संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ४०३
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०३
'वंशपत्रपतित' (में भगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। दस-सात अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ऽ। ।ऽ। ऽ। ।।ऽ ।। ।।।।ऽ अद्य कुरुष्व कर्म सुकृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव॥ 'मन्दाक्रान्ता' (में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु होते हैं। ४, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। (इसके प्रत्येक चरणके अन्तिम सात अक्षर कम कर देनेपर 'हंसी' छन्द बन जाता है।) उदाहरण— ऽऽऽऽ ।।।।।ऽ ऽ।ऽ ऽ।ऽऽ बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥ 'शिखरिणी' (-में यगण, मगण, सगण, नगण, भगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं तथा ६, ११ अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ।ऽऽ ऽऽ ऽ ।।।।।ऽ ऽ।।।ऽ महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः। अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ (१८) अठारह-अठारह अक्षरोंके चार चरणोंसे बननेवाले छन्द-समूहकी संज्ञा 'धृति' कही गयी है। प्रस्तारसे इसके २६२१४४ भेद होते हैं। उनमेंसे एक ही भेद 'कुसुमितलतावेल्लिता' नामक छन्दका लक्षण और उदाहरण दिया जाता है। इसमें मगण, तगण, नगण और तीन भगण होते हैं। ५, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽऽऽ ।।।।। ऽऽ। ऽऽ। ऽऽ धन्यानामेताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजत्परभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझङ्कारम्या ग्रामान्तःस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयान्ति॥ (१९) उन्नीस-उन्नीस अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायको 'विधृति' या 'अतिधृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके ५२४२८८ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'शार्दूलविक्रीडित' नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण और एक गुरु होते हैं तथा बारह और सात अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽ ।।ऽ ।ऽ ।।। ऽ ऽऽ। ऽऽ । ऽ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥ (२०) बीस-बीस अक्षरोंके चार पादोंसे निष्पन्न होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'कृति' है। प्रस्तारसे इसके १०४८५७६ भेद होते हैं। उनमेंसे २के लक्षण और उदाहरण यहाँ बतलाये जाते हैं। पहलेका सुवदना और दूसरेका नाम 'वृत्त' है। सुवदनामें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। ७, ७, ६ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ ऽऽऽ ।ऽऽ ।। ।।।। ऽऽऽ ।। ।ऽ या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगकालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजियिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने प्रत्यक्षं पार्वती मे भवतु भगवती स्नेहात्सुवदना॥ 'वृत्त' (में एक गुरु, एक लघुके क्रमसे २० अक्षर होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।) उदाहरण— ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । ऽ। ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । जन्तुमात्रदुःखकारि कर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनां हिताय॥ (२१) इक्कीस-इक्कीस अक्षरोंके चार पादोंमें पूर्ण होनेवाले छन्दोंकी जातिवाचक संज्ञा 'प्रकृति' है। प्रस्तारसे इसके २०९७१५२ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'स्रग्धरा' के नामसे प्रसिद्ध है। इसमें मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगण
४०४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽ ऽ। ऽऽ ।।। ।। ।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्खलन्ती। क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥ (२२) बाईस-बाईस अक्षरोंके चार पादोंसे परिपूर्ण होनेवाले छन्दोंका नाम 'आकृति' है। प्रस्तारसे इसकी भेद-संख्या ४१९४३०४ होती है। इसके एक भेद **'भद्रक'**का उदाहरण यहाँ दिया जाता है। भद्रकके प्रत्येक पादमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण, एक गुरु होते हैं। दस, बारह अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ।। ऽ।ऽ ।।। ऽ ।ऽ। ।। ऽ ।ऽ ।।। ऽ भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभावनम्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः। ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुरावलीपरिवृताः॥ (२३) तेईस-तेईस अक्षरोंके चार-चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमुदायको 'विकृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके ८३८८६०८ भेद होते हैं। इनमें 'अश्वललित' और 'मत्ताक्रीडा' नामक दो छन्दोंके उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, १ लघु १ गुरु होनेसे 'अश्वललित' छन्द होता है। उदाहरण— ।।। ।ऽ ।ऽ ।। ऽ ।ऽ ।।। ऽ।ऽ ।।ऽ पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावनितया वशीकृतमिदम्। सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपान्न्रपशुः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम्॥ 'मत्ताक्रीडा' (में २ मगण, १ तगण, ४ नगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। आठ और पंद्रह अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ऽऽ ऽऽ ऽऽऽऽ ।।।।।।।।।।।।।ऽ वन्दे देवं श्रीगोविन्दं प्रणयपरवशमतिकरुणहृदयं मात्रा बद्धं दाम्ना साम्ना स्तुतमपि सुतमिव निजमिह सभयम्। हन्तुं याऽऽगात्तस्यै मातृव्यतरदतुलनिजगतिमतिविमलां गां गोपीर्गोपान् योऽगोपायदिह विधृतगिरिरुपचितघनतः॥ (२४) चौबीस-चौबीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते हैं, उनका नाम 'संस्कृति' है। प्रस्तारसे इसके १६७७७२१६ भेद होते हैं। इनमें 'तन्वी' नामक छन्दका उदाहरण दिया जाता है। उसमें भगण, तगण, नगण, सगण, २ भगण, नगण, यगण होते हैं। ५, ७, १२ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ। ।ऽऽ ।।।।। ऽ ऽ।।ऽ। ।।। ।। ऽऽ नाथ तवाहं तव पदकमलं सेवितुमेव मनसि मम कामो नाम सुधासोदरमतिमधुरं मे रसना रसयतु नितरां वै। प्रेमिजना ये प्रभुगुणरसिकास्तेषु सदैव भवतु मम वासो देव दयां दर्शय वस हृदये त्वां न विनेह जगति मम बन्धुः॥ (२५) पच्चीस-पच्चीस अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्दोंको 'अतिकृति' या 'अभिकृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इनके ३३५५४४३२ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेदका नाम 'क्रौञ्चपदा' है। उसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण, ४ नगण तथा १ गुरु होते हैं। ५, ५, ८, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ।। ऽऽ ऽ।। ऽऽ ।। ।।।।।।।।।।।ऽ माधव भक्तिं देह्यविभक्तिं तव चरणयुगलशरणमुपगतः संहर पापं दर्शिततापं निजगुणगणरतिमुपनय नितराम्। मोहन रूपं रम्यमनूपं प्रकटय शमय विषयविषमनिशं वादय वंशीं मानसदंशी तिमिरिनिभहृदयविहितवरवडिशाम्॥ (२६) छब्बीस-छब्बीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते हैं, उनकी जातिवाचक संज्ञा 'उत्कृति' है। प्रस्तारसे इसके ६७१०८८६४ भेद होते हैं। इनमेंसे दो भेद बताये जाते हैं। एकका नाम 'भुजङ्गविजृम्भित' और दूसरेका 'अपवाह' है। 'भुजङ्गविजृम्भित'— (में २ मगण, १ तगण, ३ नगण, १ रगण, १ सगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। ८, १९, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।)
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|---|
संज्ञाएँ हैं, प्रस्तारसे^१ इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षरवाले पादमें प्रथम गुरुके नीचे लघु लिखना चाहिये, फिर दाहिनी ओरकी पङ्क्तिको ऊपरकी पङ्क्तिके समान भर दे। तात्पर्य यह कि शेष स्थानोंमें ऊपरके अनुसार गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रियाको बराबर करता जाय। इसे करते हुए ऊनस्थान अर्थात् बायीं ओरके शेष स्थानमें गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक कि सभी लघु अक्षरोंकी प्राप्ति न हो जाय। इसे 'प्रस्तार' कहा गया है^२॥१४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जानेपर यदि उसके किसी भेदका स्वरूप जानना हो तो उसे जाननेकी विधिको 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं।) यदि नष्ट अङ्क सम है | तो उसके लिये एक लघु लिखे और उसका आधा भी यदि सम हो तो उसके लिये पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अङ्क विषम हो तो उसके लिये एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़कर आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिये भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक अभीष्ट अक्षरोंका पाद प्राप्त न हो जाय^३। (प्रस्तारके किसी भेदका स्वरूप तो ज्ञात हो; किंतु संख्या ज्ञात न हो तो उसके जाननेकी विधिको 'उद्दिष्ट' कहते हैं।) उद्दिष्टमें गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें पहले अक्षरपर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरोंपर दूने अङ्क लिखता जाय; फिर लघुके ऊपर जो अङ्क हों,
उदाहरण—
ऽऽऽऽऽऽऽऽ ।।।।।।।।।ऽ ऽऽ ।। ऽ ।ऽ
हेलोदञ्चन्यञ्चत्पादप्रकटविकटनटनभरो रणत्करतालकः चारुप्रेङ्खच्चूडाबर्हः श्रुतितरलनवकिसलयस्तरङ्गितहारधृत्।
त्रस्यत्रागस्त्रीभिर्भक्त्या मुकुलितकरकमलयुगं कृतस्तुतिरच्युतः पायाद्वश्चिन्दन् कालिन्दीह्रदकृतनिजवसतिबृहद् भुजङ्गविजृम्भितम्॥
'अपवाह' (-के प्रत्येक पादमें १ मगण, ६ नगण, १ सगण, २ गुरु होते हैं। ९, ६, ६, ५ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण—
ऽऽऽ ।।।।।।।।।।।।।।।।ऽ ऽऽ
श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणसकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम्।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम्॥
१. छन्दःशास्त्रमें छः प्रत्यय होते हैं—१- प्रस्तार, २- नष्ट, ३- उद्दिष्ट, ४- एकद्व्यादिलगक्रिया, ५- संख्यान और छठा अध्वयोग। प्रस्तारका अर्थ फैलाव; अमुक संख्यायुक्त अक्षरोंसे बने हुए पादवाले छन्दके कितने और कौन-कौनसे भेद हो सकते हैं? इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्रस्तार है। नष्ट आदिका स्वरूप आगे बतायेंगे।
