नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( २.२ ) जीमूतकेतु- (सुनकर, हर्षपूर्वक हंस कर) देवी ! शोक को छोड़ दो। निश्चय ही यह चूडामणि इसी का है, (जो) मांस के लोभ से किसी पक्षी के द्वारा मस्तक से उखाड़ कर लाया जाता हुआ इस भूमि पर गिर पड़ा है। वृद्धा - (सन्तोष के साथ, मलयवती को गले लगाकर) सौभाग्यवती, धीरज धर। ऐसी (सुन्दर) आकृति वैधव्य दुःख का अनुभव नहीं कर सकती। मलयवती - माता जी ! आपके ही आशीर्वादों के प्रभाव से। [पैरों पर गिरती है] जीमूतकेतु - (शङ्खचूड के पास जाकर) वत्स, क्या तुम्हारा चूडामणि चुरा लिया गया है ? शङ्खचूड- आर्य ! केवल मेरा ही नहीं, त्रिलोकि का ही। जीमूतकेतु - कैसे ? शङ्खचूड - दुःख के अत्यन्त भार के कारण आँसुओं से रुँधे हुए गले वाला मैं कह नहीं सकता। जीमूतकेतु - हे पुत्र, अपना कठिनता से सहन किए जाने वाला (भी) दुःख मुझे सुनाओ, जिससे मुझे दे देने से यह सहने योग्य (हल्का) हो जाएगा।
( २१४ ) शङ्खचूडः—श्रूयताम्। शङ्खचूडो नाम नागः खल्वहम्। आहारार्थं वासुकिना वैनतेयाय प्रेषितः। किं बहुना विस्तरेण ! कदाचिदियं रुधिरधारापद्धतिः पांसुभिरवकीर्यमाणा दुर्लभ्यतामुपयाति। तत्संक्षेपतः कथयामि— विद्याधरेण केनापि करुणाविष्टचेतसा। मम संरक्षिताः प्राणा दत्त्वात्मानं गरुत्मते ॥११॥ जीमूतकेतुः— कोऽन्य एवं परहितव्यसनी ? वत्स ! ननु स्पष्टमेवोच्यतां जीमूतवाहनेनेति। हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः। वृद्धा- हा पुत्तअ ! कहं तुए एदं किदं ? हा पुत्रक ! कथं त्वयैतत्कृतम् ? मलयवती— (सास्रम्) कहं सच्चीभूदं जेव्व दुच्चिंतिदं ? कथं सत्यीभूतमेव दुश्चिन्तितम् ?. [सर्वे मोहं गच्छन्ति] शङ्खचूडः— (सास्रम्) नूनमेतौ पितरौ तस्य महासत्त्वस्य। कथमप्रियवादिना मया इमामवस्थां नीतौ। अथवा (विषादृते विषधरस्य मुखात् किमन्यन्निःसरति ? अहो श्लोक नं०: ११, अन्वयः— करुणाविष्टचेतसा केनापि विद्याधरेण गरुत्मते आत्मानं दत्त्वा मम प्राणाः संरक्षिताः।
( २१५ ) शङ्खचूड— सुनिए— मैं शङ्खचूड नामक नाग हूँ। मुझे वासुकि ने गरुड़ के पास खाने के लिए भेजा था। अधिक विस्तार से क्या लाभ ? कहीं यह खून की धारा का मार्ग धूलि से ढक जाने से कठिनता से दिखाई पड़ने लगे । अतः संक्षेप से कहता हूँ।— करुणापूर्ण चित्त वाले किसी विद्याधर ने गरुड़ को अपना शरीर देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। जीमूतकेतु—कौन दूसरा इस प्रकार परोपकार में लगन रखता है ? पुत्र, साफ़ साफ़ कहो कि जीमूतवाहन ने (तुम्हारे प्राण बचाए हैं) । आह, मैं अभागा मारा गया ! वृद्धा— हाय बच्चे, तू ने ऐसा क्यों किया ? मलयवती— (आँसुओं के साथ) क्या जिस अमङ्गल की मुझे शङ्का थी वह सच ही हो गया। [सब मूर्छित हो जाते हैं] शङ्खचूड़—(आंसुओं के साथ) अवश्य ही ये ही (दोनों) उस महात्मा के माता पिता हैं। अप्रिय वचन बोल कर मैं ने इन्हें इस दशा को क्यों पहुँचाया है ? अथवा, साँप के मुख से विष के विना और क्या निकल सकता है ? आह, प्राण दान करने वाले जीमूतवाहन
