संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२२० * संक्षिप्त नारदपुराण *
सप्तर्षिगण तुम्हें कल्याण प्रदान करें।'
(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे—)
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि।
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद् घ्नन्तु सर्वदा॥
'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, वह सब सदाके लिये जल शान्त कर दे।'
(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर उसपर गूलरकी स्रुवासे सरसोंका तेल उठाकर डाले, उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—) 'ॐ मिताय स्वाहा। ॐ संमिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा। ॐ कटंकटाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा।' मस्तकपर होमके पश्चात् लौकिक अग्निमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे। फिर होमशेष चरुद्वारा बलिमन्त्रोंको पढ़कर इन्द्रादि दिक्पालोंको बलि भी अर्पित करे। तत्पश्चात् कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान् विनायकको अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली माता पार्वतीको भी उपहार भेंट करे। फिर पृथ्वीपर मस्तक रखकर 'तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे गणेशजीको और 'सुभागायै विद्महे। काममालिन्यै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर गणेशजननी अम्बिकाका उपस्थान करे। उपस्थानसे पूर्व फूल और जलसे अर्घ्य देकर दूर्वा, सरसों और पुष्पसे पूर्ण अञ्जलि अर्पण करे। (उपस्थानका मन्त्र इस प्रकार है—)
रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे॥
'भगवति! मुझे रूप दो, यश दो, कल्याण प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करो।'
पार्वतीजीका उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध, माल्य, अनुलेप और नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति श्रीभगवान् शङ्करकी पूजा करे। तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दन और मालासे अलंकृत हो ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गुरुको भी दक्षिणासहित दो वस्त्र अर्पित करे।
इस प्रकार विनायककी पूजा करके लक्ष्मी, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुषको ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु—इन नवों ग्रहोंकी क्रमशः स्थापना करनी चाहिये। सूर्यकी प्रतिमा ताँबेसे, चन्द्रमाकी रजत (या स्फटिक)—से, मङ्गलकी लाल चन्दनसे, बुधकी सुवर्णसे, गुरुकी सुवर्णसे, शुक्रकी रजतसे, शनिकी लोहेसे तथा राहु—केतुकी सीसेसे बनाये, इससे शुभकी प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्रपर उनके-उनके रंगके अनुसार वर्णकसे उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन-कुंकुम आदि)—से ग्रहोंकी आकृति बना ले। ग्रहोंके रंगके अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सबके लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रहके लिये (अग्निस्थापनपूर्वक) समन्त्रक चरुका होम करना चाहिये। 'आ कृष्णेन रजसा०' इत्यादि सूर्य देवताके, 'इमं देवाः०' इत्यादि चन्द्रमाके, 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' इत्यादि मङ्गलके, 'उद्बुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्र बुधके, 'बृहस्पते अति यदर्यः०' इत्यादि मन्त्र बृहस्पतिके,
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२१
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२१
'अन्नात् परिस्रुतो०' इत्यादि मन्त्र शुक्रके, 'शन्नो देवी०' इत्यादि मन्त्र शनैश्चरके, 'काण्डाट् काण्डाट्०' इत्यादि मन्त्र राहुके और 'केतुं कृण्वन्नकेतवे०' इत्यादि मन्त्र केतुके हैं। आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा—ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहोंकी समिधा हैं। सूर्यादि ग्रहोंमेंसे प्रत्येकके लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीरकी आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठीके चावलका भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्रित भात, माष (उड़द) मिलाया हुआ भात और खिचड़ी—इनको ग्रहके क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मणके लिये भोजन दे। अपनी शक्तिके अनुसार यथाप्राप्त वस्तुओंसे ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा—ये वस्तुएँ दक्षिणामें दे। ये ग्रहोंकी दक्षिणाएँ बतायी गयी हैं। जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम आदि दुष्ट स्थानोंमें स्थित हो, वह पुरुष उस ग्रहकी उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजीने इन ग्रहोंको वर दिया है कि 'जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओंके धन और जातिका उत्कर्ष तथा जगत्की जन्म-मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है; अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय हैं। जो सदा सूर्यदेवकी पूजा एवं स्कन्दस्वामीको तथा महागणपतिको तिलक करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कर्ममें सफलता एवं उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो मातृयाग किये बिना ग्रहपूजन करता है, उसपर मातृकाएँ कुपित होती हैं और उसके प्रत्येक कार्यमें विघ्न डालती हैं। शुभकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको 'वसोः पवित्रम्०' इस मन्त्रसे वसुधारा समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्ममें गौरी आदि मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उनके नाम ये हैं—गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि और तुष्टि। इनके साथ अपनी कुलदेवी और गणेशजी अधिक हैं। वृद्धिके अवसरोंपर इन सोलह मातृकाओंकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। इन सबकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय), स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती तथा दक्षिणा—ये उपचार समर्पित करने चाहिये।
अब मैं पितृकल्पका वर्णन करूँगा, जो धन और संततिकी वृद्धि करनेवाला है। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि (विवाहादिका अवसर), कृष्णपक्ष, दोनों अयनोंके आरम्भका दिन, श्राद्धीय द्रव्यकी उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्यकी संक्रान्ति, व्यतीपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्धके लिये रुचिका होना—ये सभी श्राद्धके समय अथवा अवसर कहे गये हैं। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञानमें अग्रगण्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मवेत्ता, युवक, मन्त्र और ब्राह्मणरूप वेदका तत्त्वज्ञ, ज्येष्ठ सामका गान करनेवाला, त्रिमधु¹, त्रिसुपर्ण², भानजा, ऋत्विक्, जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत³, दौहित्र,
१. 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप और तदनुकूल व्रतका आचरण करनेवाला। २. त्रिसौपर्णी ऋचाओंका अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रतका पालन करनेवाला। ३. त्रिणाचिकेत-संज्ञक त्रिविध अग्निविद्याको जाननेवाला और तदनुकूल व्रतका पालक।
२२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पञ्चाग्निसेवी*, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। रोगी, न्यूनाङ्ग, अधिकाङ्ग, काना, पुनर्भूकी संतान, अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहते हुए ब्रह्मचर्य भंग करनेवाला), कुण्ड (पतिके जीते-जी पर-पुरुषसे उत्पन्न की हुई संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद जारज संतान), खराब नखवाला, काले दाँतवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, नपुंसक, कन्याको कलङ्कित करनेवाला, स्वयं जिसपर दोषारोपण किया गया हो वह, मित्र-द्रोही, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाला, माता, पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, कुण्ड और गोलकका अन्न खानेवाला, शूद्रसे उत्पन्न, एक पतिको छोड़कर आयी हुई स्त्रीका पति, चोर और कर्मभ्रष्ट—ये ब्राह्मण श्राद्धमें निन्दित हैं (अतः इनका त्याग करना चाहिये)।
श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिये। श्राद्धके दिन अपराह्नकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशकी पवित्री धारण किये रहे। जब ब्राह्मणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्तिके अनुसार युग्म (दो, चार, छः आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन, पाँच, आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे-पुते पवित्र स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाकी ओर भूमि कुछ नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये। वैश्वदेव-श्राद्धमें दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके श्राद्धमें भी ऐसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो वैश्वदेव-श्राद्धमें और तीन मातामहादि श्राद्धमें अथवा उभयपक्षमें एक-ही-एक ब्राह्मण रखे।
वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे—‘मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें—‘आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर ‘विश्वेदेवास आगत०' इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल छोड़े, ‘यवोऽसि०' इत्यादिसे जौ डाले, फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् ‘या दिव्या आपः०' इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे—‘अमुकश्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्तार्घ्यं नमः।' यों कहकर वह अर्घ्यजल कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुशापर गिरा दे। तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर क्रमशः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन वस्त्र अर्पण करे; पुनः हस्तशुद्धिके लिये जल दे। (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी दे, सव्यभावसे उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये)।
