भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः २ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । ९५ हे वीर ! केवल आप में, दमयन्ती के किल-किञ्चित ( मुस्कराने, हँसने, रूठने, मान करने आदि विलास चेष्टाओं ) के आविर्भाव विशेष रूप से शोभा देंगे; क्योंकि ( जिस प्रकार वृद्धा नारी के ढलके हुए स्तनों पर नहीं, प्रत्युत ) तरुणी के (दृढ़ तथा उन्नत ) उरोजों पर ही मोतियों के रत्न-हार की रमणीकता झलकती है (उसी प्रकार अद्वितीय सुन्दरी दमयन्ती की सभी चेष्टाएं, दुर्बल-अयोग्य-नपुंसक पति के योग्य नहीं, बल्कि आप जैसे वीर के योग्य हैं) ॥४४॥ तव रूपमिदं तया विना विफलं पुष्पमिवावकेशिनः । इयमृद्धधना वृथावनी स्ववनी सम्प्रवदत्पिकापि का ॥४५॥ तवेति । हे वीर ! तवेदं रूपं = सौन्दर्यं तया = दमयन्त्या विना, अवके- शिनः = वन्ध्यवृक्षस्य । 'बन्ध्योऽफलोऽवकेशी च' इत्यमरः । पुष्पमिव विफलं = निरर्थकम् । ऋद्धधना = सम्पूर्णवित्ता इयमवनी वृथा = निरर्थिका । सम्प्रव- दत्पिका=कूजत्कोकिला स्वबनी=निजोद्यानमपि । गौरादित्वात् ङीष् । का=तुच्छा, निरर्थिकेल्यर्थः । तद्योगे तु सर्वं सफलमिति भावः । 'किं वितर्के परिप्रश्ने क्षेपे निन्दापराधयोः' इति विश्वः । अत्र नलरूपावनीनां दमयन्त्या विना रम्यतानिषेधाद्विनोक्तिरलङ्कारः । 'विना सम्बन्धि यत्किञ्चिद्रम्यमन्यत्र परा भवेत् । रम्यतारम्यता वा स्यात् सा विनोक्ति- स्तुस्मृता' इति लक्षणात् । तस्याश्च पुष्पमिवेत्युपमया संसृष्टिः ॥४५॥ आपका यह (अप्रतिम) लावण्य, दमयन्ती के बिना - फलहीन बाँझ पेड़ के फूल के समान - निरर्थक है; समृद्ध धन (प्रचुर सम्पत्ति) वाली (आप द्वारा शासित) यह पृथ्वी (साम्राज्य) व्यर्थ है और कुहू कुहू करके बोलने वाली कोयल जिसमें हो-ऐसी (आप की) सुन्दर उद्यान-वाटिका भी किस काम की ? ॥४५॥ अनयामरकाम्यमानया सह योगः सुलभस्तु न त्वया । घनसंमृतयाम्बुदागमे कुमुदेनेव निशाकरत्विषा ॥ ४६ ॥ अत्रान्यापेक्षां दर्शयितुं तस्याः दौर्लभ्यमाह - अनयेति । [ अमर-काम्य- मानया ] अमरेरिन्द्रादिभिः, काम्यमानया ऽभिलष्यमाणया, अनया = दमयन्त्या सह, योगः, अम्बुदागमे घनसंवृतया = मेघावृतया निशाकरत्विषा सह योगः कुमुदेन इव त्वया न तु सुलभः=दुर्लभ इत्यर्थः । अत्र तत्संयोगदौर्लभ्यस्य अमर- कामनापदार्थ हेतुकत्वात् काव्यलिङ्गभेदः । तत्सापेक्षा चेयमुपमेति सङ्करः ॥ ४६ ॥ देवताओं द्वारा कामना की जानेवाली दमयन्ती के साथ आपका मिलन