- करुणा ने जिस के मन पर काबू पा लिया है; अथवा, करुणा से भरे मन वाला।
- जिस को परोपकार करने की लत है।
( २१६ ) प्राणप्रदस्य सुसदृशं १ प्रत्युपकृतं जीमूतवाहनस्य शङ्ख- चूडेन। तत् किमधुनैवात्मानं व्यापाययामि ? अथवा समाश्वासयामि तावदेतौ। तात ! समाश्वसिहि ! अम्ब सामाश्वसिहि। [उभौ समाश्वसितः] वृद्धा- वच्छे ! उट्ठेहि, मा रोअ। अम्हे किं जीमूदवाहणेण वत्से ! उत्तिष्ठ, मा रुदिहि ! वयं किं जीमूतवाहनेन विणा जीवम्ह ? ता समस्सस दाव। विना जीवामः ? तत्समाश्वसिहि तावत्। मलयवती- (समाश्वस्य) अज्जउत्त ! कहिं मए तुमं पेक्खिदव्वो ? आर्यपुत्र ! क्व मया त्वं प्रेक्षितव्यः ? जीमूतकेतुः - हा वत्स ! गुरुचरणशुश्रूषाविधिज्ञ ! चूडामणिं चरणयोर्मम पातयता त्वया। लोकान्तरगतेनापि नोज्झितो २ विनयक्रमः ॥ १२ ॥ (चूडामणिं गृहीत्वा) हा वत्स ! कथमेतावन्मात्रदर्शनः संवृत्तोऽसि ? (हृदये दत्त्वा) अहह ! — ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ श्लोक नं०: १२, अन्वयः— मम चरणयोः चूडामणिं पातयता, लोकान्तरगतेनापि त्वया विनयक्रमः न उज्झितः।
( २१७ ) का शङ्खचूड़ ने क्या ही अच्छा प्रत्युपकार किया है ? तो क्या मैं अभी अपने आप को मार डालूँ ? अथवा, इन दोनों को धैर्य बन्धाता हूँ । पिता जी, धीरज करो; माता जी, धीरज करो । [दोनों होश में आते हैं] वृद्धा - बेटी, उठ; रो मत । हम क्या जीमूतवाहन के बिना जी सकते हैं ? अतः धीरज कर । मलयवती - (होश में आकर) आर्यपुत्र ! मैं आप को कहां ढूँढूँ । जीमूतकेतु - हाय पुत्र, गुरुजनों के चरणों की सेवा करने की विधि जानने वाले ;- मेरे पैरों पर चूडामणि गिराते हुए, परलोक गए हुए भी तू ने विनय का क्रम (मार्ग) नहीं छोड़ा । (चूड़ामणि लेकर) हाय पुत्र ! क्या अब तुम्हारे दर्शन इतने ही रह गए ? (हृदय पर रख कर) आह !-
- कटाक्ष अथवा उपालम्भ रूप में । उसके इतने बड़े उपकार के बदले मैं ने इतना उपकार किया ।
- क्रम = मर्यादा ; मार्ग ; तरीका ।
यहाँ पृष्ठ पर अंकित पाठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