वैश्वदेवकाण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य
*सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत—इन पाँच अग्नियोंका उपासक।
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २२३ ---|---
करके पिता आदि तीनके लिये तीन द्विगुण-भुग्न कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर 'उशन्तस्त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके 'आयन्तु नः०' इत्यादिका जप करे। 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः०' यह मन्त्र पढ़ कर सब ओर तिल बिखेरे। वैश्वदेव-श्राद्धमें जो कार्य जैसे किया जाता है, वही पितृश्राद्धमें तिलसे करना चाहिये। अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे। संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे चुए हुए जल) पितृपात्रमें ग्रहण करके भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके ढुलका दे और कहे 'पितृभ्यः स्थानमसि।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और पवित्रक आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे।
इसके बाद 'अग्नौ करण' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'अग्नौ करिष्ये' (मैं अग्निमें इसकी आहुति देना चाहता हूँ)। तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर वह पिण्डपितृयज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे (उस समय ये दो मन्त्र क्रमशः पढ़े—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा नमः। सोमाय पितृमते स्वाहा नमः।)। फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोंमें—विशेषतः चाँदीके पात्रोंमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर 'पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानम्०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर 'इदं विष्णु०' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श कराये। तदनन्तर तीनों व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र तथा 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे—'आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें।' फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करें।
उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको त्याग दे और जबतक ब्राह्मणलोग पूर्णतः तृप्त न हो जायँ, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और हविष्य उन्हें परोसता रहे। उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोंका तथा पावमानी आदि ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'क्या आप पूर्ण तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम तृप्त हो गये।' यजमान फिर पूछे—'शेष अन्न क्या किया जाय?' ब्राह्मण कहें—'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनकी इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए अन्नको ब्राह्मणोंके आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर तिल-जल छोड़कर वह अन्न रख दे। उस समय 'ये अग्निदग्धाः०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक-एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर दक्षिणाभिमुख हो पिण्डपितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे, तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे—आपलोग 'अक्षय्यमस्तु' कहें। तब ब्राह्मण 'अक्षय्यम् अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे—'अब मैं स्वधावाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें—'स्वधावाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर पितरों और मातामहादिके लिये 'आप यह स्वधावाचन करें, ऐसा कहे। तब ब्राह्मण बोलें—'अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे और 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्' यों कहे। ब्राह्मण भी इस वाक्यको दुहरायें—'प्रीयन्तां विश्वेदेवाः।' तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे
२२४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
श्राद्धकर्ता निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति ॥
'मेरे दाता बढ़ें। वेद और संतति बढ़े। हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये बहुत धन हो।'
यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रिय वचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे—'वाजे-वाजे०' इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक विसर्जन करे। पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिये। पहले जिस अर्घ्यपात्रमें संस्रवका जल डाला गया था, उस पितृपात्रको उत्तान करके ब्राह्मणोंको विदा करना चाहिये। ग्रामकी सीमातक ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे जाकर उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण—दोनोंको ब्रह्मचारी रहना चाहिये।
इसी प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि वृद्धिके अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख पितरोंका यजन करे। दही और बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे। एकोद्दिष्ट श्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक ही पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और अग्नौकरणकी क्रिया नहीं होती। सब कार्य जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। 'अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपनिष्ठताम्' का प्रयोग करे। 'वाजे-वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय 'अभिरम्यताम्' यों कहे और ये ब्राह्मणलोग 'अभिरताः स्मः' ऐसा उत्तर दें। सपिण्डीकरण श्राद्धमें पूर्वोक्त विधिसे अर्घ्यसिद्धिके लिये गन्ध, जल और तिलसे युक्त चार अर्घ्यपात्र तैयार करे। (इनमेंसे तीन तो पितरोंके पात्र हैं और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रोंमें डाले। उस समय 'ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे। शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरणश्राद्ध वर्ष पूर्ण होनेसे पहले हो जाता है, उसके लिये एक वर्षतक ब्राह्मणको सान्नोदक कुम्भदान देते रहना चाहिये। एक वर्षतक प्रतिमास मृत्युतिथिको एकोद्दिष्ट करना चाहिये; फिर प्रत्येक वर्षमें एक बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित है। प्रथम एकोद्दिष्ट तो मरनेके बाद ग्यारहवें दिन किया जाता है। सभी श्राद्धोंमें पिण्डोंको गाय, बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंको दे देना चाहिये। अथवा उन्हें अग्निमें या अगाध जलमें डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करके वहाँसे उठ न जायँ, तबतक उच्छिष्ट स्थानपर झाडू न लगाये। श्राद्धमें हविष्यान्नके दानसे एक मासतक और खीर देनेसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है वह अक्षय होता है। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे अमावास्यातककी चौदह तिथियोंमें श्राद्ध-दान करनेवाला पुरुष क्रमशः इन चौदह फलोंको पाता है—रूप-शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान् दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत-विजय, खेतीमें लाभ, व्यापारमें लाभ, दो खुर और एक खुरवाले पशु, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक (त्रपु-सीसा आदि), जाति-भाइयोंमें श्रेष्ठता और सम्पूर्ण मनोरथ। जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हों, उन्हींके लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान किया जाता है।
| * पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २२५ |
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स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, पुत्र, श्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रधानता, शुभ, प्रवृत्तचक्रता (अप्रतिहत शासन), वाणिज्य आदि, नीरोगता, यश, शोकहीनता, परम गति, धन, वेद, चिकित्सामें सफलता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि), गौ, बकरी, भेड़, अश्व तथा आयु—इन सत्ताईस प्रकारके काम्य पदार्थोंको क्रमशः वही पाता है जो कृत्तिकासे लेकर भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करता है तथा आस्तिक, श्रद्धालु एवं मद-मात्सर्य आदि दोषोंसे रहित होता है। वसु, रुद्र और आदित्य—ये तीन प्रकारके पितर श्राद्धके देवता हैं। ये श्राद्धसे संतुष्ट किये जानेपर मनुष्योंके पितरोंको तृप्त करते हैं। जब पितर तृप्त होते हैं, तब वे मनुष्योंको आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं। इस प्रकार मैंने कल्पाध्यायका विषय थोड़ेमें बताया है। वेद तथा पुराणान्तरसे विशेष बातें जाननी चाहिये। मुनीश्वर! जो विद्वान् इस कल्पाध्यायका चिन्तन करता है, वह इस लोकमें कर्म-कुशल होता है और परलोकमें शुभ गति पाता है। जो मनुष्य देवकार्य तथा पितृकार्यमें इस कल्पाध्यायका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह यज्ञ और श्राद्धका पूरा फल पाता है। इतना ही नहीं, वह इस लोकमें धन, विद्या, यश और पुत्र पाता है तथा परलोकमें उसे परम गति प्राप्त होती है। अब मैं वेदके मुखस्वरूप व्याकरणका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। एकाग्रचित्त होकर सुनो। (पूर्वभाग, द्वितीय पाद, अध्याय ५१)
व्याकरण-शास्त्रका वर्णन
सनन्दन उवाच
अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद।
सिद्धरूपप्रबन्धेन मुखं वेदस्य साम्प्रतम्॥ १॥
सनन्दनजी कहते हैं—अब मैं शब्दोंके सिद्धरूपोंका उल्लेख करते हुए तुमसे संक्षेपमें व्याकरणका वर्णन करता हूँ; क्योंकि व्याकरण वेदका मुख है॥ १॥
सुप्तिङन्तं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः।
स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका॥ २॥