२. उदाहरणके लिये चार अक्षरके पादवाले छन्दका मूलोक्त रीतिसे प्रस्तार अङ्कित किया जाता है—
| १—ऽऽऽऽ | ९—ऽऽऽ। |
| २—।ऽऽऽ | १०—।ऽऽ। |
| ३—ऽ।ऽऽ | ११—ऽ।ऽ। |
| ४—।।ऽऽ | १२—।।ऽ। |
| ५—ऽऽ।ऽ | १३—ऽऽ।। |
| ६—।ऽ।ऽ | १४—।ऽ।। |
| ७—ऽ।।ऽ | १५—ऽ।।। |
| ८—।।।ऽ | १६—।।।। |
३. जैसे किसीके द्वारा पूछा जाय कि चार अक्षरके पादवाले छन्दका छठा भेद क्या है? तो इसमें छठा अङ्क सम हैं; अतः उसके लिये प्रथम एक लघु होगा (।), फिर छः का आधा करनेपर तीन विषम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। अब तीनमें एक जोड़कर आधा किया तो दो सम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये फिर एक लघु (।) लिखा। उस दोका आधा किया तो एक विषम अङ्क हुआ; अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। सब मिलकर (।ऽ ।ऽ) ऐसा हुआ। अतः चार अक्षरवाले छन्दके छठे भेदमें प्रत्येक पादमें प्रथम अक्षर लघु, दूसरा गुरु, तीसरा लघु और चौथा गुरु होगा।
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|---|
उन्हें जोड़कर उसमें एक और मिला दे तथा वही उद्दिष्ट स्वरूपकी संख्या बतावे। ऐसा पुराणवेत्ता विद्वानोंका कथन है^१। (अमुक छन्दके प्रस्तारमें एक गुरुवाले या एक लघुवाले, दो लघुवाले या दो गुरुवाले, तीन लघुवाले या तीन गुरुवाले भेद कितने हो सकते हैं; यह पृथक्-पृथक् जाननेकी जो प्रक्रिया है, उसे 'एकद्व्यादिलगक्रिया' कहते हैं।) छन्दके अक्षरोंकी जो संख्या हो, उसमें एक अधिक जोड़कर उतने ही एकाङ्क ऊपर-नीचेके क्रमसे लिखे। उन एकाङ्कोंको ऊपरकी अन्य पङ्क्तिमें जोड़ दे; किंतु अन्त्यके समीपवर्ती अङ्कको न जोड़े और ऊपरके एक-एक अङ्कको त्याग दे। ऊपरके सर्व गुरुवाले पहले भेदसे नीचेतक गिने। इस रीतिसे प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु और तीसरा भेद द्विगुरु होता है। इसी तरह नीचेसे ऊपरकी ओर ध्यान देनेसे सबसे नीचेका सर्वलघु, उसके ऊपरका एक लघु, तीसरा भेद | द्विलघु इत्यादि होता है। इस प्रकार 'एकद्व्यादिलगक्रिया' जाननी चाहिये।^२ लगक्रियाके अङ्कोंको जोड़ देनेसे उस छन्दके प्रस्तारकी पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है। यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है, अथवा उद्दिष्टपर दिये हुए अङ्कोंको जोड़कर उसमें एकका योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तारकी पूरी संख्याको प्रकट कर देता है^३। छन्दके प्रस्तारको अङ्कित करनेके लिये जो स्थानका नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं। प्रस्तारकी जो संख्या है, उसे दूना करके एक घटा देनेसे जो अङ्क आता है, उतने ही अंगुलका उसके प्रस्तारके लिये अध्वा या स्थान कहा गया है॥१६-२०॥ मुने! यह छन्दोंका किंचित् लक्षण बताया गया है। प्रस्तारद्वारा प्रतिपादित होनेवाले उनके भेद-प्रभेदोंकी संख्या अनन्त है॥२१॥<br>(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५७)
१-जैसे कोई पूछे कि चार अक्षरके पादवाले छन्दमें जहाँ प्रथम तीन गुरु और अन्तमें एक लघु हो तो उसकी संख्या क्या है अर्थात् वह उस छन्दका कौन-सा भेद है? इसको जाननेके लिये पहले उद्दिष्टके गुरु-लघुको निम्नाङ्कित रीतिसे अङ्कित करके उनके ऊपर क्रमशः द्विगुण अङ्क स्थापित करे—
| १ | २ | ४ | ८ |
|---|---|---|---|
| ऽ | ऽ | ऽ | । |
तत्पश्चात् केवल लघुके अङ्क ८ में एक और जोड़ दिया गया तो ९ हुआ। यही उद्दिष्टकी संख्या है। अर्थात् वह उस छन्दका नवाँ भेद है।
२. निम्नाङ्कित कोष्ठकसे यह बात स्पष्ट हो जाती है—
अर्थात् चार अक्षरवाले छन्दके प्रस्तारमें ४ लघुवाला १ भेद, एक गुरु तीन लघुवाला ४ भेद, २ गुरु और दो लघुवाला ६ भेद, तीन गुरु और १ लघुवाला ४ भेद और चार गुरुवाला १ भेद होगा।
३. यथा—चार अक्षरके प्रस्तारमें लगक्रियाके अङ्क १+४+६+४+१ होते हैं, इनका योग सोलह होता है। अतः चार अक्षरके पादवाले छन्दके सोलह भेद होंगे अथवा उद्दिष्टके अङ्क हैं १+२+४+८ इसका योग हुआ १५, इनमें एकका योग करनेसे प्रस्तार संख्या १६ प्रकट हो जाती है।
\ १ \ ४ऽ
\ \
\ १ \ ४ \ ३ऽ।
\ \ \
\ १ \ ३ \ ६ \ २ऽ२।
\ \ \ \
\ १ \ २ \ ३ \ ४ \ १ऽ३।
\ \ \ \ \
| १ | १ | १ | १ | १ \ ४।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ४०७
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०७
शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें युवतियोंद्वारा उनकी सेवा, राजा जनकके द्वारा शुकदेवजीका सत्कार और शुकदेवजीके साथ उनका मोक्षविषयक संवाद
श्रीसनन्दनजीने कहा—नारदजी! एक दिन मोक्ष-धर्मका ही विचार करते हुए शुकदेवजी पिता व्यासदेवके समीप गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—'भगवन्! आप मोक्ष-धर्ममें निपुण हैं, अतः मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मेरे मनको परम शान्ति प्राप्त हो।' मुने! पुत्रकी यह बात सुनकर महर्षि व्यासने उनसे कहा—'वत्स! नाना प्रकारके धर्मोंका भी तत्त्व समझो और मोक्षशास्त्रका अध्ययन करो।' तब शुकने पिताकी आज्ञासे सम्पूर्ण योगशास्त्र और कपिलप्रोक्त सांख्यशास्त्रका अध्ययन किया। जब व्यासजीने समझ लिया कि मेरा पुत्र ब्रह्मतेजसे सम्पन्न, शक्तिमान् तथा मोक्षशास्त्रमें कुशल हो गया है, तब उन्होंने कहा—'बेटा! अब तुम मिथिलानरेश जनकके समीप जाओ, राजा जनक तुम्हें मोक्षतत्त्व पूर्णरूपसे बतलायेंगे।' पिताके आदेशसे शुकदेवजी धर्मकी निष्ठा और मोक्षके परम आश्रयके सम्बन्धमें प्रश्न करनेके लिये मिथिलापति राजा जनकके पास जाने लगे। जाते समय व्यासजीने फिर कहा—'वत्स ! जिस मार्गमें साधारण मनुष्य चलते हों, उसीसे तुम भी यात्रा करना। मनमें विस्मय अथवा अभिमानको स्थान न देना। अपनी योगशक्तिके प्रभावसे अन्तरिक्षमार्गद्वारा कदापि यात्रा न करना। सरल भावसे ही वहाँ जाना। मार्गमें सुख-सुविधा न देखना, विशेष व्यक्तियों या स्थानोंकी खोज न करना; क्योंकि वे आसक्ति बढ़ानेवाले होते हैं। 'राजा जनक शिष्य और यजमान हैं'—ऐसा समझकर उनके सामने अहंकार न प्रकट करना। उनके वशमें रहना। वे तुम्हारे संदेहका निवारण करेंगे। राजा जनक धर्ममें निपुण तथा मोक्षशास्त्रमें कुशल हैं। वे मेरे शिष्य हैं, तो भी तुम्हारे लिये जो आज्ञा दें, उसका निस्संदिग्ध होकर पालन करना।'
पिताके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शुकदेव मुनि मिथिला गये। यद्यपि समुद्रोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको वे आकाशमार्गसे ही लाँघ सकते थे, तथापि पैदल ही गये। महामुनि शुक विदेहनगरमें पहुँचे। पहले राजद्वारपर पहुँचते ही द्वारपालोंने उन्हें भीतर जानेसे रोका; किंतु इससे उनके मनमें कोई ग्लानि नहीं हुई। नारदजी! महायोगी शुक भूख-प्याससे रहित हो वहीं धूपमें जा बैठे और ध्यानमें स्थित हो गये। उन द्वारपालोंमेंसे एकको अपने व्यवहारपर बड़ा शोक हुआ। उसने देखा, शुकदेवजी दोपहरके सूर्यकी भाँति यहाँ स्थित हो रहे हैं, तब हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनका पूजन एवं सत्कार करके राजमहलकी दूसरी कक्षामें उनका प्रवेश कराया। वहाँ चैत्ररथ वनके समान एक विशाल उपवन था, जिसका सम्बन्ध अन्तःपुरसे था। वह वन बड़ा रमणीय था। द्वारपालने शुकदेवजीको सारा उपवन दिखाकर एक सुन्दर आसनपर बिठाया तथा राजा जनकको इसकी सूचना दी। मुनिश्रेष्ठ! राजाने जब सुना कि शुकदेवजी मेरे पास आये हैं तो उनके हार्दिक भावको समझनेके उद्देश्यसे उनकी सेवाके लिये बहुत-सी युवतियोंको नियुक्त किया। उन सबके वेश बड़े मनोहर थे। वे सब-की-सब तरुणी और देखनेमें मनको प्रिय लगनेवाली थीं। उन्होंने लाल रंगके महीन एवं रंगीन वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके अङ्गोंमें तपाये हुए शुद्ध सुवर्णके आभूषण चमक
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रहे थे। वे बातचीतमें बड़ी चतुर तथा समस्त कलाओंमें कुशल थीं। उनकी संख्या पचाससे अधिक थी। उन सबने शुकदेवजीके लिये पाद्य, अर्घ्य आदि प्रस्तुत किये तथा देश और कालके अनुसार प्राप्त हुआ उत्तम अन्न भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया। नारदजी! जब वे भोजन कर चुके तो उनमेंसे एक-एक युवतीने शुकदेवजीको अपने साथ लेकर उन्हें वह अन्तःपुरका वन दिखलाया। फिर मनके भावोंको समझनेवाली वे सब युवतियाँ हँसती, गाती हुई उदारचित्तवाले शुकदेव मुनिकी परिचर्या करने लगीं। शुकदेवमुनिका अन्तःकरण परम शुद्ध था। वे क्रोध और इन्द्रियोंको जीत चुके थे तथा निरन्तर ध्यानमें ही स्थित रहते थे। उनके मनमें न हर्ष होता था, न क्रोध। संध्याका समय होनेपर शुकदेवजीने हाथ-पैर धोकर संध्योपासना की। फिर वे पवित्र आसनपर बैठे और उसी मोक्ष-धर्मके विषयमें विचार करने लगे। रातके पहले पहरमें वे ध्यान लगाये बैठे रहे। दूसरे और तीसरे पहरमें भगवान् शुकने न्यायपूर्वक निद्राको स्वीकार किया। फिर प्रातःकाल ब्रह्मवेलामें ही उठकर उन्होंने शौच-स्नान किया। तदनन्तर स्त्रियोंसे घिरे होनेपर भी परम बुद्धिमान् शुक पुनः ध्यानमें ही लग गये। नारदजी! इसी विधिसे उन्होंने वह शेष दिन और सम्पूर्ण रात्रि राजकुलमें व्यतीत की।
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राजा जनक पुरोहित तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंको आगे करके मस्तकपर अर्घ्यपात्र लिये गुरुपुत्र शुकदेवजीके समीप गये। उन्होंने सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एक महान् सिंहासन लेकर गुरुपुत्र शुकदेवजीको अर्पित किया। व्यासनन्दन शुक जब उस आसनपर विराजमान हुए, तब राजाने पहले उन्हें पाद्य अर्पण किया, उसके बाद अर्घ्यसहित गाय निवेदन की। महातेजस्वी द्विजोत्तम शुकने मन्त्रोच्चारणपूर्वक की हुई उस पूजाको स्वीकार करके राजाका कुशल-मङ्गल पूछा। राजाका हृदय और परिजन सभी उदार थे। वे भी गुरुपुत्रसे कुशल-समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले भूमिपर बैठे। तत्पश्चात् व्यासनन्दन शुकसे कुशल-मङ्गल पूछकर विधिज्ञ राजाने
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ४०९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०९
प्रश्न किया—'ब्रह्मन्! किसलिये आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?'
