नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( १२७ ) विदूषक— यह रही तमालवीथी । यहां फिरते फिरते मानों श्रीमती जी थकी हुई सी दिखाई दे रही हैं । अतः यहीं स्फटिक मणि- शिला के ऊपर बैठ कर विश्राम कर लें । नायक — मित्र ! आप ने खूब देखा— प्यारी का यह मुख अपनी गालों की शोभा से चन्द्रमा को जीतकर, गरमी से लाल होकर निश्चय अब मानों (लाल) कमल को भी जीतना चाहता है । (मलयवती का हाथ पकड़ कर)- प्रिये ! (आओ) यहां बैठें । नायिका — जैसे आर्यपुत्र की आज्ञा । [ सब बैठ जाते हैं.] नायक — (नायिका का मुख ऊँचा करके, देखते हुए)-हे प्रिये ! हम ने कुसुमाकर उद्यान को देखने की उत्सुकता से तुम्हें व्यर्थ ही कष्ट दिया । क्योंकि— भौंहों रूपी लताओं से सुशोभित और लाल होंठ रूपी कोमल पत्तों से युक्त यह तुम्हारा मुख ही नन्दन वन है । इस से अति- रिक्त दूसरा बाग़ तो जङ्गल ही (के समान) है ।
- परिखेदिता = दुःखी, क्लेश युक्त, थकी हुई ।
- आर्यपुत्रः = प्राणनाथ, आप । आर्य ( = सज्जन, पूज्य, ससुर) का पुत्र । संस्कृत नाटकों में स्त्रियां अपने पतियों को प्रायः इसी नाम से पुकारती हैं ।
- 'अधर' प्रायः निचले होंठ के लिए प्रयुक्त होता है।
- नन्दन = सब को आनन्द देने वाला; इन्द्र का प्रसिद्ध बाग़ ।
( १३८ ) चेटी-(सस्मितं विदूषकं निर्दिश्य) सुदं तुए, भद्दिदारिआ कहं वण्णिदेत्ति । श्रुतं त्वया; भर्तृदारिका कथं वर्णितेति । विदूषकः- (सस्मितम् ) चउरिए ! मा एवं गव्वं उव्वह । चतुरिके ! मैवं गर्वमुद्वह । अम्हाणं पि मज्झे दंसणीओ जणो अत्थि एव्व । अस्माकमपि मध्ये दर्शनीयो जनोऽस्त्येव । केवलं मच्छरेण को वि ण वण्णेदि । केवलं मत्सरेण कोऽपि न वर्णयति । चेटी-(सस्मितम्) अज्ज ! अहं तुमं वण्णामि । आर्य ! अहं त्वां वर्णयामि¹ । विदूषकः- (सहर्षम्) भोदि ! जीविदोम्हि । ता करेदु भोदि भवति ! 'जीवितोऽस्मि । तत्करोतु भवती पसादं, जेण एसो मं पुणोवि ण भणादि, जहा- प्रसादं, येनैष मां पुनरपि न भणति, यथा- तुमं ईदिसो तादिसो कविलमंकडाआरो त्ति । त्वमीदृशस्तादृशः कपिङ्गलमर्कटाकार इति । चेटी- अज्ज ! तुमं मए विआहजाअरणे णिद्दाअमाणो आर्य ! त्वं मया विवाहजागरणे निद्रायमाणो णिमीलिअ अच्छो सोहणो दिट्ठो । ता तह ज्जेव्व चिट्ठ, निमीलिताक्षः शोभनो दृष्टः । तत्तथैव तिष्ठ, जेण वण्णेमि । येन वर्णयामि ।