विप्रवर! सुबन्त¹ और तिङन्त² पदको शब्द कहते हैं (जिसके अन्तमें ‘सुप्’ प्रत्यय हों, वह सुबन्त कहलाता है)। सुप्की सात विभक्तियाँ हैं। उनमेंसे प्रथमा (पहली) विभक्ति सु, औ, जस्—इस प्रकार बतायी गयी है (‘सु’ प्रथमाका एकवचन है, ‘औ’ द्विवचन है और ‘जस्’ बहुवचन है)। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिक (नाम) स्वरूप मानी गयी है॥ २॥
सम्बोधने च लिङ्गादावुक्ते कर्मणि कर्तरि।
अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप्रत्ययवर्जितम्॥ ३॥
सम्बोधनमें³ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता
१. रामः, हरिम्, पितुः, रमायाः, ज्ञानम् इत्यादि। २. तिङ् विभक्ति जिसके अन्तमें हो, उसे तिङन्त कहते हैं। तिङ्के दो विभाग हैं—परस्मैपद और आत्मनेपद। इन दोनोंमें तीन पुरुष होते हैं—प्रथम, मध्यम तथा उत्तम। प्रत्येक पुरुषमें तीन वचन होते हैं—एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। परस्मैपदके प्रथम पुरुषसम्बन्धी प्रत्यय इस प्रकार हैं—‘तिप्, तस्, अन्ति।’ ये क्रमशः एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन हैं। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिये। आत्मनेपदके प्रथम पुरुषमें ‘ते, आते, अन्ते’ ये प्रत्यय होते हैं। इस प्रकार दोनों पदोंके तीनों पुरुषसम्बन्धी प्रत्ययोंका मूलमें ही उल्लेख हुआ है। यहाँ संक्षेपसे दिग्दर्शन कराया गया है। ‘ति’ से लेकर ‘महे’ तकके समस्त प्रत्ययोंका संक्षिप्त नाम ‘तिङ्’ है। ये जिसके अन्तमें हों, वह ‘तिङन्त’ है। उसीकी ‘पद’ संज्ञा होती है। उदाहरण—‘भवति’ (होता है), ‘पपाठ’ (पढ़ा), ‘गमिष्यति’ (जायगा), ‘एधते’ (बढ़ता है) इत्यादि। ३. ‘सम्बोधनमें प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है—‘हे राम’ इत्यादि।
२२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
है; जहाँ प्रतिपदिकके अतिरिक्त लिङ्ग^१, परिमाण^२ और वचन^३ आदिका बोध कराना हो, वहाँ भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। उक्त^४ कर्ममें (जहाँ कर्म वाच्य हो, उसमें) तथा उक्त कर्तामें^५ (जहाँ कर्ता वाच्य हो, उसमें) भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। धातु और प्रत्ययसे रहित सार्थक शब्दकी प्रातिपदिक^६ संज्ञा होती है॥ ३॥
अमौशसो द्वितीया स्यात् तत्कर्म क्रियते च यत्।
द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते ॥ ४॥
अम्, औ, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है (यहाँ भी 'अम्' आदिको क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन समझना चाहिये)। जो किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं। अनुक्त^७ कर्ममें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग कहा गया है (कर्तृवाच्य वाक्योंमें कर्म अनुक्त होता है, वहाँ उसकी प्रधानता नहीं रहती, इसीलिये उसे 'अनुक्त' कहा गया है)। 'अन्तरा', 'अन्तरेण' इन शब्दोंका जिसके साथ संयोग या अन्वय हो, उस शब्दमें द्वितीया विभक्तिका^८ प्रयोग करना चाहिये ॥ ४॥
टाभ्याम्भिसस्तृतीया स्यात् करणे कर्तरिरीता।
येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥ ५॥
'टा', 'भ्याम्', 'भिस्'—यह तृतीया विभक्ति है (यहाँ भी पूर्ववत् एकवचन आदिका विभाग समझना चाहिये)। करणमें^९ और अनुक्त^१० कर्तामें तृतीया विभक्ति बतायी गयी है। जिसकी सहायतासे कार्य किया जाता है, उसका नाम करण है और जो कार्य करता है, उसे कर्ता कहते हैं (जिस वाक्यमें कर्मकी प्रधानता होती है, वहाँ कर्ता अनुक्त माना गया है) ॥ ५॥
ङेभ्याम्भ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके।
यस्मै दित्सां धारयेद्द्वै रोचते सम्प्रदानकम् ॥ ६ ॥
'ङे', 'भ्याम्', 'भ्यस्'—यह चतुर्थी विभक्ति है। इसका प्रयोग सम्प्रदान कारकमें होता है। जिस व्यक्तिको कोई वस्तु देनेकी इच्छा मनमें धारण की जाय, उसकी 'सम्प्रदान^११' संज्ञा होती है तथा जिसको कोई वस्तु रुचिकर प्रतीत होती है, वह भी सम्प्रदान^१२ है (सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है) ॥ ६॥
१. 'तटः', 'तटी', 'तटम्'। २. परिमाणका उदाहरण 'द्रोणो व्रीहिः' (एक दोन धान है) इत्यादि है। ३. 'एकः', 'द्वौ', 'बहवः'। ४. 'हरिः सेव्यते' (श्रीहरि भक्तोंद्वारा सेवित होते हैं), 'लक्ष्म्या सेवितः' (भगवान् विष्णु लक्ष्मीद्वारा सेवित हैं) इत्यादि। ५. 'रामः करोति' (राम करते हैं)। ६. धातुसे रहित इसलिये कहा गया कि 'अहन्' इत्यादि पदोंमें प्रातिपदिक संज्ञा होकर 'न' लोप न हो जाय। प्रत्ययरहित कहनेका कारण यह है कि 'हरिषु', 'करोषि' इत्यादिमें भी 'सु' की प्रातिपदिक संज्ञा न हो जाय। यदि प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक एकवचन लाकर पदसंज्ञा करनेपर उक्त उदाहरणोंमें दन्त्य 'स' के स्थानमें 'मूर्धन्य 'ष' नहीं हो पाता; क्योंकि पदादि 'स' कारके स्थानमें 'ष' कार होनेका निषेध है। प्रत्ययके निषेधसे प्रत्ययान्तका भी निषेध समझना चाहिये। इससे 'हरिषु' इत्यादि समुदायकी प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होगी। सार्थक शब्दकी ही प्रातिपदिक संज्ञा होती है, निरर्थककी नहीं। इसलिये 'धनम्, वनम्' इत्यादिमें प्रत्येक अक्षरकी अलग-अलग 'प्रातिपदिक' संज्ञा नहीं हो सकती।
७. 'हरिं भजति' (श्रीहरिको भजता है)। इत्यादि वाक्योंमें 'हरि' इत्यादि पद अनुक्त है; इसलिये उनमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग होता है। ८. इसका उदाहरण है 'अन्तरा त्वां मां हरिः' (तुम्हारे और मेरे भीतर भी भगवान् हैं)। 'अन्तरेण हरिं न सुखम्' (भगवान्के बिना सुख नहीं है) इत्यादि। ९-१०. 'रामेण बाणेन हतो वाली' (श्रीरामने बाणसे वालीको मारा) इस वाक्यमें राम अनुक्त कर्ता हैं और बाण करण। अतः इन दोनोंमें तृतीया विभक्तिका प्रयोग हुआ है। ११. 'ब्राह्मणाय गां ददाति' (ब्राह्मणको गाय देता है) इस वाक्यमें ब्राह्मण सम्प्रदान है, इसलिये उसमें चतुर्थी हुई है। १२. इसका उदाहरण है—'हरये रोचते भक्तिः' (भगवान्को भक्ति पसंद है)।
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२७
पञ्चमी स्याङ्सिभ्याम्भ्यो ह्यपादाने च कारके।
यतोऽपैति समादत्ते अपादाने च यं यतः ॥ ७॥
'ङसि', 'भ्याम्', 'भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अपादान कारकमें होता है। जहाँसे कोई जाता है, जिससे कोई किसी वस्तुको लेता है तथा जिस स्थानसे कोई वस्तु अलग की जाती या स्वतः अलग होती है, विभाग या अलगावकी उस सीमाको अपादान¹ कारक कहते हैं ॥ ७॥
ङस्सोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसम्बन्धमुख्यके।
ङ्योस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत् ॥ ८॥
'ङस्', 'ओस्', 'आम्'—यह षष्ठी विभक्ति है। जहाँ स्वामी-सेवक आदि सम्बन्धकी² प्रधानता हो, वहाँ (भेदकमें) षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता है। 'ङि', 'ओस्' 'सुप्'—यह सप्तमी विभक्ति है। इसका प्रयोग अधिकरण³ कारकमें होता है ॥ ८॥
आधारे चापि विप्रेन्द्र रक्षार्थानां प्रयोगतः।
ईप्सितं चानीप्सिताद् यत्तदपादानकं स्मृतम् ॥ ९॥
विप्रवर ! आधारमें⁴ भी सप्तमी होती है। भयार्थक⁵ तथा रक्षार्थक⁶ धातुओंका प्रयोग होनेपर भयके कारणकी अपादान संज्ञा होती है। इसी प्रकार वारणार्थक⁷ धातुओंका प्रयोग होनेपर अनीप्सितसे (जो अभीष्ट नहीं है, उससे) रक्षणीय जो अभीष्ट वस्तु है, उसकी अपादान संज्ञा होती है ॥ ९॥
पञ्चमी पर्यपाङ्योगे इतरर्तेंऽन्यदिङ्मुखे।
एतैर्योगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः ॥ १०॥
परि, अप, आङ्, इतर, ऋते, अन्य (आरात्) तथा दिग्वाचक शब्द—इन सबके योगमें भी पञ्चमी⁸ विभक्ति होती है। 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञावाले शब्दोंके साथ योग होनेपर द्वितीया विभक्ति होती है ॥ १०॥
लक्षणेत्थंभूतेऽभिरभागे चानुपर्प्रति।
अन्तरेषु सहार्थे च हीने हापश्च कथ्यते ॥ ११॥
लक्षण⁹, इत्थम्भूताख्यान¹⁰, भाग¹¹ तथा वीप्सा¹²—
१. इसके उदाहरण इस प्रकार हैं—'ग्रामादपैति' (गाँवसे दूर जाता है), 'देवदत्तः यज्ञदत्तात् पुस्तकं समादत्ते' (देवदत्त यज्ञदत्तसे पुस्तक लेता है), 'पात्रात् ओदनं गृह्णाति' (बर्तनसे भात लेता है), 'अश्वात् पतति' (घोड़ेसे गिरता है), 'पर्वतात् नदी निस्सरति' (पर्वतसे नदी निकलती है) इत्यादि।
२. 'गृहस्य स्वामी' (घरके स्वामी), 'राज्ञः सेवकः' (राजाका सेवक), 'दशरथस्य पुत्रः' (दशरथके पुत्र), 'सीतायाः पतिः' (सीताके पति) इत्यादि। ३. 'गृहे वसति' (घरमें रहता है)। ४. आधार तीन प्रकारके हैं—औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक। इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार है)। ५. 'कटे आस्ते' (चटाईपर बैठता है) 'मोक्षे इच्छा अस्ति' (मोक्षविषयक इच्छा है), 'सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति' (सबमें आत्मा है)। 'चौर्याद्विभेति' (चोरीसे डरता है)। ६. 'पापाद् रक्षति' (पापसे बचाता है)। ७. 'यवेभ्यो गां वारयति' (जौसे गायको हटाता है)। ८. 'परि हरेः संसारः' (श्रीहरिसे संसार अलग है), 'अप हरेः सर्वे दोषाः' (सब दोष भगवान्से दूर हैं), 'आ मुक्तेः संसारः' (जबतक मोक्ष न हो, तभीतक संसार है), 'इतरः कृष्णात्' (कृष्णसे भिन्न), 'ऋते भगवतः' (भगवान्के बिना), 'अन्यः श्रीरामात्' (श्रीरामसे भिन्न), 'आरात् वनात्' (वनसे दूर या समीप), 'पूर्वो ग्रामात्' (गाँवसे पूर्व) इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये। ९. उदाहरण—'वृक्षं प्रति परि अनु वा विद्योतते विद्युत् (वृक्षकी ओर बिजली चमकती है)। यहाँ वृक्षके प्रकाशित होनेसे बिजलीकी चमकका ज्ञान होता है, अतः वृक्ष लक्षण है। किसीके मतमें विद्युत्का विद्योतन ही लक्षण है, इसे व्यक्त करनेवाले प्रति, परि अथवा अनु किसीके भी योगमें द्वितीया ही होगी। १०. 'भक्तो विष्णुं प्रति, परि, अनु वा।' (यह श्रीविष्णुका भक्त है)। यहाँ 'इत्थंभूत' का अर्थ है किसी विशेषणको प्राप्त। भक्तस्वरूप विशेषणको प्राप्त पुरुषके कथनमें प्रयुक्त प्रति आदि अव्यय कर्मप्रवचनीय होकर 'विष्णु' शब्दसे युक्त हो उसमें द्वितीया विभक्ति लाते हैं। ११. लक्ष्मीर्हरिं प्रति, परि, अनु वा। इसका अर्थ हुआ लक्ष्मीजी भगवान् श्रीहरिकी वस्तु हैं, उनपर उन्हींका अधिकार है, वे श्रीहरिका भाग हैं। १२. मूलमें 'वीप्सा' का प्रयोग न होनेपर भी 'लक्षणेत्थंभूत०' (पा० सू० १।४।९०)-के आधारपर उसका
