भारतकोश
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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

३०८ | मुद्राराक्षसम्

[ तत प्रविशत्यासनस्थ स्वभवनगतः पुरुषेणानुगम्यमान सञ्चितो राक्षसः ]

राक्षसः—[स्वगतम्] सम्पूर्णमस्मद्वल चन्द्रगुप्तबलैरिति यत् सत्य न मे मनस' शुद्धिरस्ति । कुत ?—

**हिन्दी अनुवाद—सिद्धार्थक—**कुमार ! अमात्य राक्षस ने मुझसे सन्देश ( पहुँचाने के लिए ) कहा है । जैसे—'ये मेरे प्रिय मित्र पांच राजा तुम्हारे साथ पहले से (ही) मधि कर चुके हैं। जैसे—कुलूत ( कुल्लू प्रदेश ) का स्वामी चित्रवर्मा, मलय जनपद का अधिपति सिंहनाद, काश्मीर देश का स्वामी पुष्कराक्ष, सिन्धु देश का राजा सिन्धुषेन और पारसीक (फारस) का अधिपति मेघाक्ष । इन्हीं मे से पहले कहे गये तीन राजा मलयकेतु का राज्य चाहते हैं और दूसरे दो खजाना तथा हाथियों की सेना । तो जिस प्रकार चाणक्य को हटाकर महाराज ने मेरी प्रीति को उत्पन्न किया है, उसी प्रकार इनका भी उपर्युक्त प्रयोजन पूग कर देना चाहिये ।' बस, इतना ही मौखिक सन्देश है ।

मलयकेतु—[ मन में ] वैसे चित्रवर्मा आदि भी मुझसे द्रोह करते हैं । इसीलिये राक्षस मे इनकी अत्यन्त प्रीति है । [प्रकट] विजये ! अमात्य राक्षस को देखना चाहता हूँ ।

**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर चली जाती है । ]

[ तदनन्तर अपने भवन में आसन पर विराजमान चिन्तामग्न राक्षस एक पुरुष के साथ प्रवेश करता है । ]

राक्षस—[ मन में ] हमारी सम्पूर्ण सेना चन्द्रगुप्त की सेनाओ से भर चुकी है, यह जो सत्य बात है—इस कारण मेरे मन मे शान्ति नहीं है । क्योकि—

**टिप्पणी—प्रियवयस्या —**वयसा तुल्या इति वयस्या वयस्+यत् । प्रिया' वयस्या' इति प्रियवयस्या कर्मधारय म० । **मामभिद्रुह्यन्ति—**अत्र 'क्रुधद्रुहोरूपसृष्टयो कर्म' इत्यनेन कर्मसज्ञा—द्वितीया । **निरतिशया—**अत्य धिक । निर्धूढः निश्चित या अतिशयः अस्ति अस्या इति निरतिशया ।

'पञ्चमोऽङ्कः' ३०६

साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितं बिभ्रत् सपक्षे स्थितिं व्यावृत्तञ्च विपक्षतो भवति यत् तत् साधनं सिद्धये । यत् साध्यं स्वयमेव तुल्यमुभयोः पक्षे विरुद्धञ्च यत् तस्याङ्गीकरणेन वादिन इव स्यात् स्वामिनो निग्रहः ॥ १० ॥

अन्वयः— यत् साधन साध्ये निश्चितम् सपक्षे स्थितिं बिभ्रत् अन्वयेन घटितं विपक्षतो व्यावृत्तं च तत् सिद्धये भवति । यत् स्वयमेव साध्यम् उभयोः तुल्यम्, यच्च पक्षे विरुद्धं तस्य अङ्गीकरणेन वादिनः इव स्वामिनः निग्रहः स्यात् ॥ १० ॥

व्याख्या— (वादिपक्षे—) यत् साधनं—धूमादिरूपं हेतुः, साध्ये—सिद्धिविषयीभूते वह्नयादौ निश्चितं—निश्चितव्याप्तिकम् असंदिग्धमिति यावत्, सपक्षे—पक्षसदृशे निश्चितसाध्यवति महानसादौ, स्थितिं—सत्तां, बिभ्रत्—धारयत्, अन्वयेन—तत्सत्त्वनियतसत्ताकत्वरूपान्वयव्याप्त्या, घटितं—विशिष्टं, विपक्षतः—साध्याभाववतः जलह्रदादेः, व्यावृत्तं च—व्यपगतं च अवर्तमाने प्रतिपाद्ये स्वयमप्यवर्तमानमित्यर्थः, तत्—साधनं सिद्धये—वह्नयनुमानाय, भवति—जायते । यत्—साधनं हेतुः, स्वयमेव, साध्यं—हेत्वन्तरेणानुमेयम्, उभयोः—सपक्षविपक्षयोः, तुल्यम्—उभयत्र वर्तमानमवर्तमानं वा (दृश्यते), यच्च—साधनं, पक्षे, विरुद्धं—विपरीतं साध्यधर्मासत्त्वेऽपि स्वयं सदित्यर्थः, तस्य—तथाविधस्य साधनस्य, अङ्गीकरणेन—स्वीकरणेन, स्वामिनः—भर्तुः राज्ञ इत्यर्थः, इव, वादिनः—तार्किकस्य, निग्रहः—पराजयः, स्यात्—भवेत् । (स्वामिपक्षे—) साध्ये—शत्रुविनाशनात्मके कार्ये, निश्चितं—निर्णीतं योग्यतया अध्यवसितमित्यर्थः, यत् साधनं—सैन्यम्, अन्वयेन—पुरुषपरम्परया, घटितं—प्राप्तं कुलक्रमागतमित्यर्थः, सपक्षे—निजवर्गे, स्थितिम्—अवस्थानं, बिभ्रत्—दधत्, विपक्षतः—शत्रुवर्गात्, व्यावृत्तं—पराङ्मुखम्, तत् सैन्यम्, सिद्धये—कार्यसिद्धये, भवति । यत्—सैन्यम्, स्वयमेव—आत्मना एव, साध्यम्—सम्पाद्यम् (न तु कुलक्रमागतमिव सिद्धम् अथवा), उभयोः—सपक्षविपक्षयोः, तुल्यम्—समानादरम्, यच्च, पक्षे—स्ववर्गे, विरुद्धं—विषमं, तस्य, अङ्गीकरणेन, वादिनः इव स्वामिनः निग्रहः स्यात् ॥ १० ॥

हिन्दी अनुवाद— (वादी के पक्ष में—) जो (धूम आदि रूप) हेतु

३१० मुद्राराक्षसम्

साध्य (वह्नि आदि मे) निश्चित रूप से है, सपक्ष (महानस आदि) मे सत्ता धारण करता हुआ अन्वय-व्याप्ति से विशिष्ट है और विपक्ष (जलाशय आदि) मे निवृत्त (अर्थात् वहाँ नही रहता) है वह (वह्नि के अनुमान की) सिद्धि के लिये (समर्थ) होता है। किन्तु जो हेतु स्वयं ही साध्य (अर्थात् दूसरे हेतु से अनुमान करने योग्य) है तथा सपक्ष और विपक्ष दोनो मे समान है और जो हेतु पक्ष मे विपरीत है, उस हेतु के स्वीकार करने से स्वामी की तरह वादी का पराजय होता है। (स्वामी के पक्ष मे—) साध्य (शत्रु विनाश रूप कार्य) मे लगी हुई जो सेना वंशपरम्परा से आयी हुई है और अपने वर्ग में स्थिति धारण करती हुई शत्रु-वर्ग मे विमुख है, वह कार्य-सिद्धि के लिए (समर्थ) होती है। किन्तु जो सेना स्वयं ही साध्य है (अर्थात् वंश परम्परा से आयी हुई की तरह सिद्ध नहीं है) तथा अपने पक्ष और शत्रु-पक्ष मे समान (आदर रखती) है और जो सेना अपने पक्ष मे विपरीत है, उसके स्वीकार करने से वादी की तरह स्वामी का पराजय होता है ॥ १० ॥