( १३६ ) चेटी — (मुस्कराते हुए, विदूषक से) क्या तुम ने सुना किस प्रकार राजकुमारी का वर्णन किया गया है। विदूषक — (मुस्कराते हुए) चतुरिका ! इस प्रकार गर्व न कर । हमारे बीच भी सुन्दर व्यक्ति है। केवल ईर्ष्या से कोई (उसका) वर्णन नहीं करता । चेटी — (मुस्कराते हुए) आर्य ! मैं आप का वर्णन (गुणों की प्रशंसा, अथवा, रंगना) करती हूँ। विदूषक — (हर्षपूर्वक) श्रीमति, मानों मैं जी पड़ा। अतः मुझ पर कृपा कीजिए जिस से यह फिर मुझे यह न कह सके कि 'तू ऐसा है, वैसा है, भूरे बन्दर की शक्ल वाला है' इत्यादि । चेटी — आर्य ! विवाह में जागरण के समय आँखें बन्द कर के ऊंघते हुए आप मुझे बड़े सुन्दर दिखाई दे रहे थे। अतः उसी अवस्था में बैठे रहो ताकि मैं वर्णन करूं ।
- 'वर्णयामि' के दो अर्थ हैं। विदूषक इस का 'गुणों की प्रशंसा' अर्थ लेता है। परन्तु चेटी 'रंगना' अर्थ में इस का प्रयोग करती है।
- मेरी जान में जान आ गई।
( १४० ) विदूषकः - ( तथा करोति ) चेटी - (स्वगतम्)- जाव एसो णिमीलिअअच्छो चिट्ठदि यावदेष निमीलिताक्षस्तिष्ठति, दाव णीलरसाणुआरिणा तमालपल्लवरसेण मुहं से तावन्नीलरसानुकारिणा तमालपल्लवरसेन मुखमस्य कालीकरिस्सं । कालीकरिष्यामि । [उत्थाय तमालपल्लवग्रहणं तन्निपीडनं च नाटयति । नायको नायिका च विदूषकं पश्यतः।] नायकः- वयस्य ! धन्यः खल्वसि, योऽस्मासु १ तिष्ठत्सु त्वमेवं वर्ण्यसे । [ चेटी तमालरसेन विदूषकस्य मुखं कालीकरोति, ] नायिका--[सस्मितं विदूषकं दृष्ट्वा नायकं पश्यति] नायकः-(नायिकामुखं दृष्ट्वा)- स्मितपुष्पोद्गमोऽयं ते दृश्यतेऽधरपल्लवे । २ फलं त्वन्यत्रमुग्धाक्षि ! चक्षुषोर्मम पश्यतः ३ ॥ १२ ॥ विदूषकः - भो दे ! किं तुए किदं ? भवति ! कि त्वया कृतम् ? श्लोक नं : १२, अन्वयः- (हे) मुग्धाक्षि ! अधरपल्लवे तेऽयं स्मितपुष्पोद्गमो दृश्यते । (परमस्य पुष्पोद्गमस्य) फलं तु अन्यत्र पश्यतः मम चक्षुषोः (जातम्) ।
( १४७ ) विदूषक - (वैसा ही करता है) चेटी - (मन ही मन) जब तक यह आँखें बन्द किए ठहरा है तब तक नीले रस के समान तमाल पत्र के रस से इस का मुंह काला करती हूँ। [उठ कर तमाल पत्र को लेने तथा उसे निचोड़ने का अभिनय करती है। नायक तथा नायिका विदूषक को देखते हैं] नायक - मित्र ! तुम सचमुच धन्य हो जो हमारे रहते हुए भी तुम्हारा (ही) इस तरह से वर्णन किया जा रहा है। (तुम रंगे जा रहे हो)। [चेटी तमाल रस से विदूषक के मुख को काला कर देती है] नायिका - (मुस्कराते हुए विदूषक को देख कर नायक को देखती है) नायक - (नायिका के मुख को देखकर - हे सुन्दर आंखों वालो ! तुम्हारे होंठ रूपी कोमल पत्तों में यह मुस्कान रूपी फूलों का निकलना दिखाई दे रहा है। परन्तु (इस फूल का) फल तो कहीं और मुझ देखने वाले की आंखों में (हो रहा है)। (अर्थात् तुम्हारी मुस्कान को देखकर मेरी आंखें सफल हो गईं) विदूषक - भद्रे ! तुमने क्या किया ?
