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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

१९० मुहूर्त्तचिन्तामणि यात्रा में ग्रहों का शुभाशुभफल केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः शुभास्स्युर्याने पापास्त्र्यायषट्खेषु चन्द्रः । नेष्टो लग्नान्त्यारिरन्ध्रे शनिः खेस्ते शुक्रो लग्नेट् नगान्त्यारिरन्ध्रे ॥ ५६ ॥ अन्वयः—केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः, त्र्यायषट्खेषु पापाः याने शुभाः स्युः, लग्ना- न्त्यारिरन्ध्रे चन्द्रः नेष्टः (स्यात्), खे शनिः नेष्टः, अस्ते शुक्रः नेष्टः, नगान्त्यारिरन्ध्रे लग्नेट् नेष्टः स्यात् ॥ ५६ ॥ यात्रा में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें इन स्थानों में स्थित शुभग्रह और तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इन स्थानों में स्थित पापग्रह शुभ होते हैं। लग्न, बारहवें, छठे, आठवें, इन स्थानों में स्थित चन्द्रमा, दशवें स्थान में स्थित शनैश्चर, सातवें स्थान में स्थित शुक्र और सातवें, बारहवें, छठे, आठवें इन स्थानों में स्थित लग्न का स्वामी अशुभ होता है ॥ ५६ ॥ यात्रा के अधिकारी योगात्सिद्धिर्धरणिपतीनामृक्षगुणैरपि भूदेवानाम् । चौराणामपि शकुनैरूक्ता भवति मुहूर्त्तादपि मनुजानाम् ॥ ५७ ॥ अन्वयः—धरणिपतीनां योगात्, भूदेवानां ऋक्षगुणैः, अपि चौराणां शुभशकुनैः सिद्धिः उक्ता, मनुजानां मुहूर्त्तात् अपि सिद्धिः भवति ॥ ५७ ॥ आगे कहे हुए योग-लग्न-बल से राजाओं की, चन्द्र-तारा-बल-सहित विहित नक्षत्रादि में की हुई यात्रा ब्राह्मणों की, आगे कहे हुए शकुनों से चोरों की और मुहूर्त्त-बल से अन्य मनुष्यों की यात्रा सिद्धिदायक होती है ॥ ५७ ॥ योगयात्रा सहजे रविर्दशमे शशी तथा शनिमङ्गलौ रिपुगृहे सितः सुते । हिबुके बुधो गुरुरपीह लग्नगः स जयत्यरीन् प्रचलितोऽचिरान्नृपः ॥ ५८ ॥ अन्वयः—रविः सहजे, शशी दशमे, तथा शनिमगलौ रिपुगृहे, सितः सुते, बुधः हिबुके, गुरुः अपि लग्नगः (यदि स्यात्) इह (अस्मिन् समये यः) नृपः प्रचलितः स अचिरात् अरीन् जयति ॥ ५८ ॥ यदि लग्न से तीसरे स्थान में शुक्र और दशवें स्थान में चन्द्रमा हो, छठे स्थान में शनि, मंगल ये दोनों हों, पाँचवें स्थान में शुक्र, चौथे स्थान में बुध, लग्न में बृहस्पति हो, ऐसे योग में चला हुआ राजा शीघ्र ही अपने शत्रुओं को जीतता है ॥ ५८ ॥

