नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( ८७ ) और मैं ने सुना है कि वह जीमूतवाहन यहीं गौरी के मन्दिर के साथ लगे हुए चन्दनलतागृह में है । वह चन्दनलतागृह यही है । तो (इसमें) प्रवेश करता हूं । [भीतर जाता है] विदूषक — (घबराहट के साथ देखकर) — हे मित्र ! उस कन्या के इस चित्र को इस केले के पत्ते से ढक दो । (क्योंकि) यह सिद्धों का युवराज मित्रावसु इधर ही आ पहुंचा है । शायद (यह) देख लेगा । नायक — (केले के पत्ते से ढक देता है) मित्रावसु — (समीप जाकर) कुमार ! मित्रावसु (आपको) प्रणाम करता है । नायक — (देखकर) मित्रावसु ! तुम्हारा स्वागत है । (आओ) यहां बैठो । चेटी — राजकुमारी ! स्वामी मित्रावसु आगए । नायिका — सखी, मुझे खुशी है । नायक — मित्रावसु ! क्या सिद्धराज विश्वावसु सकुशल हैं ? मित्रावसु — (जी हां) पिता जी कुशलपूर्वक हैं । उन्हीं की आज्ञा से मैं आप के पास आया हूँ । नायक — श्रीमान् ने क्या कहा है ?
- कभी, कहीं, शायद ।
( ८८ ) नायिका-- सुणिस्सं दाव, किं तादेण संदिट्ठं त्ति । श्रोष्यामि तावत्, किं तातेन सन्दिष्टमिति । मित्रावसुः-इदमाह तातः-अस्ति मे मलयवती नाम कन्या जीवितमिवास्य सर्वस्यैव सिद्धराजान्वयस्य । सा मया तुभ्यं प्रतिपाद्यते । प्रतिगृह्यताम्'' इति । चेटी- (विहस्य) - भट्टिदारिए ! किं ण कुप्पसि दाणीं ? भर्तृदारिके ! किं न कुप्यसीदानीम् ? नायिका - (सस्मितं सलज्जं चाधोमुखी स्थित्वा) हज्जे ! हञ्जे ! मा हस । किं विसुमरिदं दे एदस्स अण्णहिअअत्तणं ? मा हस । किं विस्मृतं त एतस्यान्यहृदयत्वम् ? नायकः- (अपवार्य) वयस्य सङ्कटे पतिताः स्मः । विदूषकः- (अपवार्य) भो वअस्स ! जाणामि ण तं वज्जिअ भो वयस्य ! जानामि न तां वर्जयित्वा- अण्णहिं चित्तं दे अहिरमदि, ता जधा तथा जं किम्पि ऽन्यत्र, चित्तं तेऽभिरमते । तयथा तथा यत्किमपि भणिअ विसज्जीअदु एसो । भणित्वा विसृज्यतामेषः । नायिका- (सरोपमात्मगतम्) हदास ! को वो एदं न जाणादि ? हताश¹ ! को चैतन्न जानाति ?
( ८६ )
नायिका— मैं भी सुनना चाहती हूँ कि पिता जी ने क्या सन्देश भेजा है । मित्रावसु — पिता जी ने यह कहा है कि "मलयवती नाम की मेरी कन्या है जो सम्पूर्ण सिद्धराज वंश की मानों जान है । उसे मैं तुम्हें (विवाह में) देता हूं । (उसे) स्वीकार कीजिए ।” चेटी— (हंसकर) राजकुमारी ! अब क्रोध क्यों नहीं करती ? नायिका—(मुस्कराहट तथा लज्जा के साथ नीचे मुख करके) सखी, मत हँस । क्या तू भूल गई कि इनका मन किसी और (स्त्री) में है ? नायक— (अलग) मित्र, (बड़े) संकट में पड़ गए । विदूषक— (अलग) हे मित्र, मैं जानता हूँ कि उसे छोड़ कर आपका मन और कहीं नहीं लग सकता । अतः जैसे तैसे जो कुछ भी कह कर इसे विदा करो । नायिका—(क्रोध के साथ, मन ही मन) दुष्ट ! यह कौन नहीं जानता ?