( २१८ ) भक्त्या विदूरविनताननमग्रमौलेः शश्वत्तव प्रणमतश्चरणौ मदीयौ । चूडामणिर्निकषणैर्मसृणोऽप्ययं हि$^1$ गाढं विदारयति मे हृदयं कथं नु ॥ १३ वृद्धा—हा पुत्त जीमूदवाहण ! जस्स दे गुरुअणसुस्स हा पुत्र जीमूतवाहन ! यस्य ते गुरुजनशुश्रूषां विजिअ अण्णं सुहं ण रोअदि, सो कहिं दाणिं पि वर्जयित्वान्यत्सुखं न रोचते , स कुत्रेदानों पित उज्झिअ सग्गसुहमणुहोदुं गदोसि ? उज्झित्वा स्वर्गसुखमनुभवितुं गतोऽसि ? जीमूतकेतुः—(सास्रम्) देवि ! किं जीमूतवाहनेन वि जीवामो वयं येनैवं प्रलपसि ? मलयवती—(पादयोर्निपत्य कृताञ्जलिः)— ता देहि मे अ[त्त] तद्देहि मे आ उत्तचिण्हं चूडामणिं, जेण एदं हिअए क[डु] पुत्रचिह्नं चूडामणिं , येनैनं हृदये कृत जलणपवेसेण अवणेमि हिअअस्स संदावदुःखम् । ज्वलन प्रवेशेनापनयामि हृदयस्य सन्तापदुःखम् । श्लोक नं०: १३, अन्वयः— भक्त्या विदूरविनताननमग्रमौलेः मदीयौ चरणौ शश्वत् प्रण[मतः] तव अयं हि चूडामणिः निकषणैः मसृणोऽपि कथं नु मे [हृदयं] गाढं विदारयति ।
( २१६ ) भक्ति के साथ दूर तक अपने मुख तथा सिर को झुकाने वाले, सदा मेरे पैरों पर प्रणाम करने वाले तेरा यह चूडामणि, रगड़ से चिकना हुआ भी क्यों मेरे हृदय को इतने ज़ोर से काट रहा है। द्धा - हा पुत्र जीमूतवाहन, तुम्हें तो गुरुजनों की सेवा को छोड़ दूसरा कोई सुख अच्छा ही नहीं लगता था, फिर तुम अब माता पिता को छोड़ कर स्वर्ग का सुख अनुभव करने कैसे चले गए हो ? जीमूतकेतु — (आंसुओं के साथ) देवी ! क्या हम जीमूतवाहन के बिना जीएँगे जो तुम इस प्रकार विलाप कर रही हो ? मलयवती — (चरणों पर गिर कर, हाथ जोड़ कर) — आर्य्यपुत्र की निशानी यह चूडामणि मुझे दे दीजिए, ताकि इसे छाती से लगाकर अग्नि में प्रवेश कर के अपने हृदय की जलन तथा दुःख दूर करूँ ।
१. विरोधाभास ।
(२२०) जीमूतकेतुः— पतिव्रते ! किमेवमाकुलयसि ? ननु सर्वेषामे- वास्माकमयं निश्चयः । वृद्धा- महाराअ ! ता किं अम्हेहिं पडिवालीअदि ? महाराज ! तत्किमस्माभिः प्रतिपाल्यते ? जीमूतकेतुः— न खलु देवि ! किञ्चित् । किन्त्वाहिताग्नेर्ना-^1 न्येनाग्निसंस्कारो विहितः^2 । अतोऽग्निहोत्रशरणाद्- ग्नीनादायात्मानमुद्दीपयामः^3 । शङ्खचूडः— (आत्मगतम्)— कष्टं ! ममैकस्य कृते सकल- मेवेदं विद्याधरकुलमुच्छिन्नम्। तदेवं तावत्। (प्रकाशम्) तात ! न खल्वनिश्चित्यैव युक्तमिदमीदृशं साहसमनु- ष्ठातुम् । विचित्राणि हि दैवविलसितानि । कदाचिन्नायं नाग इति ज्ञात्वा परित्यजेन्नागशत्रुः । तदनयैव दिशा वैनतेयमनुसरामस्तावत् । वृद्धा— सव्वहा देवदाणं पसादेण जीवतस्स पुत्तअस्स मुहं सर्वथा देवतानां प्रसादेन जीवतः पुत्रस्य मुखं दंसेम । पश्यामः । मलयवती-(आत्मगतम्) दुल्हहं क्खु एदं मम मंदभग्गाए । दुर्लभं खल्वेतन्मम मन्दभाग्यायाः