यात्राप्रकरण १९१ भ्रातरि सौरिर्भूमिसुतो वैरिणि लग्ने देवगुरुः । आयगतेऽर्के शत्रुजयश्चेदनुकूलो दैत्यगुरुः ॥ ५९ ॥ अन्वयः—भ्रातरि सौरिः, वैरिणि भूमिसुतः, लग्ने देवगुरुः, आयगतः अर्कः, च (तथा) चेत् दैत्यगुरुः अनुकूलः (तदा) शत्रुजयः स्यात् ॥ ५९ ॥ अथवा तीसरे स्थान में शनैश्चर, छठे स्थान में मंगल, लग्न में बृहस्पति, ग्यारहवें स्थान में सूर्य हो और यदि शुक्र पीछे या वामभाग में हो, ऐसे योग में चले हुए राजा की जय होती है ॥ ५९ ॥ तनौ जीव इन्दुर्मृतौ वैरिगोऽर्कः प्रयातो महीन्द्रो जयत्येव शत्रून् ॥ ६० ॥ अन्वयः—(यदि) तनौ जीवः, मृतौ इन्दुः, अर्कः वैरिगः (तदा) प्रयात: महीन्द्रः शत्रून् जयत्येव ॥ ६० ॥ अथवा लग्न में बृहस्पति, आठवें स्थान में चन्द्रमा, छठे स्थान में सूर्य हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाला राजा शत्रुओं को अवश्य ही जीतता है ॥ ६० ॥ लग्नगतः स्याद्देवपुरोधाः । लाभधनस्थैः शेषनभोगैः ॥ ६१ ॥ अन्वयः—(यदि) देवपुरोधाः लग्नगतः स्यात्, शेषनभोगैः लाभधनस्थैः (तदा राज्ञो विजयः) ॥ ६१ ॥ अथवा यदि लग्न में बृहस्पति हो और गेरहवें, दूसरे इन दोनों स्थानों में शेष सब ग्रह हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा को विजय होती है ॥ ६१ ॥ द्यूने चन्द्रे समुदयगेऽर्के जीवे शुक्रे विदि धनसंस्थे । ईदृग्योगे चलति नरेशो जेता शत्रून् गरुड इवाहीन् ॥ ६२ ॥ अन्वयः—चन्द्रे द्यूने, अर्के समुदयगे, जीवे शुक्रे विदि धनसंस्थे, ईदृग्योगे नरेशः चलति (तदा) गरुडः अहीन् इव शत्रून् जेता ॥ ६२ ॥ अथवा यदि सातवें स्थान में चन्द्रमा, लग्न में सूर्य और गुरु, शुक्र, बुध ये तीनों ग्रह दूसरे स्थान में हों ऐसे योग में चलनेवाला राजा इस प्रकार शत्रुओं को जीतता है जैसे गरुड़ सर्पों को जीतता है ॥ ६२ ॥ वित्तगतः शशिपुत्रो भ्रातरि वासरनाथः । लग्नगते भृगुपुत्रे स्युः शलभा इव सर्वे ॥ ६३ ॥ अन्वयः—शशिपुत्रः वित्तगतः वासरनाथः भ्रातरि (स्थितः), भृगुपुत्रे लग्नगते (सति) सर्वे (शत्रवः) शलभाः इव स्युः ॥ ६३ ॥

१९२ मुहूर्तचिन्तामणि अथवा दूसरे स्थान में बुध, तीसरे स्थान में सूर्य और लग्न में शुक्र हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा के सामने शत्रुगण इस प्रकार के हो जाते हैं जैसे अग्नि के सामने शलभ ॥ ६३ ॥ उदये रविर्यदि सौरिररिगः शशी दशमेऽपि । वसुधापतिर्यदि याति रिपुवाहिनी वशमेति ॥ ६४ ॥ अन्वयः—यदि रविः उदये, सौरिः अरिगः, शशी दशमे अपि (स्थितः) (अत्र) यदि वसुधापतिः याति (तदा) रिपुवाहिनी वशं एति ॥ ६४ ॥ अथवा यदि लग्न में सूर्य, छठे स्थान में शनैश्चर वा दशवें स्थान में चन्द्रमा हो, ऐसे योग में यदि राजा यात्रा करे तो शत्रु की सेना उसके अधीन हो जाती है ॥ ६४ ॥ तनौ शनिकुजौ रविर्दशमभे बुधो भृगुसुतोऽपि लाभदशमे । त्रिलाभरिपुभेषु भूसुतशनौ गुरुज्ञभृगुजास्तथा बलयुताः ॥ ६५ ॥ अन्वयः—तथा तनौ शशिकुजौ, दशमभे रविः, बुधः भृगुसुतोपि लाभदशमे, भूसुतशनौ त्रिलाभरिपुभेषु (स्थितौ) गुरुज्ञभृगुजाः बलयुताः (तदा जयः स्यात्) ॥ ६५ ॥ अथवा यदि लग्न में शनैश्चर, मंगल ये दोनों स्थित हों, दशवें स्थान में सूर्य हो और दशवें या गेरहवें स्थान में बुध वा शुक्र हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है । अथवा तीसरे, छठे, गेरहवें इन तीनों स्थानों में कहीं मंगल, शनैश्चर हों और बृहस्पति, बुध, शुक्र ये बली होकर कहीं भी स्थित हों, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ॥ ६५ ॥ समुदायगे विबुधगुरौ मदनगते हिमकिरणे । हिबुकगतौ बुधभृगुजौ सहजगताः खलखचराः ॥ ६६ ॥ अन्वयः—विबुधगुरौ समुदायगे, हिमकिरणे मदनगते (सति) यदि बुधशुक्रौ हिबुक- गतौ, खलखचराः सहजगताः (तदा जयः स्यात्) ॥ ६६ ॥ अथवा बृहस्पति यदि लग्न में हो और चन्द्रमा सातवें स्थान में हो, और बुध, शुक्र ये दोनों चौथे स्थान में स्थित हों और तीसरे स्थान में पापग्रह स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ॥ ६६ ॥ त्रिदशगुरुस्तनुगो मदने हिमकिरणो रविरायगतः । सितशशिजावपि कर्मगतौ रविसुतभूमिसुतौ सहजे ॥ ६७ ॥

यात्राप्रकरण १९३ अन्वयः—त्रिदशगुरुः तनुगः, हिमकिरणः मदने, रविः आयगतः, सितशशिजौ कर्म- गतौ, रविसुतभूमिसुतौ सहजे, (तदापि जयः स्यात्) ।। ६७ ।। अथवा यदि बृहस्पति लग्न में, चन्द्रमा सातवें स्थान में, सूर्य गेरहवें स्थान में और शुक्र, बुध ये दोनों दशवें स्थान में, शनैश्चर और मंगल ये दोनों तीसरे स्थान में स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करने से शत्रु राजा के अधीन हो जाते हैं ।। ६७ ।। देवगुरौ वा शशिनि तनुस्थे वासरनाथे रिपुभवनस्थे । पञ्चमगेहे हिमकरपुत्रः कर्मणि सौरिः सुहृदि सितश्च ।। ६८ ।। अन्वयः—देवगुरौ वा शशिनि तनुस्थे, वासरनाथे रिपुभवनस्थे, हिमकरपुत्रः पञ्चम- गेहे, सौरिः कर्मणि, च सितः सुहृदि (तदापि जयः स्यात्) ।। ६८ ।। अथवा बृहस्पति या शुक्र लग्न में, सूर्य छठे स्थान में, बुध पाँचवें स्थान में, शनैश्चर दशवें स्थान में तथा शुक्र चौथे स्थान में हो, ऐसे योग में राजा की यात्रा माता के समान हितकारिणी होती है ।। ६८ ।। हिमकिरणसुतो बली चेत्तनौ त्रिदशपतिगुरुर्हि केन्द्रस्थितः । व्ययगृहसहजारिधर्मस्थितो यदि च भवति निर्बलश्चन्द्रमाः ।। ६९ ।। अन्वयः—चेत् बली हिमकिरणसुतः तनौ, त्रिदशपतिगुरुः केन्द्रस्थितः, च यदि निर्बलः चन्द्रमाः व्ययगृहसहजारि धर्मस्थितो भवति (तदापि जयः स्यात्) ।। ६९ ।। अथवा यदि बली होकर बुध लग्न में और बृहस्पति केन्द्र में स्थित हो और चन्द्रमा निर्बल होकर बारहवें, तीसरे, छठे, नवें इनमें से किसी स्थान में स्थित हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ।। ६९ ।। अशुभखगैरनवाष्टमदस्थैर्हिबुकसहोदरलाभगृहस्थः । कविरिह केन्द्रगगीष्पतिदृष्टो वसुचयलाभकरः खलु योगः ।। ७० ।। अन्वयः—अशुभखगैः अनवाष्टमदस्थैः, कविः हिबुक सहोदरलाभगृहस्थः केन्द्र- गगीष्पतिदृष्टः इह खलु (निश्चयेन) वसुचयलाभकरः योगः स्यात् ।। ७० ।। अथवा यदि नवें, आठवें, सातवें इन स्थानों को छोड़कर अन्य स्थानों में पापग्रह स्थित हों और चौथे, तीसरे, गेरहवें इन स्थानों में स्थित शुक्र को केन्द्रस्थ बृहस्पति देखता हो तो यह योग यात्रा करनेवाले को धनसमूह का लाभ कराता है ।। ७० ।। रिपुलग्नकर्महिबुके शशिजे परिवीक्षिते शुभनभोगमनैः । व्ययलग्नमन्मथगृहेषु जयः परिवर्जितेष्वशुभनामधरैः ।। ७१ ।।