टिप्पणीसाधनम्—साध्यते अनेन इति √साध् +ल्युट् करणे। हेतु, पक्षान्तर मे—सेना। 'साधन सिद्धिसैन्ययो' इति हैम। साध्ये—√साध् +ण्यत् कर्मणि = साध्य—वह जिसे सिद्ध करना है। जैसे 'पर्वतोऽयं वह्निमान् धूमात्' मे वह्निमत्त्व या वह्नि साध्य है। पक्षान्तर मे—जिसे प्राप्त करना है। निश्चितम्—असन्दिग्ध। पक्षान्तर मे—धृतसङ्कल्प। सपक्षे—पक्षेण सह वर्तमान इति सपक्ष। निश्चितसाध्यवान् सपक्ष। जिसमे साध्य या अनुमान का विषय हो। पक्षान्तर मे—समान पक्ष अस्य इति सपक्ष। एक ही (समान) पक्ष का। अन्वयेन घटितम्—अनु√इ+अच् भावे = अन्वय। तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम्। उस (हेतु) के रहने पर उस (साध्य) की सत्ता निश्चित है, फलतः हेतु और साध्य का साहचर्य। पक्षान्तर मे—अनु√इ+अच् अधिकरणे = अन्वय = वंश। √घट्+णिच्+क्त कर्मणि = घटित 'मिता ह्रस्व' इति ह्रस्व। युक्त। पक्षान्तर मे—लब्ध। सिद्धये—सिद्धि (वह्नि की अनुमिति, पक्षान्तर मे—विजयादि की प्राप्ति) के लिए। विपक्षतः—विभिन्न पक्षात् विपक्ष प्रादितत्० पक्ष से भिन्न वस्तु (जलाशय

पञ्चमोऽङ्कः ३११

आदि ) से । पक्षान्तर में—विरुद्धः पक्षः अस्य इति विपक्षः शत्रु मे । व्यावृत्तम्—हटा हुआ । वि-आ√वृत्+क्त कर्मणि । निग्रहः—पराजय । नि√ग्रह्+अप् भावे ।

यहाँ दार्ष्टान्तिक पक्ष का अभिप्राय यह है कि चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी को स्थिर करने रूप साध्य में निश्चित मौर्य की स्थिति तथा नन्द के विनाश रूप अन्वय और व्यतिरेक व्याप्ति से विशिष्ट, भद्रभट, भागुरायण आदि रूप सपक्ष में स्थिति को धारण करने वाली और मलयकेतु रूप विपक्ष से अलग चाणक्य-नीति रूप साधन मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए समर्थ है । किन्तु जो मलयकेतु की सेना भद्रभट आदि के कारण स्वयमेव साध्य है ( अर्थात् वंश-परम्परागत पुरुषो से युक्त नही है ) मलयकेतु ओर चाणक्य दोनों पक्षों में समान ( आदर रखती ) है और मलयकेतु के पक्ष मे भद्रभटादिको के रूप में विपरीत है, उस सेना के स्वीकार करने से स्वामी ( अर्थात् मलयकेतु ) का पराजय अवश्यम्भावी है । इस श्लोक में श्लेषालंकार से अनुप्राणित श्रौती पूर्णोपमा अलंकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १० ॥

अथवा तैस्तैर्विज्ञातापरागहेतुभिः प्राक्परिगृहीतोपजापैरापूर्णमिति न विकल्पयितुमर्हामि । [ प्रकाशम् ] प्रियंवदक ! उच्यन्तामस्मद्वचनात् कुमारानुयायिनो राजानः—सम्प्रति दिने दिने प्रत्यासीदति कुसुमपुरम् । अतः परिकल्पितविभागैर्भवद्भिः प्रयाणे प्रस्थातव्यम् । कथमिति ?

प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्मामनुव्यूह्य सैन्यै-
र्गान्धारैर्मध्ययाने सयवनपतिभिः संविधेयः प्रयत्नः ।
पश्चाद् गच्छन्तु वीराः शकनरपतयः संवृताश्चेदिहूणैः
कौलूताद्यश्च शिष्टः पथि परिवृणुयाद्राजलोकः कुमारम् ॥ ११ ॥

अन्वयः—पुरस्तात् व्यूह्य मामनु खसमगधगणैः सैन्यैः प्रस्थातव्यम् । मध्ययाने सयवनपतिभिः गान्धारैः प्रयत्नः संविधेयः । पश्चात् चेदिहूणैः संवृताः वीराः शकनरपतयः गच्छन्तु । शिष्टः च कौलूताद्यः राजलोकः पथि कुमारं परिवृणुयात् ॥ ११ ॥

३१२ | मुद्राराक्षसम्

व्याख्या—पुरस्तात्— ( सङ्ग्रामोद्यतसैन्यसमुदायस्य ) अग्रे, व्यूह्य— विभागं कृत्वा, माम् अनु— मम पृष्ठत , खसमगधगणै — खसाश्च मगधाश्च खसमगधा तेषां गणो येषु तानि खसमगधगणानि तयाविधे , सैन्यै — सैनिकै , प्रस्थातव्यम्— प्रयातव्यम् । मध्ययाने - सैन्यमध्यगमने, सयवनपतिभि — यवनराजै सह, गान्धारे — गान्धारदेशवासिभि सैन्यैरिति शेष , प्रयत्न — उद्योग , मविधेय — कार्य । पश्चात् — अनन्तरम्, चेदिहूणै — चेदिदेशीयम्नेच्छविशेषै , मवृता — सम्मिलिता वीर — पराक्रमशालिन , शकनरपतय — शकदेशीयराजान , गच्छन्तु— यान्तु । शिष्टः च— अवशिष्टश्च, कोलूतार्थ — कुलूतराजप्रमुख , राजलोञ् — नृपवर्ग , पथि-- मार्गे, कुमार— मलयकेतुम्, परिवृणुयात्— वेष्टयित्वा यायात् ॥ ११ ॥

हिन्दी अनुवाद — अथवा ( चन्द्रगुप्त के प्रति ) जिनके विराग के कारणों को जान लिया गया है ऐसे तथा पहले से ( हमारे ) भेदों को जान हुए उन ( भद्रभटादिकों ) से व्याप्त है—इस प्रकार सन्देह करने के योग्य नहीं हैं। [ प्रकट ] प्रियंवदक ! मेरी ओर से कुमार के अनुयायी राजाओं से कहो—अब पाटलिपुत्र दिनोंदिन समीप आता जा रहा है । इसलिए विभागों की रचना करके आप लोगों को यात्रा में चलना चाहिये । किस प्रकार ?—