( २२१ ) जीमूतकेतु—हे पतिव्रते ! इस प्रकार क्यों व्याकुल हो रही हो ? हम सब का यही निश्चय है। वृद्धा—महाराज ! तो हम किस की प्रतीक्षा कर रहे हैं ? जीमूतकेतु—देवी ! किसी की नहीं। परन्तु अग्निहोत्री का दाह संस्कार किसी दूसरी अग्नि से नहीं हो सकता। अतः अग्निहोत्र शाला से अग्नियां लाकर अपने आप को जलाते हैं। शङ्खचूड़—(मन ही मन) बड़े कष्ट की बात है। मुझ अकेले के लिए यह विद्याधर कुल सारा ही नष्ट हो रहा है। तो ऐसा (करता हूँ)। (प्रकट) हे तात ! बिना निश्चय किए ही ऐसा साहस करना उचित नहीं। भाग्य के खेल विचित्र हैं। कदाचित् 'यह नाग नहीं है' ऐसा जान कर गरुड़ उसे छोड़ (ही) दे। अतः इसी मार्ग से गरुड़ का पीछा करते हैं। वृद्धा—सब प्रकार से देवताओं की कृपा से हम जीते हुए पुत्र का मुख देखेंगे। मलयवती—(मन ही मन) मुझ अभागिन के लिए यह दुर्लभ है। १. आहिताग्नि = अग्निहोत्री। जो घर में यज्ञ की अग्नि सदा जलाए रखते हैं; बुझने नहीं देते। २. न विहितः = विधान नहीं किया गया। शास्त्रकारों ने अनुमति नहीं दी। ३. अग्नीन् = तीन प्रकार की अग्नियां बताई हैं — दक्षिण, गार्हपत्य तथा आहवनीय।
( १२२ ) -वत्सः ! अवितथैषा तव भारती भवतु । तथापि साग्नीनामेवास्माकं युक्तमनुसर्तुम् । तदनुसरतु भवान् । वयमप्यग्निशरणादग्निमादाय त्वरितमेवानुगच्छामः । [पत्नीवधूसमेतो निष्क्रान्तः ।] शङ्खचूडः - तद्यावद् गरुडमनुसरामि । (परिक्रम्य अग्रतो निर्वर्ण्य) - ^1कुर्वाणो रुधिराद्र्रचञ्चुकषणैर्दोखीरिवाद्रेस्तटीः, प्लुष्टोपान्तवनान्तरः स्वनयनज्योतिःशिकासञ्चयैः । मज्जद्वङ्ककठोरघोरनखरप्रान्तावगाढावनिः शृङ्गाग्रे मलयस्य पन्नगपुरिर्दूरादसौ दृश्यते ॥१४॥ [ततः प्रविशति आसनस्थः पुरःपतितनायको गरुडः] गरुडः - (आत्मगतम्) जन्मन. प्रभृति भुजङ्गपतीनश्नन्। नेदमाश्चर्यं मया दृष्टपूर्वं यदयं महासत्वो न केवलं न व्यथते प्रत्युत प्रहृष्ट इव किमपि दृश्यते । तथाहि- श्लोक नं०: १४, अन्वयः- रुधिराद्र्रचञ्चुकषणैः अद्रेः तटीः दोधीः इव कुर्वाणः, स्वनयनज्योतिःशिखासञ्चयैः प्लुष्टोपान्तवनान्तरः, मज्जद्वङ्ककठोरघोरनखरप्रान्तावगाढावनिः, असौ पन्नगरिपुः शृङ्गाग्रे दूरात् दृश्यते ॥
( २२१ ) जीमूतकेतु—वत्स, तुम्हारी यह वाणी सत्य हो ! फिर भी अग्नि के साथ ही हमारा अनुसरण करना उचित होगा। अतः आप (उसका) अनुसरण करें। हम भी अग्निशाला से अग्नि लेकर शीघ्र ही पीछे पीछे आते हैं। [पत्नी तथा बहू के साथ प्रस्थान] शङ्खचूड़— तब मैं गरुड़ का अनुसरण करता हूँ। (घूमकर, आगे देख कर)— रक्त से गीली अपनी चोंच के रगड़ने से पर्वत की तलहटियों को नावों की तरह (बीच में से गहरी) करता हुआ अपनी आँखों की ज्योति की ज्वालाओं से समीप के वन के मध्यभाग को जलाता हुआ, (मलयभूमि में) घुसने वाले वज्र के समान कठोर भीषण नखों की नोकों से भूमि को खोदता हुआ, यह साँपों का शत्रु (गरुड़) मलयपर्वत की चोटी पर (बैठा हुआ) दूर से (ही) दिखाई दे रहा है। [सामने पड़े हुए नायक के साथ आसन जमाए गरुड़ का प्रवेश] गरुड़ – (मन ही मन) जन्म से नागराजों को खाते हुए मैंने कभी पहिले ऐसा आश्चर्य नहीं देखा। क्योंकि यह महासत्त्व (महात्मा) केवल व्यथा रहित ही नहीं, अपितु कुछ कुछ प्रसन्न सा दिखाई देता है— । क्योंकि:—