- जिसकी आस टूट चुकी हो ; जिसने आस तोड़ दी हो ; निर्दय; अभागा; दुष्ट ।
( ६० ) [ना]यकः--मित्रावसो ! क इह नेच्छेद भवद्भिः सह श्लाघ्य- मीदृशं सम्बन्धम् ? किन्तु न शक्यते चित्तमन्यतः प्रवृत्तमन्यतो प्रवर्त्तयितुम् । अतो नाहमेनां प्रतिग्रही- तुमुत्सहे । नायिका - (मूर्च्छां नाटयति) चेटी - समस्ससदु समस्ससदु भट्टिदारिआ ! समाश्वसितु समाश्वसितु भर्तृदारिका ! विदूषकः-भो ! पराधीणो क्खु एसो, किं एदिणा अब्भत्थिदेण ? भो ! पराधीनः खल्वेषः , किमनेनाभ्यर्थितेन ? ता गुरुअणं से गदुअ अब्भड्ढेहि । तद्गुरुजनमस्य गत्वाभ्यर्थय । मित्रावसुः - (आत्मगतम् ) साधूक्तं, नायं गुरुजनवचन- मतिक्रामति । अस्य गुरुरप्यस्मिन्नेव गौर्याश्रमे प्रति- वसति । तद्यावद्गत्वाऽस्य पित्रा मलयवतीं प्रति- ग्राहयामि । नायिका - (समाश्वसिति) मित्रावसुः - (प्रकाशम् ) एवं निवेदितात्मनोऽस्मान् प्रत्या- चक्षाणः कुमार एव बहुतरं जानाति । नायिका - (सरोषं विहस्य) कहं पच्चाक्खाणलहू मित्तावसू पुणो वि मन्तेदि ? कथं ^1प्रत्याख्यानलघुर्मित्रावसुः पुनरपि मन्त्रयते ?
( ६१ ) नायक — मित्रावसु ! आप लोगों के साथ ऐसा प्रशंसनीय सम्बन्ध कौन नहीं चाहेगा ? परन्तु कहीं और लगे हुए मन को अन्यत्र नहीं लगाया जा सकता । अतः मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता । नायिका— (मूर्च्छित हो जाती है) चेटी—धीरज धरो, राजकुमारी, धीरज धरो । विदूषक—अजी, यह पराधीन है। इस से प्रार्थना करने से क्या लाभ ? अतः इसके माता पिता के पास जाकर प्रार्थना कीजिए । मित्रावसु–(मन ही मन) इसने ठीक कहा है । यह अपने माता पिता के कहने का उल्लंघन नहीं करेगा । इस के पिता जी भी इसी गौरी आश्रम में ही रहते हैं अतः जाकर इनके पिता से मलयवती को स्वीकार करने को कहता हूँ । नायिका— (होश में आती है) मित्रावसु—(प्रकट) इस प्रकार अपनी बात कहने पर हमें ‘न’ में उत्तर देने वाले कुमार स्वयं अधिक जानते हैं । नायिका—(क्रोध के साथ, हँसकर) क्या अस्वीकृति से अपमानित मित्रावसु फिर भी बातें कर रहा है ?
