भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३०८ | मुद्राराक्षसम्

[ तत प्रविशत्यासनस्थ स्वभवनगतः पुरुषेणानुगम्यमान सञ्चितो राक्षसः ]

राक्षसः—[स्वगतम्] सम्पूर्णमस्मद्वल चन्द्रगुप्तबलैरिति यत् सत्य न मे मनस' शुद्धिरस्ति । कुत ?—

**हिन्दी अनुवाद—सिद्धार्थक—**कुमार ! अमात्य राक्षस ने मुझसे सन्देश ( पहुँचाने के लिए ) कहा है । जैसे—'ये मेरे प्रिय मित्र पांच राजा तुम्हारे साथ पहले से (ही) मधि कर चुके हैं। जैसे—कुलूत ( कुल्लू प्रदेश ) का स्वामी चित्रवर्मा, मलय जनपद का अधिपति सिंहनाद, काश्मीर देश का स्वामी पुष्कराक्ष, सिन्धु देश का राजा सिन्धुषेन और पारसीक (फारस) का अधिपति मेघाक्ष । इन्हीं मे से पहले कहे गये तीन राजा मलयकेतु का राज्य चाहते हैं और दूसरे दो खजाना तथा हाथियों की सेना । तो जिस प्रकार चाणक्य को हटाकर महाराज ने मेरी प्रीति को उत्पन्न किया है, उसी प्रकार इनका भी उपर्युक्त प्रयोजन पूग कर देना चाहिये ।' बस, इतना ही मौखिक सन्देश है ।

मलयकेतु—[ मन में ] वैसे चित्रवर्मा आदि भी मुझसे द्रोह करते हैं । इसीलिये राक्षस मे इनकी अत्यन्त प्रीति है । [प्रकट] विजये ! अमात्य राक्षस को देखना चाहता हूँ ।

**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर चली जाती है । ]

[ तदनन्तर अपने भवन में आसन पर विराजमान चिन्तामग्न राक्षस एक पुरुष के साथ प्रवेश करता है । ]

राक्षस—[ मन में ] हमारी सम्पूर्ण सेना चन्द्रगुप्त की सेनाओ से भर चुकी है, यह जो सत्य बात है—इस कारण मेरे मन मे शान्ति नहीं है । क्योकि—

**टिप्पणी—प्रियवयस्या —**वयसा तुल्या इति वयस्या वयस्+यत् । प्रिया' वयस्या' इति प्रियवयस्या कर्मधारय म० । **मामभिद्रुह्यन्ति—**अत्र 'क्रुधद्रुहोरूपसृष्टयो कर्म' इत्यनेन कर्मसज्ञा—द्वितीया । **निरतिशया—**अत्य धिक । निर्धूढः निश्चित या अतिशयः अस्ति अस्या इति निरतिशया ।