- कृ + शानच् + प्रथमा एक वचन।
( २२५ ) १ग्लानिर्नाधिकपीयमानरुधिरस्याप्यस्ति धैर्याम्बुधे- र्मांसोत्कर्त्तनजा रुजोऽपि वहतः प्रीत्या प्रसन्नं^२ मुखम् । गात्रं यन्न विलुप्तमेष पुलकस्तत्र स्फुटो लक्ष्यते, दृष्टिर्मुग्धोपकारिणीव निपतत्यस्यापकारिण्यपि ॥१५॥ अतः कुतूहलमेव जनितमस्या नया धैर्यवृत्त्या । भवतु, न भक्षयाम्येवैनम् । पृच्छामि तावत्कोऽयमिति [अपसर्पति] नायकः — (मांसोत्कर्त्तन विमुखमुपलक्ष्य) — — शिरामुखैः स्यन्दत^३ एव रक्तमद्यापि देहे मम मांसमस्ति । तृप्तिं न पश्यामि तवापि तावत्, किं भक्षणात्त्वं विरतो गरुत्मन् ॥१६॥ गरुडः — (आत्मगतम्) आश्चर्यमाश्चर्यम् ! कथमस्यामप्य- वस्थायामेवमूर्जितमभिधत्ते !! (प्रकाशम्) — अहो महासत्त्व ! श्लोक न०: १५, अन्वय: — (मया) अधिकपीयमानरुधिरस्य अपि (अस्य) धैर्याम्बुधेः ग्लानिः न अस्ति, मांसोत्कर्त्तनजाः रुजः वहतः अपि (अस्य) मुखं प्रीत्या प्रसन्नम् । यत् गात्रं न विलुप्तं तत्र एष पुलकः स्फुटो लक्ष्यते; मयि अपकारिण्यपि अस्य दृष्टिः उपकारिणि इव निपतति ॥ श्लोक न०: १६, अन्वयः — (मम) शिरामुखैः अद्यापि रक्तं स्यन्दते एव । अद्यापि मम देहे मांसमस्ति तव तृप्तिमपि न पश्यामि । तावत् गरुत्मन् ! किं त्वं (ममशरीर-) भक्षणात् विरतः ?
( २२५ ) (मेरे) अधिक रक्त पी लेने पर भी (इस) धीरता के समुद्र को कोई ग्लानि (मलिनता) नहीं। माँस के काटने से उत्पन्न हुई पीड़ा को धारण करते हुए भी (इसका) मुख हर्ष से प्रसन्न है। (इसका) जो अङ्ग (अभी तक) नष्ट नहीं हुआ वहां यह रोमाञ्च स्पष्ट दिखाई दे रहा है। (और) मुझ अपकार करने वाले पर भी इसकी दृष्टि ऐसे पड़ रही है मानों किसी उपकारी व्यक्ति पर पड़ रही हो। अतः इसकी इस धैर्य-वृत्ति से मुझे उत्सुकता ही पैदा हुई है। अस्तु, अब और इसे नहीं खाऊँगा। तो पूछता हूँ यह कौन है। (हट जाता है) नायक—(गरुड़ को मांस के काटने से विमुख हुआ देखकर)— मेरी नाड़ियों के मुखों से अभी रक्त वह रहा है। अभी तक मेरे शरीर में मांस है। तुम्हारी तृप्ति भी मैं नहीं देख रहा। तो हे गरुड़ ! तुम (मेरे शरीर को) खाने से क्यों हट गए हो ? गरुड़—(मन ही मन)—आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! क्या इस दशा में भी, इस प्रकार तेजस्वी वचन बोल रहा है !!! (प्रकट) हे महात्मन्—
- मलिनता; थकावट; कमज़ोरी।
- प्रसन्न; आनन्दित; शान्त।