२२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
इन सबकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त हुए प्रति, परि, अनु—इन अव्ययोंकी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा होती है। 'भाग' अर्थको छोड़कर शेष जो लक्षण आदि अर्थ हैं, उनकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाला 'अभि१' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होता है। हीन२ अर्थको प्रकाशित करनेवाला 'अनु' तथा 'हीन' और 'अधिक३' अर्थोंको प्रकट करनेके लिये प्रयुक्त 'उप' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होते हैं। अन्तर अर्थात् मध्य४ अर्थ तथा सहार्थ यानी तृतीया५ विभक्तिका अर्थ व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त हुआ 'अनु' शब्द भी 'कर्मप्रवचनीय' है। (इन सबके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है) ॥ ११ ॥
द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि।
अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥ १२ ॥
गत्यर्थक६ धातुओंके कर्ममें द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं, यदि गमनकी चेष्टा प्रकट होती हो। (परंतु मार्ग या उसका वाचक शब्द यदि गत्यर्थक धातुका कर्म हो तो उसमें चतुर्थी नहीं होती, केवल द्वितीया होती है७। यह चतुर्थीका निषेध तभी लागू होता है, जब पथिक मार्गपर चल रहा हो। यदि वह गलत रास्तेसे जाकर अच्छा रास्ता पकड़ना चाहता हो तब चतुर्थीका प्रयोग भी हो ही सकता है८) ज्ञानार्थक 'मन्' धातुका कर्म यदि कोई प्राणिभिन्न वस्तु हो और अनादर अर्थ प्रकट करना हो तो उसमें भी द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ होती हैं९ ॥ १२ ॥
नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योग ईरिता।
चतुर्थी चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥ १३ ॥
नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम्, वषट्— इन सब अव्यय शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्तिके प्रयोगका विधान है१०। तादर्थ्यमें अर्थात् जिस वस्तुके लिये कोई कार्य किया जाता है, उस 'वस्तु'के बोधक शब्दमें चतुर्थी विभक्ति होती है११। 'तुमुन्' के अर्थमें प्रयुक्त अव्ययभिन्न भावार्थक प्रत्ययान्त शब्दमें भी चतुर्थी विभक्तिका ही प्रयोग होना चाहिये१२ ॥ १३ ॥
तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽङ्गे विशेषणे।
काले भावे सप्तमी स्यादेतैर्योगे च षष्ठ्यपि ॥ १४ ॥
स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसूत्कैः।
निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥ १५॥
ग्रहण किया गया है। उसका अर्थ है व्याप्ति। उदाहरण है—'वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति' (एक-एक पेड़को सींचता है), 'परि सिञ्चति, अनु सिञ्चति' का भी प्रयोग हो सकता है। १.उदाहरण—हरिमभि वर्तते। २. 'अनु हरिं सुराः' इसका अर्थ है—दैत्य भगवान्से हीन हैं। ३. 'अधिक' अर्थमें जहाँ 'उप' है, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है। 'हीन' अर्थमें जहाँ 'उप' है, उसके योगमें द्वितीया होती है। यथा—'उप हरिं सुराः'—'देवता भगवान्से हीन हैं। ४.उदाहरण—'हृदयमनु हरिः' भगवान् हृदयके भीतर हैं। ५.उदाहरण—नदीमन्ववसिता सेना। नद्या सह सम्बद्धेत्यर्थः (सेना नदीसे सम्बद्ध है)। ६.उदाहरण—'ग्रामं ग्रामाय वा गच्छति' (गाँवको जाता है)
७. यथा—'पन्थानं गच्छति' (राह चलता है)। ८. यथा—'उत्पथेन पथे गच्छति' (अच्छी राह पकड़नेके लिये बुरे रास्तेसे जाता है)। ९. यथा—'न त्वां तृणं मन्ये, तृणाय वा' (मैं तुझे तृणके बराबर भी नहीं समझता)। वार्तिककारके मतमें यहाँ 'प्राणिभिन्न' को हटाकर 'नौका, अन्न, शुक, शृगाल—इन शब्दोंको छोड़कर' इतना बढ़ा देना चाहिये। इससे 'न त्वाम् अन्नं मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें प्राणिभिन्न होनेपर भी चतुर्थी नहीं होगी और 'न त्वां शुने मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें 'प्राणी' होनेपर भी चतुर्थी हो जायगी। १०. क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं—'हरये नमः। स्वस्ति प्रजाभ्यः। अग्नये स्वाहा। पितृभ्यः स्वधा। अलं मल्लो मल्लाय। वषट् इन्द्राय। ११. यथा—'मुक्तये हरिं भजति (मोक्षके लिये भगवान्का भजन करता है)। १२. यागाय याति—यष्टुं यातीत्यर्थः (यज्ञके लिये जाता है)।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२९
| ‘सह’ तथा उसके पर्यायवाची शब्दोंसे योग होनेपर तृतीया विभक्ति होती है१ (इसी प्रकार सदृशार्थक२ शब्दोंके योगमें भी तृतीया होती है)। यदि कोई विकृत अङ्ग विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ हो तो उसमें भी तृतीया विभक्ति होती है३। जहाँ एक क्रियाके होते समय दूसरी क्रिया लक्षित होती हो, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है४। ‘स्वामी’, ‘ईश्वर’, ‘अधिपति’, ‘साक्षी’, ‘दायाद’, ‘प्रसूत’ (तथा ‘प्रतिभू’)—इन शब्दोंके योगमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं५। जिस समुदायमेंसे किसी एककी जाति-सम्बन्धी, गुण-सम्बन्धी, क्रिया-सम्बन्धी अथवा किसी विशेष नामवाले व्यक्तिसम्बन्धी विशेषताका निश्चय करना हो, उस समुदायबोधक शब्दमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं६। ‘हेतु’ शब्दका प्रयोग करके यदि हेत्वर्थका प्रकाशन किया जाय तो षष्ठी विभक्ति होती है७॥ १४-१५॥ | स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियत्नके।<br>हिंसार्थानां प्रयोगे च कृति कर्मणि कर्तरि ॥ १६ ॥<br>स्मरणार्थक क्रियाओंके कर्ममें शेषषष्ठी होती है८। ‘कृ’ धातुके कर्ममें भी शेषषष्ठीका विधान है। यदि प्रतियत्न (गुणाधान या संस्कार) सूचित होता हो९। ‘हिंसा’ अर्थवाले धातुओंका प्रयोग होनेपर उनके कर्ममें शेषषष्ठी होती है१०। कृदन्त शब्दका योग होनेपर कर्ता और कर्ममें षष्ठी होती है११॥ १६॥<br>न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादने।<br>एता वै द्विविधा ज्ञेयाः सुबादिषु विभक्तिषु।<br>भूवादिषु तिङन्तेषु लकारा दश वै स्मृताः ॥ १७॥<br>यदि निष्ठा आदिका प्रतिपादन करनेवाले प्रत्ययोंसे युक्त शब्दका प्रयोग हो तो कर्ता और कर्ममें षष्ठी नहीं होती१२। ये विभक्तियाँ दो प्रकारकी जाननी चाहिये—सुप् और तिङ्। ऊपर सुबादि विभक्तियोंके विषयमें वर्णन किया गया |
१. यथा—पुत्रेण सहागतः पिता (पुत्रके साथ पिता आया है)। यहाँ ‘सह’ के योगमें तृतीया हुई है। इसी प्रकार ‘साकम्’, ‘सार्धम्’, ‘समम्’—इन शब्दोंके योगमें भी तृतीया जाननी चाहिये। २. ‘सदृश’, ‘तुल्य’, ‘सम’, ‘निभ’, ‘सदृक्ष’, ‘नीकाश’, ‘संकाश’, ‘उपमित’ आदि शब्द सदृशार्थक हैं; इनके योगमें भी तृतीया होती है, यथा—मेघेन सदृशः श्यामो हरिः (भगवान् विष्णु मेघके समान श्याम हैं)। ३. यथा—अक्ष्णा काणः (आँखका काना), कर्णेन बधिरः (कानका बहरा), पादेन खञ्जः (पैरका लँगड़ा) इत्यादि। ४. यथा—गोषु दुह्यमानासु गतः (जब गौएँ दुही जाती थीं, उस समय गया)। ५. गवां गोषु वा स्वामी। मनुष्याणां मनुष्येषु वा ईश्वरः—इत्यादि उदाहरण हैं। ६. यथा—नृणां नृषु वा ब्राह्मणः श्रेष्ठः। गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा। गच्छतां गच्छत्सु वा धावन् शीघ्रः। छात्राणां छात्रेषु वा। मैत्रः पटुः—ये उदाहरण हैं। ७. यथा—अन्नस्य हेतोर्वसति।
८. मातुः स्मरति, मातुः स्मरणम् आदि उदाहरण है। शेषत्वेन विवक्षित होनेपर ही षष्ठी होती है। विवक्षा न होनेपर ‘मातरं स्मरति’ इस प्रकार द्वितीया विभक्ति ही होगी। ९. उदाहरण—एधोदकस्योपस्करणम्—एधोदकस्योपस्कुरुते। १०. महर्षि पाणिनिने यहाँ—‘जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम्’ (२।३।५६) इस सूत्रद्वारा हिंसा-अर्थमें परिगणित धातुओंको ही ग्रहण किया है। उदाहरणके लिये ‘चौरस्योज्जासनम्’ ‘चौरस्य प्रणिहननम्’ निहननम्, प्रहणनं वा। ‘ ‘चौरस्योन्नाटनम्।’ ‘चौरस्य क्राथनम्।’ ‘चौरस्य पेषणं वा।’ इत्यादि प्रयोग हैं। ११. यथा—‘कृष्णस्य कृतिः’ यहाँ ‘कृष्ण’ कर्ता है, उसमें षष्ठी हुई है। ‘जगतः कर्ता कृष्णः’ इसमें ‘जगत्’ कर्म है, यहाँ कर्ममें षष्ठी हुई है। १२. आदि पदसे ‘न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्’ (पा० सू० २।३।६९) इस सूत्रमें निर्दिष्ट स्थलोंको ग्रहण करना चाहिये। निष्ठाका उदाहरण यह है—‘विष्णुना हता दैत्याः’ (विष्णुसे दैत्य मारे गये)। ‘दैत्यान् हत्वान् विष्णुः’ (दैत्योंको विष्णुने मारा)। इसमें कृदन्त शब्दका योग होनेसे विष्णुशब्दमें षष्ठीकी प्राप्ति थी, जो इस निषेधसे बाधित हो गयी।
२३० * संक्षिप्त नारदपुराण *
है। क्रियावाचक 'भू' 'वा' आदि शब्द ही तिङ् विभक्तियोंके साथ संयुक्त होनेपर तिङन्त कहे गये हैं। इनमें दस^१ लकार बताये गये हैं॥ १७॥
तिप्तसन्तीति प्रथमो मध्यः सिप्थस्थ उत्तमः।
मिब्वस्मसः परस्मै तु पदानां चात्मनेपदम्॥ १८॥
(प्रत्येक लकारमें परस्मैपद और आत्मनेपद—ये दो पद होते हैं। प्रत्येक पदमें प्रथम, मध्यम और उत्तम—ये तीन पुरुष होते हैं।) 'तिप्' 'तस्' 'अन्ति' यह प्रथम पुरुष है। 'सिप्' 'थस्' 'थ'—यह मध्यम पुरुष है तथा 'मिप्' 'वस्' 'मस्' यह उत्तम पुरुष है (प्रत्येक पुरुषमें जो तीन-तीन प्रत्यय हैं, वे क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन हैं)। ये सब परस्मैपदके प्रत्यय हैं। अब आत्मनेपद बताया जाता है॥ १८॥
ते आतेऽन्ते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः।
ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यन्ये लिडादिषु॥ १९॥
'ते' 'आते' 'अन्ते' यह प्रथम पुरुष है। 'से' 'आथे' 'ध्वे' यह मध्यम पुरुष है। 'ए' 'वहे' 'महे' यह उत्तम पुरुष है। ये 'लट्' लकारके स्थानमें होनेवाले आदेश हैं। 'लिट्' आदि लकारोंके स्थानमें होनेवाले प्रत्ययरूप आदेश दूसरे हैं, उन्हें (अन्य व्याकरणसम्बन्धी ग्रन्थोंसे) जानना चाहिये॥ १९॥
नाम्नि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत्।
मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि॥ २०॥