(सैन्यसमूह के ) अग्रभाग में व्यूह बनाकर मेरे पीछे खस और मगध के समूहों वाली सेनाओं को चलना चाहिये । मध्य भाग में यवन राजाओं के साथ गान्धार सैनिकों को प्रयत्न करना चाहिये । पश्चात् चेदि देश के रहने वाले हूणों से सम्मिलित होकर वीर शक राजगण जायें । और अवशिष्ट कोलूत आदि राजाओं का समूह मार्ग में कुमार को घेर कर चलें ॥ ११ ॥

टिप्पणी—विज्ञातापरागहेतुभि — विज्ञाता अनुमिता अपरा गहेतवः विरागकारणानि येषा ते तथोक्ता , तै । प्राक्परिगृहीतोपजापै — प्राक् पूर्वं परिगृहीत ज्ञात उपजाप भेद ये ते तथोक्ता , तै । परिकल्पितविभागे — परिकल्पित आरचित विभाग सैन्यविभाग ये ते तथोक्ता , तै । माम् अनु-- अत्र अनोः कर्मप्रवचनीयत्वेन तद्योगे द्वितीया । व्यूह्य— व्यूहं कृत्वा इति व्यूह + णिच् + क्त्वा—ल्यप् । यहाँ ल्यप् आदेश किसी भी सूत्र से सम्भव नहीं है । यदि 'वि /ऊह् + क्त्वा—ल्यप्' ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं तो 'उपसर्गाद्ध्रस्वस्य ऊहतेः'

पञ्चमोऽङ्कः ३१३

सूत्र से ह्रस्वता हो जाने पर 'व्यूह्य' रूप बनाता है । मध्ययाने—मध्यं यानम् सुप्सुपा स०, अथवा मध्यं यानम् कर्मधारय स० । इस श्लोक मे स्वभावोक्ति अलंकार है और स्रग्धरा छन्द है । स्रग्धरा का लक्षण १,१ में देखिये ॥११॥

प्रियंवदकः—जं अमच्चो आणबेदि । (यदमात्य आज्ञापयति ) [इति निष्क्रान्तः । ]

प्रतीहारी—[प्रविश्य] जेदु जेदु अमच्चो । अमच्च ! इच्छदि तुमं कुमालो प्पेक्खिदुं । (जयतु जयत्वमात्यः । अमात्य ! इच्छति त्वां कुमारः प्रेक्षितुम् । )

राक्षसः—भद्रे ! मुहूर्त्त तिष्ठ । कः कोऽत्र भोः ?

पुरुषः—[प्रविश्य] आणवेदु अमच्चो । ( आज्ञापयत्वमात्यः । )

राक्षसः—भद्र ! उच्यतां शकटदास यथा परिधापिता वयमाभरणं कुमारेण, तन्न युक्तमिदानीमस्माभिरनलङ्कृतैः कुमारदर्शनमनुभवितुम्, अतो यदलङ्करणत्रयं क्रीतं तन्मध्यादेकं दीयतामिति ।

पुरुषः—जं अमच्चो आणबेदि । (यदमात्य आज्ञापयति ।) [इति निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य च ] अमच्च ! इदं तं अलङ्करणं । (अमात्य ! इदं तदलङ्करणम् ।)

राक्षसः—[ नाट्येनावलोक्यात्मानमलंकृत्योत्थाय च ] भद्रे ! राजकुलगामिनं मार्गमादेशय ।

प्रतीहारी—एदु एदु अमच्चो । ( एतु एत्वमात्यः । )

राक्षसः—[ स्वगतम् ] अधिकारपदं नाम निर्दोषस्यापि पुरुषस्य महदाशङ्कास्थानम् । कुतः ?—

भयं तावत् सेव्यादभिनिविशते सेवकजनं ततः प्रत्यासन्नाद् भवति हृदयेष्वेव निहितम् । ततोऽध्यारूढानां पदमसुजनद्वेषजननं मतिः सोच्छायाणां पतनमनुकूलं कलयति ॥१२॥

अन्वयः—सेवकजनं तावत् भयं सेव्यात् अभिनिविशते । ततः प्रत्यासन्नात्

३१६ मुद्राराक्षसम्

राक्षस - [ अभिनय के साथ देखकर ] अरे ये कुमार हैं। जो ये— मनोव्यापार से रहित होने के कारण उस (पैर के अग्र भाग) के विशेषो (अंगुष्ठ कनिष्ठिका आदि) को न जानने वाली 'स्थिर दृष्टि को पैर के अग्र भाग पर रख कर महान् कार्यों की गुरुता से मानो झुके हुए मुखचन्द्र को हाथ से धारण कर रहे हैं ॥ १३ ॥

**टिप्पणी—शून्यत्वात्—**मन के साथ न रहने पर नेत्रों के खुले रहने पर भी पदार्थ का अवलोकन नही होता है । उपनिषद् मे भी कहा है—'अन्यत्रमनाः आसम् नापश्यम्' । **निश्चलन्तीम्—**इसके स्थान में 'निश्चलाङ्गीम्' भी पाठ मिलता है । अर्थ स्पष्ट है । वक्त्रेन्दुम् — वक्त्रम् मुखम् इन्दुरिव अथवा वक्त्रमिव इन्दु इति वक्त्रेन्दु उपमितकर्मधारय स०, तम् । यहाँ रूपक और उपमा अलंकारों का सन्देहसङ्कर है, जो वाच्यात्प्रेक्षा अलंकार से संसृष्ट है । इसमें प्रहर्षिणी छन्द है । इसका लक्षण १, ७ में देखिए ॥ १३ ॥

[ उपसृत्य ] विजयता विजयता कुमार ।

मलयकेतु — आर्य ! अभिवादये । इदमासनमास्यताम् ।

राक्षस — [ उपविशति ]

मलयकेतु — अमात्य ! चिरदर्शनेनार्यस्य वयमुद्विग्ना ।

राक्षस — कुमार ! प्रयाणे प्रतिविधानमनुतिष्ठता मया कुमारादयमुपालम्भोऽधिगत ।

मलयकेतु — अमात्य ! प्रयाणे कथ प्रतिविहितमिति श्रोतुमिच्छामि ।

राक्षस — कुमार ! एवमादिष्टा कुमारस्यानुयायिनो राजान ।

[ प्रस्थातव्यमित्यादिश्लोक पुन पठति । ]

मलयकेतु — [ स्वगतम् ] विज्ञायते, कथ य एव मद्विनाशन चन्द्रगुप्तमाराधयितुमुद्यता त एव मा परिवृण्वन्ति [ प्रकाशम् ] आर्य ! अस्ति कश्चित् य कुसुमपुर प्रति गच्छति तत आगच्छति वा ?

राक्षस — कुमार ! अवसितमिदानी गतागतप्रयोजनम् । ननु पञ्च षैरहोभिर्वयमेव तत्र गन्तास्म ।

पञ्चमोऽङ्कः ३१७

मलयकेतुः—[ स्वगतम् ] विज्ञायते । [ प्रकाशम् ] यद्येवं, तत् किमयमार्थेण सलेखः पुरुषः कुसुमपुरं प्रस्थापितः ?

