भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( २.२ ) जीमूतकेतु- (सुनकर, हर्षपूर्वक हंस कर) देवी ! शोक को छोड़ दो। निश्चय ही यह चूडामणि इसी का है, (जो) मांस के लोभ से किसी पक्षी के द्वारा मस्तक से उखाड़ कर लाया जाता हुआ इस भूमि पर गिर पड़ा है। वृद्धा - (सन्तोष के साथ, मलयवती को गले लगाकर) सौभाग्यवती, धीरज धर। ऐसी (सुन्दर) आकृति वैधव्य दुःख का अनुभव नहीं कर सकती। मलयवती - माता जी ! आपके ही आशीर्वादों के प्रभाव से। [पैरों पर गिरती है] जीमूतकेतु - (शङ्खचूड के पास जाकर) वत्स, क्या तुम्हारा चूडामणि चुरा लिया गया है ? शङ्खचूड- आर्य ! केवल मेरा ही नहीं, त्रिलोकि का ही। जीमूतकेतु - कैसे ? शङ्खचूड - दुःख के अत्यन्त भार के कारण आँसुओं से रुँधे हुए गले वाला मैं कह नहीं सकता। जीमूतकेतु - हे पुत्र, अपना कठिनता से सहन किए जाने वाला (भी) दुःख मुझे सुनाओ, जिससे मुझे दे देने से यह सहने योग्य (हल्का) हो जाएगा।