- चू रहा है; बह रहा है।
( १२६ ) 1 आवर्जितं मया चञ्च्वा हृदयात्तव शोणितम् । अनेन धैर्येण पुनस्त्वया हृदयमेव नः ॥ १७ ॥ तत्कस्त्वमिति श्रोतुमिच्छामि । नायकः - एवं क्षुदुपतप्तो न श्रवणयोग्यस्त्वम् । कुरुष्व तावन्मम मांसशोणितेन तृप्तिम् । शङ्खचूडः - (सहसोपसृत्य) तार्क्ष्य ! न खलु न खलु साहस- मनुष्ठेयम् । नायं नागः । परित्यजैनम् । मां भक्षय । अहं तवाहारार्थं प्रेषितोऽस्मि वासुकिना । [इत्युरो ददाति] नायकः-(शङ्खचूडं दृष्ट्वा सविषादमात्मगतम्) कष्टं ! विफलीकृतो मे मनोरथः शङ्खचूडेनागच्छता । गरुड़ः - (उभौ निरूप्य) द्वयोरपि भवतोर्वध्यचिह्नम् । कः खलु नाग इति नावगच्छामि । शङ्खचूडः- अस्थान एव भ्रान्तिः । श्लोक न०: १७, अन्वयः- मया चञ्च्वा तव हृदयात् शोणितम् (एव) आवर्जितम् । त्वया पुनः अनेन धैर्येण नः हृदयमेव (आवर्जितम्) ।
५. पञ्चम अङ्क: गरुड़-हृदय परिवर्तन, बोधिसत्त्व धर्म व नाग-जीवन रक्षा
( २२७ ) मैं ने तो अपनी चोंच से आपके हृदय से रक्त ही निकाला है ; पर आपने तो इस धैर्य से हमारा हृदय ही हर लिया है (वश में कर लिया है) । अतः मैं यह सुनना चाहता हूँ कि आप कौन हैं। नायक — इस प्रकार भूख से पीड़ित तुम (अभी) सुनने योग्य नहीं हो । अतः (पहिले) मेरे मांस तथा रक्त से अपनी तृप्ति कर लो । शङ्खचूड— (सहसा पास जा कर) हे गरुड़ ! मत करो, ऐसा साहस मत करो । यह नाग नहीं है । इसे छोड़ दो । मुझे खाओ । मैं ही वासुकि के द्वारा तुम्हारे भोजन के लिए भेजा गया हूँ । [यह कहकर अपनी छाती भेंट करता है] (शङ्खचूड़ को देखकर, दुःख के साथ, मन ही मन) — हाय, शङ्खचूड ने आकर मेरे मनोरथ को निष्फल कर दिया ! गरुड— (दोनों को देखकर) तुम दोनों के वध्यचिह्न है । तो कौन (वस्तुतः) नाग है यह मैं नहीं समझ सका । शङ्खचूड़—आप का भ्रम उचित नहीं । (क्योंकि—)
- निकालना; वश में करना; हरना ।
( २२८ ) आस्तां स्वस्तिकलक्ष्म वक्षसि तनौ नालोक्यते कञ्चुको जिह्वे जल्पत एव मे न गणिते नाम त्वया द्वे अपि ? तिस्रस्तोत्रविषाग्निधूमपटलव्याजिह्मरत्नत्विषो नैता दुःसहशोकफूत्कृतमरुत्स्फीताः फणाः पश्यसि? ॥१८॥ गरुडः- (उभौ निरूप्य, शङ्खचूडस्य फणां दृष्ट्वा)-तत्कः खल्वयं मया व्यापादितः ? शङ्खचूडः-विद्याधरवंशतिलको जीमूतवाहनः । कथमकारु- णिकेन त्वया इदमनुष्ठितम् ? गरुडः - (स्वगतम्) अये, अयमसौ विद्याधरकुमारो जीमूतवाहनः ! मेरौ मन्दरकन्दरासु हिमवत्सानौ महेन्द्राचले कैलासस्य शिलातलेषु मलयप्राग्भारदेशेष्वपि दिक्कुञ्जेषु च तेषु बहुशो यस्य श्रुतं तन्मया लोकालोकविचारिचारणगणैरुद्गीयमानं यशः ॥१६॥ श्लोक नं०: १८, अन्वयः— वक्षसि स्वस्तिकलक्ष्म आस्ताम् तनौ । कञ्चुको नालोक्यते । जल्पत एव मे द्वे जिह्वे अपि त्वया न गणिते नाम ? तीव्रविषा- ग्निधूमपटलव्याजिह्मरत्नत्विषः, दुःसहशोकफूत्कृतमरुत्स्फीताः एताः तिस्रः फणाः (अपि किं त्वं) न पश्यसि ? श्लोक नं०: १६, अन्वयः— पश्य तत् यशः मेरौ, मन्दरकन्दरासु, हिमवत्सानौ, महेन्द्राचले, कैलासस्य शिलातलेषु, मलयप्राग्भारदेशेषु अपि, तेषु दिक्कुञ्जेषु च लोकालोकविचारिचारणगणैः उद्गीयमानं मया श्रुतम् ।