हिन्दी अनुवाद—[ समीप जाकर ] कुमार की विजय हो, विजय हो ।

मलयकेतुः—आर्य ! प्रणाम करता हूँ । इस आसन पर बैठिए ।

राक्षस—[ बैठता है ]

मलयकेतु—अमात्य ! बहुत देर के बाद आर्य के दर्शन होने से हम बेचैन हैं ।

राक्षस—कुमार ! प्रयाण की तैयारी करते हुए मैंने कुमार से यह उलाहना पाया ।

मलयकेतु—अमात्य ! प्रयाण की कैसे तैयारी की है, यह सुनना चाहता हूँ ।

राक्षस—कुमार ! कुमार के अनुयायी राजाओ को इस प्रकार आदेश दिया है ।

[ ‘प्रस्थातव्यम्’ इत्यादि श्लोक को पुनः पढ़ता है । ]

मलयकेतु— [ मन में ] समझता हूँ, कैसे जो ही मेरे विनाश के द्वारा चन्द्रगुप्त की सेवा करने के लिए उद्यत हैं, वे ही मुझे घेर रहे हैं । [ प्रकट ] आर्य ! (ऐसा) कोई है, जो पाटलिपुत्र जा रहा है या वहाँ से आ रहा है ?

राक्षस—कुमार ! अब जाने-आने का प्रयोजन समाप्त हो गया है । पाँच-छः दिनो में हम ही वहाँ पहुँच जाएँगे ।

मलयकेतु—[ मन में ] जानता हूँ । [ प्रकट ] यदि ऐसा है तो आर्य ने इस व्यक्ति को पत्र के साथ पाटलिपुत्र क्यों भेजा है ?

टिप्पणीचिरदर्शनेन—बहुकालोत्तरमवलोकनेन । यहाँ गूढ अर्थ यह है कि आपका दर्शन इस समय मेरे लिए उद्वेगजनक हो रहा है । प्रतिविधानम्—प्रयत्न, व्यवस्था । अनुतिष्ठता—कुर्वता । अवसितम्—समाप्त । अव√सो+क्त कर्तरि । पञ्चषैः—पञ्च षट् वा परिमाण येषां तानि पञ्चषानि बहुव्रीहि स०, ‘बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात्’ इत्यनेन् डच्प्रत्ययः । तैः । यह ‘अहोभिः’ का विशेषण है ।

३१८ मुद्राराक्षसम्

राक्षस —[ विलोक्य ] अये ! सिद्धार्थक ! भद्र ! किमिदम् ?

सिद्धार्थक —[ सबाष्पं लज्जां नाटयन् ] प्पसीददु प्पसीददु अमच्चो । अमच्च ! अतिताडीअन्तेण मए ण पारिदं अमच्चस्स रहस्स धारिदुं । ( प्रसीदतु प्रसीदत्वमात्य । अमात्य ! अतिताड्यमानेन मया न पारितममात्यस्य रहस्यं धारयितुम् । )

राक्षस —भद्र ! कीदृशं तत् रहस्यम् ? न खल्ववगच्छामि ।

सिद्धार्थक —ननु विष्णवेमि, ताडीअन्तेण मए—' । ( ननु विज्ञापयामि ताड्यमानेन मया—') [ इत्यधोक्तं सभयमधोमुखस्तिष्ठति ]

मलयकेतु — भागुरायण ! स्वामिनः पुरस्ताद् भीतो लज्जितश्च नैष कथयिष्यति, अतः स्वयमेवार्याय कथय ।

भागुरायण — यदाज्ञापयति कुमारः । अमात्य ! एष कथयति, यथा—'अहममात्यराक्षसेन लेखं दत्त्वा वाचिकञ्च सन्दिश्य चन्द्रगुप्तसकाशं प्रेषित' इति ।

राक्षस —भद्र सिद्धार्थक ! अपि सत्यम् ?

सिद्धार्थक —[ लज्जां नाटयन् ] एव्वं अतिताडीअन्तेण मए णिवेदितं । ( एवमतिताड्यमानेन मया निवेदितम् ।) ।

राक्षस — कुमार ! अनृतमेतत् ताड्यमानः किं न ब्रूयात् ?

मलयकेतु —भागुरायण ! दर्शय लेखं, वाचिकञ्चायमस्मै स्वभृत्यः कथयिष्यति ।

हिन्दी अनुवादराक्षस—[देखकर] अरे ! सिद्धार्थक ! भद्र ! यह क्या ?

सिद्धार्थक—[आंसू के साथ लज्जा का अभिनय करते हुए] अमात्य प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। अमात्य ! बहुत पीटा जाता हुआ मैं अमात्य का रहस्य नहीं धारण कर पाया।

राक्षस—भद्र ! कैसा वह रहस्य है ? मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।

सिद्धार्थक—निवेदन तो कर रहा हूँ कि पीटा जाता हुआ मैं—'। [ ऐसा आधा कहने पर भयपूर्वक मुंह नीचे किये खड़ा हो जाता है । ]

पञ्चमोऽङ्कः ३१६

मलयकेतु—भागुरायण ! स्वामी के आगे डरा हुआ तथा लज्जित यह नहीं कहेगा । इसलिए स्वयम् आर्य को बता दो ।

भागुरायण—कुमार की जो आज्ञा । अमात्य ! यह कह रहा है कि मुझे अमात्य राक्षस ने पत्र देकर और मौखिक संदेश कहकर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।

राक्षस—भद्र सिद्धार्थक ! क्या ( यह ) सत्य है ?

सिद्धार्थक—[ लज्जा का अभिनय करते हुए ] $\cdots\cdots\cdots$ बहुत पीटे जाते हुए मैंने ऐसा निवेदन किया ।

राक्षस—कुमार ! यह असत्य है । पीटा जाता हुआ ( व्यक्ति ) क्या नहीं कह सकता है ?

मलयकेतु—भागुरायण ! पत्र दिखाओ, मौखिक संदेश तो यह इनको अपना भृत्य कहेगा ।

टिप्पणी—प्रसीदतु प्रसीदतु—शीघ्रता सूचित करने के लिए दो वार उच्चारण किया गया है । न पारितं रहस्यं धारयितुम्—इससे सत्यता को स्वीकार किया है ।

भागुरायणः—[ लेखमवलोकयन् ] 'स्वस्ति यथास्थाने कुतोऽपि पुरुष-विशेषमवगमयति' इति वाचयति ।

राक्षसः—कुमार ! शत्रोः प्रयोग एषः ।

मलयकेतुः—लेखस्याशून्यार्थमार्येणेदमाभरणमनुप्रेषितमिति तत् कथ शत्रोः प्रयोग एष स्यात् ? [ इत्याभरणं दर्शयति । ]

राक्षसः—[ आभरणं निर्वर्ण्य ] कुमार ! नैतन्मयाऽनुप्रेषितम्, एतद्धि कुमारेण मह्यं दत्तं; मया च परितोषस्थाने सिद्धार्थकाय दत्तम् ।

भागुरायणः—भो अमात्य ! ईदृशस्याभरणविशेषस्य, विशेषतः कुमारेण स्वगात्रादवतार्य दत्तस्येयं परित्यागभूमिः ?