- इनकार से जो हलका अथवा तिरस्कृत हुआ है ।
( ६२ ) [मित्रावसुः निष्क्रान्तः] नायिका—(सास्रमात्मानं पश्यन्ती, आत्मगतम् ) किं मम एदिणा दोब्भग्गकलङ्कमइलेण अच्चंतदुक्खभाइणा किं ममैतेन दौर्भाग्यकलङ्कमलिनेन अत्यन्तदुःखभागिनाऽ अज्जवि सरीरेण धारिदेण ? त इध ज्जेव असोअ- द्यापि शरीरेण धारितेन ? तदिहैवाऽशोक- पाअव्वे इमाए अदिमुत्तलदाए उव्वंधिअ अत्ताणं वावादिस्सं। पादपेऽनयाऽतिमुक्तलतयोद्बध्यात्मानं व्यापायिष्यामि । ता एव्वं दाव। (प्रकाशं विलक्षस्मितेन) हज्जे ! पेक्ख तदेवं तावत् । हञ्जे ! प्रेक्षस्व दाव मित्तावसु दूरं गदो ण वेत्ति जेण अहम्पि इदो तावत् , मित्रावसुर्दूरं गतो न वेति, येनाहमपि इतो गमिस्सं । गमिष्यामि । चेटी—(कतिचित्पदानि गत्वा, अवलोक्यात्मगतम् ) अण्णारिसं से हिअअं पेक्खामि, ता ण गमिस्सं । २५ अन्यादृशमस्या हृदयं प्रेक्षे। तन्न गमिष्यामि। ज्जेव ओवारिदा पेक्खामि किं एसा पडिवज्जदि त्ति । इहैवाऽपवारिता प्रेक्षे किमेषा प्रतिपद्यत इति। [इति स्थिता] नायिका-[दिशोऽवलोक्य पाशं गृहीत्वा सास्रम् ] भअवदि गोरि ! इध तुए ण किदो पसादो, भगवति गौरि ! इह त्वया न कृतः प्रसादः ;
( ६३ ) [ मित्रावसु का प्रस्थान ] नायिका—(आंसुओं के साथ, अपने आप को देखती हुई मन ही मन): दुर्भाग्य रूपी कलङ्क से मलिन, अत्यन्त दुःख के भागी इस शरीर को धारण करने से अब क्या लाभ ? अतः इसी अशोक- वृक्ष के नीचे इस अतिमुक्त लता से गले में फांसी डाल कर मैं अपने आप को मार डालूंगी । तो ऐसा ही सहो । (प्रकट, विचित्र हंसी के साथ) सखी, देखो तो मित्रावसु दूर चले गए कि नहीं, जिससे मै भी यहाँ से चलूँ । चेटी—(कुछ कदम चलकर, देखकर, मन ही मन) इस का मन कुछ और प्रकार का देख रही हूँ । अतः मैं नहीं जाऊँगी । यहीं छिपकर देखूँ यह क्या करती है । (यह कह कर ठहर जाती है) नायिका- (चारों ओर देखकर, फन्दा लेकर, आंसुओं के साथ) हे भगवती गौरी ? यहां (इस जन्म में) तो आप ने कृपा नहीं
- उद्बध्य = फांसी लेकर ।
( ६४ ) 'ता जम्मन्तरे जहा ण ईरिसी दुक्खभाइणी होमि, तथा करेसि तज्जन्मान्तरे यथा नेदृशी दुःखभागिनी भवामि तथा करिष्यसि। (कण्ठेपाश मपर्यति) चेटी — (दृष्ट्वा ससम्भ्रममुपेत्य) पलित्ताअदु पलित्ताअदु परित्रायतां परित्रायताम् । एसा भट्टिदारिआ उव्वन्धित्र अत्ताणं वावादेदि । एषा भर्तृदारिकोद्वध्य आत्मानं व्यापादयति । नायकः — (ससम्भ्रममुपसृत्य) क्वासौ ? क्वासौ ? चेटी — अअं असोअपादवे । इयमशोकपादपे । नायकः — (सहर्षमवलोक्य) कथं सैवेयमस्मन्मनोरथभूमिः¹ ? (नायिकां पाणौ गृहीत्वा लतापाशमाक्षिपन्)— न खलु न खलु मुग्धे² ! साहसं कार्यमीदृक् व्यपनय करमेतं पल्लवाभं लतायाः । कुसुममपि विचेतुं यो न मन्ये समर्थः कलयति³ स कथं ते पाशमुद्वन्धनाय ॥ ११ ॥ नायिका — (ससाध्वसम्)हज्जे ! को उण एसो ? हञ्जे ! कः पुनरेषः ? श्लोक नं०: ११, अन्वयः— मुग्धे ! न खलु न खलु ईदृक् साहसं कार्य्यम् । पल्लवाभम् एतं करं लतायाः व्यपनय । मन्ये, य ते (करः) कुसुमम् अपि विचेतुं न समर्थः स उद्वन्धनाय पाशं कथं कलयति ?