- सती सप्तमी ।
- यह साधारण नियम है कि जहां फूल लगता है फल भी वहीं लगता है; परन्तु स्मित रूपी फूल तेरे ओष्ठ रूपी पल्लव पर खिला है, परन्तु सफल (फलयुक्त) मेरी आंखें हो रही हैं। 'फल' पर श्लेष है - (i) फल, अथवा (ii) परिणाम। यहां फल, आंखों को होने वाला आनन्द है।
- पश्यतः = दृश् + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन । 'मम' का विशेषण ।
( १४२ ) चेटी- णं वञ्चिणादोसि । ननु वञ्चितोऽसि । विदूषकः- (हस्तेन मुखं प्रमृज्य हस्तं दृष्ट्वा सरोषं दण्डकाष्ठमुद्यम्य) आः दासीए धीए ! राअउलं क्खु एदं । किं क्ख करिस्सं ? आः दास्याः पुत्रि ! राजकुलं खल्वेतत् । किं तव करिष्यामि ? (नायकमुद्दिश्य) भो ! तुम्हाणं पुरदो एव्व अहं दासीए- भो ! युवयोः पुरत एवाहं दास्याः- धीआए खलीकिदो । ता किं मम इध ट्ठिदेण ? अण्णदो पुत्र्या खलीकृतः¹ । तत्किं ममेह स्थितेन ? अन्यतो गमिस्सं । गमिष्यामि । [निष्क्रामति] चेटी-कुविदो मे अज्जअत्तेओ, जाव णं गदुअ पसादइस्सं । कुपितो मे आर्यात्रेयः, यावदेनं गत्वा प्रसादयिष्यामि । [गन्तुमिच्छति] नायिका-हञ्जे चदुरिए ! कहं मं एआइणीं उज्झिअ हञ्जे चतुरिके ! कथं मामेकाकिनीमुज्झित्वा गच्छसि ? गच्छसि ? चेटी-(नायकमुद्दिश्य सस्मितम् ) एव्वं एआइणी चिरं होहि । एवमेकाकिनी चिरं भव । [इति निष्क्रान्ता]
( १५३ ) चेटी - सचमुच तुम्हारा वर्णन (रंगन) किया है। विदूषक- (हाथ से मुंह पोंछ कर, हाथ को देखकर; क्रोध से डण्डा उठा कर) अरी दुष्टा ! यह राजकुल है। तुम्हारा क्या करूँ ? (नायक से) आप लोगों के सम्मुख ही इस नीच ने मेरा अपमान किया है। तो मेरे यहाँ ठहरने से क्या लाभ ? वहीं और चला जाता हूँ। (निकल जाता है) चेटी- आर्य आत्रेय मुझ से नाराज़ हो गए ? अतः जाकर उन्हें मनाती हूँ। (जाना चाहती है) नायक - सखी चतुरिका ! क्या मुझे अकेली छोड़ कर जा रही हो ? चेटी- (नायक की ओर देखकर मुस्कराती हुई) ऐसी अकेली (तो) तू चिरकाल तक रह। [यह कह कर प्रस्थान]
- खलीकृत = उल्लू बनाया गया हूँ। इस ने बुरा सलूक किया है।
( १४४ )
नायकः – (नायिकाया मुखं पश्यन् )– दिनकरकरामृष्टं विभ्रद् द्युतिं परिपाटलां, दशनकिरणैरुपसर्पद्भिः स्फुटीकृतकेसरम्। अयि मुखमिदं मुग्धे¹ ! सत्यं समं कमलेन ते, मधु मधुकरः किन्त्वेतस्मिन् पिबन्न² विभाव्यते ॥१३॥ नायिका-(विहस्य मुखमन्यतो नयति) [नायकः तदेव पठति] चेटी-(पटाक्षेपेण प्रविश्य, उपसृत्य) एसो क्खु अज्ज मित्तावसु एष खल्वार्यमित्रावसुः कज्जेण केण वि कुमारं पेक्खिदुं आअदो। कार्येण केनापि कुमारं प्रेक्षितुमागतः । नायकः-प्रिये ! गच्छ त्वमात्मनो गृहम् । अहमपि मित्रावसुं दृष्ट्वा त्वरितमागत एव । नायिका – (चेट्या सह निष्क्रान्ता) [ततः प्रविशति मित्रावसुः]