मलयकेतुः—वाचिकमप्याप्ततमात्सिद्धार्थकाच्छ्रोतव्यमिति लिखित-मार्येण ।

३२० मुद्राराक्षसम्

राक्षस — कुतो वाचिकम् ? कस्य वा लेख ? अयमेवास्मदीयो न भवति ।

मलयकेतु — इयं तर्हि कस्य मुद्रा ?

राक्षस — कुमार ! कपटमुद्रामप्युत्पादयितुं शक्नुवन्ति धूर्ताः ।

भागुरायण — कुमार ! सम्यगमात्यो विज्ञापयति । सिद्धार्थक ! केनायं लिखितो लेख ?

सिद्धार्थकः — [ राक्षसमुखमवलोक्य तूष्णीमधोमुखस्तिष्ठति । ]

हिन्दी अनुवादभागुरायण — [पत्र को देखता हुआ] 'स्वस्ति यथास्थाने' इत्यादि वाच देता है ।

राक्षस — कुमार ! यह शत्रु की चाल है ।

मलयकेतु — पत्र की रिक्तता को पूरण करने के लिए आर्य ने यह आभूषण भेजा है । तब यह शत्रु की चाल कैसे है ? [ आभूषण दिखाता है । ]

राक्षस — [ आभूषण को ध्यान से देखकर ] कुमार ! मैंने यह नहीं भेजा है । यह तो कुमार ने मुझे दिया था, और मैंने पारितोषिक के रूप में सिद्धार्थक को दे दिया ।

भागुरायण — अमात्य महोदय ! ऐसे विशिष्ट आभूषण का, विशेष करके कुमार के द्वारा शरीर से उतारकर दिये हुए का यह देने का स्थान है ?

मलयकेतु — अत्यन्त विश्वासपात्र सिद्धार्थक से मौखिक सन्देश भी सुनना चाहिए — यह आर्य ने लिखा है ।

राक्षस — कहाँ से मौखिक संदेश ? या किसका पत्र ? यह ( पत्र ) ही मेरा नहीं है ।

मलयकेतु — तब यह मुद्रा किसकी है ?

राक्षस — कुमार ! धूर्त लोग कृत्रिम मुद्रा भी बना सकते हैं ।

भागुरायण — कुमार ! अमात्य ठीक कह रहे हैं । सिद्धार्थक ! यह पत्र किसने लिखा है ?

सिद्धार्थक — [राक्षस का मुंह देखकर चुपचाप मुंह लटकाये खड़ा रहता है।]

पञ्चमोऽङ्कः ३२१

**टिप्पणी—परित्यागभूमिः—**दानपात्रम्। अर्थात् वस्तु-विशेष का दान पात्रविशेष को ही देना चाहिए। यह इसका उपयुक्त पात्र नहीं है। **कुतो-वाचिकम्—**यहाँ ‘कुतः’ सूचित करता है भेजने वाले को।

**भागुरायणः—**अलं पुनरात्मानं ताडयित्वा, कथय।

**सिद्धार्थकः—**अज्ज, सअड़दासेण। ( आर्य ! शकटदासेन । )

**राक्षसः—**कुमार ! यदि शकटदासेन लिखितस्तर्हि मयैव लिखितः।

**मलयकेतुः—**विजये ! शकटदासं द्रष्टुमिच्छामि।

**प्रतीहारी—**ज कुमालो आणवेदि। ( यत् कुमार आज्ञापयति । )

भागुरायणः—[ स्वगतम् ] न खल्वनिश्चतायामार्यचाणक्यप्रणिधयोऽभिधास्यन्ति। आगत्य शकटदासो वा ‘सोऽयं लेखः’ इति प्रत्यभिज्ञाय पूर्ववृत्तं प्रकाशयेत्। एवं सति सन्दिहानो मलयकेतुरस्मिन् प्रयोगे श्लथादरो भवेत्। [ प्रकाशम् ] कुमार ! न कदाचिदपि शकटदासोऽमात्यराक्षसस्याग्रतो ‘मया लिखितः’ इति प्रतिपत्स्यते, अतोऽन्यलिखितमस्यानीयतां, यतो वर्णसंवाद एवैतत् सर्वं विभावयिष्यति।

**मलयकेतुः—**विजये ! एवं क्रियताम्।

**भागुरायणः—**कुमार ! मुद्रामप्यानयत्वियम।

**मलयकेतुः—**उभयमप्यानीयताम्।

**प्रतीहारी—**जं कुमालो आणवेदि। ( यत् कुमार आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य ] कुमाल ! इदं क्खु तं सअड़दासेण स्सहत्थलिहिदं पत्तं मुद्दा अ। ( कुमार ! इदं खलु तत् शकटदासेन स्वहस्तलिखितं पत्रं मुद्रा च। )

मलयकेतुः—[ उभयमपि नाट्येनावलोक्य ] आर्य ! संवदन्त्यक्षराणि।

राक्षसः—[ स्वगतम् ] संवदन्त्यक्षराणि, शकटदासस्तु मम मित्रमिति च विसंवदन्त्यक्षराणि, तत् किं शकटदासेन लिखितम् ?

स्मृतं स्यात् पुत्रदाराणां विस्मृताः स्वामिभक्तयः।
चलेष्वर्थेषु लुब्धेन न यशःस्वनपायिषु ॥ १४ ॥

मु० रा०—२१

३२२ मुद्राराक्षसम्

अन्वय— चलेषु अर्थेषु लुब्धेन न अनपायिषु यश सु (लुब्धेन) स्वामि-भक्तय विस्मृता, पुत्रदाराणा स्मृत स्यात् ॥ १४ ॥

व्याख्या— चलेषु—अस्थिरेषु, अर्थेषु—धनेषु, लुब्धेन—इच्छुकेन, न—नहि, अनपायिषु—स्थिरेषु, यश सु—कीर्तिषु, (लुब्धेन) स्वामिभक्तय —प्रभुविषयकानुरागाः, विस्मृता —मनसा परिहृताः (स्यु ), पुत्रदाराणा—पुत्राणा मुताना दाराणा स्त्रियाश्च, स्मृत स्यात्—स्मरण वृत्त स्यात् ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद— भागुरायण—पुन अपने को मार खिलाना व्यर्थ है, बताओ ।

सिद्धार्थक— आर्य ! शकटदास ने ।

राक्षस— कुमार ! यदि शकटदास ने लिखा है तब मैने ही लिखा है ।

मलयकेतु — विजये ! शकटदास को देखना चाहता हूँ ।

प्रतीहारो— जो कुमार की आज्ञा ।

भागुरायण— [ मन मे ] आर्य चाणक्य के गुप्तचर अनिश्चित बात को नही बतायेगे । अथवा आकर शकटदास 'यह वही लेख है' ऐसा पहचानकर पहले की बात खोल दे । ऐसा होने पर सन्देह करता हुआ मलयकेतु इस प्रयोग में अनुत्साहित हो जायेगा [ प्रकट ] कुमार ! शकटदास अमात्य राक्षस के सामने 'मैंने लिखा है' ऐसा कभी भी स्वीकार नही करेगा । इसलिये उसकी दूसरी लिखावट मंगायी जाय, जिसलिये कि अक्षरो की समानता ही यह सब निर्णय कर देगी ।

मलयकेतु— विजये ! ऐसा करो ।

भागुरायण— कुमार ! यह मुद्रा भी ले आवे ।

मलयकेतु— दोनो ले आओ ।

'प्रतीहारी— जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर जाकर पुन प्रवेश करके ] कुमार ! यह वह शकटदास का अपने हाथ से लिखा हुआ पत्र और मुद्रा है ।

मलयकेतु— [ दोनो को अभिनय के साथ देखकर ] आर्य ! अक्षर मिल रहे हैं ।

पञ्चमोऽङ्कः ३२३

राक्षस— [ मन में ] अक्षर मिल रहे हैं। किन्तु शकटदास मेरा मित्र है, इसलिए अक्षर नहीं मिल रहे हैं। तो क्या शकटदास ने लिखा ?