( २२६ ) छाती पर के स्वस्तिक चिह्न को रहने दो; (किन्तु) मेरे शरीर पर की केंचुली (भी क्या आप को) दिखाई नहीं देती ? मेरे बोलते हुए की दो जिह्वाओं को भी आपने नहीं गिना ? भयानक विष की अग्नि के धुँए के समूह से जिन के रत्नों की चमक मलीन हो गई है और जो दुःसह शोक के कारण सू सू कर के निकलती हुई हवा से फैल रहे हैं ऐसे मेरे इन तीन फणों को भी क्या आप नहीं देख रहे ? गरुड़- (दोनों को अच्छी तरह देखकर, शङ्खचूड़ के फण को देखकर) तो यह कौन मेरे द्वारा मारा गया है ? शङ्खचूड़- विद्याधरों के वंश का तिलक जीमूतवाहन । निर्दय हो कर तुम ने ऐसा क्यों किया ? गरुड़- (मन ही मन) अरे, क्या यह वही विद्याधर कुमार जीमूतवाहन है जिस का यश मेरु पर्वत पर, मन्दराचल की कन्दराओं में, हिमालय के उन्नत प्रदेशों में महेन्द्र पर्वत पर, कैलाश पर्वत की चट्टानों पर, मलय पर्वत की चोटियों पर तथा दिशाओं की कुक्षों में लोकालोक पर्वत पर विचरण करने वाले चारणों से गाया जाता हुआ मैं ने बहुत बार सुना है।
- जल्प + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन ।
- सचमुच; शायद; सम्भवतः; कदाचित् ।
- मलीन; धुंदली। 4. चमक; कान्ति ।
- श्रेष्ठ; शिरोमणि । 6. प्राग्भार = चोटी, शिखर ।
- विभिन्न दिशाओं की कन्दराओं अथवा लताभवनों में ।
( २३० ) सर्वथा महत्यंहःपङ्के निमग्नोऽस्मि । नायकः— भो फणिपते ! किमेवमुद्विग्नोऽसि ? शङ्खचूडः— किमस्थानमिदमावेगस्य? स्वशरीरेण शरीरं ताद्यत् परिरक्षतो मदीयमिदम् । युक्तं नेतुं भवता पातालतलादपि तलं माम् ॥२०॥ गरुडः—अये ! करुणार्द्रचेतसानेन महात्मनास्मद्ग्रासगोचर- पतितस्यास्य फणिनः प्राणान् रक्षितुं स्वदेह आहारार्थ- मुपनीतः। तन्महदकृत्यमेतन्मया कृतम् । किं बहुना, बोधिसत्त्व एवायं व्यापादितः । तस्य महतः पापस्याग्नि- प्रवेशादृते नान्यत् प्रायश्चित्तं पश्यामि। तत् क्व नु खलु वह्निं समासादयामि ? (दिशः पश्यन्—) अये ! अमी केऽपि गृहीताग्नय इत एवागच्छन्ति। तद्याव- देतान् प्रतिपालयामि । शङ्खचूडः — कुमार ! पितरौ ते प्राप्तौ । नायकः— (ससम्भ्रमम् ) शङ्खचूड ! समुपविश्यानेनोत्तरीये- णाच्छादितशरीरं कृत्वा धारय माम् । अन्यथा कदा- चिदीदृशं सहसैवं मां दृष्ट्वा पितरौ जीवितं जहाताम् ।