शुकदेवजी बोले—राजन्! आपका कल्याण हो! पिताजीने मुझसे कहा है कि 'मेरे यजमान विदेहराज जनक मोक्ष-धर्मके तत्त्वको जाननेमें कुशल हैं। तुम उन्हींके पास जाओ। तुम्हारे हृदयमें प्रवृत्ति या निवृत्तिके विषयमें जो भी संदेह होगा, उसका वे शीघ्र ही निवारण कर देंगे। इसमें संशय नहीं है।' अतः मैं पिताजीकी आज्ञासे आपके समीप अपना हार्दिक संशय मिटानेके लिये यहाँ आया हूँ। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। मुझे यथावत् उपदेश देनेकी कृपा करें। ब्राह्मणका इस जगत्में क्या कर्तव्य है? तथा मोक्षका स्वरूप कैसा है? उसे ज्ञान या तपस्या किस साधनसे प्राप्त करना चाहिये?
राजा जनकने कहा—ब्रह्मन्! इस जगत्में जन्मसे लेकर जीवनपर्यन्त ब्राह्मणका जो कर्तव्य है, वह बतलाता हूँ, सुनो—तात! उपनयन-संस्कारके पश्चात् ब्राह्मण-बालकको वेदोंके स्वाध्यायमें लग जाना चाहिये। वह तपस्या, गुरुसेवा और ब्रह्मचर्य-पालनमें संलग्न रहे। होम तथा श्राद्ध-तर्पणद्वारा देवताओं और पितरोंके ऋणसे मुक्त हो। किसीकी निन्दा न करे। सम्पूर्ण वेदोंका नियमपूर्वक अध्ययन पूरा करके गुरुको दक्षिणा दे, फिर उनकी आज्ञा लेकर द्विजबालक अपने घरको लौटे। समावर्तन-संस्कारके पश्चात् गुरुकुलसे लौटा हुआ ब्राह्मणकुमार विवाह करके अपनी ही पत्नीमें अनुराग रखते हुए गृहस्थ-आश्रममें निवास करे। किसीके दोष न देखे। न्यायपूर्वक बर्ताव करे। अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक अग्निहोत्र करे। पुत्र और पौत्रोंकी उत्पत्ति हो जानेपर वानप्रस्थ-आश्रममें रहे और पहलेकी स्थापित अग्निका ही विधिपूर्वक आहुतिद्वारा पूजन करे। वानप्रस्थीको भी अतिथि-सेवामें प्रेम रखना चाहिये। तदनन्तर धर्मज्ञ पुरुष वनमें न्यायपूर्वक सम्पूर्ण अग्नियोंको (भावनाद्वारा) अपने भीतर ही लीन करके वीतराग हो ब्रह्मचिन्तनपरायण संन्यास-आश्रममें निवास करे और शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहन करे।
शुकदेवजीने पूछा—राजन्! यदि किसीको ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही सनातन ज्ञान-विज्ञानकी प्राप्ति हो जाय और हृदयके राग-द्वेष आदि द्वन्द्व दूर हो गये हों तो भी उसके लिये क्या शेष तीन आश्रमोंमें निवास करना अत्यन्त आवश्यक है? इस संदेहके विषयमें मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप बतानेकी कृपा करें।
राजा जनकने कहा—ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी उपलब्धि भी नहीं होती। गुरु इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौकाके समान बताया गया है। लोककी धार्मिक मर्यादाका उच्छेद न हो और कर्मानुष्ठानकी परम्पराका भी नाश न होने पावे, इसके लिये पहलेके विद्वान् चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन करते थे। इस प्रकार क्रमशः अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए शुभाशुभ कर्मोंकी आसक्तिका त्याग हो जानेपर यहीं मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अनेक जन्मोंसे सत्कर्म करते-करते जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पवित्र हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष प्रथम आश्रममें ही उत्तम मोक्षरूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है। उसे पाकर जब ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही तत्त्वका साक्षात्कार एवं मुक्ति सुलभ हो जाय तब परमात्माको चाहनेवाले जीवन्मुक्त विद्वान्के लिये शेष तीनों आश्रमोंमें जानेकी क्या आवश्यकता है। विद्वान्को चाहिये कि वह राजस और तामस दोषोंका परित्याग कर दे और सात्त्विक मार्गका आश्रय लेकर बुद्धिके
४१० * संक्षिप्त नारदपुराण *
द्वारा आत्माका दर्शन करे। जो सम्पूर्ण भूतोंको अपनेमें और अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखता है, वह संसारमें रहकर भी उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता और अक्षय पदको प्राप्त कर लेता है। तात! इस विषयमें राजा ययातिकी कही हुई गाथा सुनो—
जिसे मोक्ष-शास्त्रमें निपुण विद्वान् द्विज सदा धारण किये हुए हैं, अपने भीतर ही उस आत्मज्योतिका प्रकाश है, अन्यत्र नहीं। वह ज्योति सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर समान रूपसे स्थित है। समाधिमें अपने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करनेवाला पुरुष उसको स्वयं देख सकता है। जिससे दूसरा कोई प्राणी नहीं डरता, जो स्वयं किसी दूसरे प्राणीसे भयभीत नहीं होता तथा जो इच्छा और द्वेषसे रहित हो गया है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीकी बुराई नहीं करता, उस समय वह ब्रह्मरूप हो जाता है। जब मोहमें डालनेवाली ईर्ष्या, काम और लोभका त्याग करके पुरुष अपने-आपको तपमें लगा देता है, उस समय उसे ब्रह्मानन्दका अनुभव होता है। जब सुनने और देखने योग्य विषयोंमें तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके ऊपर मनुष्यका समानभाव हो जाय और सुख-दुःख आदि द्वन्द्व उसके चित्तपर प्रभाव न डाल सकें, तब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जिस समय निन्दा-स्तुति, लोहा-सोना, सुख-दुःख, सर्दी-गरमी, अर्थ-अनर्थ, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरणमें समान दृष्टि हो जाती है, उस समय मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासीको मनके द्वारा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखना चाहिये*। जिस प्रकार अन्धकारसे व्याप्त हुआ घर दीपकके प्रकाशसे स्पष्ट दीख पड़ता है, उसी तरह बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे आत्माका दर्शन हो सकता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी! उपर्युक्त सारी बातें मुझे आपमें दिखायी देती हैं। इनके अतिरिक्त जो कुछ भी जानने योग्य विषय है, उसे आप ठीक-ठीक जानते हैं। ब्रह्मर्षे! मैं आपको अच्छी तरह जानता हूँ। आप अपने पिताजीकी कृपा और शिक्षाके कारण विषयोंसे परे हो गये हैं। उन्हीं महामुनि गुरुदेवकी कृपासे मुझे भी यह दिव्य विज्ञान प्राप्त हुआ है, जिससे मैं आपकी स्थितिको पहचानता हूँ। आपका विज्ञान, आपकी गति और आपका ऐश्वर्य—ये सब अधिक हैं। किंतु आपको इस बातका पता नहीं है। ब्रह्मन्! आपको ज्ञान हो चुका है और आपकी बुद्धि भी स्थिर है; साथ ही आपमें लोलुपता भी नहीं है; परंतु विशुद्ध निश्चयके बिना किसीको भी परब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती। आप सुख-दुःखमें कोई अन्तर नहीं समझते! आपके मनमें तनिक भी लोभ नहीं है। आपको न नाच देखनेकी
* न बिभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः। यश्च नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते स तु॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम। कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
संयोज्य तपसाऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहिनीम्। त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्मत्वमश्नुते॥
यदा श्रव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाव्ययम्। समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेन चपश्यति। काञ्चनं चायसं चैव सुखदुःखे तथैव च॥
शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम्। जीवितं मरणं चैव ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
प्रसार्यह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः। तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥
(ना० पूर्व० ५९। २९—३५)
| * पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ४११ |
