु दुर्दिनम्' कोश के अनुसार बादलों से घिरा हुआ दिन 'दुर्दिन' होता है। परन्तु यहाँ केवल मेघ अर्थ करना चाहिये क्योंकि मेघ ही आकाश और चित्त दोनों को आच्छादित करता है ॥ १ ॥

अन्वय—जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः, विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः, संहतबलाकगृहीतशङ्खः, अपरः, केशवः, इव, खम्, आक्रमितुम्, प्रवृत्तः, मेघः, आभाति ॥२॥

शब्दार्थजलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः = पानी से गीले किये गये भैंसे के पेट और भौंरे के समान नील (काले) वर्णवाला, विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः= बिजली की चमक से बने हुये पीले दुपट्टे वाला, **संहतबलाकगृहीतशङ्खः=**एक साथ चलनेवाले बगुलों की पंक्तिरूपी शंख को लेनेवाला, अपरः = दूसरे, **केशवः=**विष्णु के, **इव=**समान, खम् = आकाश को, **आक्रमितुम्=**लांघने के लिये, **प्रवृत्तः=**सन्नद्ध, तैयार, **मेघः=**बादल, **आभाति=**शोभित हो रहा है।

विष्णुपक्ष में—**जलार्द्रमहिषोदरभृङ्गनीलः—**इसमें अर्थभेद नहीं है। परन्तु **विद्युत्प्रभारचितपीतपटोत्तरीयः’—**बिजली की चमक के समान बने हुये पीतवस्त्र के दुपट्टे वाले—**और संहतबलाकगृहीतशङ्खः=**एकत्रित बगुलों की पंक्ति के समान पाञ्चजन्यनामक अपने शंख को धारण किये हुये—यह अर्थ है ॥ २ ॥

अर्थ—और भी—

पानी से गीले किये गये भैंसे के पेट और भौंरें के समान काला, बिजली की चमक से बने हुये पीतवस्त्र के दुपट्टे को धारण करनेवाला, (विष्णुपक्ष में—बिजली की कान्ति के समान बने हुये पीताम्बर के दुपट्टेवाले), एकत्रित बगुलों की पंक्तिरूपी शंखवाला (विष्णुपक्ष में—एकत्रित हुये बगुलों की पांत के समान शंख को धारण करनेवाले) दूसरे (वामनरूपधारी) विष्णु के समान, आकाश को लांघने के लिये तैयार मेघ शोभित हो रहा है। [यहाँ वामनरूपी विष्णु के साथ मेघ की सुन्दर उपमा है।] ॥ २ ॥