भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३२२ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—भाव ! सुट्ठु दे भणिदं। (भाव ! सुष्ठु ते भणितम् ।) एषा हि—

मूढे ! निरन्तरपयोधरया मयैव कान्तः सहाभिरमते यदि किं तवात्र । मां गर्जितैरपि मुहुर्विनिवारयन्ती मार्गं रुणद्धि कुपितेव निशा सपत्नी ॥ १५ ॥


विमर्श— कुल को कलङ्कित करने वाले लोग संन्यास अवस्था को भी कलङ्कित करते हैं। कुलटा युवती जिस प्रकार एक पति के पास नहीं रहती हैं, प्रतिदिन घर बदलती रहती है, उसी प्रकार बिजली भी आकाश में भिन्न-भिन्न स्थानों पर चमकती रहती है। 'सम्' पूर्वक ष्ठा = स्था धातु से आत्मनेपद का विधान 'समवप्रविभ्यः स्थः' १।३।२२ सूत्र करता है ॥ १४ ॥

अन्वयः— मूढे ! निरन्तरपयोधरया, मया, एव, सह, यदि, कान्तः, अभिरमते, तदा, अत्र, तव, किम् ? [ईदृशैः] गर्जितैः, अपि, माम्, मुहुः, निवारयन्ती, कुपिता, सपत्नी, इव, निशा, मम, मार्गम्, रुणद्धि ॥ १५ ॥

शब्दार्थ— मूढे ! = रे मूर्खवसन्तसेने !, निरन्तरपयोधरया = घने पयोधरों [ रात्रिपक्ष में बादल और सपत्नीपक्ष में स्तनों ] वाली, मया=मेरे, एव=ही, सह=साथ, यदि=यदि कान्तः=प्रिय, अभिरमते=अभिरमण करता है, अत्र=इसमें तव=तुम्हारा=वसन्तसेना का क्या ? [ ईदृशैः=इस प्रकार के ] गर्जितैः=बार-बार गरजनों से, अपि=भी, माम्=मुझ=वसन्तसेना को, मुहुः=बार-बार, निवारयन्ती=रोकती हुयी, कुपिता=प्रणयकोपवती, सपत्नी=सौतन, इव=के समान, निशा=रात, मम=मेरा, वसन्तसेना का, मार्गम्=रास्ता, रुणद्धि=रोकती है ॥ १५ ॥

अर्थ—वसन्तसेना— भाव ! तुमने ठीक ही कहा है। क्योंकि यह—

'मूर्ख वसन्तसेने ! घने पयोधरों [ रात्रिपक्ष में बादलों और सौतवपक्ष में स्तनों ] वाली मुझ [ रात या सौतन ] के साथ ही यदि कान्त [ चन्द्रमा या चारुदत्त ] अभिरमण कर लेता है तो इसमें तुम्हारा [ वसन्तसेना का ] क्या ? इस प्रकार के गर्जनों से भी मुझे [ वसन्तसेना को ] बार-बार रोकती हुयी सौतन के समान यह रात मेरा रास्ता रोक रही है ॥ १५ ॥

टीका— विटोक्तिं समर्थयमाना रात्रिं सपत्नीत्वेनोपपादयन्ती आह—मूढे इति। रे मूढे ! = परवृत्तानभिज्ञे, वसन्तसेने इति भावः, निरन्तरपयोधरया=निविडमेघावृतया पक्षे निविडकुचयुग्मया; मया = निशया, एव, सह = सार्द्धम्, कान्तः=चन्द्रः, पक्षे चारुदत्तः, यदि, अभिरमते=अभिरमणं करोति, अत्र=अस्मिन् विषये, तव=वसन्तसेनायाः किम्=न किमपीति भावः । ईदृशैः, गर्जितैः=गर्जनैः,

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