( ६५ ) की। अतः दूसरे जन्म में ऐसा करना कि इस प्रकार दुःखभागिनी न होऊँ। [ गले में फन्दा डालती है ] चेटी (देख कर, घबराहट के साथ पास जाकर) बचाओ ! बचाओ ! ! यह राजकुमारी गले में फांसी लगाकर अपने प्राण दे रही है। नायक - (घबराहट के साथ पास जाकर) कहां है ? वह कहां हैं ? चेटी—यह अशोक वृक्ष के नीचे। नायक (हर्ष के साथ देखकर) हैं ! यह तो वही हमारी अभीष्ट प्रिया है ! (नायिका को हाथ से पकड़ कर लता के फन्दे को छुड़ाते हुए) हे सुन्दरी ! निश्चय ही ऐसा साहस नहीं करना चाहिए। पल्लव के समान कोमल इस हाथ को लता से हटा ले। मेरा विश्वास है कि जो तेरा हाथ फूल चुनने में (भी) समर्थ नहीं, वह फाँसी लगाने के लिए फन्दा कैसे पकड़ सकता है। नायिका- (घबराहट के साथ) सखी ! यह कौन है ? (अच्छी तरह देख
- सा + एव + इयम् + अस्मद् + मनोरथभूमिः । हमारी इच्छा का पात्र । अभीष्ट प्रिया । जिसे हम चाहते हैं ।
- मोहित करने वाली, सुन्दर, भोली-भाली, पगली, मूर्ख ।
- पकड़ता है ।
( ६६ ) (निरूध्य सरोषं हस्तमाक्षेप्तुमिच्छति)— मुञ्च मुञ्च मे अग्गहत्थं, को तुमं णिवारेदुं ? मरणे वि किं मुञ्च मुञ्च मे ऽग्रहस्तम् । कस्त्वं निवारयितुम् ? मरणेऽपि किं तुमं जेव्व-अब्भट्ठणीओ । त्वमेवाभ्यर्थनीयः ? नायकः — नाहं मुञ्चामि । कण्ठे ¹हारलतायोग्ये येन पाशस्त्वयाऽर्पितः । गृहीतः सापराधोऽयं, स कथं मुच्यते करः ? ॥ १२ ॥ विदूषकः-भोदि ! किं उण से इमस्स मरणव्ववसायस्स कारणं ? भवति ! किं पुनरस्या अस्य मरणव्यवसायस्य² कारणम् ? चेटी- (साकूतं³) णं एसो एव्व दे पिअवअस्सो । नन्वेष एव ते प्रियवयस्यः । नायकः-कथमहमेवास्या मरणकारणम् ? न खल्ववगच्छामि । विदूषकः- भोदि ! कहं वित्र । भवति ! कथमिव । चेटी - (साकूतम्) जा सा पिअवअस्सेण दे कावि हिअववल्लहा या सा प्रियवयस्येन ते काऽपि हृदयवल्लभा सिलाअले आलिहिदा ताए पक्खवादिणा एदेण शिलातले आलिखिता तस्याः ⁴पक्षपातिनैतेन श्लोक नंः १२, अन्वयः — येन (करेण) त्वया हारलतायोग्ये कण्ठे पाशः अर्पितः स सापराधः करः अयं गृहीतः, (स) कथं मुच्यते ?