श्लोक नंः १३, अन्वयः— अयि मुग्धे ! दिनकरकरामृष्टं परिपाटलां द्युतिं विभ्रत् उपसर्पद्भि दशनकिरणैः स्फुटीकृतकेसरम् इदं ते मुखं सत्यं कमलेन समम् ; किन्तु एतस्मिन् (मुखकमले) मधु पिबन् (कोऽपि) मधुकरः न विभाव्यते ॥
(१४६) मित्रावसुः-अनिहत्य तं सपत्नं कथमिव जीमूतवाहनस्याहम् । कथयिष्यामि हतं तव राज्यं रिपुणेति निर्लज्जः ? ॥१४॥ अनिवेद्य च न युक्तं गन्तुमिति निवेद्य गच्छामि । (इत्युपसर्पति) नायकः-(मित्रवसुं दृष्ट्वा) - मित्रावसो ! इत आस्यताम् । मित्रावसुः— (उपविशति ) नायकः — (निरूप्य)— मित्रावसो ! संरब्ध ¹ इव लक्ष्यसे मित्रावसुः — कः खलु मतङ्गेहतके ² संरम्भः ? नायक — किं कृतं मतङ्गेन ? मित्रावसुः- स्वनाशाय किल युष्मदीयं राज्यमाक्रान्तम् । नायकः— (सहर्षमात्मगतम् ) अपि नाम सत्यमेतत्स्यात् ! मित्रावसुः — अतस्तदुच्छित्तये आज्ञां दातुमर्हति कुमारः । किं बहुना ?–
श्लोक नं० : १४, अन्वयः— जीमूतवाहनस्य तं सपत्नम् अनिहत्य अहं निर्लज्जः कथं कथयिष्यामि (यत् ) तव राज्यं रिपुणा हतम् इति ।
( १४७ ) मित्रावसु- जीमूतवाहन के उस शत्रु को मारे बिना मैं निर्लज्ज बन कर (इसे) कैसे कहूँ कि आपका राज्य शत्रु ने हर लिया है ? और इसे यह सूचना दिए बिना जाना भी उचित नहीं, अतः कह कर (ही) जाता हूँ । नायक-(मित्रावसु को देखकर)- मित्रावसु ! इधर बैठिए ! मित्रावसु - (बैठ जाता है) नायक - (अच्छी तरह देखकर) मित्रावसु ! कुछ घबराए हुए से दीखते हो ? मित्रावसु - दुष्ट मतङ्ग के विषय में क्या घबराहट (हो सकती है) ? नायक - (क्यों) मतङ्ग ने क्या किया है ? मित्रावसु-अपने नाश के लिए उसने आप के राज्य को हड़प लिया है । नायक - (प्रसन्नता पूर्वक, मन ही मन) काश कि यह सच हो ! मित्रावसु- अतः उसके विनाश के लिए कुमार आज्ञा दें । अधिक क्या ?-- १. क्रुद्ध; जोश में; आवेश में; घबराए हुए । २. 'हतक' समास के अन्त में आता है। अर्थ है 'दुष्ट', 'नीच' ।
( १४८ ) संसर्पद्भिः समन्तात्कृतसकलवियन्मार्गयानैर्विमानैः कुर्वाणाः प्रावृषीव स्थगितरविरुचः श्यामतां वासरस्य एते याताश्च सद्यस्तव वचनमितः प्राप्य युद्धाय सिद्धाः, सिद्धश्वोद्वृत्तशत्रुक्षयभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यम् ॥१५॥ अथवा किं बलौघैः — एकाकिनाऽपि हि मया रभसाऽवकृष्ट- निस्त्रिंशदीधितिसटाभरभासुरेण। आरान्निपत्य हरिणेव मतङ्गजेंद्र- माजौ मतङ्गहतकं हतमेव विद्धि ॥ १६ ॥ नायकः-(कर्णौ पिधाय आत्मगतम् ) अहह दारुणमभिहितम् । अथवा एवं तावत् । (प्रकाशम्) मित्रावसो कियदेतत् ? बहुतरमतोपि बाहुशालिनि त्वयि सम्भाव्यते । श्लोक नं०: १५, अन्वयः — समन्तात् संसर्पद्भिः कृतसकलवियन्मार्गयानैः विमानैः प्रावृषीव स्थगितरविरुचः वासरस्य श्यामतां कुर्वाणाः एते सिद्धाः तव वचनं प्राप्य इतः युद्धाय सद्यः याताश्च उद्वृत्तशत्रुक्षयभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यं सिद्धञ्च ॥ श्लोक नं०: १६, अन्वयः — एकाकिनापि हि रभसावकृष्ट-निस्त्रिंशदीधितिसटाभरभासुरेण मया आरात् निपत्य हरिणा इव मतङ्गजेंद्रम् आजौ मतङ्गहतकं हतमेव विद्धि ।
( १४६ ) आप की आज्ञा प्राप्त करके शीघ्र ही ये सिद्ध लोग अपने विमानों में चल पड़ेंगे जो आकाश में चारों तरफ़ उड़ते हुए वर्षा ऋतु के (बादलों के) समान सूर्य की किरणों को छुपा कर दिन को अन्धकारमय कर देंगे । (फिर) उद्दण्ड शत्रु (मतङ्ग) के मारे जाने पर (शेष) राजागण डरके मारे झुक जायेंगे और आप का राज्य सिद्ध (वश में) हो जाएगा । अथवा, सेना के समूह की भी क्या आवश्यकता है ?— वेग के साथ निकाली हुई तलवार की किरणों रूपी (शेर की गर्दन के) बालों से देदीप्यमान मुझ अकेले के द्वारा ही उस दुष्ट मतङ्ग को युद्ध में उसी तरह मारा गया ही समझो जैसे समीप से ही झपट कर शेर के द्वारा हाथियों का राजा । नायक—(कान बन्द कर, मन ही मन) आह, (इसने) बड़े कठोर शब्द कहे हैं । अथवा, इस प्रकार कहता हूँ । (प्रकट) मित्रावसु ! (तुम्हारे आगे) यह (काम) कितना है ? तुम जैसे वीर से तो इस से भी बहुत अधिक सम्भव है ।
- ढकना; छिपाना; रोकना ।
- उद्द्वृत्त = गर्वित; उद्दण्ड; उच्छृङ्खल ।
- राजकं = राजाओं का इकट्ठ; राजागण । 4: आजि = युद्ध ।
- बड़ी भुजाओं वाला । जिस में भुज-बल अधिक है । वीर ।
( १५० ) किन्तु—स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यादयाचितः कृपया । राज्यस्य कृते¹ स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ? ॥१७॥ अपि च, क्लेशान्² विहाय मम शत्रुबुद्धिरेव नान्यत्र । यदि त्वमस्मत्प्रियं कर्तुमीहसे, तदनुकम्प्यतामसौ राज्यस्य कृते क्लेशदासीकृत³स्तपस्वी । मित्रावसुः – (सामर्षं सहासञ्च) कथं नानुकम्पनीय ईदृशो- ऽस्माकमुपकारी, कृपणश्च⁴ । नायकः- (स्वगतम् ) अनिवार्यसंरम्भः प्रत्यग्रकोपाक्षिप्तचेता न तावदयं शक्यते निवर्तयितुम् । तदेवं तावत् । (प्रकाशम् ) मित्रावसो, उत्तिष्ठ, अभ्यन्तरमेव प्रविशावः। तत्रैव त्वां बोधयिष्यामि । सम्प्रति परिणतमहः। तथाहि— श्लोक नं०: १७, अन्वयः यः खलु अयाचितः (अपि) कृपया परार्थं स्वशरीरम् अपि दद्यात् सः (अहं) राज्यस्य कृते कथं प्राणिवधक्रौर्यम् अनुमन्ये ?