१९४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—शशिजे रिपुलग्नकर्महिबुके (स्थिते) शुभनभोगमनैः परिवीक्षिते, अशुभ- नामधरैः (पापैः) व्ययलग्नमन्मथगृहेषु परिवर्जितेषु [स्थानेषु] स्थितैः (जयः स्यात्) ॥ ७१ ॥ अथवा शुभग्रहों से दृष्ट बुध छठे या लग्न या दशवें या चौथे स्थान में हो और लग्न, बारहवें, सातवें इन स्थानों को छोड़ अन्यत्र शुभग्रह स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की जय होती है ॥ ७१ ॥ लग्ने यदि जीवः पापा यदि लाभे कर्मण्यपि चेद्राज्याधिगमः स्यात् । द्यूने बुधशुक्रौ चन्द्रो हिबुके वा तद्वत्फलमुक्तं सर्वैर्मुनिवर्यैः ॥ ७२ ॥ अन्वयः—यदि जीवः लग्ने, यदि पापाः लाभे अपि वा कर्मणि चेत् (तदा) राज्या- धिगमः स्यात् । वा बुधशुक्रौ द्यूने, चन्द्रः हिबुके (तदा) सर्वैः मुनिवर्यैः तद्वत् फलं उक्तम् ॥ ७२ ॥ अथवा यदि लग्न में बृहस्पति हो और पापग्रह गेरहवें, दशवें इन दोनों स्थानों में हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा को राज्य मिलती है। अथवा बुध, शुक्र ये दोनों सातवें स्थान में हों और चन्द्रमा चौथे स्थान में हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा को भी राज्य मिलती है ॥ ७२ ॥ रिपुतनुनिधने शुक्रजीवेन्दवो ह्यथ बुधभृगुजौ तुर्यगेहस्थितौ । मदनभवनगश्चन्द्रमा वाम्बुगः शशिसुतभृगुजान्तर्गतश्चन्द्रमाः ॥ ७३ ॥ अन्वयः—शुक्रजीवेन्दवः रिपुतनुनिधने (स्थिताः) (तदा जयः स्यात्) वा बुधभृगुजौ तुर्यगेहस्थितौ, चन्द्रमाः मदनभवनगः (तदा जयः स्यात्) ॥ ७३ ॥ अथवा लग्न में बृहस्पति, छठे स्थान में शुक्र, आठवें स्थान में चन्द्रमा हो, अथवा बुध, शुक्र ये दोनों चौथे स्थान में और चन्द्रमा सातवें स्थान में हो, अथवा चन्द्रमा चौथे स्थान में स्थित होकर बुध और शुक्र के मध्य में हो, इन योगों में की हुई यात्रा जयकारिणी होती है ॥ ७३ ॥ सितजीवभौमबुधभानुतनूजास्तनुमन्मथारिहिबुकत्रिगृहे चेत् । क्रमतोरिसोदरखशात्रवहोराहिबुकआयगैर्गुरुदिनेऽखिलखेटैः ॥ ७४ ॥ अन्वयः—चेत् सितजीवभौमबुधभानुतनूजाः क्रमतः तनुमन्मथारिहिबुकत्रिगृहे (स्थिताः) वा गुरुदिने अखिलखेटैः [सूर्याद्यैः] क्रमतः अरिसोदरखशात्रवहोराहिबुकआयगैः (तदा जयः स्यात्) ॥ ७४ ॥ अथवा लग्न में शुक्र, सातवें बृहस्पति, छठे मंगल, चौथे बुध, और तीसरे स्थान में शनैश्चर हो, अथवा बृहस्पति के दिन छठे स्थान में सूर्य, तीसरे