श्लोक नं०: २०, अन्वयः— स्वशरीरेण ताद्यत् मदीयम् इदं शरीरं परिरक्षता भवता मां पातालतलादपि तलं नेतुं युक्तम् ॥
( २३१ ) मैं तो सब प्रकार से महान पाप के पङ्क में डूब गया हूँ । नायक- हे नागराज (शङ्खचूड़) ! तुम ऐसे घबराए हुए क्यों हो ? शङ्खचूड़ - क्या यह घबराने का कारण नहीं ? अपना शरीर देकर गरुड़ से मेरे इस शरीर की रक्षा करते हुए मुझे पाताल से भी नीचे (नरक में) ले जाना क्या आप के लिए उचित था ? गरुड़ - अरे, दया से आर्द्र चित्त वाले इस महात्मा ने हमारे आहारार्थ आए हुए इस नाग के प्राणों की रक्षा करने के लिए अपने शरीर को (मेरे) खाने के लिए अर्पित कर दिया। तब तो यह मैंने बड़ा अनर्थ किया है। अधिक क्या, यह तो बोधिसत्त्व को ही मार डाला है। इस महान पाप का प्रायश्चित्त अग्नि में जलकर मरने के सिवाय कोई और दूसरा नहीं देख रहा हूँ । तो अग्नि कहाँ पाऊँ ? (चारों ओर देख कर) अरे, यह कुछ लोग आग लिए हुए इधर ही आ रहे हैं। तब तक इन की प्रतीक्षा करता हूँ । शङ्खचूड़- कुमार ! आप के माता पिता आगए । नायक- (घबराहट के साथ) शङ्खचूड़ ! तुम मेरे पास बैठ कर इस चादर से मेरे शरीर को ढक कर मुझे पकड़े रहो । नहीं तो कहीं सहसा ही मुझे इस दशा में देख कर मेरे माता पिता अपने प्राण ही छोड़ दें ।
- अस्थानम् = अनुचित स्थान; अकारण; अनुचित ।
- अकृत्यम् = बुरा काम; पाप; अनिष्ट ।
- ,ऋते' के योग में पञ्चमी आती है । अर्थ = बिना, अतिरिक्त ।
- जहाताम् = हा + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + द्विवचन । 'छोड़ें' ।
( २३२ ) [शङ्खचूडः पार्श्वपतितमुत्तरीयं गृहीत्वा तथा करोति।] [ततः प्रविशति पत्नीवधूसमेतो जीमूतकेतुः।] जीमूतकेतुः- (सास्रम्) हा पुत्र जीमूतवाहन ! - आत्मीयः पर इत्ययं खलु कुतः सत्यं कृपायाः क्रमः ? किं रक्षामि बहून् किमेकमिति ते जाता न चिन्ता कथम् ? तार्क्ष्यात्त्रातुमहिं स्वजीवितपरित्यागं त्वया कुर्वता, येनात्मा पितरौ वधूरिति हतं निःशेषमेतत्कुलम् ॥२१॥ वृद्धो- (मलयवतीमुद्दिश्य) जादे ! विरम मुहुत्तअं । अविरत- जाते ! विरम मुहूर्त्तकम् । अविरत- णिवडंतबाष्पबिंदूहिं अहिहवीअदि अअंअग्गी । निपतद्बाष्पबिन्दुभिर् अभिभूयतेऽयमग्निः । [सर्वे परिक्रामन्ति] जीमूतकेतुः- हा पुत्र जीमूतवाहन ! गरुडः- (श्रुत्वा) 'हा पुत्र जीमूतवाहन ! इति ब्रवीति। तद् व्यक्तमयमस्य पिता। तत् किमेतदीयेनाग्निना आत्मान- मुद्दीपयामि ? न शक्नोम्यस्य पुत्रघाताल्लज्जया मुखं श्लोक नं ०: २१, अन्वयः - अयं आत्मीयः (अयं) परः इति कृपायाः क्रमः कुतः ? (तत्) खलु सत्यम्। (परं) किं बहून् रक्षामि, किमेकं (वा) इति चिन्ता ते कथं न जाता ? येन तार्क्ष्यात् अहिं स्वजीवितपरित्यागं कुर्वता त्वया आत्मा पितरौ वधूरिति निःशेषमेतत्कुलं हतम् ।