( ६७ ) कर, क्रोध के साथ हाथ छुड़ाना चाहती है)—छोड़ो, मेरा हाथ छोड़ दो ! तुम रोकने वाले कौन हो ? क्या मरने के लिए भी आप से ही प्रार्थना करनी पड़ेगी ? नायक-- मैं नहीं छोड़ता :— जिस हाथ से तुमने हार के योग्य गले में फन्दा डाला है, वह अपराधी हाथ यह पकड़ा गया है। वह कैसे छोड़ा जा सकता है? विदूषक–श्रीमती, इसके इस मरने के निश्चय का क्या कारण है ? चेटी— (अभिप्राय के साथ) यही तुम्हारे प्रिय मित्र । नायक—मैं ही इस के मरने का कारण कैसे हूँ ? यह मैं नहीं समझ सका । विदूषक— आर्ये ! वह कैसे ? चेटी—(अभिप्राय के साथ) जिस प्राणप्यारी को आपके प्रिय मित्र ने शिलातल पर चित्रित किया था उसी में आसक्ति के कारण
- हारलता = लता के समान हलका सा हार ।
- व्यवसाय = कोशिश; निश्चय; काम, क्रिया ।
- आकूतं = अर्थ, अभिप्राय, भाव, आवेग, उत्कण्ठा, इच्छा ।
- पक्षपात = किसी के पक्ष में होना; किसी को पसन्द करना, चाहना, प्रेम करना; लगाव, आसक्ति ।
( ६८ ) पडिवादअंतस्सवि मित्तावसुणो णाहं पडिच्छिदेत्ति प्रतिपादयतोऽपि मित्रावसोर्नाहं प्रतीष्टेति जादणिव्वेदाए इमाए एव्वं व्ववसिदं । ¹जातनिर्वेदाऽनयैवं व्यवसितम् । नायकः-(सहर्षमात्मगतम्)-कथमियमेवासौ विश्वावसोर्दुहिता मलयवती ! अथवा रत्नाकरादृते ²कुतश्चन्द्रलेखायाः प्रसूतिः ? हा ! कथं वञ्चितोऽस्म्यनया ? विदूषकः-भोदि ! जइ एवं ता अणवराद्धो दाणी पियवयस्सो। भवति, यद्येवं तदनपराध इदानीं प्रियवयस्यः । अहवा जइ मम ण पत्तिआअदि, तदा सअं ज्जेव्व अथवा यदि मम न प्रत्येति, तदा स्वयमेव गदुअ सिलाअलं पेक्खदु भोदि । गत्वा शिलातलं प्रेक्षतां भवती । नायिका-(सहर्षं सलज्जञ्च नायकं पश्यन्ती हस्तमाक्षेप्तुमिच्छति) मुञ्च मुञ्च मे अग्गहत्थं । मुञ्च मुञ्च मेऽग्रहस्तम् । नायकः-(सस्मितं) न तावन्मुञ्चामि यावन्मम हृदयवल्लभां शिलायामालिखितां न पश्यसि । [ सर्वे चन्दनलतागृहं प्रविशन्ति ] विदूषकः— (कदलीपत्रमपनीय) भोदि ! पेक्ख एदं से हिअवल्लहं जणं । भवति ! प्रेक्षस्व, एतमस्य हृदयवल्लभं जनम् ।
( ६६ ) इन्हों ने मित्रावसु के द्वारा दी गई हुई भी मुझे स्वीकार नहीं किया इस से उदास हो कर इस ने ऐसा निश्चय किया है। नायक - (हर्ष पूर्वक, मन ही मन) क्या यही विश्वावसु की पुत्री मलयवती है ? अथवा, सागर के बिना चन्द्रलेखा की उत्पत्ति कहां हो सकती है ? आह, इस ने मुझे कैसा धोखा दिया है। विदूषक - श्रीमती जी, यदि ऐसा है तब तो मेरा प्रिय मित्र अपराध- रहित है। अथवा, यदि मेरा विश्वास नहीं करतीं तो आप स्वयं जाकर शिलातल को देख सकती हैं। नायिका-(हर्ष तथा लज्जा के साथ, नायक को देखती हुई, हाथ खींचना चाहती है)- छोड़िए, मेरा हाथ छोड़ दीजिए। नायक - (मुस्कराहट सहित) तब तक नहीं छोडूंगा जब तक शिला पर चित्रित मेरी प्राणप्रिया को देख न लेगी। (सब चन्दनलता गृह में प्रवेश करते हैं) विदूषक - (केले के पत्ते को हटाकर) देवी, देखिए, यह हैं इस की प्राणप्रिया।