जहाँ 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंके अतिरिक्त अन्य कोई भी नाम (संज्ञा-शब्द) उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयुक्त होता हो, वहाँ प्रथम पुरुष होता है। 'युष्मद्' शब्द उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयुक्त हो तो मध्यम पुरुष होता है और 'अस्मद्' शब्दका उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयोग हो तो उत्तम पुरुष कहा गया है॥ २०॥
भूवाद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः।
लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा॥ २१॥
मास्मयोगे च लङ्वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः।
विध्यादौ स्यादाशिषि च लिङित्तो द्विविधो मुने॥ २२॥
क्रिया-बोधक 'भू' 'वा' आदि शब्दोंको 'धातु' कहा गया है। 'सन्'^२ आदि प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु संज्ञा है। धातुओंसे वर्तमानकालमें लट्लकारका विधान है। अनद्यतन (आजसे पहलेके) भूतकालमें लङ् लकार होता है तथा 'मा' और 'स्म' इन दोनोंके योगमें लङ् (और लुङ्) लकार होता है, यह बताना चाहिये। आशीर्वाद और विधि^३ आदि अर्थमें धातुसे लोट् लकारका विधान है। विधि आदि अर्थमें तथा आशीर्वादमें लिङ् लकारका भी प्रयोग होता है, किंतु विधिलिङ् और आशिष्-लिङ्के धातुरूपोंमें अन्तर होता है। मुने! इसीलिये वह दो प्रकारका माना गया है॥ २१-२२॥
लिडतीते परोक्षे स्याच्छ्वस्तने लुट् भविष्यति।
स्यादेवाद्यतने लृट् च भविष्यति तु धातुतः॥ २३॥
परोक्ष भूतकालमें लिट् लकारका प्रयोग होता है। आजके बाद होनेवाले भविष्यमें 'लुट्'का प्रयोग किया जाता है। आज होनेवाले भविष्यमें (तथा सामान्य भविष्यकालमें भी) धातुसे लृट् लकार होता है॥ २३॥
१. लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ्, लुङ् तथा लृङ्—ये दस लकार हैं। इनमेंसे पाँचवें लकारका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
२. सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, आचारक्विप्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ् तथा णिङ्—ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं। ३. विधि (प्रेरणा या आज्ञा), निमन्त्रण (श्राद्ध आदिमें नियुक्ति या न्योता), आमन्त्रण (इच्छानुसार आज्ञा देना) तथा अधीष्ट (सत्कारपूर्ण व्यवहार)—इनको विध्यादि कहते हैं।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३१
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३१
भूते लुङतिपत्तौ च क्रियाया लृङ् प्रकीर्तितः ।
सिद्धोदाहरणं विद्धि संहितादिपुरःसरम् ॥ २४ ॥
सामान्य भूतकालमें लुङ् लकारका प्रयोग करना चाहिये। हेतुहेतुमद्भाव आदि जो लिङ्के निमित्त हैं, उन्हींके होनेपर भविष्य-अर्थमें लृङ् लकारका प्रयोग होता है; किंतु यदि क्रियाकी असिद्धि सूचित होती हो तभी ऐसा होना उचित है। मुने ! [ अब संधिका प्रकरण आरम्भ करते हैं—] संधिके सिद्ध उदाहरण संहिता आदि ग्रन्थोंके अनुसार समझो ॥ २४ ॥
दण्डाग्रं च दधीदं च मधूदकं पितृषभः ।
होतृकारस्तथा सेयं लाङ्गलीषा मनीषा ॥ २५ ॥
गङ्गोदकं तवल्कार ऋणार्णं च मुनीश्वर ।
शीतार्तश्च मुनिश्रेष्ठ सैन्द्रः सौकार इत्यपि ॥ २६ ॥
पहले स्वर-संधिके उदाहरण दिये जाते हैं—
दण्ड+अग्रम्=दण्डाग्रम् (डंडेका सिरा)। दधि+इदम्=दधीदम् (यह दही)। मधु+उदकम्=मधूदकम् (मधु और जल)। पितृ+ऋषभः=पितृषभः (पितृवर्गमें श्रेष्ठ)। होतृ+लृकारः=होतृकारः (होताका लृकार)¹।
इसी प्रकार 'मनीषा'के साथ 'लाङ्गलीषा' भी सिद्धसंधि है।² मुनीश्वर ! गङ्गा+उदकम्=गङ्गोदकम् (गङ्गाजल), तव+लृकारः=तवल्कारः (तुम्हारा लृकार), सा+इयम्=सेयम् (वह यह—स्त्री)।³ स+ऐन्द्रः=सैन्द्रः (वह इन्द्रका भाग)। स+औकारः=सौकारः (वह औकार)। ऋण+ऋणम्=ऋणार्णम् (ऋणके लिये ऋण)। शीत+ऋतः=शीतार्तः (शीतसे युक्त)। कृष्ण+एकत्वम्=कृष्णैकत्वम् (कृष्णकी एकता)। गङ्गा+ओघः=गङ्गौघः (गङ्गाकी जलराशिका प्रवाह)—ये वृद्धि संधिके उदाहरण हैं⁴ ॥ २५-२६ ॥
वध्वासनं पित्रर्थो नायको लवणस्तथा ।
त आद्या विष्णवे ह्यत्र तस्मा अर्थो गुरा अथः ॥ २७ ॥
दधि+अत्र=दध्यत्र (यहाँ दही है), वधू+आसनम्=वध्वासनम् (बहूका आसन), पितृ+अर्थः=पित्रर्थः (पिताका धन), लृ+आकृतिः=लाकृतिः (देवजातिकी माताका स्वरूप)—ये यण्संधिके उदाहरण हैं⁵। (हरे+ए=हरये—भगवान्के लिये)। नै+अकः=नायकः (स्वामी)। लो+अणः=लवणः
१. ये पाँच उदाहरण दीर्घसंधिके हैं। नियम यह है कि अ, इ, उ, ऋ और लृ—ये स्वर दीर्घ हों या ह्रस्व, यदि अपने सवर्ण स्वरको समीप एवं परवर्ती पायें तो दोनों मिल जाते हैं और उन दोनोंके स्थानपर एक ही दीर्घस्वर हो जाता है। ऋ और लृ असमान प्रतीत होनेपर भी परस्पर सवर्ण माने गये हैं। अतः ऋ+लृके मिलनेपर एक ही 'ऋ' बनता है, जैसा कि 'होतृकारः' में दिखाया गया है।
२. लाङ्गल+ईषा=लाङ्गलीषा। मनस्+ईषा=मनीषा। ये ही इनके पदच्छेद हैं। पहलेमें 'लाङ्गल' शब्दके अन्तका 'अ' ईषाके ईकारमें मिलकर तद्रूप हो गया है। दूसरेमें 'मनस्' के अन्तका 'अस्' भाग ईषाके ईकारका स्वरूप बन गया है। ऐसी संधिको पररूप कहते हैं। 'मनीषा' का अर्थ बुद्धि और 'लाङ्गलीषा' का अर्थ हरिस—हलका ईषादण्ड है। वार्तिककारने मनीषा आदि शब्दोंको 'शकन्धू' आदि गण (समुदाय)-में सम्मिलित किया है। ऐसे शब्द जो प्राचीन ग्रन्थोंमें प्रयुक्त हुए हैं और जिनके साधनकी कोई विशेष पद्धति नहीं है, उन्हें निपातनात् सिद्ध माना गया है। ३. ये गुणसंधिके उदाहरण हैं। नियम यह है कि 'अ' या 'आ' से परे 'इ' 'उ' अथवा 'ऋ' हों तो वह क्रमशः 'ए' 'ओ' अथवा 'अर्' रूप धारण करता है। ये आदेश दो अक्षरोंके स्थानपर अकेले होते हैं। ४. नियम यह है कि 'अ' अथवा 'आ' से परे 'ए', 'ओ' अथवा 'ऋ' हो तो दो अक्षरोंके स्थानपर क्रमशः 'ऐ', 'औ' एवं 'आर्' आदेश होते हैं। 'ए' या 'ओ' की जगह 'ऐ', 'और' हों तो भी वैसा ही रूप बनता है। 'ऋ' के स्थानमें 'आर्' होनेके स्थल परिगणित हैं।
५. नियम यह है कि 'इ' 'उ' 'ऋ' 'लृ'—ये चार अक्षर दीर्घ हों या ह्रस्व, इनसे परे कोई भी असवर्ण (असमान) स्वर होनेपर इन 'इ' कार आदिके स्थानपर क्रमशः य्, व्, र्, ल् आदेश होते हैं।
२३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
(नमक)। (पौ+अकः=पावकः—अग्नि)—ये अयादि संधि कहलाते हैं¹। ते+आद्याः=त आद्याः (वे प्रथम हैं)। विष्णो+एह्यात्र=विष्ण एह्यात्र (भगवन् विष्णो! यहाँ पधारिये)। तस्मै+अर्थः=तस्मा अर्थः (उनके लिये अर्घ्य)। गुरौ+अधः=गुरा अधः (गुरुके समीप नीचे)। इन उदाहरणोंमें यलोप और वलोप हुए हैं²॥ २७॥
हरेऽव विष्णोऽवेत्येषादसो मादप्यमी अघाः।
शौरी एतौ विष्णू इमौ दुर्गे अमू नो अर्जुनः॥ २८॥
आ एवं च प्रकृत्यैते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम।
हरे+अव=हरेऽव (भगवन्! रक्षा कीजिये)। विष्णो+अव=विष्णोऽव (विष्णो! रक्षा कीजिये)। यह पूर्वरूप संधि है³। अदस् शब्दसम्बन्धी मकारसे परे यदि दीर्घ ‘ई’ और ‘ऊ’ हों तो वे ज्यों-के-त्यों रह जाते हैं। इस अवस्थाको प्रकृतिभाव कहते हैं। जैसे अमी+अघाः (ये पापी हैं)⁴, शौरी+एतौ=(ये दोनों श्रीकृष्ण-बलराम हैं), विष्णू+इमौ=(ये दोनों विष्णुरूप हैं), दुर्गे+अमू=(ये दोनों दुर्गरूप हैं)। ये भी प्रकृतिभावके ही उदाहरण हैं।⁵ नो+अर्जुनः (अर्जुन नहीं है), आ+एवम् (ऐसा ही है)—इनमें भी सन्धि नहीं होती⁶। मुनिश्रेष्ठ नारद! ‘अमी+अघाः’ से लेकर यहाँतकके सभी उदाहरण ऐसे हैं, जो अपनी प्रकृतावस्थामें ही रहते हैं॥ २८१/२ ॥
षडत्र षण्मातरश्च वाक्छूरो वाग्घरिस्तथा॥ २९॥
अब व्यञ्जन सन्धिके उदाहरण दिये जाते हैं। षट्+अत्र=षडत्र⁷ (यहाँ छः हैं)। षट्+मातरः=षण्मातरः⁸ (छः माताएँ)। वाक्+शूरः=वाक्छूरः⁹
१. नियम यह है कि ‘ए’, ‘ओ’, ‘ऐ’, ‘औ’—इनसे परे कोई भी स्वर हो तो इनके स्थानमें क्रमशः ‘अय्, अव्, आय्, और आव्’ आदेश होते हैं। २. नियम यह है कि कोई भी स्वर परे रहनेपर अवर्णपूर्वक पदान्त य, व का लोप हो जाता है। यहाँ पूर्वोक्त नियमानुसार पहले अय्, अव् आदि आदेश होते हैं; फिर अभी बताये हुए नियमके अनुसार य, व का लोप हो जाता है। यहाँ ‘य’-लोप या ‘व’-लोप होनेपर ‘त आद्या’ ‘विष्ण एह्यात्र’ आदिमें पुनः दीर्घ एवं गुण आदि संधि नहीं हो सकती; क्योंकि इन संधियोंकी दृष्टिमें य-लोप, व-लोप असिद्ध हैं; इसलिये इनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती। सारांश यह कि इन स्थलोंमें पुनः संधिका निषेध है। ३. नियम यह है कि पदान्त एकार और ओकारके बाद यदि ह्रस्व अकार हो तो वह पूर्ववर्ती स्वरमें मिल जाता है। ४. इस उदाहरणमें यण्सन्धि प्राप्त हुई थी; किंतु अभी बताये हुए नियमके अनुसार प्रकृतिभाव होनेसे सन्धि नहीं हुई।
५. पूर्वके दो उदाहरणोंमें यण्की और अन्तिम उदाहरणमें पूर्वरूपकी प्राप्ति थी; परंतु सन्धिका निषेध हो गया। नियम यह है कि ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचनका प्रकृतिभाव होता है; अतः वहाँ सन्धि नहीं होती है। ६. पहलेमें पूर्वरूप और दूसरेमें वृद्धि सन्धिकी प्राप्ति थी; परंतु प्रकृतिभाव हो गया। नियम यह है किओकारान्त निपात और एक स्वरवाले निपात जैसे हैं, वैसे ही रह जाते हैं। ७. इसमें षट् के ‘ट्’ की जगह ड् हुआ है। नियम यह है कि झ, भ, घ, ढ, ध, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स—इनमेंसे यदि कोई अक्षर पदान्तमें हो तो उसके स्थानमें ज, ब, ग, ड, द—इनमेंसे कोई अक्षर योग्यताके अनुसार होता है। योग्यताका अभिप्राय स्थानकी समानतासे है। जैसे ‘ट’ का स्थान मूर्धा है, अतः उसकी जगह मूर्धा स्थानका ‘ड’ अक्षर ही हुआ। ‘ज’, ‘ब’ आदिके स्थान भिन्न हैं,, इसलिये वे नहीं हुए। ८. इसमें ‘ट्’ की जगह ‘ण्’ आदेश हुआ है। ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके किसी भी अक्षरके बाद यदि अनुनासिक वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) हों तो पूर्ववर्ती अक्षर यदि पदान्तमें हो तो उसके स्थानमें अनुनासिक हो जाता है। जो अक्षर जिस वर्गका है, उसके स्थानमें उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर अनुनासिक होता है। इसीलिये उक्त उदाहरणमें ‘ट्’ की जगह उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर ‘ण्’ हुआ। ९. यहाँ ‘श्’ के स्थानमें ‘छ्’ हुआ है। ऊपर लिखे हुए ‘झ’ से ‘प’ तकके अक्षरोंके बाद यदि ‘श्’ हो तो उसकी जगह ‘छ्’ हो जाता है; किंतु उस ‘श’ के बाद कोई स्वर अथवा ‘ह, य, व, र’—ये अक्षर होने चाहिये। यही इस सन्धिका नियम है।