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उत्कण्ठा होती है, न गीत सुननेकी। आपका कहीं भी राग है ही नहीं। न तो बन्धुओंके प्रति आपकी आसक्ति है, न भयदायक पदार्थोंसे भय। महाभाग! मैं देखता हूँ—आपकी दृष्टिमें अपनी निन्दा और स्तुति एक-सी है। मैं तथा दूसरे मनीषी विद्वान् भी आपको अक्षय एवं अनामय पथ (मोक्षमार्ग)—पर स्थित मानते हैं। विप्रवर! इस लोकमें ब्राह्मण होनेका जो फल है और मोक्षका जो स्वरूप है, उसीमें आपकी स्थिति है।
सनन्दनजी कहते हैं—नारद! राजा जनककी यह बात सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी एक दृढ़ निश्चयपर पहुँच गये और बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करके उसीमें स्थित होकर कृतार्थ हो गये। उस समय उन्हें परम आनन्द और परम शान्तिका अनुभव हुआ। इसके बाद वे | हिमालय पर्वतको लक्ष्य करके चुपचाप उत्तर दिशाकी ओर चल दिये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता व्यासजीको देखा, जो पैल आदि शिष्योंको वैदिकसंहिता पढ़ा रहे थे। शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेव अपनी दिव्य प्रभासे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर बड़े आदरसे पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर उदार-बुद्धि शुकने राजा जनकके साथ जो मोक्षसाधन-विषयक संवाद हुआ था, वह सब अपने पिताको बताया। उसे सुनकर वेदोंका विस्तार करनेवाले व्यासजीने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे पुत्रको छातीसे लगा लिया और अपने पास बिठाया। तत्पश्चात् पैल आदि ब्राह्मण व्यासजीसे वेदोंका अध्ययन करके उस शैलशिखरसे पृथ्वीपर आये और यज्ञ कराने तथा वेद पढ़ानेके कार्यमें संलग्न हो गये।
व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए 'प्रवह' आदि सात वायुओंका परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको ज्ञानोपदेश
सनन्दनजी कहते हैं—नारदजी! जब पैल आदि ब्राह्मण पर्वतसे नीचे उतर आये, तब पुत्रसहित परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास एकान्तमें मौनभावसे ध्यान लगाकर बैठ गये। उस समय आकाशवाणीने पुत्रसहित व्यासजीको सम्बोधित करके कहा—'वसिष्ठ-कुलमें उत्पन्न महर्षि व्यास! इस समय वेद-ध्वनि क्यों नहीं हो रही है? तुम अकेले कुछ चिन्तन करते हुए-से चुपचाप ध्यान लगाये क्यों बैठे हो? इस समय वेदोच्चारणकी ध्वनिसे रहित होकर यह पर्वत सुशोभित नहीं हो रहा है। अतः भगवन्! अपने वेदज्ञ पुत्रके साथ परम प्रसन्नचित्त हो सदा वेदोंका स्वाध्याय करो।' आकाशवाणीद्वारा उच्चारित यह वचन सुनकर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवजीके साथ | वेदोंकी आवृत्ति आरम्भ कर दी। द्विजश्रेष्ठ! वे दोनों पिता-पुत्र दीर्घकालतक वेदोंका पारायण करते रहे। इसी बीचमें एक दिन समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकी आँधी उठी। इसे अनध्यायका हेतु समझकर व्यासजीने पुत्रको वेदोंके स्वाध्यायसे रोक दिया। तब उन्होंने पितासे पूछा—'भगवन्! यह इतने जोरकी हवा क्यों उठी थी? वायुदेवकी यह सारी चेष्टा आप बतानेकी कृपा करें।'<br><br>शुकदेवजीकी यह बात सुनकर व्यासजी अनध्यायके निमित्तस्वरूप वायुके विषयमें इस प्रकार बोले—'बेटा! तुम्हें दिव्यदृष्टि उत्पन्न हुई है, तुम्हारा मन स्वतः निर्मल है। तुम तमोगुण तथा रजोगुणसे दूर एवं सत्यमें प्रतिष्ठित हुए हो,
४१२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
अतः अपने हृदयमें वेदोंका विचार करके स्वयं ही बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणरूप वायुके विषयमें आलोचना करो।
पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो वायु चलती है, उसके सात मार्ग हैं। जो धूम तथा गरमीसे उत्पन्न बादल-समूहों और ओलोंको इधर-से-उधर ले जाता है, वह प्रथम मार्गमें प्रवाहित होनेवाला 'प्रवह' नामक प्रथम वायु है। जो आकाशमें रसकी मात्राओं और बिजली आदिकी उत्पत्तिके लिये प्रकट होता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न द्वितीय वायु 'आवह' नामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी आवाजके साथ बहता है। जो सदा सोम-सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है, मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे उदान कहते हैं, जो चारों समुद्रोंसे जल ग्रहण करता है और उसे ऊपर उठाकर 'जीमूतों' को देता है तथा जीमूतोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें 'पर्जन्य' के हवाले करता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है। जिससे प्रेरित होकर अनेक प्रकारकेनीले महामेघ घटा बाँधकर जल बरसाना आरम्भ करते हैं तथा जो देवताओंके आकाशमार्गसे जानेवाले विमानोंको स्वयं ही वहन करता है, वह पर्वतोंका मान मर्दन करनेवाला चतुर्थ वायु 'संवह' नामसे प्रसिद्ध है। जो रूक्षभावसे वेगपूर्वक बहकर वृक्षोंको तोड़ता और उखाड़ फेंकता है तथा जिसके द्वारा संगठित हुए प्रलयकालीन मेघ 'बलाहक' संज्ञा धारण करते हैं, जिसका संचरण भयानक उत्पात लानेवाला है तथा जो अपने साथ मेघोंकी घटाएँ लिये चलता है, वह अत्यन्त वेगवान् पञ्चम वायु 'विवह' कहा गया है। जिसके आधारपर आकाशमें दिव्य जल प्रवाहित होते हैं, जो आकाशगङ्गाके पवित्र जलको धारण करके स्थित है और जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणोंके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव एक ही किरणसे युक्त प्रतीत होते हैं, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है तथा अमृतकी दिव्यनिधि चन्द्रमाका भी जिससे पोषण होता है, उस छठे वायुका नाम 'परिवह' है, वह सम्पूर्ण विजयशील तत्त्वोंमें श्रेष्ठ है। जो अन्तकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वैवस्वत यम अनुगमन मात्र करते हैं, सदा अध्यात्मचिन्तनमें लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभाँति विचार या अनुसंधान : करनेवाले ध्यानाभ्यासपरायण पुरुषोंको जो अमृतत्व देनेमें समर्थ है, जिसमें स्थित होकर प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र बड़े वेगसे सम्पूर्ण दिशाओंके अन्तमें पहुँच गये तथा जिससे वृष्टिका जल तिरोहित होकर वर्षा बंद हो जाती है, वह सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायु 'परावह' नामसे प्रसिद्ध है। उसका अतिक्रमण करना सबके लिये कठिन है। इस प्रकार ये सात मरुद्गण दितिके परम अद्भुत पुत्र हैं। इनकी सर्वत्र गति है। ये सब जगह विचरते रहते हैं; किंतु बड़े आश्चर्यकी बात है कि उस वायुके वेगसे आज यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४१३
हिमालय भी सहसा काँप उठा है। बेटा! यह वायु भगवान् विष्णुका निःश्वास है। जब कभी सहसा वह निःश्वास वेगसे निकल पड़ता है, उस समय सारा जगत् व्यथित हो उठता है। इसलिये ब्रह्मवेत्ता पुरुष प्रचण्ड वायु (आँधी) चलनेपर वेदका पाठ नहीं करते हैं। वेद भी भगवान्का निःश्वास ही है। उस समय वेद-पाठ करनेपर वायुसे वायुको क्षोभ प्राप्त होता है।
अनध्यायके विषयमें यह बात कहकर पराशरनन्दन भगवान् व्यास अपने पुत्र शुकदेवसे बोले—'अब तुम वेद-पाठ करो।' यों कहकर वे आकाशगङ्गाके तटपर गये। जब व्यासजी स्नान करने चले गये, तब ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी वेदोंका स्वाध्याय करने लगे। वे वेद और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् थे। नारदजी! व्यासपुत्र शुकदेवजी जब स्वाध्यायमें लगे हुए थे, उसी समय वहाँ भगवान् सनत्कुमार एकान्तमें उनके पास आये¹। व्यासनन्दन शुकने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारजीका उठकर स्वागत-सत्कार किया। विप्रेन्द्र! तत्पश्चात् ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमारजीने शुकदेवजीसे कहा—'महाभाग! महातेजस्वी व्यासपुत्र! क्या कर रहे हो?'
