नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १२७ ) विदूषक— यह रही तमालवीथी । यहां फिरते फिरते मानों श्रीमती जी थकी हुई सी दिखाई दे रही हैं । अतः यहीं स्फटिक मणि- शिला के ऊपर बैठ कर विश्राम कर लें । नायक — मित्र ! आप ने खूब देखा— प्यारी का यह मुख अपनी गालों की शोभा से चन्द्रमा को जीतकर, गरमी से लाल होकर निश्चय अब मानों (लाल) कमल को भी जीतना चाहता है । (मलयवती का हाथ पकड़ कर)- प्रिये ! (आओ) यहां बैठें । नायिका — जैसे आर्यपुत्र की आज्ञा । [ सब बैठ जाते हैं.] नायक — (नायिका का मुख ऊँचा करके, देखते हुए)-हे प्रिये ! हम ने कुसुमाकर उद्यान को देखने की उत्सुकता से तुम्हें व्यर्थ ही कष्ट दिया । क्योंकि— भौंहों रूपी लताओं से सुशोभित और लाल होंठ रूपी कोमल पत्तों से युक्त यह तुम्हारा मुख ही नन्दन वन है । इस से अति- रिक्त दूसरा बाग़ तो जङ्गल ही (के समान) है ।
- परिखेदिता = दुःखी, क्लेश युक्त, थकी हुई ।
- आर्यपुत्रः = प्राणनाथ, आप । आर्य ( = सज्जन, पूज्य, ससुर) का पुत्र । संस्कृत नाटकों में स्त्रियां अपने पतियों को प्रायः इसी नाम से पुकारती हैं ।
- 'अधर' प्रायः निचले होंठ के लिए प्रयुक्त होता है।
- नन्दन = सब को आनन्द देने वाला; इन्द्र का प्रसिद्ध बाग़ ।