- निर्वेदः = निराशा; उदासीनता; मन का उचाट होना; वैराग्य; शोक; अपमान;
- ऋते = बिना । इसके साथ पञ्चमी विभक्ति आती है।
( १०० ) नायिका-(निरूप्यापवार्य सस्मितं) चदुरिए ! अहं वित्र आलिहिदा! चतुरिके ! अहमिवालिखिता ! चेटी-(चित्राकृतिं नायिकाञ्च निर्वर्ण्य) भट्टिदारिए किं भणसि- भर्तृदारिके ! किं भणसि- अहंवित्र आलिहिदेत्ति । ईरिसं से सारिच्छं जेण णा अहमिवालिखितेति । ईदृशमस्य सादृश्यं येन न जाणीअदि किं दाव इध ज्जेव्व सिलाअले भट्टिदारिआए ज्ञायते किं तावदिहैव शिलातले भर्तृदारिकायाः पडिबिम्वं संकंतं, उद तुमं आलिहिदेत्ति । प्रतिबिम्बं सङ्क्रान्तम्, उत त्वमालिखितेति । नायिका — (विहस्य) हज्जे दुज्जणीकिदम्हि इमिणा मं हञ्जे ¹दुर्जनीकृतास्म्यनेने मां चित्तगदं दंसअंतेण । चित्रगतां दर्शयता । विदूषकः— भो ! णिव्वुत्तो दाणीं दे गन्धव्वो विवाहो । भो ! निर्वृत्त² इदानीं ते • गन्धर्वविवाहः । ता मुञ्च दाव से अग्गहत्थं । एसा क्खु कावि तन्मुञ्च तावदस्या अग्रहस्तम् । एषा खलु कापि तुरिदतुरिदा इध ज्जेव्व आअच्छदि । त्वरितत्वरिता इहैवागच्छति । नायकः— (मुञ्चति) [ ततः प्रविशति चेटी ]
( १०१ ) नायिका—(देखकर, मुस्कराहट के साथ, अलग) चतुरिके ! यह तो मानो मेरा ही चित्र है! (मानों मैं ही चित्रित की गई हूँ) चेटी—(चित्र की आकृति और नायिका को देखकर) राजकुमारी, क्या कहती है “मानों मैं ही चित्रित हूं”। इस की तो (आप के साथ) इतनी सदृशता है कि यह मालूम ही नहीं होता कि यहां शिलातल पर राजकुमारी का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है अथवा आप का चित्र बना है। नायिका—(हँस कर) सखी ! चित्र में मुझे ही चित्रित हुई दिखाकर इन्हों ने मुझे (ही) अपराधिनी बना दिया है। विदूषक—अजी आपका गन्धर्व विवाह हो गया। अतः इसका हाथ छोड़ दो। यह कोई स्त्री जल्दी जल्दी यहां ही आ रही है। नायक—(छोड़ देता है)। [चेटी का प्रवेश]
- मेरा ही चित्र दिखा कर इन्हों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मैं ही 'दुर्जन' (दुष्ट) हूँ।
- सम्पूर्ण। हो चुका।