स्थिर यश के नहीं बल्कि अस्थिर धन के लोभी ( शकटदास ) ने स्वामि-भक्तियों को भुला दिया होगा और स्त्री-पुत्रों का स्मरण किया होगा ॥ १४ ॥

टिप्पणी—ताडयित्वा— अत्र 'अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा' इति सूत्रेण क्त्वाप्रत्ययः। न खलु— भागुरायण नहीं जानता है कि यह लेख किसका है। इसलिए वह सन्देह में है कि कहीं ऐसा न हो कि शकटदास इस लेख को पहचान कर सब रहस्य खोल दे। इसलिए वह ऐसा प्रस्ताव रखता है। जिससे शकटदास का आना ही रुक जाता है। वर्णसंवादः— अक्षरसादृश्यम्। सम्√वद्+घञ् भावे संवादः। वर्णानां संवादः वर्णसंवादः। विभावयिष्यति— कथयिष्यतीत्यर्थः। वि√भू+णिच्+लृट्—तिप्। पुत्रदाराणाम्— पुत्राश्च दाराश्च इति पुत्रदाराः द्वन्द्व स०। यहाँ पुत्र को हि अभ्यर्हित (श्रेष्ठ) मानकर 'अभ्यर्हितं च' से उसका पूर्व प्रयोग किया गया है। 'पुत्रप्रयोजना दाराः' इसके अनुसार पुत्र ही मुख्य है। तेषाम्। अत्र 'अधीगर्थदयेशां कर्मणि' इत्यनेन कर्मणि षष्ठी। इस पद्य में परिसंख्या अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ३ में देखिये ॥ १४ ॥

अथवा, कः सन्देहः ?

मुद्रा तस्य कराङ्गुलिप्रणयिनी सिद्धार्थकस्तत्सुहृद्
तस्यैवापरलेख्यसूचितमिदं पत्रं प्रयोगाश्रयम् ।
सुव्यक्तं शकटेन भेदपटुभिः सन्धाय सार्द्धं परै-
र्भर्तृस्नेहपराङ्मुखेन कृपणं प्राणार्थिना चेष्टितम् ॥ १५ ॥

अन्वयः— प्राणार्थिना भर्तृस्नेहपराङ्मुखेन शकटेन भेदपटुभिः परैः सार्द्धं सन्धाय कृपणं चेष्टितम् (इति) सुव्यक्तम् । ( यतो हि ) मुद्रा तस्य कराङ्गुलिप्रणयिनी, प्रयोगाश्रयम् अपरलेख्यसूचितम् इदं पत्रं तस्यैव, सिद्धार्थकः तत्सुहृद् ॥ १५ ॥

व्याख्या—प्राणार्थिना— पुत्रदारादिजीवनाभिलाषिणा, भर्तृस्नेहपराङ्मुखेन— भर्तुः स्वामिनः स्नेहः प्रीतिः तस्मात् पराङ्मुखेन विमुखेन, शकटेन— शकटदासेन,

३२४ मुद्राराक्षसम्

भेदपटुभि —उपजापनिपुणै , परै —शत्रुभि., सार्द्धं—सह, संधाय—मिलित्वा, कृपण—हीन, चेष्टितम्—आचरितम्, ( इति ) सुव्यक्तम्—सुस्पष्टम् । ( यतो हि ) मुद्रा—अङ्गुलिमुद्रा, तस्य—शकटदासस्य, कराङ्गुलिप्रणयिनी—करशाखा-वर्तिनी, प्रयोगाश्रयम्—प्रयोग शत्रुकृतभेदोपाय आश्रय आलम्ब यस्य तथाभूतम्, अपरलेख्यसूचितम्—अपरेण इतरेण लेख्येन सूचित लेखेन संवा-दितम्, इद—दृश्यमान, पत्रम्, तस्यैव—शकटस्यैव, सिद्धार्थक , तत्सुहृत्—तस्य शकटस्य सुहृत्—मित्रम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अनुवाद—अथवा, क्या सन्देह है ?

प्राणों के इच्छुक तथा स्वामिभक्ति से विमुख शकटदास ने फूट डालने में पटु शत्रुओं से मिलकर हीन चेष्टा की है—यह सुस्पष्ट है, क्योंकि ( यह ) मुद्रा ( अंगूठी ) उस ( शकटदास ) के हाथ की अँगुली से प्रेम करने वाली है, ( अर्थात् सदा उसी के पास रहती है ), ( कूटनीतिक ) प्रयोग पर आधारित तथा दूसरी लिखावट से सूचित ( अर्थात् मिलता हुआ ) यह पत्र उसी ( शकटदास ) का है और सिद्धार्थक उसका मित्र है ॥ १५ ॥

टिप्पणीप्राणार्थिना—यहाँ प्राण का तात्पर्य है स्त्री-पुत्रों के जीवन से । भर्तृस्नेहपराङ्मुखेन—परा = दूर । परा अञ्चति इति परा√अञ्च्+क्विप् कर्तरि = पराच् ( प्रातिपदिक ) । पराक् मुखमस्य इति पराङ्मुख, तेन । 'पदव्यवाये च' इति णत्वनिषेध । भर्तु स्नेह, तत्र तस्मात् वा पराङ्मुखेन । शकटेन—यहाँ 'शकट' शकटदास के लिए आया है । जैसे 'भीमसेन' के लिए 'भीम' और 'गोदावरी' के लिए 'गोदा' का प्रयोग किया जाता है । मुद्रा तस्य—यह मुद्रा राक्षस ने शकटदास को दी थी और कहा था कि इसी मुद्रा से तुम व्यवहार करना—'अनयैव मुद्रया स्वाधिकारे व्यवहर्त्तव्यम्'—द्वितीय अंक । प्रयोगाश्रयम्—प्रयोग = साम, दान, दण्ड और भेद । इनमें से कोई भी जिसका अवलम्ब है । लेख्य—अक्षर लिखावट । √लिख्+ण्यत् कर्मणि = लेख्यम् । इस श्लोक में काव्यलिंग अलंकार तथा समुच्चय अलंकार हैं । इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ।॥ १५ ॥

मलयकेतुः—आर्य ! 'अलंकारत्रय श्रीमता यदनुप्रेषित, तदुपगतम्'

पञ्चमोऽङ्कः ३२५

इत्यार्येण यल्लिखितं, तन्मध्यादेकं किमिदम् ? [ निर्वर्ण्यात्मगतम् ] कथं तातेन धृतपूर्वमिदमाभरणम् ? [ प्रकाशम् ] आर्य, कुतोऽयमलङ्कारः ?

राक्षसः—वणिग्भ्यः क्रयादधिगतः ।

मलयकेतुः—विजये ! अपि प्रत्यभिजानाति भवती भूषणमिदम् ?