शुकदेवजी बोले—ब्रह्मकुमार! इस समय मैं वेदोंके स्वाध्यायमें लगा हूँ। मेरे किसी अज्ञात पुण्यके फलसे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अतः महाभाग! मैं आपसे किसी ऐसे तत्त्वके विषयमें पूछना चाहता हूँ जो मोक्षरूपी पुरुषार्थका साधक हो। अतः आप कृपापूर्वक बतावें, जिससे मुझे भी उसका ज्ञान हो।
सनत्कुमारजीने कहा—ब्रह्मन्! विद्याके समान कोई नेत्र नहीं है, सत्यके तुल्य कोई तपस्या नहीं है, रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके सदृश कोई सुख नहीं है। पाप-कर्मसे दूर रहना, सदा पुण्यका सञ्चय करते रहना, साधु पुरुषोंके बर्तावको अपनाना और उत्तम सदाचारका पालन करना—यह सर्वोत्तम श्रेयका साधन है। जहाँ सुखका नाम भी नहीं है, ऐसे मानव-शरीरको पाकर जो विषयोंमें आसक्त होता है, वह मोहमें डूब जाता है। विषयोंका संयोग दुःखरूप है, वह कभी दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकता। आसक्त मनुष्यकी बुद्धि चञ्चल हो जाती है और मोहजालका विस्तार करनेवाली होती है। जो उस मोहजालसे घिर जाता है, वह इस लोक और परलोकमें भी दुःखका ही भागी होता है। जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सभी उपायोंसे काम और क्रोधको काबूमें करना चाहिये, क्योंकि वे दोनों दोष मनुष्यके श्रेयका विनाश करनेके लिये उद्यत रहते हैं। मनुष्यको चाहिये कि तपको क्रोधसे, सम्पत्तिको डाहसे, विद्याको मान-अपमानसे और अपनेको प्रमादसे बचावे। क्रूरस्वभावका परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। क्षमा सबसे महान् बल है। आत्मज्ञान सर्वोत्तम ज्ञान है और सत्य ही सबसे बढ़कर हितका साधन है²। सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ है, किंतु हितकारक बात कहना सत्यसे भी बढ़कर है। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, उसीको मैं सत्य मानता हूँ। जो नये-नये कर्म आरम्भ करनेका संकल्प छोड़ चुका है, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो
१. यहाँ सनत्कुमारजीने शुकदेवजीसे मिलकर उनको जो उपदेश दिया है, वह या तो जनकके उपदेश देनेके पूर्वका प्रसंग समझना चाहिये अथवा ऐसा समझना चाहिये कि यह उपदेश सनत्कुमारजीने संसारके हितके लिये शुकदेवजीको निमित्त बनाकर दिया है।
२. नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात्। विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं हि परमं हितम् ॥
(ना० पूर्व० ६० । ४८-४९)
४१४
- संक्षिप्त नारदपुराण *
किसी वस्तुका संग्रह नहीं करता तथा जिसने सब कुछ त्याग दिया है, वही विद्वान् है और वही पण्डित है। जो अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा अनासक्त भावसे विषयोंका अनुभव करता है, जिसके अन्तःकरणमें सदा शान्ति विराजती है, जो निर्विकार एवं एकाग्रचित्त है तथा जो आत्मीय कहलानेवाले शरीर और इन्द्रियोंके साथ रहकर भी उनसे एकाकार न होकर विलग-सा ही रहता है, वह सब बन्धनोंसे छूटकर शीघ्र ही परम कल्याण प्राप्त कर लेता है। मुने ! जिसकी किसी भी प्राणीकी ओर दृष्टि नहीं जाती, जो किसीका स्पर्श तथा किसीसे बातचीत नहीं करता, उसे महान् श्रेयकी प्राप्ति होती है। किसी भी जीवकी हिंसा न करे। सब प्राणियोंके साथ मित्रतापूर्ण बर्ताव करे। इस जन्म (अथवा शरीर)-को लेकर किसीके साथ वैरभाव न करे। जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता तथा मनको वशमें रखनेवाला है, उसे चाहिये कि किसी भी वस्तुका संग्रह न करे। मनमें पूर्ण संतोष रखे। कामना तथा चपलताको त्याग दे। इससे परम कल्याणकी सिद्धि होती है। जिन्होंने भोगोंका परित्याग कर दिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते, इसलिये प्रत्येक मनुष्यको भोगासक्तिका त्याग करना चाहिये। जो किसीसे भी पराजित न होनेवाले परमात्माको जीतना चाहता हो, उसे तपस्वी, जितेन्द्रिय, मननशील, संयतचित्त तथा सम्पूर्ण विषयोंमें अनासक्त होना चाहिये। जो ब्राह्मण त्रिगुणात्मक विषयोंमें आसक्त न होकर सदा एकान्तवास करता है, वह बहुत शीघ्र सर्वोत्तम सुख (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। मुने ! जो मैथुनमें सुख समझनेवाले प्राणियोंके बीचमें रहकर भी (स्त्रियोंसे रहित) अकेले रहनेमें ही आनन्द मानता है, उसे ज्ञानानन्दसे तृप्त समझना चाहिये। जो ज्ञानानन्दसे पूर्णतः तृप्त है, वह शोकमें नहीं पड़ता। जीव सदा कर्मोंके अधीन रहता है, वह शुभ कर्मोंसे देवता होता है, शुभ और अशुभ दोनोंके आचरणसे मनुष्ययोनिमें जन्म पाता है तथा केवल अशुभ कर्मोंसे पशु-पक्षी आदि नीच योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। उन-उन योनियोंमें जीवको सदा जरा-मृत्यु तथा नाना प्रकारके दुःखोंका शिकार होना पड़ता है। इस प्रकार संसारमें जन्म लेनेवाला प्रत्येक प्राणी संतापकी आगमें पकाया जाता है।
यहाँ विभिन्न वस्तुओंके संग्रह-परिग्रहकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संग्रहसे महान् दोष प्रकट होता है। रेशमका कीड़ा अपने संग्रहके कारण ही बन्धनमें पड़ता है। स्त्री, पुत्र आदि कुटुम्बमें आसक्त रहनेवाले जीव उसी प्रकार कष्ट पाते हैं, जैसे जंगलके बूढ़े हाथी तालाबके दलदलमें फँसकर दुःख भोगते हैं। जैसे महान् जालमें फँसकर पानीके बाहर आये हुए मत्स्य तड़पते हैं, उसी प्रकार स्नेह-जालमें फँसकर अत्यन्त कष्ट उठाते हुए इन प्राणियोंकी ओर दृष्टिपात करो। कुटुम्ब, पुत्र, स्त्री, शरीर और द्रव्यका संग्रह, यह सब कुछ पराया है, सब अनित्य है। यहाँ अपना क्या है ? केवल पुण्य और पाप। अर्थ (परमात्मा)-की प्राप्तिके लिये विद्या, कर्म, पवित्रता और अत्यन्त विस्तृत ज्ञानका सहारा लिया जाता है। जब अर्थकी सिद्धि (परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है तो मनुष्य मुक्त हो जाता है। गाँवमें रहनेवाले मनुष्यकी विषयोंके प्रति जो आसक्ति होती है, वह उसे बाँधनेवाली रस्सीके समान है। पुण्यात्मा पुरुष उस रस्सीको काटकर आगे परमार्थके पथपर बढ़ जाते हैं; परंतु पापी जीव उसे नहीं काट पाते। यह संसार एक नदीके समान है। रूप इसका किनारा, मन स्रोत, स्पर्श द्वीप और रस ही प्रवाह है। गन्ध इस नदीका कीचड़, शब्द जल और स्वर्गरूपी दुर्गम घाट है। इस नदीको मनुष्य-
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४१५
| शरीररूपी नौकाकी सहायतासे पार किया जा सकता है। क्षमा इसको खेनेवाले डाँड और धर्म इसको स्थिर करनेवाला लंगर है। विषयासक्तिके त्यागरूपी शीघ्रगामी वायुद्वारा ही इस नदीको पार किया जा सकता है। इसलिये तुम कर्मोंसे निवृत्त, | सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वविजयी, सिद्ध तथा भाव, अभावसे रहित हो जाओ। बहुत-से ज्ञानी पुरुष संयम और तपस्याके बलसे नवीन बन्धनोंका उच्छेद करके नित्य सुख देनेवाली अवाधसिद्धि (मुक्ति)-को प्राप्त हो चुके हैं। |
शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश
| सनत्कुमारजी कहते हैं—शुकदेव! शास्त्र शोकको दूर करनेवाला है। वह शान्तिकारक तथा कल्याणमय है। अपने शोकका नाश करनेके लिये शास्त्रका श्रवण करनेसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है। उनके मिलनेपर मनुष्य सुखी एवं अभ्युदयशील होता है। शोकके हजारों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही अपना प्रभाव डालते हैं। विद्वान् पुरुषपर उनका जोर नहीं चलता*। अल्प बुद्धिवाले मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगसे मन-ही-मन दुःखी होते हैं। जो वस्तु भूतकालके गर्भमें छिप गयी (नष्ट हो गयी), उसके गुणोंका स्मरण नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो आदरपूर्वक उसके गुणोंका चिन्तन करता है, वह उसकी आसक्तिके बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता। जहाँ चित्तकी आसक्ति बढ़ने लगे, वहीं दोषदृष्टि करनी चाहिये और उसे अनिष्टको बढ़ानेवाला समझना चाहिये। ऐसा करनेपर उससे शीघ्र ही वैराग्य हो जाता है। जो बीती बातके लिये शोक करता है, उसे धर्म, अर्थ और यशकी प्राप्ति नहीं होती। वह उसके अभावका दुःखमात्र उठाता है। उससे अभाव दूर नहीं होता। सभी प्राणियोंको उत्तम पदार्थोंसे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं। किसी एकपर ही यह शोकका अवसर नहीं आता। जो | मनुष्य भूतकालमें मरे हुए किसी व्यक्ति अथवा नष्ट हुई किसी वस्तुके लिये निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। इस प्रकार उसे दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं। यदि कोई शारीरिक और मानसिक दुःख उपस्थित हो जाय तथा उसे दूर करनेमें कोई उपाय काम न दे सके, तो उसके लिये चिन्ता न करनी चाहिये। दुःख दूर करनेकी सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका बार-बार चिन्तन न किया जाय। चिन्तन करनेसे वह घटता नहीं, बल्कि और बढ़ता ही जाता है। इसलिये मानसिक दुःखको बुद्धिके विचारसे और शारीरिक कष्टको औषध-सेवनद्वारा नष्ट करना चाहिये। शास्त्रज्ञानके प्रभावसे ही ऐसा होना सम्भव है। दुःख पड़नेपर बालकोंकी तरह रोना उचित नहीं है। रूप, यौवन, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका सहवास—ये सब अनित्य हैं। विद्वान् पुरुषको इनमें आसक्त नहीं होना चाहिये। आये हुए संकटके लिये शोक करना उचित नहीं है। यदि उस संकटको टालनेका कोई उपाय दिखलायी दे तो शोक छोड़कर उसे ही करना चाहिये। इसमें संदेह नहीं कि जीवनमें सुखकी अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है तथापि जरा और मृत्युके दुःख महान् हैं, अतः उनसे अपने प्रिय आत्माका |
१. शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥
(ना० पूर्व० ६१।२)
४१६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
उद्धार करे। शारीरिक और मानसिक रोग सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले वीर पुरुषके छोड़े हुए तीखी धारवाले बाणोंकी तरह शरीरको पीड़ित करते हैं। तृष्णासे व्यथित, दुःखी एवं विवश होकर जीनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यका नाशवान् शरीर क्षण-क्षणमें विनाशको प्राप्त हो रहा है। जैसे नदियोंका प्रवाह आगेकी ओर ही बढ़ता जाता है, पीछेकी ओर नहीं लौटता, उसी प्रकार रात और दिन भी मनुष्योंकी आयुका अपहरण करते हुए एक-एक करके बीतते चले जा रहे हैं। यदि जीवके किये हुए कर्मोंका फल पराधीन न होता तो वह जो चाहता, उसकी वही कामना पूरी हो जाती। बड़े-बड़े संयमी, चतुर और बुद्धिमान् मनुष्य भी अपने कर्मोंके फलसे वञ्चित होते देखे जाते हैं तथा गुणहीन, मूर्ख और नीच पुरुष भी किसीके आशीर्वाद बिना ही समस्त कामनाओंसे सम्पन्न दिखायी देते हैं। कोई-कोई मनुष्य तो सदा प्राणियोंकी हिंसामें ही लगा रहता है और संसारको धोखा दिया करता है, किंतु कहीं-कहीं ऐसा पुरुष भी सुखी देखा जाता है। कितने ही ऐसे हैं, जो कोई काम न करके चुपचाप बैठे रहते हैं, फिर भी उनके पास लक्ष्मी अपने-आप पहुँच जाती है और कुछ लोग बहुत-से कार्य करते हैं, फिर भी मनचाही वस्तु नहीं पाते। इसमें पुरुषका प्रारब्ध ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पैदा होता है और अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता है। कभी तो वह योनिमें पहुँचकर गर्भ धारण करानेमें समर्थ होता है और कभी नहीं होता। कितने ही लोग पुत्र-पौत्रकी इच्छा रखकर उसकी सिद्धिके लिये यत्न करते रहते हैं, तो भी उनके संतान नहीं होती और कितने ही मनुष्य संतानको क्रोधमें भरा हुआ साँप समझकर सदा उससे डरते रहते हैं तो भी उनके यहाँ दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो जाता है, मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोकसे आकर प्रकट हो गया हो। कितने ही गर्भ ऐसे हैं,जो पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले दीन स्त्री-पुरुषोंद्वारा देवताओंकी पूजा और तपस्या करके प्राप्त किये जाते हैं और दस महीनेतक माताके उदरमें धारण किये जानेके बाद जन्म लेनेपर कुलाङ्गार निकल जाते हैं। उन्हीं माङ्गलिक कृत्योंसे प्राप्त हुए बहुत-से ऐसे पुत्र हैं, जो जन्म लेनेके साथ ही पिताके संचित किये हुए अपार धन-धान्य और विपुल भोगोंके अधिकारी होते हैं। (इन सबमें प्रारब्ध ही प्रधान है।)
जो सुख और दुःख दोनोंकी चिन्ता छोड़ देता है, वह अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है और परमानन्दका अनुभव करता है। धनके उपार्जनमें बड़ा कष्ट होता है, उसकी रक्षामें भी सुख नहीं है तथा उसके खर्च करनेमें भी क्लेश ही होता है, अतः धनको प्रत्येक दशामें दुःखदायक समझकर उसके नष्ट होनेपर चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मनुष्य धनका संग्रह करते-करते पहलेकी अपेक्षा ऊँची स्थितिको प्राप्त करके भी कभी तृप्त नहीं होते, वे और अधिक धन कमानेकी आशा लिये हुए ही मर जाते हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट रहते हैं (वे धनकी तृष्णामें नहीं पड़ते)। संग्रहका अन्त है विनाश, सांसारिक ऐश्वर्यकी उन्नतिका अन्त है उस ऐश्वर्यकी अवनति। संयोगका अन्त है वियोग और जीवनका अन्त है मरण। तृष्णाका कभी अन्त नहीं होता। संतोष ही परम सुख है। अतः पण्डितजन इस लोकमें संतोषको ही उत्तम धन कहते हैं। आयु निरन्तर बीती जा रही है। वह पलभर भी विश्राम नहीं लेती। अब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसारकी दूसरी किस वस्तुको नित्य समझा जाय। जो मनुष्य सब प्राणियोंके भीतर मनसे परे परमात्माकी स्थिति जानकर उन्हींका चिन्तन करते हैं, वे
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संसारयात्रा समाप्त होनेपर परमपदका साक्षात्कार करते हुए शोकके पार हो जाते हैं।
जैसे वनमें नयी-नयी घासकी खोजमें विचरते हुए अतृप्त पशुको सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है, उसी प्रकार भोगोंकी खोजमें लगे हुए अतृप्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है। इसलिये इस दुःखसे छुटकारा पानेका उपाय अवश्य सोचना चाहिये। जो शोक छोड़कर साधन आरम्भ करता है और किसी व्यसनमें आसक्त नहीं होता, उसकी मुक्ति हो जाती है। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और उत्तम गन्ध आदि विषयोंमें किञ्चित् सुखका अनुभव होता है। उपभोगके पश्चात् उनमें कुछ नहीं रहता। प्राणियोंको एक-दूसरेसे संयोग होनेके पहले कोई दुःख नहीं होता। जब संयोगके बाद प्रियका वियोग होता है तभी सबको दुःख हुआ करता है; अतः विवेकी पुरुषको अपने स्वरूपमें स्थित होकर कभी भी शोक नहीं करना चाहिये। धैर्यके द्वारा शिश्न और उदरकी, नेत्रद्वारा हाथ और पैरकी, मनके द्वारा आँख और कानकी तथा सद्विद्याके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करनी चाहिये। पूजनीय तथा अन्य मनुष्योंमें आसक्ति हटाकर शान्तभावसे विचरण करता है, वही सुखी और वही विद्वान् है। जो अध्यात्म-विद्यामें अनुरक्त, निष्काम तथा भोगासक्तिसे दूर है और सदा अकेला ही विचरता रहता है, वह सुखी होता है। जब मनुष्य सुखको दुःख और दुःखको सुख समझने लगता है, उस अवस्थामें बुद्धि, सुनीति और पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाते। अतः मनुष्यको ज्ञानप्राप्तिके लिये स्वभावतः यत्न करना चाहिये; क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष कभी दुःखमें नहीं पड़ता।
सनन्दनजी कहते हैं—व्यासपुत्र शुकदेवसे ऐसा कहकर उनकी अनुमति ले महामुनि सनत्कुमारजी उनसे सादर पूजित हो वहाँसे चले गये। योगियोंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी भी अपनी स्वरूपस्थितिको भलीभाँति जानकर ब्रह्मपदका अनुसंधान करनेके लिये उत्सुक हो पिताके पास गये। पितासे मिलकर महामुनि शुकने उन्हें प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वे कैलासपर्वतको चले गये।
श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, श्वेतद्वीप तथा वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान्की आज्ञासे शुकदेवजीका व्यासजीके पास आकर भागवतशास्त्र पढ़ना
सनन्दनजीने कहा—देवर्षे! कैलास-पर्वतपर जाकर सूर्यके उदय होनेपर विद्वान् शुकदेव हाथ-पैरोंको यथोचित रीतिसे रखकर विनीतभावसे पूर्वकी ओर मुँह करके बैठे और योगमें लग गये। उस समय उन्होंने सब प्रकारके सङ्गोंसे रहित परमात्माका दर्शन किया। यों उस परमात्माका साक्षात्कार करके शुकदेवजी खूब खुलकर हँसे। फिर वे वायुके समान आकाशमें विचरने लगे। उस समय उनका तेज उदयकालीन अरुणके समान प्रकाशित हो रहा था। वे मन और वायुके समान आगे बढ़ रहे थे। उस समय सबने अपनी शक्ति तथा रीति-नीतिके अनुसार उनका पूजन किया। देवताओंने उनपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की। उन्हें इस प्रकार ऊपर उठते देख गन्धर्व, अप्सरा, महर्षि तथा सिद्धगण सब आश्चर्यसे चकित हो उठे। तत्पश्चात् वे नित्य, निर्गुण एवं लिङ्गरहित ब्रह्मपदमें स्थित हो गये। उस समय उनका तेज धूमरहित अग्निकी भाँति उद्दीप्त हो रहा था। आगे बढ़नेपर शुकदेवजीने पर्वतके दो अनुपम शिखर देखे, जिनमें एक तो हिमालयके
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समान श्वेत तथा दूसरा मेरुके समान पीतवर्ण था। एक रजतमय था और दूसरा सुवर्णमय। दोनों एक-दूसरेसे सटे हुए और सुन्दर थे। नारद! इनका विस्तार ऊपरकी ओर तथा अगल-बगलमें सौ-सौ योजनका था। शुकदेवजी दोनों शिखरोंके बीचसे सहसा आगे निकल गये। वह श्रेष्ठ पर्वत उनकी गतिको रोक न सका। उस समय शुकदेवजी वायुलोकसे ऊपर अन्तरिक्षमें यात्रा करते हुए अपना प्रभाव दिखाकर सर्वस्वरूप हो सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करने लगे। परम योगवेत्ता शुकदेवजी श्वेतद्वीपमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने पहले भगवान् श्रीनारायणदेवका प्रभाव देखा। तत्पश्चात् जिन्हें वेदकी ऋचाएँ भी ढूँढ़ती फिरती हैं, उन देवाधिदेव जनार्दनका साक्षात् दर्शन किया। दर्शनके अनन्तर शुकदेवजीने भगवान्की स्तुति की। नारद! उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् बोले।
श्रीभगवान्ने कहा— योगीन्द्र! मैं सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अदृश्य होकर रहता हूँ, फिर भी तुमने मेरा दर्शन कर लिया है। ब्रह्मचारी शुक! तुम सनत्कुमारजीके बताये हुए योगके द्वारा सिद्ध हो चुके हो। अतः वायुके मार्गमें स्थित होकर इच्छानुसार सम्पूर्ण लोकोंको देखो।