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३३
(बोलनेमें बहादुर)। वाक्+हरिः=वाग्घरिः^१ (वाणीरूप भगवान्) ॥२९॥
हरिशेते विभुश्चिन्त्यस्तच्छेषो यच्चरस्तथा।
प्रश्नस्त्वथ हरिष्षष्ठः कृष्णाष्टीकत इत्यपि ॥३०॥
हरिस्+शेते=हरिशेते^२ (श्रीहरि शयन करते हैं)। विभुस्+चिन्त्यः=विभुश्चिन्त्यः^३ (सर्वव्यापी परमेश्वर चिन्तन करने योग्य हैं)। तत्+शेषः=तच्छेषः^४ (उसका शेष)। यत्+चरः=यच्चरः^५ (जिसमें चलनेवाला)। प्रश्+नः=प्रश्नः^६ (सवाल)। हरिस्+षष्ठः=हरिष्षष्ठः^७ (श्रीहरि छठे हैं) तथा कृष्णः+टीकते=कृष्णाष्टीकते^८ (श्रीकृष्ण जाते हैं) इत्यादि ॥३०॥
भवान्षष्ठश्च षट् सन्तः षट् ते तल्लेप एव च।
चक्रिंश्छिन्धि भवाञ्छौरिर्भवाञ्शौरिरिहेत्यपि ॥३१॥
भवान्+षष्ठः (आप छठे हैं)। इसमें पूर्व नियमके अनुसार प्राप्त होनेपर तवर्गका टवर्ग नहीं होता^९। इसी तरह षट् सन्तः (छः सत्पुरुष) और षट् ते (वे छः हैं) इत्यादिमें भी ष्टुत्व नहीं हुआ है^{१०}। तत्+लेपः=तल्लेपः^{११} (उसका लेप)। चक्रिन्+छिन्धि=चक्रिंश्छिन्धि^{१२} (चक्रधारी प्रभो! मेरा बन्धन काटिये)। भवान्+शौरिः=भवाञ्छौरिः, भवाञ्शौरिः इह (आप श्रीकृष्ण यहाँ हैं), (भवाञ्छ्छौरिः, भवाञ्श्शौरिः) इस पदच्छेदमें ये चार रूप बनते हैं^{१३}॥३१॥
सम्यङ्ङनन्तोऽङ्गच्छाया कृष्णं वन्दे मुनीश्वर।
तेजांसि मंस्यते गङ्गा हरिश्चेत्तामरशिवः ॥३२॥
सम्यङ्+अनन्तः=सम्यङ्ङनन्तः (अच्छे शेषनाग), सुगण्+ईशः=सुगण्णीशः (अच्छे गणोंके स्वामी)। सन्+अच्युतः=सन्नच्युतः^{१४} (नित्य सत्वरूप श्रीहरि)। अङ्ग+छाया=अङ्गच्छाया^{१५} (शरीरकी परछाईं) कृष्णम्+वन्दे=कृष्णं वन्दे^{१६} (श्रीकृष्णको प्रणाम
१.उपर्युक्त 'झ'से 'प' तकके अक्षरोंके बाद यदि 'ह' हो तो उस 'ह' के स्थानमें पूर्ववर्ती अक्षरके वर्गका चौथा वर्ण हो जाता है। इस नियमके अनुसार उक्त उदाहरणमें 'क्' के बाद 'ह' होनेसे 'ह'के स्थानमें कवर्गका चौथा अक्षर 'घ्' हो गया है और 'क्' की जगह पूर्वोक्त नियमानुसार 'ग्' हो गया॥
२-३-४-५. शकार और चवर्गका योग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः शकार और चवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार पूर्व दो उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'श्' हुआ है और शेष दोमें तवर्गकी जगह चवर्ग हुआ है। शेषके शकारका छकार हुआ है। नियम 'वाक्छूरः में, बताया गया है। ६. शके बाद तवर्ग हो तो उसकी जगह चवर्ग नहीं होता; अतः 'प्रश्नः' में न ज्यों-का-त्यों रह गया है। ७-८. षकार और टवर्गसे संयोग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः षकार और टवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार दोनों उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'ष' हुआ है।
९. क्योंकि षकार परे रहनेपर तवर्गके टवर्ग होनेका निषेध है। १०. क्योंकि पदान्त टवर्गसे परे नाम्-भिन्न सकार और तवर्गके स्थानमें षकार और टवर्ग नहीं होते। ऐसा निषेध है। ११. यहाँ तकारके स्थानमें लकार आदेश हुआ। नियम यह है कि लकार परे रहनेपर तवर्गके स्थानमें 'ल्' हो जाता है।
१२. इसमें 'न्' के स्थानमें 'र्', 'र' का विसर्ग एवं उसका दन्त्य 'स्' होकर फिर छकारके योगमें उसका तालव्य 'श्' हो गया तथा उसके पूर्व अनुस्वार एवं अनुनासिक हुआ। नियम यह है कि छ, ठ, थ, च, ट, त-ये अक्षर परे हों तो नान्त पदके नकारका 'र्' हो, और उसके पूर्व स्वरका विकल्पसे अनुनासिक अथवा 'र्' से परे अनुस्वारका आगम हो। १३.नियम यह है कि शकार परे रहनेपर नान्त पदके आगे 'त्' बढ़ जाता है। शेष परिवर्तन पूर्वोक्त नियमके अनुसार होते हैं।
१४. इन उदाहरणोंमें ङ्, ण्, न् एकसे दो हो गये हैं। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे यदि 'ङ' 'ण्' या 'न्' हो और उसके बाद भी कोई स्वर हो तो वे एकसे दो हो जाते हैं। १५. यहाँ छ के पहले आधा च् बढ़ गया है। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे छ होनेपर उसके पहले आधा च् बढ़ जाता है। १६. यहाँ म् के स्थानमें अनुस्वार हो गया है। कोई भी हल् अक्षर परे हो तो पदान्तमें स्थित म् का अनुस्वार हो जाता है।
२३४
- संक्षिप्त नारदपुराण *
करता हूँ)। तेजान्+सि=तेजांसि (तेज), मन्+स्यते=मंस्यते^१ (मानेंगे)। गं+गा=गङ्गा^२ (देव-नदी गङ्गा)।
मुनीश्वर नारद! यहाँतक व्यञ्जन-सन्धिका वर्णन हुआ। अब विसर्ग-सन्धि प्रारम्भ करते हैं। हरिः+छेत्ता= हरिश्चेत्ता (श्रीहरि बन्धन काटनेवाले हैं)। अमरः+शिवः= अमरश्शिवः^३ (भगवान् शिव अमर हैं) ॥ ३२॥
राम काम्यः कृपःपूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि। रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता दृष्टा इमा यतः॥ ३३॥
रामः+काम्यः=राम काम्यः (श्रीराम कमनीय हैं)। कृपः+पूज्यः=कृप पूज्यः^४ (कृपाचार्य पूज्य हैं)। पूज्यस्+अर्च्यः=पूज्योऽर्च्यः^५ (पूजनीय और अर्चनीय)। रामस्+दृष्टः=रामो दृष्टः^६ (राम देखे गये हैं)। अबलास्+अत्र=अबला अत्र (यहाँ अबलाएँ हैं)। सुप्तास्+दृष्टाः=सुप्ता दृष्टाः (सोयी देखी गयीं)। इमास्+अतः=इमायतः^७ (ये स्त्रियाँ हैं, अतः) ॥ ३३॥
विष्णुर्नम्यो रविरयं गी ≍ फलं प्रातरच्युतः। भक्तैर्वन्द्योऽप्यन्तरात्मा भो भो एष हरिस्तथा। एष शार्ङ्गी सैष रामः संहितैवं प्रकीर्तिता ॥३४॥
विष्णुः+नम्यः=विष्णुर्नम्यः (श्रीविष्णु प्रणामके योग्य हैं)। रविः+अयम्=रविरयम् (ये सूर्य हैं) गीः+फलम्=गीष्फलम् (वाणीका फल)। प्रातर्+अच्युतः=प्रातरच्युतः (प्रातःकाल श्रीहरि)। भक्तैस्+वन्द्यः=भक्तैर्वन्द्यः (भक्तजनोंके द्वारा वन्दनीय हैं)। अन्तर्+आत्मा=अन्तरात्मा (जीवात्मा या अन्तर्यामी परमात्मा)। भोस्+भोः=भो भोः (हे हे)—ये सब उदाहरण पूर्वोक्त नियमोंसे ही बन जाते हैं। एषस्+हरिः=एष हरिः (ये श्रीहरि हैं)। एषस्+शार्ङ्गी=एष शार्ङ्गी (ये शार्ङ्गधारी हरि हैं)। सस्+एषस्+रामः=सैष
१. यहाँ अपदान्त न् का अनुस्वार हुआ है। नियम यह है कि झल् परे रहनेपर अपदान्त न् म् का अनुस्वार होता है। झल्में इतने अक्षर आते हैं—झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह। २. यहाँ अपदान्त अनुस्वारका परसवर्ण हुआ है। र, श, ष, स, ह—इनको छोड़कर कोई भी हल् अक्षर परे रहनेपर अपदान्त अनुस्वारका नित्य परसवर्ण (परवर्ती अक्षरके वर्गका पञ्चम वर्ण) होता है—यह नियम है। ३. इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होकर श्चुत्व सन्धिका नियमसे तालव्य 'श्' हो गया। नियम यह है कि विसर्गके स्थानमें स् हो जाता है खर् परे रहनेपर। उपर्युक्त अक्षरोंमें 'ख' से 'स' तकके अक्षरोंको खर कहते हैं। ४. यहाँ विसर्गके स्थानमें ऐसा ≍ चिह्न हो गया है। विसर्गके बाद क, ख, या प, फ होनेपर विसर्गकी यह अवस्था होती है। ५. यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु' होकर 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है। फिर गुणसन्धिका नियमसे ओकार होनेपर 'अर्च्यः' के अकारका पूर्वरूप हो गया है। यहाँ नया नियम यह जानना है कि पदान्त 'स्' के स्थानमें 'रु' होता है और अप्लुत अकारसे परे होनेपर उस 'रु' का 'उ' हो जाता है। ऐसा तभी होता है, जब उस 'रु' के बाद भी कोई अप्लुत अकार या 'हश्' हो। ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—इन अक्षरोंके समुदायको 'हश्' कहते हैं। ६. यहाँ अभी बताये गये नियमके अनुसार 'स' को 'रु' करके फिर उसका उत्व हुआ। तत्पश्चात् गुण होकर 'रामो' बना। ७. इन सब उदाहरणोंमें 'स्' के स्थानमें पूर्ववत् 'रु' होता है; फिर 'रु' के स्थानमें 'य्' होकर पूर्व दो उदाहरणोंमें उसका लोप हो जाता है। और अन्तिम उदाहरणमें 'य्' 'अ' में मिल जाता है। यहाँ स्मरण रखने योग्य नियम यह है—भो, भगो, अघो तथा अवर्णपूर्वक 'रु' के स्थानमें 'य्' होता है अश् परे रहनेपर। और हल् परे रहनेपर उस 'य्'का लोप हो जाता है। सम्पूर्ण स्वरवर्ण तथा ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—ये सभी अक्षर 'अश्' के अन्तर्गत हैं।
८. एतत् और तत् शब्दोंसे परे 'सु' विभक्तिके 'स' कारका लोप हो जाता है हल् परे रहनेपर। इस नियमके अनुसार यहाँ 'स्' का लोप हो गया है।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३५
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३५
रामः १ (वही ये श्रीराम हैं)। इस प्रकार संहिता (सन्धि)-का प्रकरण बताया गया है॥ ३४॥ (अब सुबन्तका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले स्वरान्त शब्दोंका शुद्ध रूप देते हैं। उसमें भी एक श्लोकद्वारा मङ्गलाचरणके लिये श्रीरामका स्मरण करते हुए 'राम' शब्दके प्रायः सभी विभक्तियोंके एक-एक रूपका उल्लेख करते हैं—) रामेणाभिहितं करोमि सततं २ रामं भजे सादरं रामेणापहृतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः। रामान्मुक्तिरभीप्सिता मम सदा रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे रज्यतु मे मनः सुविशदं हे राम तुभ्यं नमः॥ ३५॥ 'मैं श्रीरामके द्वारा दिये हुए आदेशका सदा पालन करता हूँ। श्रीरामका आदरपूर्वक भजन करता हूँ। रामने (मेरा) सारा पाप हर लिया। भगवान् श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है। मुझे श्रीरामसे मोक्षकी प्राप्ति अभीष्ट है। मैं सदाके लिये श्रीरामका दास हूँ। मेरा निर्मल मन श्रीराममें अनुरक्त हो। हे श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है३॥ ३५॥ सर्व इत्यादिका गोपाः सखा चैव पतिर्हरिः ॥ ३६ ॥ सर्व आदि शब्द सर्वनाम४ माने जाते हैं।५ 'गोपाः' का अर्थ है गौओंका पालन करनेवाला६। सखाका अर्थ है मित्र। यह 'सखि' शब्दका रूप है७। पतिका अर्थ है स्वामी८। हरि शब्दका अर्थ है भगवान् विष्णु९॥ ३६॥ सुश्रीर्भानुः स्वयम्भूश्च कर्ता रा गौस्तु नौरिति । अनड्वागोधुग्लिट् च द्वौ त्रयश्चत्वार एव च ॥ ३७॥ जो उत्तम श्रीसे सम्पन्न हो, उसे सुश्री कहते हैं१०। भानुका अर्थ है सूर्य और किरण११। स्वयम्भूका अर्थ है स्वयं प्रकट होनेवाला। इसका