( १०२ ) चेटी—(उपसृत्य, सहर्षम्) भट्टिदारिए ! दिट्ठिआ वड्ढसि । भर्तृदारिके ! दिष्ट्या वर्धसे । पडिच्छिदा क्खु तुमं भट्टिणो जीमूदवाहणस्स गुरुहिं । प्रतीष्टा¹ खलु त्वं भर्तुर्जीमूतवाहनस्य गुरुभिः। विदूषकः— (नृत्यन्) ही ही भो! सम्पुण्णा मणोरहा ही ही भोः ! सम्पूर्णा मनोरथाः पिअवअस्स । अहवा णहि णहि, भोदीए मलयवदीए । प्रियवयस्य । अथवा नहि नहि , भवत्या मलयवत्याः । अहवा ण एदाणं। (भोजनमभिनयन् ) मम ज्जेव एक्कस्स बह्मणस्स । अथवा न एतयोः ! ममैव एकस्य ब्राह्मणस्य । चेटी—(नायिकामुद्दिश्य) आणत्तम्हि जुवराअमित्तावसुणा आज्ञप्तास्मि युवराजमित्रावसुना जहा—अज्ज ज्जेव मलयवदीए विवाहो । ता लहुं तं यथा—अद्यैव मलयवत्याः विवाहः। तल्लघु तां गेण्हिअ आगच्छ त्ति । ता एहि गच्छुम्ह । गृहीत्वागच्छ' इति । तदेहि गच्छावः । विदूषकः—आः गदा क्खु तुमं दासीए धीए ! एदं गेण्हिअ । आः गता खलु त्वं, ²दास्याःपुत्रि ! इमां गृहीत्वा । पिअवअस्सेण किं इध ज्जेव अवत्थिदव्वं ? प्रियवयस्येन किमिहैवावस्थातव्यम् ? चेटी—हदास ! मा तुवर । तुम्हाणं पि ण्हवणाअं आगदं जेव । हताश³ ! मा त्वरस्व। युष्माकमपि ⁴स्नपनकमागतमेव ।
( १०३ ) चेटी—(पास जाकर, हर्ष के साथ), राजकुमारी ! बड़े आनन्द की बात है। बधाई हो महाराज जीमूतवाहन के माता पिता ने तुम्हें (पुत्रवधू) स्वीकार कर लिया है। विदूषक— (नाचते हुए) अहा हा !! मेरे प्रिय मित्र के सब मनोरथ पूर्ण हो गए। अथवा, नहीं नहीं, श्रीमती मलयवती के। अथवा, इन दोनों के (ही) नहीं। (खाने का अभिनय करते हुए) मुझ अकेले ब्राह्मण के ही। चेटी— (नायिका से) युवराज मित्रावसु ने मुझे आज्ञा दी है कि— "आज ही मलयवती का विवाह है। अतः शीघ्र ही उसे लेकर आ।" तो आओ चलें। विदूषक— अरे दुष्ट, तू सचमुच इसे लेकर जा रही है। मेरे प्रिय मित्र को क्या यहीं ठहरना होगा ? चेटी— अरे नीच, इतनी जल्दी न कर। आप के स्नान का समय भी आया समझो।
- स्वीकार कर ली गई।
- दास्याः पुत्रो = नौकरानी की बेटी। शब्दार्थ छोड़ अब यह गाली बन गई है। दुष्ट, नीच। 3. निराश, दुष्ट, नीच।
- स्नपनकं = स्नान, नहाना। अथवा, स्नान के समय। अथवा, स्नान की सामग्री (स्नान करने का सामान)।
( १०४ ) नायिका—(सानुरागं सलज्जं च नायकं पश्यन्ती सपरिवारा निष्क्रान्ता) [नेपथ्ये वैतालिकः पठति] • वृष्ट्या पिष्टातकस्य १ द्युतिमिह मलये मेरुतुल्यां दधानः सद्यः २ सिन्दूर-दूरीकृतदिवससमारम्भसन्ध्या तपश्रीः । ३ उद्गीतैरङ्गनानां चलचरणरणन्नूपुरह्लादहृद्यै- रुद्वाहस्नानवेलां कथयति भवतः सिद्धये ४ सिद्धलोकः ॥१३॥ विदूषकः— (आकर्ण्य) भो वअस्स ! दिट्ठिआ आगदं ण्हवणअं । भो वयस्य ! दिष्ट्यागतं स्नपनकम् । नायकः—(सहर्षम् )सखे ! यद्येवं तत्किमिदानीमिह स्थितेन । तदागच्छ । तातं नमस्कृत्य स्नानभूमिमेव गच्छावः । ५ अन्योऽन्यदर्शनकृतः समानरूपानुरागकुलवयसाम् । केषाञ्चिदेव मन्ये समागमो भवति ६ पुण्यवताम् ॥ १४ ॥ [निष्क्रान्ताः सर्वे] इति द्वितीयोऽङ्कः ।