विप्रवर! भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर शुकदेवमुनि उन्हें प्रणाम करके अखिलविश्ववन्दित विष्णुधामको गये। नारद! वैकुण्ठलोक विमानपर विचरनेवाले देवताओंसे सेवित है। उसे विरजा नामवाली दिव्य नदीने चारों ओरसे घेर रखा है। उस दिव्य धामके प्रकाशित होनेसे ही ये सम्पूर्ण लोक प्रकाशित हो रहे हैं। वहाँ सुन्दर-सुन्दर बावड़ियाँ बनी हैं, जो कमलोंसे आच्छादित रहती हैं। उनके घाट मूँगेके बने हुए हैं, जिनमें सुवर्ण और रत्न जड़े हुए हैं। वे सब बावड़ियाँ निर्मल जलसे भरी रहती हैं। वहाँके द्वारपाल चार भुजाधारी होते हैं। नाना प्रकारके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे सभी विष्वक्सेनजीके अनुयायी एवं सिद्ध हैं। उनकी कुमुद आदि नामोंसे प्रसिद्धि है। शुकदेवजीको उनमेंसे किसीने नहीं रोका। वे बिना बाधा भीतर प्रवेश कर गये। वहाँ उन्होंने सिद्ध-समुदायके द्वारा निरन्तर सेवित देवाधिदेव भगवान् विष्णुका दर्शन किया। उनके चार भुजाएँ थीं। वे शान्त एवं प्रसन्नमुख दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा था। शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म मूर्तिमान् होकर भगवान्की सेवामें उपस्थित थे। उनके वक्षःस्थलमें भगवती लक्ष्मी विराज रही थीं और कौस्तुभमणिसे वे प्रकाशित हो रहे थे। उनके कटिभागमें करधनी, बायें कंधेपर यज्ञोपवीत, हाथोंमें कड़े तथा भुजाओंमें अङ्गद सुशोभित थे। माथेपर मण्डलाकार किरीट और चरणोंमें नूपुर शोभा दे रहे थे। भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके शुकदेवने भक्तिभावसे उनकी स्तुति की।
शुकदेवजी बोले— सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र साक्षी आप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्के बीजस्वरूप, सर्वत्र परिपूर्ण एवं
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
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निश्चल आत्मरूप आपको नमस्कार है। वासुकि नागकी शय्यापर शयन करनेवाले श्वेतद्वीपनिवासी श्रीहरिको नमस्कार है। आप हंस, मत्स्य, वाराह तथा नरसिंहरूप धारण करनेवाले हैं। ध्रुवके आराध्यदेव भी आप ही हैं। आप सांख्य और योग दोनोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। चारों सनकादि आपके ही अवतार हैं। आपने ही कच्छप और पृथुरूप धारण किया है। आत्मानन्द ही आपका स्वरूप है। आप ही नाभिपुत्र ऋषभदेवजीके रूपमें प्रकट हुए हैं। जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले आप ही हैं। आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन परशुराम, रघुनन्दन श्रीराम, परात्पर श्रीकृष्ण, वेदव्यास, बुद्ध तथा कल्कि भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। कृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंके रूपमें आप ही विराज रहे हैं। जानने और चिन्तन करने योग्य परमात्मा भी आप ही हैं। नर-नारायण, शिपिविष्ट तथा विष्णु नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। सत्य ही आपका धाम है। आप धामरहित हैं। गरुड़ आपके ही स्वरूप हैं। आप स्वयंप्रकाश, ऋभु (देवता), उत्तम व्रतका पालन करनेके लिये विख्यात, उत्कृष्ट धामवाले और अजित हैं। आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपका स्वरूप है। आप ही विश्वरूपमें प्रकट हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी आप ही हैं। यज्ञ और उसके भोक्ता, स्थूल और सूक्ष्म तथा याचना करनेवाले वामनरूप आपको नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। साहस, ओज और बल आपसे भिन्न नहीं हैं। आप यज्ञोंद्वारा यजन करने योग्य, साक्षी, अजन्मा तथा अनेक हाथ, पैर और मस्तकवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीके स्वामी, उनके निवासस्थान तथा भक्तोंके अधीन रहनेवाले हैं। आप शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करते हैं। आठ¹ प्रकृतियोंके अधिपति, ब्रह्मा तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न आप परमेश्वरको नमस्कार है। बृहदारण्यक उपनिषद्के द्वारा आपके तत्त्वका बोध होता है। आप इन्द्रियोंके प्रेरक तथा जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हैं। आपके नेत्र विकसित कमलके समान हैं। क्षेत्रज्ञके रूपमें आप ही प्रकाशित हो रहे हैं। आपको नमस्कार है। गोविन्द, जगत्कर्ता, जगन्नाथ, योगी, सत्य, सत्यप्रतिज्ञ, वैकुण्ठ और अच्युतरूप आपको नमस्कार है। अधोक्षज, धर्म, वामन, त्रिधातु, तेजःपुञ्ज धारण करनेवाले, विष्णु, अनन्त एवं कपिलरूप आपको नमस्कार है। आप ही विरिञ्चि नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माजी हैं। तीन शिखरोंवाला त्रिकूट पर्वत आपका ही स्वरूप है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आपके अभिन्न विग्रह हैं। एक सींगवाले शृङ्गी ऋषि भी आपकी ही विभूति हैं। आपका यश परम पवित्र है तथा सम्पूर्ण वेद-शास्त्र आपसे ही प्रकट हुए हैं। आपको नमस्कार है। आप वृषाकपि (धर्मको अविचल रूपसे स्थापित करनेवाले विष्णु, शिव और इन्द्र) हैं। सम्पूर्ण समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा प्रभु सर्वशक्तिमान् हैं। यह सम्पूर्ण विश्व आपकी ही रचना है। भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक आपके ही स्वरूप हैं। आप दैत्योंका नाश करनेवाले तथा निर्गुण रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप निरञ्जन, नित्य, अव्यय और अक्षररूप हैं। शरणागतवत्सल ईश्वर ! आपको नमस्कार है। आप मेरी रक्षा कीजिये²।
इस प्रकार स्तुति करनेपर प्रणतजनोंपर दया करनेवाले शङ्ख, चक्र और गदाधारी भगवान् विष्णु शुकदेवजीसे इस प्रकार बोले।
श्रीभगवान्ने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग व्यासपुत्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें विद्या और भक्ति दोनों प्राप्त हों।
१. गीताके अनुसार आठ प्रकृतियोंके नाम इस प्रकार हैं—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार।
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तुम ज्ञानी और साक्षात् मेरे स्वरूप हो। ब्रह्मन्! तुमने पहले श्वेतद्वीपमें जो मेरा स्वरूप देखा है, वह मैं ही हूँ। सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये मैं वहाँ स्थित हूँ। मेरा वही स्वरूप भिन्न-भिन्न अवतार धारण करनेके लिये जाता है। महाभाग ! मोक्षधर्मका निरन्तर चिन्तन करनेसे तुम सिद्ध हो गये हो। जैसे वायु तथा सूर्य आकाशमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी समस्त श्रेष्ठ लोकोंमें भ्रमण कर सकते हो। तुम नित्य मुक्तस्वरूप हो। मैं ही सबको शरण देनेवाला हूँ। संसारमें मेरे प्रति भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। उस भक्तिको प्राप्त कर लेनेपर और कुछ पाना शेष नहीं रहता। (वह तुमको प्राप्त हो गयी) बदरिकाश्रममें नर-नारायण ऋषि कल्पान्त कालतकके लिये तपस्यामें स्थित हैं। उनकी आज्ञासे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता व्यास भागवत-शास्त्रका सम्पादन करेंगे। अतः तुम पृथ्वीपर जाओ और उस शास्त्रका अध्ययन करो। इस समय वे गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करते हैं। | नारदजी ! भगवान्के ऐसा कहनेपर शुकदेवजीने उन चार भुजाधारी श्रीहरिको नमस्कार किया और वे पिताके समीप लौट गये। तदनन्तर शुकदेवको अपने निकट देख परम प्रतापी पराशरनन्दन भगवान् व्यासका मन प्रसन्न हो गया। वे पुत्रको पाकर तपस्यासे निवृत्त हो गये। फिर भगवान् नारायण और नरश्रेष्ठ नरको नमस्कार करके शुकदेवजीके साथ अपने आश्रमपर आये। मुनीश्वर नारद ! तुम्हारे मुखसे भगवान् नारायणका आदेश पाकर उन्होंने अनेक प्रकारके शुभ उपाख्यानोंसे युक्त दिव्य भागवतसंहिता बनायी, जो वेदके तुल्य माननीय तथा भगवद्भक्तिको बढ़ानेवाली है। व्यासजीने वह संहिता अपने निवृत्तिपरायण पुत्र शुकदेवको पढ़ायी। व्यासनन्दन भगवान् शुक यद्यपि आत्माराम हैं तथापि उन्होंने भक्तोंको सदा प्रिय लगनेवाली उस संहिताका बड़े उत्साहसे अध्ययन किया। अनघ ! इस प्रकार ये मोक्षधर्म बतलाये गये, जो पाठकों और श्रोताओंके हृदयमें भगवान्की भक्ति बढ़ानेवाले हैं।
१. शान्तं प्रसन्नवदनं पीतकौशेयवाससम् । शङ्खचक्रगदापद्मूर्तिमद्भिरुपासितम् ॥
वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या कौस्तुभेन विराजितम् । कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकटकाङ्गदभूषितम् ॥
भ्राजत्किरीटवलयं मणिनूपुरशोभितम् । ददर्श सिद्धनिकरैः सेव्यमानमहर्निशम् ॥
तं दृष्ट्वा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम् । नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे ॥
जगद्बीजस्वरूपाय पूर्णाय निभृतात्मने । हरये वासुकिस्थाय श्वेतद्वीपनिवासिने ॥
हंसाय मत्स्यरूपाय वाराहतनुधारिणे । नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययोगेश्वराय च ॥
चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने । नाभेयाय जगद्धात्रे विधात्रेऽन्तकराय च ॥
भार्गवेन्द्राय रामाय राघवाय पराय च । कृष्णाय वेदकर्त्रे च बुद्धकल्किस्वरूपिणे ॥
चतुर्व्यूहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने । नरनारायणाख्याय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥
ऋतधाम्ने विधाम्ने च सुपर्णाय स्वरोचिषे । ऋभवे सुव्रताख्याय सुधाम्ने चाजिताय च ॥
विश्वरूपाय विश्वाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे । यज्ञाय यज्ञभोक्त्रे च स्थविष्ठायाणवेऽर्थिने ॥
आदित्यसोमनेत्राय सहओजोबलाय च । ईज्याय साक्षिणेऽजाय बहुशीर्षाङ्घ्रिबाहवे ॥