प्रतीहारी—[ निर्वर्ण्य सवाष्पम् ] कुमाल ! अहं ण पच्चभिआणिस्सं ? इमं क्खु सुगिहोदणामधेएण देएण पब्बदीसरेण धारिदपुव्वं । ( कुमार ! कथं न प्रत्यभिज्ञास्यामि ? इदं खलु सुगृहीतनामधेयेन देवेन पर्वतेश्वरेण धारितपूर्वम् । )

मलयकेतुः—[ सवाष्पम् ] हा तात !—

एतानि तानि तव भूषणवल्लभस्य गात्रोचितानि कुलभूषण ! भूषणानि । यैः शोभितोऽसि मुखचन्द्रकृतावभासो नक्षत्रवानिव शरत्समयप्रदोषः ॥ १६ ॥

अन्वयः—कुलभूषण ! भूषणवल्लभस्य तव गात्रोचितानि एतानि तानि भूषणानि यैः शोभितः मुखचन्द्रकृतावभासः नक्षत्रवान् शरत्समयप्रदोष इव असि ॥ १६ ॥

व्याख्या—कुलभूषण !—हे वंशालङ्करण ! भूषणवल्लभस्य—भूषणानि अलङ्काराः वल्लभाति प्रियाणि यस्य तथाविधस्य, तव—भवतः, गात्रोचितानि—शरीरयोग्यानि, एतानि—इमानि, तानि—प्रसिद्धानि, भूषणानि—अलङ्करणानि, यैः—भूषणैः, शोभितः—अलङ्कृतः, मुखचन्द्रकृतावभासः—मुखचन्द्रेण चन्द्रतुल्येन मुखेन कृतः विहितः अवभासः दीप्ति येन तादृशः ( पक्षान्तरे— ) मुखे आरम्भे चन्द्रेण कृतः अवभासः प्रकाशः यस्य तथाविधः, नक्षत्रवान्—तारकामण्डितः, शरत्समयप्रदोष इव—शरत्समयस्य शरत्कालस्य प्रदोषः रजनीमुखमिव, असि—अभूः ॥ १६॥

हिन्दी अनुवादमलयकेतु—आर्य ! 'श्रीमन् ने जो तीन आभूषण भेजे, वे मिल गये' यह जो आर्य ने लिखा है सो क्या उन्ही ( आभूषणों ) में से यह एक है ? [ अच्छी तरह देखकर मन में ] पहले पिता जी के द्वारा धारण

१२६ मुद्राराक्षसम्

किया हुआ यह आभूषण कैसे ? [ प्रकट ] आर्य ! यह आभूषण कहाँ से ( प्राप्त किया ) ?

राक्षस—बनियों से खरीदकर प्राप्त किया।

मलयकेतु—विजये ! क्या तुम इस आभूषण को पहचानती हो ?

प्रतीहारी—[ भली भाँति देखकर आंसू के साथ ] कैसे न पहचानूंगी ? यह तो पहले प्रात स्मरणीय महाराज पर्वतेश्वर के द्वारा धारण किया गया है।

मलयकेतु—[ आंसू के साथ ] हाय पिता जी !

हे कुलभूषण ! आभूषण के प्रेमी आपके शरीर के योग्य ये वे आभूषण हैं, जिनसे सुशोभित होकर ( अपने ) चन्द्रतुल्य मुख से कान्ति फैलाते हुए आप नक्षत्रों से युक्त शरत्कालीन प्रदोष के समान लगते थे ॥१६॥

टिप्पणीतन्मध्यात्—'तत्' अलङ्कारत्रय को सूचित करता है। यहाँ बुद्धिस्थ अपादान की अपेक्षा करके पञ्चमी हुई है। इस प्रश्न से मलयकेतु की बुद्धिहीनता सूचित होती है। क्योकि उसकी दृष्टि में राक्षस चन्द्रगुप्त से मिला हुआ है, ऐसी स्थिति में राक्षस चन्द्रगुप्त का दिया हुआ पर्वतेश्वर वाला आभूषण पहनकर मलयकेतु के पास कैसे आ सकता है। यदि कहे कि राक्षस को इसका ज्ञान नही है कि यह आभूषण किसका है तो भला चन्द्रगुप्त ही मलयकेतु के पास रहते हुए राक्षस को यह आभूषण कैसे भेज सकता है, जबकि वह राक्षस से गुप्त सन्धि कर चुका है। क्या कभी इस आभूषण के देख लेने से मलयकेतु के मन में राक्षस के प्रति सन्देह नही उत्पन्न हो सकता है ? प्रत्यभिजानासि—प्रति-अभि√ज्ञा+लट्—सि । अत्र 'सम्प्रतिभ्यामनाध्याने' इति सूत्रेण नात्मनेपदम् अभिना व्यवधानात् । धारितपूर्वम्—धृतपूर्वम् । 'धारित' इत्यत्र स्वार्थे णिच् । असि—अभू । अत्र वर्तमानसामीप्ये भूतार्थे लट् । इस श्लोक में लाटानुप्रास, रूपक और उपमा का सन्देहसङ्कर, प्रतीयमानोपमा और पूर्णोपमा अलङ्कार हैं। इसमे वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ मे देखिये ॥१६॥

राक्षस—[ स्वगतम् ] कथं पर्वतेश्वरधृतपूर्वाणीत्याह ? [ प्रकाशम् ] व्यक्तमेतान्यपि तेन चाणक्यप्रयुक्तेन वणिग्जनेनास्मासु विक्रीतानि ।

पञ्चमोऽङ्कः ३२५

मलयकेतुः—आर्य ! तातेन धृतपूर्वाणामाभरणविशेषाणां विशेषतश्चन्द्रगुप्तहस्तगतानां वणिग्भ्यः क्रयादधिगम इति न युज्यते, अथवा युज्यत एवैतत्—

चन्द्रगुप्तस्य विक्रेतुरधिकं लाभमिच्छतः।
कल्पिता मूल्यमेतेषां क्रूरेण भवता वयम् ॥१७॥

**अन्वयः—**अधिकं लाभम् इच्छतः विक्रेतुः चन्द्रगुप्तस्य क्रूरेण भवता वयम् एतेषां मूल्यं कल्पिताः ॥१७॥

व्याख्या—अधिकं—विशेषं, लाभं—प्राप्तिम्, इच्छतः—वाञ्छतः, विक्रेतुः—विनिमयकामस्य, चन्द्रगुप्तस्य—मौर्यस्य, क्रूरेण—नृशंसेन, भवता—त्वया, वयम्—अहम्, एतेषाम्—आभूषणानाम्, मूल्यम्—अर्घः, कल्पिताः—निरूपिताः ॥१७॥

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—[ मन में ] पहले पर्वतेश्वर के धारण किये हुए हैं, यह कैसे कहा ? [ प्रकट ] स्पष्ट है कि ये (आभूषण) भी चाणक्य के द्वारा नियुक्त उन बनियों ने हमें बेंच दिये हैं।

**मलयकेतु—**आर्य ! पिता जी के द्वारा पहले धारण किये गये और विशेष करके चन्द्रगुप्त के हाथ में गये हुए विशिष्ट आभूषणों का बनियों से खरीदकर प्राप्त करना ठीक नहीं है। अथवा यह ठीक ही है—