( १५१ ) : किन्तु—जो बिना मांगे ही कृपा से दूसरे के हित के लिए अपना शरीर भी दे सकता है वह मैं राज्य के लिए कैसे जीवों को मारने की क्रूरता की अनुमति दे सकता हूँ ? और भी, क्लेशों को छोड़ मैं किसी और को शत्रु ही नहीं मानता। यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो राज्य के लिए क्लेशों का दास बनने वाले उस बेचारे (मतङ्गदेव) पर दया करो। मित्रावसु— (क्रोध पूर्वक, हँसते हुए) (हाँ जी) हम पर उपकार करने वाले, ऐसे बेचारे ग़रीब पर दया क्यों नहीं करनी चाहिए ? नायक— (मन ही मन) (इस समय) यह बड़े जोश में हैं। ताज़ा गुस्से से आक्रान्त चित्त वाले इस को रोकना सम्भव नहीं। तो इस प्रकार (कहता हूँ)— (प्रकट) मित्रावसु ! उठो भीतर ही चलें। वहीं तुम्हें समझाऊँगा ! अब तो दिन ढल गया है। क्योंकि—
- कृते = के लिए। इस के साथ षष्ठी का प्रयोग है।
- क्लेश = पीड़ा, कष्ट, दुःख। बौद्ध शास्त्रों के अनुसार 'क्लेश' पाप हैं जो पाञ्च हैं; यथा— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश।
- तपस्वी = दया का पात्र; बेचारा।
- दूसरा पाठ 'कृतज्ञः' है जिस का अर्थ है 'किए हुए उपकार को मानने वाला।'
( १५२ ) निद्रामुद्राऽवबन्धव्यतिकरमनिशं¹ पद्मकोशादपास्य- न्नाशा²पूरैककर्मप्रवणनिजकरप्रीणिताशेषविश्वः । ³दृष्टः सिद्धैः प्रसक्तस्तुतिमुखरमुखैरस्तमप्येष गच्छ- न्नेकः श्लाघ्यो विवस्वान् परहितकरणायैव यस्य प्रयासः॥१८॥ [इति निष्क्रान्ताः सर्वे] इति तृतीयोऽङ्कः । श्लोक नं० १८, अन्वयः — पद्मकोशात् निद्रामुद्रावबन्धव्यतिकरम् अनिशम् अपास्यन् , आशापूरैककर्मप्रवणनिजकरप्रीणिताशेषविश्वः, अस्तमपि गच्छन् प्रसक्तस्तुतिमुखरमुखैः सिद्धैः दृष्टः, एष एकः विवस्वान् (एव) श्लाघ्यः, यस्य प्रयासः परहितकरणाय एव (भवति) ।
( १५३ ) कमल के कोश से निद्रा की मुद्रा के बन्धन को लगातार दूर करने वाला (कमल को विकसित करके उसमें बन्द भौंरे को स्वतन्त्र करने वाला), आशाओं (दिशाओं अथवा इच्छाओं) को पूर्ण करने में लगी हुई अपनी किरणों से समग्र संसार को प्रसन्न करने वाला, अस्त होते हुए भी स्तुति से मुखरित मुखों वाले सिद्धों द्वारा दर्शन किए जाने वाला— यह एक सूर्य ही प्रशंसा के योग्य है जिस का (सारा) प्रयत्न दूसरों का हित करने के लिए ही (है) । [सब का प्रस्थान] तीसरा अङ्क समाप्त
- अनिशं = रात दिन; लगातार; सदा ।
- आशा = (i) दिशा; (ii) इच्छा ।
- प्रायः लोग उसी को स्तुति करते हैं जो उदय हो रहा है— उन्नति कर रहा है। परन्तु सूर्य की अस्त होते समय भी स्तुति हो रही है, क्योंकि वह परोपकारी है।