१. यहाँ 'एष रामः' की सिद्धि तो पूर्ववत् हो जाती है; किंतु 'सस्' के 'सु' का लोप करनेके लिये एक विशेष नियम है—'सस्' के 'सु' का लोप होता है अच् परे रहनेपर, यदि उसके लोप होनेके बाद ही श्लोकके पादकी पूर्ति होती हो तब। जैसे—सैष रामः समायाति (वही ये श्रीराम आते हैं)। २. कहीं-कहीं इस अंशका पाठ इस प्रकार मिलता है—'रामो राजमणिः सदा विजयते।' प्रथमा विभक्तिके रूपकी दृष्टिसे यही पाठ ठीक जान पड़ता है। ३. 'राम' शब्दका रूप सब विभक्तियोंमें इस प्रकार समझना चाहिये—रामः रामौ रामाः। रामम् रामौ रामान्। रामेण रामाभ्याम् रामैः। रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः। रामात्, रामाद् रामाभ्याम् रामेभ्यः। रामस्य रामयोः रामाणाम्। रामे रामयोः रामेषु। हे राम हे रामौ हे रामाः। ४. इसी प्रकरणमें आगे (श्लोक ४७-४८ में) सर्वनाम शब्द गिनाये गये हैं। ५. इनमें सर्व शब्दका रूप इस प्रकार है—सर्वः सर्वौ सर्वे। सर्वम् सर्वौ सर्वान्। सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः। सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम्। सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु। अन्य सर्वनामोंके रूप भी प्रायः ऐसे ही होते हैं। ६. इसके रूप इस प्रकार हैं—गोपाः गोपौ गोपाः। गोपाम् गोपौ गोपः। गोपा गोपाभ्याम् गोपाभिः। गोपे गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपोः गोपाम्। गोपि गोपोः गोपासु। हे गोपाः हे गोपौ हे गोपाः। ७. सखि शब्दके पूरे रूप इस प्रकार हैं—सखा सखायौ सखायः। सखायम् सखायौ सखीन्। सख्या सखिभ्याम् सखिभिः। सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सख्योः सखीनाम्। सख्यौ सख्योः सखिषु। हे सखे हे सखायौ हे सखायः। ८. इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार होते हैं—पतिः पती पतयः। पतिम् पती पतीन्। शेष विभक्तियोंमें सखि शब्दके समान रूप होते हैं। सम्बोधनमें हे पते हे पती हे पतयः—इस प्रकार रूप जानने चाहिये। ९. इसके रूप इस प्रकार हैं—हरिः हरी हरयः। हरिम् हरी हरीन्। हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः। हरये हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हर्योः हरीणाम्। हरौ हर्योः हरिषु। हे हरे हे हरी हे हरयः। १०. इसके रूप इस प्रकार हैं—सुश्रीः सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रियम् सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः। सुश्रिये सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रियोः सुश्रियाम्। सुश्रियि सुश्रियोः सुश्रीषु। हे सुश्रीः हे सुश्रियौ हे सुश्रियः। ११. इसके रूप इस प्रकार हैं—भानुः भानू भानवः। भानुम् भानू भानून्। भानुना भानुभ्याम् ३ भानुभिः। भानवे भानुभ्यः २। भानोः
| २३६ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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प्रयोग प्रायः ब्रह्माजीके लिये होता है^१। काम करनेवालेको कर्ता कहते हैं। यह 'कर्तृ' शब्दका रूप है^२। 'रै' शब्द धनका वाचक है^३। पुँल्लिङ्गमें 'गो' शब्दका अर्थ बैल होता है और स्त्रीलिङ्गमें गाय^४। 'नौ' शब्द नौकाका वाचक है^५। यहाँतक स्वरान्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये गये हैं।
अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये जा रहे हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलको अनड्वान् कहते हैं। यह अनडुहशब्दका रूप है^६। गाय दुहनेवालेको गोधुक् कहते हैं। मूल शब्द गोदुह् है^७। लिह शब्दका अर्थ है चाटनेवाला^८। 'द्वि' शब्द संख्या दोका, 'त्रि' शब्द तीनका और 'चतुर्' शब्द चारका वाचक है। इनमेंसे पहला केवल द्विवचनमें और शेष दोनों केवल बहुवचनमें प्रयुक्त होते हैं^९॥३७॥
राजा पन्थास्तथा दण्डी ब्रह्महा पञ्च चाष्ट च।
अष्टौ अयं मुने सम्राट् सुराड्बिभ्रद्वपुष्मतः ॥३८॥
राजा राजन्-शब्दका रूप है^{१०}। पन्थाः कहते हैं मार्गको। यह पथिन् शब्दका रूप है^{११}। जो दण्ड धारण करे, उसे दण्डी कहते हैं^{१२}। ब्रह्महन् शब्द ब्राह्मणघातीके अर्थमें प्रयुक्त होता है^{१३}। पञ्चन्-शब्द पाँचका और अष्टन् शब्द आठका
२ भान्वोः २ भानूनाम्। भानौ भानुषु। हे भानो हे भानू हे भानवः।
१. स्वयम्भू शब्दके रूप इस प्रकार हैं—स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ २ स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवम्। स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् ३। स्वयम्भूभिः। स्वयम्भुवे स्वयम्भूभ्यः २। स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवोः २। स्वयम्भुवाम्। स्वयम्भुवि स्वयम्भूषु।
२. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—कर्ता कर्तारौ २ कर्तारः। कर्तारम् कर्तॄन्। कर्त्रा कर्तृभ्याम् ३ कर्तृभिः। कर्त्रे कर्तृभ्यः २। कर्तुः २। कर्त्रोः २ कर्तॄणाम्। कर्तरि कर्तृषु। हे कर्तः हे कर्तारौ हे कर्तारः।
३. उसके रूप इस प्रकार हैं—राः रायौ २ रायः २। रायम्। राया राभ्याम् ३ राभिः। राये राभ्यः २। रायः २। रायोः ४. रायाम्। रायि रासु। सम्बोधने प्रथमावत्।
२. दोनों लिङ्गोंमें इसके एक-से ही रूप होते हैं, जो इस प्रकार हैं—गौः गावौ २ गावः। गाम् गाः। गवा गोभ्याम् ३ गोभिः। गवे गोभ्यः २। गोः २। गवोः २ गवाम्। गवि गोषु। हे गौः हे गावौ हे गावः।
५. इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है, तथापि यहाँ पुँल्लिङ्गके प्रकरणमें इसे लिखा गया है, प्रकरणके अनुसार 'सुनौ' शब्द यहाँ ग्रहण करना चाहिये। इसके रूप इस प्रकार हैं—नौः नावौ २ नावः २। नावम्। नावा नौभ्याम् ३ नौभिः। नावे नौभ्यः २। नावः २। नावोः २ नावाम्। नावि नौषु।
६. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—अनड्वान् अनड्वाहौ २ अनड्वाहः। अनड्वाहम् अनडुहः। अनडुहा अनडुद्भ्याम् ३ अनडुद्भिः। अनडुहे अनडुद्भ्यः २। अनडुहः २। अनडुहोः २ अनडुहाम्। अनडुहि अनडुत्सु। सम्बोधनके एकवचनमें हे अनड्वन्।
७. इसके रूप इस प्रकार होते हैं—गोधुक् गोधुग् गोधुहौ २ गोदुहः २। गोदुहम्। गोदुहा गोधुग्भ्याम् गोधुग्भिः। गोदुहे गोधुग्भ्यः २। गोदुहः २। गोदुहोः २ गोदुहाम्। गोदुहि गोधुक्षु।
८. इसके रूप इस प्रकार हैं—लिट् लिड् लिहौ लिहः २। लिहम्। लिहा लिड्भ्याम् ३ लिड्भिः। लिहे लिड्भ्यः २। लिहः २। लिहोः २ लिहाम्। लिहि लिट्सु लिड्सु।
९. रूप क्रमशः इस प्रकार हैं—द्वौ २ द्वाभ्याम् ३ द्वयोः २। त्रयः। त्रीन्। त्रिभिः। त्रिभ्यः २। त्रयाणाम्। त्रिषु चत्वारः। चतुरः। चतुर्भिः। चतुर्भ्यः २। चतुर्णाम्। चतुर्षु।
१०. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—राजा राजानौ २ राजानः। राजानम् राज्ञः। राज्ञा राजभ्याम् ३ राजभिः। राज्ञे राजभ्यः २। राज्ञः २। राज्ञोः २ राज्ञाम्। राज्ञि राजनि राजसु। हे राजन् हे राजानौ हे राजानः।
११. शेष रूप इस प्रकार समझने चाहिये—पन्थानौ २ पन्थानः पन्थानम् पथः। पथा पथिभ्याम् ३ पथिभिः। पथे पथिभ्यः २। पथः २। पथोः २ पथाम्। पथि पथिषु।
१२. इसका मूल शब्द दण्डिन् है, जिसके रूप इस प्रकार हैं—दण्डी दण्डिनौ २ दण्डिनः २। दण्डिनम्। दण्डिना दण्डिभ्याम् ३ दण्डिभिः। दण्डिने दण्डिभ्यः २। दण्डिनः २। दण्डिनोः २ दण्डिनाम्। दण्डिनि दण्डिषु। हे दण्डिन्।
१३. इसके रूप इस प्रकार हैं—ब्रह्महा ब्रह्महणौ २ ब्रह्महणः। ब्रह्महणम् ब्रह्मघ्नः। ब्रह्मघ्ना ब्रह्महभ्याम् ब्रह्महभिः। ब्रह्मघ्ने ब्रह्महभ्यः २। ब्रह्मघ्नः २। ब्रह्मघ्नोः २ ब्रह्मघ्नाम्। ब्रह्मघ्नि ब्रह्महसु।
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३७
वाचक है। ये दोनों बहुवचनान्त होते हैं¹। अयम्का अर्थ है यह; यह 'इदम्' शब्दका रूप है²। 'सम्राट्' कहते हैं बादशाह या चक्रवर्ती राजाको³। सुराज् शब्दके रूप—सुराट् सुराजौ सुराजः इत्यादि हैं। शेष रूप सम्राज् शब्दकी भाँति जानने चाहिये। इसका अर्थ है—अच्छा राजा। बिभ्रत्का अर्थ है धारण-पोषण करनेवाला⁴। वपुष्मत् (वपुष्मान्) का अर्थ है शरीरधारी⁵॥ ३८॥
प्रत्यङ् पुमान् महान् धीमान् विद्वाञ्षट् पिपठीश्च दोः।
उशनासाविमे प्रोक्ताः पुंस्यज्वलिवरामकाः॥ ३९॥
प्रत्यञ्च-शब्दका अर्थ है प्रतिकूल या पीछे जानेवाला 'भीतरकी ओर' भी अर्थ है⁶। पुमान्का अर्थ है पुरुष, जो पुंस्-शब्दका रूप है⁷। महान् कहते हैं श्रेष्ठको⁸। धीमान्का अर्थ है बुद्धिमान्। (धीमत्-शब्दके रूप वपुष्मत् शब्दकी भाँति जानने चाहिये।) विद्वान्का अर्थ है पण्डित⁹। षष् शब्द छःका वाचक और बहुवचनान्त है। (इसके रूप इस प्रकार हैं—षट् षड् २। षड्भिः। षड्भ्यः २। षण्णाम्। षट्सु षट्सु।) जो पढ़नेकी इच्छा करे, उसे 'पिपठीः¹⁰' कहते हैं। दोःका अर्थ है भुजा¹¹। उशनाका अर्थ है शुक्राचार्य¹²। अदस् शब्दका अर्थ है¹³ 'यह' या 'वह'। ये अजन्त (स्वरान्त) और हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्द कहे गये॥ ३९॥
राधा सर्वा गतिर्गोपी स्त्री श्रीर्धेनुर्वधूः स्वसा।
गौर्नौरुपानद्द्यौर्गोवत् ककुप्संवित्तु वा क्वचित् ॥ ४० ॥
अब स्त्रीलिङ्ग शब्दोंका दिग्दर्शन कराते हैं।
१. इनके रूप इस प्रकार हैं—पञ्च २। पञ्चभिः। पञ्चभ्यः २। पञ्चानाम्। पञ्चसु। अष्टौ २ अष्ट २। अष्टाभिः अष्टभिः। अष्टाभ्यः २ अष्टभ्यः २। अष्टानाम्। अष्टासु अष्टसु। २. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—अयम् इमौ इमे। इमम् इमौ इमान्। अनेन आभ्याम् ३ एभिः। अस्मै एभ्यः अस्मात्। अस्य अनयोः २ एषाम्। अस्मिन् एषु।
३. सम्राज् शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सम्राट् सम्राड् सम्राजौ २ सम्राजः २। सम्राजम्। सम्राजा सम्राड्भ्याम् ३ सम्राड्भिः। सम्राजे सम्राड्भ्यः २। सम्राजः २। सम्राजोः २ सम्राजाम्। सम्राजि सम्राट्सु। ४. इसके रूप इस प्रकार हैं—बिभ्रत् बिभ्रतौ २ बिभ्रतः २। बिभ्रतम्। बिभ्रता बिभ्रद्भ्याम् ३ बिभ्रद्भिः। बिभ्रते बिभ्रद्भ्यः २। बिभ्रतः २। बिभ्रतोः २ बिभ्रताम्। बिभ्रति बिभ्रत्सु। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं—वपुष्मान् वपुष्मन्तौ २ वपुष्मन्तः वपुष्मन्तम् वपुष्मतः। वपुष्मता वपुष्मद्भ्याम् ३ वपुष्मद्भिः। वपुष्मते वपुष्मद्भ्यः२। वपुष्मतः २। वपुष्मतोः २ वपुष्मताम्। वपुष्मति वपुष्मत्सु। हे वपुष्मन्। ६. इसके रूप इस प्रकार हैं—प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ २ प्रत्यञ्चः। प्रत्यञ्चम् प्रतीचः। प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् ३ प्रत्यग्भिः। प्रतीचे प्रत्यग्भ्यः २। प्रतीचः २। प्रतीचोः २ प्रतीचाम्। प्रतीचि प्रत्यक्षु। ७. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—पुमान् पुमांसौ २ पुमांसः। पुमांसम् पुंसः। पुंसा पुम्भ्याम् ३ पुम्भिः। पुंसे पुम्भ्यः २। पुंसः २। पुंसोः २ पुंसाम्। पुंसि पुंसु। हे पुमन्! ८. महत्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—महान् महान्तौ २ महान्तः। महान्तम् महतः। महता महद्भ्याम् ३ महद्भिः महते महद्भ्यः २। महतः २। महतोः २ महताम्। महति महत्सु।