श्लोक नंः १३, अन्वयः— पिष्टातकस्य वृष्ट्या इह मलये मेरुतुल्यां द्युतिं दधानः सद्यः सिन्दूरदूरीकृतदिवससमारम्भसन्ध्याऽऽतपश्रीः, अङ्गनानां चलचरणरणन्नूपुरह्लादहृद्यैः उद्गीतैः, सिद्धलोकः भवतः सिद्धये उद्वाहस्नानवेलां कथयति । श्लोक नं०: १४, अन्वयः— मन्ये समानरूपानुरागकुलवयसाम् केषाञ्चिद् पुण्यवताम् एव अन्योऽन्यदर्शनकृतः समागमः भवति ॥
(१०२) नायिका — (प्रेम तथा लज्जा के साथ नायक को देखती हुई दासियों के साथ चली जाती है) [पर्दे के पीछे वैतालिक (भाट) पढ़ता है] — अबीर (गुलाल) की वृष्टि से वहां मलय पर्वत पर मेरु पर्वत की सी शोभा धारण करते हुए, झट ही सिन्दूर से दिन के आरम्भ (प्रातः) तथा सायंकाल के प्रकाश की शोभा को मात करते हुए, स्त्रियों के चञ्चल चरणों के बजते हुए नूपुरों की ध्वनि से (मिलकर) मनोहर ऊँचे गीतों द्वारा (यह) सिद्धभूमि आपके कल्याण के लिए विवाह के स्नान के समय की सूचना दे रही है। विदूषक — (सुनकर) हे मित्र ! सौभाग्य से आप के (विवाह) स्नान का समय आ गया । नायक — (हर्ष के साथ) — मित्र ! यदि ऐसा है तो अब यहां ठहरने से क्या लाभ ? तो आओ, पिता जी को नमस्कार करके स्नान भूमि को ही चलें । मेरा विचार है कि रूप, प्रेम, वंश तथा आयु में समान किन्हीं भाग्यशालियों का ही एक दूसरे को देखकर मिलाप हुआ करता है । [सब का प्रस्थान] द्वितीय अङ्क समाप्त ।
- सुगन्धित पाउडर (अबीर, गुलाल)। 2. उसी समय; झट ।
- उच्च स्वर में गाए गीत । 4. सिद्ध लोग । अथवा, सिद्ध भूमि ।
- दूसरा पाठ — “अन्योन्यप्रीतिकृतां” —है, जिस का अर्थ है ‘परस्पर प्रेम करने वाले’। 6. पुण्य अथवा सौभाग्य वाले ।
अथ तृतीयोऽङ्कः । I [ततः प्रविशति मत्तो विचित्रविह्वलवेषश्चषकहस्तो विटः स्कन्धारोपितसुराभाण्डश्चेटश्च] विटः—णिच्चं जो पिवइ सुरं जणस्स पिअसङ्गमञ्च जो कुणइ। नित्यं यः पिबति सुरां जनस्य प्रियसङ्गमञ्च यः करोति। मह दे दो अवि देवा बलदेवो कामदेवो अ ॥ १ ॥ मम तौ द्वावपि देवौ बलदेवः कामदेवश्च ॥ (घूर्णन्)—सफलं क्खु मे सेहरअस्स जीविदं । सफलं खलु मे शेखरकस्य जीवितम् । वच्छत्थलम्हि दइआ णीलुप्पलवासिआ मुहे मइरा । वक्षःस्थले दयिता नीलोत्पलवासिता मुखे मदिरा । सीसम्मि अ सेहअरो णिच्चं विअ संठिआ जस्स ॥ २ ॥ शीर्षे च शेखरको नित्यमिव संस्थिता यस्य ॥ (प्रस्खलन्) अरे को मं चालेदि ? (सहर्षम्) अवस्सं अरे! को मां चालयति ? अवश्यं णोमालिआ मं परिहसदि। नवमलिका मां परिहसति । श्लोक नं० १, अन्वयः— यः नित्यं सुरां पिबति, यः च जनस्य प्रियसङ्गमं करोति तौ द्वौ अपि— बलदेवः कामदेवः च— मम देवौ । श्लोक नं० २, अन्वयः— यस्य वक्षःस्थले दयिता, मुखे नीलोत्पलवासिता मदिरा, शीर्षे च शेखरकः नित्यमिव संस्थिताः ।