अथ चतुर्थोऽङ्कः। [ततः प्रविशति कञ्चुकी गृहीतरक्तवस्त्रयुगलः, प्रतीहारश्च] कञ्चुकी — अन्तःपुराणां विहितव्यवस्थः¹ पदे पदे ²संस्खलितानि रक्षन् । जरातुरः सम्प्रति दण्डनीत्या सर्व्वा नृपस्यानुकरोमि वृत्तिम् ॥१॥ प्रतिहारः-आर्य्य वसुभद्र ! क्वनु खलु भवान् प्रस्थितः ? कञ्चुकी-आदिष्टोऽस्मि देव्या मित्रावसुजनन्या- ‘कञ्चुकिन् ! दशरात्रं त्वया यावन्मलयवत्या जामातुश्च रक्तवासांसि नेतव्यानि’ इति । दुहिता च श्वशुरकुले वर्त्तते । जीमूतवाहनोऽपि युवराजेन सह समुद्रवेलां द्रष्टुमद्य गत इति श्रूयते । तन्न जाने किं राजपुत्र्याः सकाशं गच्छामि अथवा जामातुरिति । प्रतीहारः- आर्य्य ! वरं ! राजपुत्र्याः सकाशं गन्तव्यम् । तत्र हि कदाचिदस्यां वेलायां जामाता स्वयमेवागतो भविष्यति । कञ्चुकी- साधूक्तम् । अथ भवान् पुनः क्व प्रस्थितः ? श्लोक नं०: १, अन्वयः— अन्तः पुराणां विहितव्यवस्थः, पदे पदे संस्खलितानि रक्षन् ; सम्प्रति जरातुरः दण्डनीत्या नृपस्य सर्वां वृत्तिम् अनुकरोमि।
चौथा अङ्क [दो लाल वस्त्र लिए हुए कञ्चुकी और द्वारपाल का प्रवेश] कञ्चुकी – अन्तःपुर (अथवा नगर के बीच) व्यवस्था करने वाला, पग पग पर ठोकरों को बचाता हुआ (अथवा, त्रुटियों या ग़लतियों का समाधान करता हुआ), एवं वृद्धावस्था से विह्वल हुआ (हाथ में) डण्डा लेकर (अथवा दण्डनीति का आश्रय लेकर) मैं राजा के सारे आचरण का अनुकरण कर रहा हूँ। प्रतीहार – आर्य वसुभद्र ! आप किधर चल पड़े हैं। कञ्चुकी – मित्रावसु की माता, महारानी जी, ने मुझे आज्ञा दी है कि “हे कञ्चुकी ! दस रात तक आप मलयवती और दामाद (जीमूतवाहन) के पास (माङ्गलिक) लाल वस्त्र ले जाया करें”। पुत्री (मलयवती) तो ससुराल में है। और जीमूतवाहन भी सुना है कि युवराज (मित्रावसु) के साथ आज समुद्र-तट देखने गए हैं। अतः मेरी समझ में नहीं आता कि राजकुमारी के पास जाऊँ या दामाद के पास। प्रतीहार – आर्य ! राजपुत्री के पास ही जाना ठीक होगा। सम्भवतः दामाद स्वयं भी इस समय तक वहीं आ गए होंगे। कञ्चुकी – तुमने ठीक कहा है। अच्छा, तो तुम किधर जा रहे हो ?
- व्यवस्था = इन्तज़ाम, प्रबन्ध, अनुशासन ।
- अन्तःपुर, सँस्खलितानि, दण्डनीत्या- के दो दो अर्थ हैं, एक कञ्चुकी के साथ दूसरा राजा के साथ। देखिए अनुवाद ! ( १५५ )
( १४८ ) नायकः- (आकर्ण्य) सम्यगुपलक्षितम्- उद्गर्जज्जलकुञ्जरेन्द्ररभसास्फालानुबन्धोद्धतः, सर्वाः पर्वतकन्दरोदरभुवः कुर्वन् प्रतिध्वानिनीः। उच्चैरुच्चरति ध्वनिः श्रुतिपथोन्माथी यथाऽयं तथा प्रायः प्रेङ्खदसङ्ख्यशङ्खवलया वेलेयमागच्छति ॥३॥ मित्रावसुः- नन्वियमागर्तैव, पश्य- कवलितलवङ्गपल्लवकरिमकरोद्गारिसुरभिणा पयसा। एषा समुद्रवेला रत्नद्युतिरञ्जिता भाति ॥ ४ ॥ तदेतस्माज्जलप्रसरणमार्गादपक्रम्यानेनैव गिरिसानु- समीपमार्गेण परिक्रमावः। नायकः- मित्रावसो ! पश्य, पश्य, शरत्समयपाण्डुभिः पयोदपटलैः प्रावृत्ताः प्रालेयाचलशिखरश्रियमुद्वहन्त्येते मलयसानवः। मित्रावसुः- नैवामी मलयसानवः, नागानामस्थिसङ्घाताः खल्वमी। श्लोक न० ३, अन्वयः-उन्मज्जत् जलकुञ्जरेन्द्र रभसास्फालानुबन्धोद्धत सर्वाः पर्वतकन्दरोदरभुवः प्रतिध्वानिनी कुर्वन् श्रुतिपथोन्माथी अयं ध्वनिः यथा उच्चैः उच्चरति तथा प्रायः प्रेङ्खदसङ्ख्यशङ्खवलया इयं वेला आगच्छति ॥ श्लोक न० ४, अन्वयः-कवलितलवङ्गपल्लवकरिमकरोद्गारिसुरभिणा पयसा रत्नद्युतिरञ्जिता एषा समुद्रवेला भाति ॥