श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तवश्याय शार्ङ्गिणे । अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥
बृहदारण्यवेद्याय हृषीकेशाय वेधसे । पुण्डरीकनिभाक्षाय क्षेत्रज्ञाय विभासिने ॥
गोविन्दाय जगत्कर्त्रे जगन्नाथाय योगिने । स्त्याय सत्यसंधाय वैकुण्ठायाच्युताय च ॥
अधोक्षजाय धर्माय वामनाय त्रिधातवे । धृतार्चिषे विष्णवे तेऽनन्ताय कपिलाय च ॥
विरिञ्चये त्रिककुदे ऋग्यजुःसामरूपिणे । एकशृङ्गाय च शुचिश्रवसे शास्त्रयोनये ॥
वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे । भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय दैत्यघ्ने निर्गुणाय च ॥
निरञ्जनाय नित्याय ह्यव्ययायाक्षराय च । नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल ॥
(ना० पूर्व० ६२ । ४७-६५)
तृतीय पाद
शैवदर्शन* के अनुसार पति, पशु एवं पाश आदिका वर्णन तथा दीक्षाकी महत्ता
| शौनकजी बोले—साधु सूतजी! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विज्ञ पण्डित हैं। विद्वन्! आपने हमलोगोंको श्रीकृष्णकथारूपी अमृतका पान कराया है। भगवान्के प्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने सनन्दनके मुखसे मोक्षधर्मोंका वर्णन सुनकर पुनः क्या पूछा? ब्रह्माजीके मानस-पुत्र सनकादि मुनीश्वर उत्तम सिद्धपुरुष हैं। वे लोगोंके उद्धारमें तत्पर होकर सम्पूर्ण जगत्में विचरते रहते हैं। महाभाग! श्रीनारदजी भी सदा श्रीकृष्णके भजनमें संलग्न रहते हैं और उन्हींके शरणागत भक्त हैं। उन सनकादि और नारदका समागम होनेपर सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली कौन-सी कल्याणमयी कथा हुई, यह बतानेकी कृपा करें?<br>सूतजीने कहा—भृगुश्रेष्ठ! सनन्दनजीके द्वारा प्रतिपादित सनातन मोक्षधर्मोंका वर्णन सुनकर | नारदजीने पुनः उन मुनियोंसे पूछा।<br>नारदजी बोले—मुनीश्वरो! किन मन्त्रोंसे भगवान् विष्णुकी आराधना की जानी चाहिये। श्रीविष्णुके चरणारविन्दोंकी शरण लेनेवाले भक्तजनोंको किन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। विप्रवरो! भागवततन्त्रका तथा गुरु और शिष्यके सम्बन्धको स्थापित करके उन्हें अपने-अपने कर्तव्यके पालनकी प्रेरणा देनेवाली दीक्षाका वर्णन कीजिये। तथा साधकोंद्वारा पालन करने योग्य प्रातःकाल आदिके जो-जो कृत्य हों, उन सबको भी हमें बताइये। जिन महीनोंमें जप, होम आदि जिन-जिन कर्मोंके अनुष्ठानसे परमात्मा श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उनका आपलोग मुझसे वर्णन करें।<br>सूतजी कहते हैं—महात्मा नारदका यह वचन सुनकर सनत्कुमारजी बोले। |
* शैव-महातन्त्र' के 'शैवागम', 'शैवदर्शन' तथा 'पाशुपत-दर्शन' आदि अनेक नाम हैं। इस अध्यायमें इसीके निगूढ़ तत्त्वोंका विशद विवेचन किया गया है। यहाँ भूमिकारूपसे उक्त दर्शनकी कुछ मोटी-मोटी बातें प्रस्तुत की जाती हैं, जिनसे पाशुपतसिद्धान्त और इस अध्यायमें वर्णित विषयको हृदयङ्गम करनेमें सुविधा होगी। शैवागमके अनुसार तीन पदार्थ (पशु, पाश तथा पशुपति) और चार पाद या साधन (विद्या, क्रिया, योग तथा चर्या) है। जैसा कि तन्त्र-तत्त्वज्ञोंका कथन है—'त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातन्त्रम् .....'
गुरुसे नियमपूर्वक मन्त्रोपदेश लेनेको दीक्षा कहते हैं। यह दीक्षा मन्त्र, मन्त्रेश्वर और विद्येश्वर आदि पशुओंके ज्ञानके बिना नहीं हो सकती। इसी ज्ञानसे पशु, पाश तथा पशुपतिका ठीक-ठीक निर्णय होता है; अतः परमपुरुषार्थकी हेतुभूता दीक्षामें उपकारक उक्त ज्ञानका प्रतिपादन करनेवाले प्रथम पादका नाम 'विद्या' है। भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारकी दीक्षा होती है। अतः अनेक प्रकारकी साङ्गोपाङ्ग दीक्षाओंके विधि-विधानका परिचय करानेवाले द्वितीय पादको 'क्रिया' पाद कहा गया है। परंतु यम, नियम, आसन आदि अष्टाङ्गयोगके बिना अभीष्टप्राप्ति नहीं हो सकती, अतः 'क्रिया' पादके पश्चात् 'योग' नामक तीसरे पादकी आवश्यकता समझकर उसका प्रतिपादन किया गया है। योगकी सिद्धि भी तभी होती है, जब शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान और निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग हो, अतः इन सब कर्मोंके प्रतिपादक 'चर्या' नामक चतुर्थ पादका वर्णन है।
पति या पशुपति
करने, न करने और अन्यथा करनेमें समर्थ, नित्य, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वथा स्वतन्त्र, परम सर्वज्ञ, परम ऐश्वर्यस्वरूप, नित्यमुक्त, नित्य-निर्मल, निरतिशय ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न तथा सबपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् महेश्वर परम शिव ही 'पति' या 'पशुपति' हैं। महेश्वरके पाँच कृत्य हैं—सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह। यद्यपि विद्येश्वर इत्यादि मुक्त जीव भी शिवभावको प्राप्त हो जाते हैं, किंतु ये सब स्वतन्त्र नहीं होते, अपितु परमेश्वरके अधीन रहते हैं। उपासनाके लिये जहाँ परमेश्वर शिवके साकार रूपका वर्णन
४२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
सनत्कुमारजी कहते हैं—नारद ! सुनो, मैं तुमसे भागवततन्त्रका वर्णन करूँगा। जिसे जानकर साधक निर्मल भक्तिके द्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। (अब पहले शैवतन्त्रका वर्णन करते हैं।) शैव-महातन्त्रमें तीन पदार्थ और चार पादोंका वर्णन है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। भोग, मोक्ष, क्रिया और चर्या—ये शैवमहातन्त्रमें चार पाद (साधन) कहे गये हैं। पदार्थ तीन ही हैं—पशुपति, पशु तथा पाश; इनमें एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा ही 'पशुपति' हैं और जीवोंको 'पशु' कहा गया है। नारद! देखो, जबतक स्वरूपके अज्ञानको सूचित करनेवाले मोह आदिसे सम्बन्ध बना रहता है, तबतक इन सब जीवोंकी 'पशु' संज्ञा मानी गयी है। उनका पशुत्व द्वैतभावसे युक्त है। इन पशुओंके जो पाश अर्थात् बन्धन हैं, वे पाँच प्रकारके माने गये हैं। उनमेंसे प्रत्येकका लक्षण बताया जायगा। पशुके तीन भेद हैं—'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल' और 'सकल'। इनमें प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल पशु' 'मल' संयुक्त (मलरूप पाशसे आबद्ध) होता है। दूसरा 'प्रलयाकल पशु' 'मल' और 'कर्म'—इन दो पाशोंसे संयुक्त (बद्ध) होता है। तीसरा अर्थात् 'सकल पशु' 'मल', 'माया' तथा 'कर्म'—इन तीन पाशोंसे बँधा हुआ कहा गया है। उक्त त्रिविध पशुओंमें जो पहला— विज्ञानाकल है, उसके दो भेद होते हैं—'समाप्त-कलुष' और 'असमाप्तकलुष'। दूसरे—प्रलयाकल पशुके लिये भी दो भेद कहे गये हैं—'पक्व-मल' और 'अपक्व-मल' (अर्थात् पक्वपाशद्वय और अपक्व पाशद्वय)। विज्ञानाकल और प्रलयाकल ये दोनों जीव (पशु) शुद्ध मार्गपर स्थित होते हैं और सकल जीव कला आदि तत्त्वोंके अधीन होकर विभिन्न लोकोंमें कर्मानुसार प्राप्त हुए तिर्यक्-मनुष्यादि शरीरोंमें भ्रमण करता है। पाश पाँच प्रकारके बताये गये हैं—'मलज', 'कर्मज', 'मायेय' (मायाजन्य), 'तिरोधानशक्तिज' और 'विन्दुज'। जैसे भूसी चावलको ढके रहती है, उसी प्रकार एक भी 'मल' पुरुषकी अनेक शक्ति—दृक्-शक्ति (ज्ञान) और क्रियाशक्तिका
है, वहाँ भी उनका शरीर प्राकृत नहीं है। वह निर्मल तथा कर्मादि बन्धनोंसे नित्यमुक्त होनेके कारण शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) है। उपनिषदोंमें महेश्वरके मन्त्रमय स्वरूपका वर्णन है। शैवदर्शनमें यह बात स्पष्ट शब्दोंमें कही गयी है—'मलाद्यसम्भवाच्छाक्तं वपुर्नैतादृशं प्रभोः।' 'तद्वपुः पञ्चभिर्मन्त्रैः।' इत्यादि।
पशु
जीवात्मा या क्षेत्रज्ञका ही नाम 'पशु' है। पशु उसे कहते हैं जो पाशोंद्वारा बँधा हो—'पाशनाच्च पशवः।' जीव भी पाशबद्ध है, इसीसे उसे 'पशु' कहते हैं। वह वस्तुतः अणु नहीं, व्यापक है। नित्य है। 'आत्मनो विभुनित्यता' यह शैवतन्त्रकी स्पष्ट घोषणा है; परंतु पशु (जीव) दशामें यह परिच्छिन्न और सीमित शक्तिसे युक्त है, तथापि यह 'सांख्य' के पुरुषकी भाँति अकर्ता भी नहीं है; क्योंकि पाशोंसे मुक्त होकर शिवत्वको प्राप्त हो जानेपर यह भी निरतिशय ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। पशु तीन प्रकारका है—'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल' तथा 'सकल'। (१) जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्मोंका क्षय कर डालता है और कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण जिसको शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता, उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं—आणव-मल, कर्मज-मल तथा मायेय-मल। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान)-द्वारा अकल—कलारहित (कलादि भोग-बन्धनोंसे शून्य) हो जाता है, इसलिये उसकी 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है। (२) जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय-मल तो नहीं रहता, परंतु आणव और कर्मज—ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकालमें ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है। (३) जिस जीवात्मामें आणव, मायेय और कर्मज—तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग-बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण 'सकल' कहा गया है।