भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 309 में से

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( ८७ ) और मैं ने सुना है कि वह जीमूतवाहन यहीं गौरी के मन्दिर के साथ लगे हुए चन्दनलतागृह में है । वह चन्दनलतागृह यही है । तो (इसमें) प्रवेश करता हूं । [भीतर जाता है] विदूषक — (घबराहट के साथ देखकर) — हे मित्र ! उस कन्या के इस चित्र को इस केले के पत्ते से ढक दो । (क्योंकि) यह सिद्धों का युवराज मित्रावसु इधर ही आ पहुंचा है । शायद (यह) देख लेगा । नायक — (केले के पत्ते से ढक देता है) मित्रावसु — (समीप जाकर) कुमार ! मित्रावसु (आपको) प्रणाम करता है । नायक — (देखकर) मित्रावसु ! तुम्हारा स्वागत है । (आओ) यहां बैठो । चेटी — राजकुमारी ! स्वामी मित्रावसु आगए । नायिका — सखी, मुझे खुशी है । नायक — मित्रावसु ! क्या सिद्धराज विश्वावसु सकुशल हैं ? मित्रावसु — (जी हां) पिता जी कुशलपूर्वक हैं । उन्हीं की आज्ञा से मैं आप के पास आया हूँ । नायक — श्रीमान् ने क्या कहा है ?

  1. कभी, कहीं, शायद ।
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