भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः ३४३

यदि कुप्यसि नास्ति रतिः कोपेन विनाऽथवा कुतः कामः ?
कुप्य च कोपय च त्वं प्रसीद च त्वं प्रसादय च कान्तम् ॥ ३४ ॥

भवतु, एवं तावत् । भोः भोः ! निवेद्यतामार्यचारुदत्ताय—

एषा फुल्ल-कदम्ब-नीप-सुरभौ काले घनोद्भासिते
कान्तस्यालयमागता समदना हृष्टा जलाद्वलिका ।

रहा है।] यहाँ चारुदत्त के घर जाकर आपको अधिक कोप [का प्रदर्शन] नहीं करना चाहिये ।

अन्वयः—यदि, कुप्यसि, रतिः, नास्ति, अथवा, कोपेन, विना, कुतः, कामः, त्वम्, कुप्य, च, कोपय, च, [कान्तम्], त्वम्, प्रसीद, च, कान्तम्, च, प्रसादय ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ—यदि=यदि, कुप्यसि=कोप करोगी, तो, रतिः=रति, नास्ति=नहीं होगी, अथवा कोपेन=क्रोध के, विना=बिना, कुतः=कहाँ से अथवा कैसे, कामः=काम का आविर्भाव, होगा, अतः, त्वम्=तुम वसन्तसेना, कुप्य=कोप करना, कान्तम् = प्रियतम चारुदत्त को भी, कोपय = कुपित करना, त्वम् च=और तुम, प्रसीद= प्रसन्न हो जाना, कान्तम् च = और प्रियतम चारुदत्त को, प्रसादय=खुश करना ॥ ३४ ॥

अर्थ—यदि तुम क्रोध करोगी तो रति=अनुराग कैसे होगा, अथवा क्रोध के विना काम=सम्भोग [का आनन्द] नहीं होता है । तुम स्वयं कोप करना और अपने प्रेमी को क्रोध करवाना । तुम स्वयं प्रसन्न हो जाना और अपने प्रेमी को भी प्रसन्न कर देना ॥ ३४ ॥

टीका—प्राथमिकमिलनावसरे सावधानतया भाव्यमिति रतिवर्धनोपायं वर्णयति विटः—यदीति । यदि = चेत्, कुप्यसि=केवलं कोप करोषि, तदा, रतिः=अनुरागः, तज्जन्यं सम्भोगसुखम्, न = नैव, अस्ति=भविष्यति, वर्तमानसामीप्ये लट् बोध्यः, अथवा कोपेन=प्रणयकोपेन, विना=ऋते, कामः=सम्भोगानन्दप्राप्तिः, कुतः ? न कथमपीति भावः, अतः त्वम्, कुप्य=कोपं कुरु, कान्तम्=प्रियतमम्, च, कोपय=कोपयुक्तं कुरु, त्वम्=वसन्तसेना, च, प्रसीद=प्रसन्ना भव, कान्तम्=प्रियतमं च, प्रसादय=प्रसन्नतायुक्तं कुरु । एवञ्च औचित्यानुसारमेव कोपप्रसादौ कार्यों येन सम्भोगसुखप्राप्तिः स्यादिति भावः ॥ ३४ ॥

विमर्श—विट का यह रहस्य है कि कुछ नकली गुस्सा दिखाना आवश्यक है । उसे मानकर यदि प्रेमी वास्तव में गुस्सा करने लग जाय तो अपना गुस्सा समाप्त करके उसे खुश करने का प्रयास करना चाहिये ॥ ३४ ॥

अन्वयः—फुल्लकदम्बनीपसुरभौ, घनोद्भासिते, काले, समदना, हृष्टा, जला-