अधिक लाभ चाहने वाले विक्रेता चन्द्रगुप्त के लिए क्रूर आप ने मुझे (ही) इन (आभूषणों) का मूल्य बनाया है ॥१७॥

टिप्पणी—तान्यपि—दूसरे अंक मे आ चुका है—'परितोष्य विक्रेतारं गृह्यन्ताम्'। सो अब राक्षस की समझ में बात आयी कि वे विक्रेता लोग चाणक्य के ही भेजे हुए थे। वयम्—अत्र 'अस्मदो द्वयोश्च' इति सूत्रेण बहुत्वम्। इस श्लोक में परिवृत्ति अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है। अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिये ॥१७॥

राक्षसः—[ आत्मगतम् ] अहो ! सुश्लिष्टोऽयमभूच्छत्रुप्रयोगः कुतः ?—

३३० मुद्राराक्षसम्

लगा हुआ मित्र का पुत्र हूँ। वह तुमको धन देने वाला है और ( यहाँ ) तुम अपनी इच्छा के अनुसार मुझे देते हो। वहाँ तुम्हारा मन्त्री का पद सत्कारपूर्वक दासता ही है और यहाँ ( तुम्हारा ) स्वामित्व है। फिर इससे अधिक किस स्वार्थ के विषय मे कामना तुम्हे अनार्य बना रही है ? ॥१६॥

टिप्पणीअनार्या सवृत्ता.—आर्य का लक्षण यह है—'कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रवृताचारो स वा आर्य इति स्मृत ॥' जो कर्तव्य करे और अकर्तव्य न करते हुए सदाचारी हो, वह आर्य है। हमने तो आपके उपकार रूप कर्तव्य का पालन नहीं किया, बल्कि आपके अपकार रूप अकर्तव्य का अनुष्ठान किया, इसलिये हम अनार्य हो गये। मोर्योऽसौ अर्थात् चन्द्रगुप्त तुम्हारे लिये प्रभु के समान सेव्य है और मै तुम्हारा सेवक हूँ, फलत वहाँ दासता है और यहाँ स्वामित्व है। दाता चन्द्रगुप्त तुमको धन देनवाला है और यहा तुम अपनी इच्छा से धन देते हो अर्थात् वहाँ धन के विषय मे परतन्त्रता है और यहाँ स्वतन्त्रता है। दास्यम् चन्द्रगुप्त के पास मन्त्री का पद दासता है और यहाँ मेरे पास तुम स्वामी हो। स्वार्थे कस्मिन् उपर्युक्त तथ्यो के आधार पर हम कह सकते हैं कि तुम्हारे लिये मेरे यहाँ से बढकर चन्द्रगुप्त के यहाँ कोई भी चीज प्रलोभन की नही है। फिर क्यो तुम मुझे छोडकर शत्रु का आश्रय ले रहे हो ? इससे बढकर अनार्यता क्या होगी। इस श्लोक मे यथासख्य अलकार है और स्रग्धरा छन्द है। स्रग्धरा का लक्षण १, १ मे देखिये ॥१६॥

राक्षस—कुमार ! एवमयुक्तव्याहारिणा भवतैव मे निर्णयो दत्त. कुत ?—[ 'मौर्याऽसौ स्वामिपुत्र.' इति युष्मदस्मदोर्व्यत्ययेन पठति । ]

मलयकेतु—[ लेखमलङ्करणस्थगिकाञ्च विनिर्दिश्य ] इदमिदानी किम् ?

राक्षस—[ सबाष्पम् ] विधेर्विलसितमिद, कुत ?—

भृत्यत्वे परिभावधामनि सति स्नेहात् प्रभूणा सता पुत्रेभ्य कृतवेदिना कृतधिया येषामभिन्ना वयम्। ते लोकस्य परीक्षका क्षितिभृत पापेन येन क्षताः तस्येद विपुल विधेर्विलसित पुसा प्रयत्नच्छिदः॥२०॥

अन्वय—कृतधिया कृतवेदिना येषा सता प्रभूणा वय परिभावधामनि

पञ्चमोऽङ्कः ३३१

भृत्यत्वे सति स्नेहात् पुत्रेभ्यः अभिन्नाः, ते लोकस्य परीक्षकाः क्षितिभृतः येन पापेन क्षताः तस्य पुंसां प्रयत्नच्छिदः विधेः इदं विपुलं विलसितम् ॥२०॥

व्याख्या—कृतधियां—परिनिष्ठितबुद्धीनां, कृतवेदिनां—कृतं कर्म विदन्ति जानन्ति ये तादृशानां गुणज्ञानां, येषां, सतां प्रभूणां—नृपोत्तमानां, (सम्बन्धे) वयम्—अहम्, परिभावधामनि—तिरस्कारास्पदे, भृत्यत्वे—सेवकत्वे, सति, स्नेहात्—प्रेम्णः, पुत्रेभ्यः—आत्मजेभ्यः, अभिन्नाः—नान्यः (स्म), ते—तथाविधाः, लोकस्य—पुरुषस्य, परीक्षकाः—विनिर्णयसमर्थाः, क्षितिभृतः—राजानः, येन, पापेन—दुराचारेण विधिना, क्षताः विनाशितः, तस्य—तथाविधस्य, पुंसां—पुरुषाणां, प्रयत्नच्छिदः—उद्योगनाशिनः, विधेः—दैवस्य, इदं दृश्यमानं, विपुलं—महत्, विलसितम्—लीला ॥२०॥

हिन्दी अनुवादराक्षस—कुमार ! इस प्रकार अनुचित कहने वाले आपने ही मेरा निर्णय कर दिया । क्योकि—[ 'मौर्योऽसौ स्वामिपुत्रः' इस श्लोक में युष्मद् और अस्मद् शब्दों को एक दूसरे से बदलकर पढ़ता है । ]

मलयकेतु—[ पत्र और आभूषणों की पेटी को बता कर ] सम्प्रति यह क्या है ?

राक्षस—[ आँसू के साथ ] यह भाग्य की लीला है। क्योकि—

संयत चित्त वाले तथा उपकार को समझने वाले जिन उत्तम राजाओं के अपमानास्पद सेवक-पद पर होने पर (भी) मैं स्नेह के कारण पुत्रों से भिन्न नही समझा जाता था, वे लोगों के परीक्षक (अर्थात् सदसद्विवेक-कर्ता) राजा जिस पापी (भाग्य) के द्वारा विनष्ट कर दिये गए, उस पुरुषों के प्रयत्न को नष्ट करने वाले भाग्य की यह महान् लीला है ॥ २० ॥

टिप्पणीअयुक्तव्याहारिणा—अनुचितवादिना । अयुक्तं व्याहरति तच्छीलः इति अयुक्त-वि-आ √हृ + णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = अयुक्तव्याहारी, तेन । युष्मदस्मदोर्व्यत्ययेन—युष्मद् और अस्मद् शब्द के व्यत्यय से 'मौर्योऽसौ'—श्लोक का पाठ इस प्रकार होता है—

मौर्योऽसौ स्वामिपुत्रः परिचरणपरो मित्रपुत्रो मम त्वं दाता सोऽर्थस्य मह्यं स्वमतमनुगतोऽहं तु तुभ्यं ददामि ।