यात्राप्रकरण १९५ स्थान में चन्द्रमा, दशवें स्थान में मंगल, छठे स्थान में बुध, लग्न में बृहस्पति, चौथे स्थान में शुक्र, गेरहवें स्थान में शनैश्चर हो, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की जय होती है ॥ ७४ ॥ सहजे कुजो निधनगश्च भार्गवो मदने बुधो रविररौ तनौ गुरुः । अथ चेत्स्युरिज्यसितभानवो जलत्रिगता हि सौरिरुधिरौ रिपुस्थितौ ॥ ७५ ॥ अन्वयः—कुजः सहजे, भार्गवश्च निधनगः, बुधः मदने, रविः अरौ, गुरुः तनौ । अथ चेत् इज्यसितभानवः जलत्रिगताः सौरिरुधिरौ रिपुस्थितौ (तदा) हि जयः स्यात् ॥ ७५ ॥ अथवा तीसरे स्थान में मंगल, आठवें स्थान में शुक्र, सातवें स्थान में बुध, छठे स्थान में सूर्य और लग्न में बृहस्पति हो, अथवा बृहस्पति, शुक्र, सूर्य ये ग्रह चौथे और तीसरे स्थानों में हों और शनैश्चर, मङ्गल ये दोनों छठे स्थान में हों, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की जय होती है ॥ ७५ ॥ यात्राकालिक योगादि एको ज्ञेज्यसितेषु पञ्चमतपःकेन्द्रेषु योगस्तथा द्वौ चेत्तेष्वधियोग एषु सकला योगाधियोगः स्मृतः । योगे क्षेममथाधियोगगमने क्षेमं रिपूणां वधं चाथो क्षेमयशोऽवनीश्च लभते योगाधियोगे व्रजन् ॥ ७६ ॥ अन्वयः—ज्ञेज्यसितेषु एकः (यदि) पञ्चमतपःकेन्द्रेषु (स्थितः तदा) योगः (स्यात्) तथा तेषु चेत् द्वौ [स्थितौ] (तदा) अधियोगः एषु यदि सकलाः (स्थिताः तदा) योगाधियोगः स्मृतः । अथ योगे [गमने] क्षेमं, अधियोगगमने क्षेमं, रिपूणां वधं च लभते, योगाधियोगे व्रजन् क्षेमयशोऽवनीश्च लभते ॥ ७६ ॥ पाँचवें, नवें, पहिले, चौथे, सातवें, दसवें इन स्थानों में यदि बुध, बृहस्पति अथवा शुक्र इनमें से कोई एक ग्रह स्थित हो तो योग, दो ग्रह एक साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तो अधियोग और तीनों ग्रह साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तो योगाधियोग होता है। योग में यात्रा करने से क्षेम, अधियोग में यात्रा करने से क्षेम और शत्रुओं का नाश और योगाधियोग में यात्रा करने से क्षेम, यश तथा पृथ्वी का लाभ होता है ॥ ७६ ॥

१९६ मुहूर्त्तचिन्तामणि विजयादशमी की प्रशंसा इषमासि सिता दशमी विजया शुभकर्मसु सिद्धिकरी कथिता । श्रवणर्क्षयुता सुतरां शुभदा नृपतेस्तु गमे जयसन्धकरी ॥ ७७ ॥ अन्वयः—इषमासि सिता विजयादशमी शुभकर्मसु सिद्धिकरी कथिता। श्रवणर्क्षयुता सा सुतरां शुभदा (स्यात्) नृपतेः गमे तु जयसन्धकरी (भवति) ॥ ७७ ॥ आश्विन मास की शुक्ल दशमी विजयासंज्ञक है। यह यात्रा करनेवालों के सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि करानेवाली है। यदि यह श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो अति ही शुभ फल देनेवाली होती है। विशेष करके राजा की यात्रा में विजय अथवा सन्धि करानेवाली होती है ॥ ७७ ॥ यात्रा में चित्तशुद्धि की प्रधानता चेतोनिमित्तशकुनै रतिसुप्रशस्त- र्ज्ञात्वा विलग्नबलमुर्व्यधिपः प्रयाति । सिद्धिर्भवेदथ पुनः शकुनादितो- ऽपि चेतोविशुद्धिरधिका न च तां विनेयात् ॥ ७८ ॥ अन्वयः—यदि विलग्नबलं ज्ञात्वा सुप्रशस्तैः चेतोनिमित्तशकुनैः उर्व्यधिपः प्रयाति (तदा) खलु [निश्चयेन] सिद्धिः भवेत् । अथ पुनः शकुनादितोऽपि चेतोविशुद्धिः अधिका (भवति) तां (चेतोविशुद्धिं) विना च न इयात् ॥ ७८ ॥ चित्त की प्रसन्नता, शुभ अंगस्फुरणादि निमित्त, शुभ शकुन इन सबके सहित लग्नबल जानकर यदि राजा चलता है तो वाञ्छित कार्य की सिद्धि होती है। परन्तु इनमें शकुनादि से चित्त की प्रसन्नता अधिक गिनी जाती है, इसलिए यदि चित्त की प्रसन्नता हो और शुभ शकुनादि भी हों तो यात्रा करे और यदि सब वस्तु शुभ हों परंतु चित्त की शुद्धि न हो तो यात्रा न करे ॥ ७८ ॥ यात्राप्रतिबन्धक कार्य व्रतबन्धनदैवतप्रतिष्ठाकरपीडोत्सवतकासमाप्तौ । न कदापि चलेदकालविद्युद्घनवर्षातुहिनेऽपि सप्तरात्रम् ॥ ७९ ॥ अन्वयः—व्रतबन्धनदैवतप्रतिष्ठाकरपीडोत्सवसूतकासमाप्तौ कदापि न चलेत्, अकालविद्युद्घनवर्षातुहिने अपि सप्तरात्रं (यावत् न चलेत्) ॥ ७९ ॥ यज्ञोपवीत, देवप्रतिष्ठा, विवाह, होलिकादि उत्सव और जननाशौच, मरणाशौच इन सबों की समाप्ति के बिना कदापि यात्रा न करे और ऐसे ही

यात्राप्रकरण १९७ अकाल * में बिजली चमकने, मेघों के गर्जने, वर्षा होने और कुहरा पड़ने पर सात दिन तक यात्रा न करे ॥ ७९ ॥ यात्रा-विशेष का विचार महीपतेरेकदिने पुरात्पुरे यदा भवेतां गमनप्रवेशकौ । भवारशूलप्रतिशुक्रयोगिनीर्विचारयेन्नैवकदापि पण्डितः ॥ ८० ॥ यद्येकस्मिन्दिवसे महीपतेर्निर्गमप्रवेशौ स्तः । तर्हि विचार्यः सुधिया प्रवेशकालो न यात्रिकस्तत्र ॥ ८१ ॥ अन्वयः—यदा महीपतेः एकदिने पुरात् पुरे गमनप्रवेशकौ भवेतां (तदा) भवारशूलप्रतिशुक्रयोगिनीः पण्डितः कदापि नैव विचारयेत् । यदि महीपतेः एकस्मिन् दिवसे निर्गमप्रवेशौ स्तः तर्हि तत्र सुधिया प्रवेशकालः विचार्यः यात्रिकः न (विचार्यः) ॥ ८०-८१ ॥ जहाँ एक ही दिन में राजा का गमन और प्रवेश हो अर्थात् किसी गाँव से चलकर अन्य अभीष्ट गाँव में पहुँचना हो, तो पण्डित को चाहिए कि नक्षत्रशूल, वारशूल, सम्मुख शुक्र, योगिनी इत्यादि न विचारे, केवल पंचांगशुद्धि देखकर यात्रा करे ॥ ८० ॥ और जहाँ एक ही दिन में राजा की यात्रा और प्रवेश हो अर्थात् किसी गाँव से चलकर अन्य अभीष्ट गाँव में पहुँचना हो वहाँ पहुँचने ही का काल विचारने योग्य होता है न कि यात्रा का काल ॥ ८१ ॥ यात्रा में त्रिनवमी दोष प्रवेशान्निर्गमं तस्मात्प्रवेशं नवमे तिथौ । नक्षत्रे च तथा वारे नैव कुर्यात्कदाचन ॥ ८२ ॥ अन्वयः—प्रवेशात् निर्गमं (कृत्वा) तस्मात् (निर्गमदिनात्) नवमे तिथौ नवमे नक्षत्रे तथा च नवमे वारे प्रवेशः कदाचन नैव कुर्यात् ॥ ८२ ॥ घर में पहुँचने की तिथि नक्षत्र वार से नवम तिथि नक्षत्र वार में यात्रा, और यात्रा के तिथि नक्षत्र वार से नवम तिथि नक्षत्र वार में गृहप्रवेश कदापि न करे । प्रयाण-नवमी प्रवेश-नवमी नवमी तिथि इनमें प्रवेश के दिन से नवम दिन प्रयाण-नवमी और यात्रा के दिन से नवम दिन प्रवेश-नवमी कही जाती है । नवमी तिथि प्रसिद्ध ही है, ये तीनों यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ ८२ ॥ *पौषादि चार महीनों में पानी बरसना अकाल-वृष्टि है ।

१९८ मुहूर्त्तचिन्तामणि यात्राकाल में कर्तव्य विधि अग्निं हुत्वा देवतां पूजयित्वा नत्वा विप्रानर्चयित्वा दिगीशम् । दत्त्वा दानं ब्राह्मणेभ्यो दिगीशं ध्यात्वा चित्ते भूमिपालोऽधिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ अन्वयः—अग्निं हुत्वा, देवतां पूजयित्वा, विप्रान् नत्वा, दिगीशं अर्चयित्वा, ब्राह्मणेभ्यो दानं दत्त्वा, चित्ते दिगीशं ध्यात्वा भूमिपालः अधिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ राजा को चाहिए कि अग्नि में हवन, इष्टदेवता की पूजा, ब्राह्मणों को नमस्कार, दिशा के स्वामी की पूजा करके और ब्राह्मणों को दान देकर चित्त में दिशा के स्वामी का ध्यान कर यात्रा करे ॥ ८३ ॥ नक्षत्र-दोहद कुल्माषांस्तिलतण्डुलानपि तथा माषांश्च गव्यं दधि त्वाज्यं दुग्धमथैणमांसमपरं तस्यैव रक्तं तथा । तद्वत्पायसमेव चाषपललं मार्गं च शाशं तथा षाष्टिक्यं च प्रियङ्गवपूपमथवाचित्राण्डजान्सत्फलम् ॥ ८४ ॥ कौर्मं सारिकगौधिकं च पललं शाल्यं हविष्यं हया- दृक्षे स्यात्कृसरान्नमुद्गमपि वा पिष्टं यवानां तथा । मत्स्यान्नं खलु चित्रितान्नमथवा दध्यन्नमेवं क्रमा- दृक्ष्याभक्ष्यमिदं विचार्य मतिमान्भक्षेतथाऽऽलोकयेत् ॥ ८५ ॥ अन्वयः—हयादृक्षे [अश्विन्यादिनक्षत्रे] क्रमात् कुल्माषान्, तिलतण्डुलान् तथा माषान्, गव्यं दधि, आज्यं, दुग्धं, अथ एणमांसं, तथा अपरं तस्य [मृगस्य] रक्तं, तद्वत् एव पायसम्, चाषपललम्, च मार्गम् [मृगमांसम्] शाशं [शशमांसं] तथा षाष्टिक्यं, प्रियंग्वपूपं अथवा चित्राण्डजान्, सत्फलम् कौर्मं पललं च पुनः सारिकगौधिकं पललं, शाल्यं, हविष्यं कृसरान्नमुद्गम् अपि यवानां पिष्टम्, तथा मत्स्यान्नं चित्रितान्नं अथवा दध्यन्नं (एवं कुलदेशानुसारेण) भक्ष्याभक्ष्यं इदम् विचार्य मतिमान् खलु भक्षेत् तथा आलोकयेत् ॥ ८४-८५ ॥ अश्विनी में पकाये हुए खड़े उड़द, भरणी में तिल मिले हुए चावल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गौ का दही, मृगशिरा में गौ का घी, आर्द्रा में गौ का दूध, पुनर्वसु में हरिण का मांस, पुष्य में हरिण का रक्त, आश्लेषा में खीर, मघा में चाषपक्षी का मांस, पूर्वाफाल्गुनी में मृग का मांस, उत्तराफाल्गुनी में शशा का मांस, हस्त में साँठी का भात, चित्रा में काकुनि, स्वाती में पुआ, विशाखा में अनेक प्रकार के पक्षियों का मांस,