९. विद्वस्-शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—विद्वान् विद्वांसौ २ विद्वांसः। विद्वांसम् विदुषः। विदुषा विद्वद्भ्याम् ३ विद्वद्भिः। विदुषे विद्वद्भ्यः २। विदुषः २। विदुषोः २ विदुषाम्। विदुषि विद्वत्सु। हे विद्वन्।
१०. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—पिपठीः पिपठीषौ २ पिपठीषः। पिपठीषम् पिपठीषः। पिपठीषा पिपठीभ्याम् ३ पिपठीभिः। पिपठीषे पिपठीभ्यः २। पिपठीषः २। पिपठीषोः २ पिपठीषाम्। पिपठीषि पिपठीषु पिपठीःषु। ११. दोष् शब्दके रूप इस प्रकार है—दोः दोषौ २ दोषः। दोषम् दोष्णः दोषः। दोष्णा दोषा दोर्भ्याम् ३ दोर्भिः। दोषे दोषे दोर्भ्यः २। दोष्णः २ दोषः २। दोष्णोः २ दोषोः २ दोष्णाम् दोषाम्। दोष्णि दोषि दोषु दोःसु।
१२. उशनस्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—उशना उशनसौ २ उशनसः २। उशनसम्। उशनसा उशनोभ्याम् ३ उशनोभिः। उशनसे उशनोभ्यः २। उशनसः २। उशनसोः २ उशनसाम्। उशनसि उशनस्सु उशनःसु।
१३. इसके रूप इस प्रकार हैं—असौ अमू अमी। अमुम् अमू अमून्। अमुना अमूभ्याम् अमीभिः। अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः। अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः। अमुष्य अमुयोः अमीषाम्। अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु।
२३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
राधाका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्णकी आह्लादिनी शक्ति, जो उनकी भी आराध्या होनेसे 'राधा' कहलाती हैं१। सर्वाका अर्थ है सब२ (स्त्री)। 'गतिः' का अर्थ है—गमन, मोक्ष, प्राप्ति या ज्ञान३। 'गोपी' शब्द प्रेम-भक्तिकी आचार्यरूपा गोपियोंका वाचक४ है। स्त्रीका अर्थ है नारी५। 'श्री' शब्द लक्ष्मीका वाचक है६। धेनुका अर्थ दूध देनेवाली गाय है७। वधूका अर्थ है जाया अथवा पुत्रवधू८। स्वसा९ कहते हैं बहिनको। गो-शब्दका रूप स्त्रीलिङ्गमें भी पुँल्लिङ्गके समान होता है। नौ-शब्दका रूप पहले दिया जा चुका है। उपानह्१० शब्द जूतेका वाचक है। द्यौ११ स्वर्गका वाचक है।
ककुभ्१२ शब्द दिशाका वाचक है। संविद्१३-शब्द बुद्धि एवं ज्ञानका वाचक है ॥४०॥
रुग्विडुद्भाः स्त्रियां तपः कुलं सोमपमक्षि च। ग्रामण्यम्बु खलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु ॥४१॥
रुक्१४ नाम है रोगका। विट्१५-शब्द वैश्यका वाचक है। उद्भाः१६का अर्थ है उत्तम प्रकाश या प्रकाशित होनेवाली। ये शब्द स्त्री-लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं।
अब नपुंसकलिङ्ग शब्दोंका परिचय देते हैं। तपस्१७-शब्द तपस्याका वाचक है। कुल१८-शब्द वंश या समुदायका वाचक है। सोमप१९-शब्दका अर्थ है सोमपान करनेवाला। 'अक्षि'का२० अर्थ है
१. इसके रूप यों हैं—राधा राधे राधाः। राधाम् राधे राधाः। राधया राधाभ्याम् राधाभिः। राधायै राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधयोः राधानाम्। राधायाम् राधयोः राधासु। हे राधे हे राधे हे राधाः। २. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं। चतुर्थीके एकवचनमें—सर्वस्यै। पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें—सर्वस्याः। षष्ठीके बहुवचनमें—सर्वासाम्। सप्तमीके एकवचनमें—सर्वस्याम्। शेष सभी रूप 'राधा' शब्दकी ही भाँति होंगे। ३. गति शब्दके रूप यों समझने चाहिये—गतिः गती गतयः। गतिम् गती गतीः। गत्या गतिभ्याम् ३ गतिभिः। गत्यै गतये गतिभ्यः २। गत्याः २ गतेः २। गत्योः २ गतीनाम्। गत्याम् गतौ गतिषु। हे गते हे गती हे गतयः। ४. गोपी-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—गोपी गोप्यौ २ गोप्यः। गोपीम् गोपीः। गोप्य गोपीभ्याम् ३ गोपीभिः। गोप्यै गोपीभ्यः २। गोप्यः २ गोप्योः २ गोपीनाम्। गोप्याम् गोपीषु। हे गोपि हे गोप्यौ हे गोप्यः। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं—स्त्री स्त्रियौ २ स्त्रियः। स्त्रियम् स्त्रीम् स्त्रियः स्त्रीः। स्त्रिया स्त्रीभ्याम् ३। स्त्रीभिः। स्त्रियै स्त्रीभ्यः २। स्त्रियाः २। स्त्रियोः २ स्त्रीणाम्। स्त्रियाम् स्त्रीषु। हे स्त्रि हे स्त्रियौ हे स्त्रियः। ६. उसके रूप इस प्रकार हैं—श्रीः श्रियौ २ श्रियः २। श्रियम्। श्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः। श्रियै श्रिये श्रीभ्यः २। श्रियाः २। श्रियः २। श्रियोः २ श्रीणाम् श्रियाम्। श्रियाम् श्रियि श्रीषु। हे श्रीः हे श्रियौ हे श्रियः। ७. इसके रूप गति शब्दकी तरह होंगे। यथा—धेनुः धेनू धेनवः। धेन्वै धेनवे इत्यादि। ८. इस शब्दके रूप इस प्रकार है—वधूः वध्वौ वध्वः। शेष रूप गोपी-शब्दकी तरह समझने चाहिये। वहाँ 'ई' के स्थानमें 'य्' होता है, यहाँ 'ऊ' के स्थानमें 'व्' होगा। इतना ही अन्तर है। ९. इसके रूप कर्तृ-शब्दके समान होते हैं। केवल द्वितीयाके बहुवचनमें 'स्वसृः' ऐसा रूप होता है—इतना ही अन्तर है। १०. उसके रूप इस प्रकार हैं—उपानत् उपानद् उपानहौ २ उपानहः २। उपानहम्। उपानहा उपानद्भ्याम् ३ उपानद्भिः। उपानहे उपानद्भ्यः २। उपानहः २। उपानहोः २ उपानहाम्। उपानहि उपानत्सु। ११. दिव्-शब्दके रूप गो-शब्दके समान समझने चाहिये। १२. इसके रूप—ककुप् ककुब् ककुभौ २ ककुभः २। ककुभम्। ककुभा ककुब्भ्याम् इत्यादि है। सप्तमीके बहुवचनमें ककुप्सु रूप होता है। १३. इसके रूप—संवित् संविद् संविदौ संविदः इत्यादि हैं। १४. इसके रूप हैं—रुक् रुग् रुजौ २ रुजः २। रुजम्। रुजा रुग्भ्याम् इत्यादि। १५. इसके रूप हैं—विट् विड् विशौ विशः इत्यादि। १६. इसके रूप है—उद्भाः उद्भासौ उद्भासः इत्यादि। १७. नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तिके रूप एकसे ही होते हैं और तृतीयासे लेकर सप्तमीतकके रूप पुँल्लिङ्गके समान होते हैं। तपस्-शब्दके रूप इस प्रकार समझने चाहिये—तपः तपसी तपांसि। ये तीनों रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्तिमें प्रयुक्त होते हैं। शेष रूप उशनस्के समान होंगे। १८. रूप ये हैं—कुलम् कुले कुलानि। शेष रामवत्। १९. प्रथमा-द्वितीया विभक्तियोंमें इसके रूप हैं—सोमपम् सोमपे सोमपानि। शेष रामवत्। २०. इसके रूप प्रथम दो विभक्तियोंमें हैं—अक्षि अक्षिणी अक्षीणि। शेष पाँच विभक्तियोंके एकवचनमें क्रमशः इस प्रकार रूप हैं—अक्ष्णा। अक्ष्णे। अक्ष्णः। अक्ष्णः। अक्षिण अक्षणि। शेष रूप हरि-शब्दके समान जानने चाहिये।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३९
| आँख। गाँवके नेताको ग्रामणी^१ कहते हैं। अम्बु^२-शब्द जलका वाचक है। खलपू^३का अर्थ है खलिहान या भूमि साफ करनेवाला। कर्तृ^४-शब्द कर्ताका वाचक है। जो धनकी सीमाको लाँघ गया हो, उस कुलको अतिरि^५ कहते हैं। जो पानी नावकी शक्तिसे बाहर हो, जिसे नावसे भी पार करना असम्भव हो, उसे 'अतिनु^६' कहते हैं ॥४१॥<br><br>स्वनडुच्च विमलद्यु वाश्वत्वारीदमेव च।<br>एतद्ब्रह्माहश्च दण्डी असृक्किञ्चित्त्यदादि च ॥४२॥<br><br>जिस कुल या गृहमें गाड़ी खींचनेवाले अच्छे बैल हों, उसको 'स्वनडुत्^७' कहते हैं। जिस दिन आकाश साफ हो, उस दिनको विमलद्यु^८ कहते हैं। वार्^९-शब्द जलका वाचक है। चतुर् शब्दका रूप नपुंसकलिङ्गमें केवल प्रथमा और द्वितीयामें | 'चत्वारि' होता है, शेष पुँल्लिङ्गवत्। इदम्-शब्दके रूप नपुंसकमें इस प्रकार हैं—इदम् इमे इमानि, शेष पुँल्लिङ्गवत्। एतत्-शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें—एषः एतौ एते इत्यादि सर्वशब्दके समान होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्तियोंमें ये रूप हैं—एतत् एते एतानि। ब्रह्मन्-शब्दके रूप नपुंसकमें 'ब्रह्म ब्रह्मणी ब्रह्माणि' हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्^{१०}। अहन्^{११}-शब्द दिनका वाचक है। दण्डिन्-शब्दके नपुंसकमें 'दण्डि दण्डिनी दण्डीनि' ये रूप हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। असृक्^{१२}-शब्द रक्तका वाचक है। किम्-शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें 'कः कौ के' इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें केवल प्रथम दो विभक्तिमें 'किम् के कानि'—ये रूप होते हैं। चित्-शब्दके रूप |
१. पुँल्लिङ्गमें इसके रूप ग्रामणीः ग्रामण्यौ ग्रामण्यः इत्यादि होते हैं। यदि कोई कुल (खानदान) गाँवका अगुआ हो तो यह शब्द नपुंसकलिङ्गमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसके रूप इस प्रकार होंगे—ग्रामणि ग्रामणिनी ग्रामणीनि। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें 'ग्रामण्या ग्रामणिना। ग्रामण्ये ग्रामणिने। ग्रामण्यः २ ग्रामणिनः २। ग्रामण्याम् ग्रामणिनि—ये रूप हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् होते हैं। २. इसके रूप—अम्बु अम्बुनी अम्बूानि इत्यादि हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें क्रमशः अम्बुना। अम्बुने। अम्बुनः २। अम्बुनि—ये रूप होते हैं। शेष रूप भानुवत् हैं। ३. पुँल्लिङ्गमें इसके रूप 'खलपूः खलप्वौ खलप्वः' इत्यादि होते हैं। जब यह किसी साधन या औजारका वाचक होता है तो नपुंसकमें प्रयुक्त होता है। उसमें इसके रूप इस प्रकार हैं—खलपु खलपुनी खलपूनि। इसमें भी तृतीयासे सप्तमीतक एकवचनमें 'खलपुना, खलपुने, खलपुनः २, खलपुनि'—ये रूप अधिक होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। ४. इसका रूप पुँल्लिङ्गमें बताया गया है। नपुंसकमें 'कर्तृ कर्तृणी कर्तृणि'—ये रूप होते हैं। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें दो-दो रूप होते हैं। यथा—कर्तृणा कर्त्रा। कर्तृणे कर्त्रे। कर्तुणः २ कर्तुः २। कर्तृणि कर्तरि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। ५. इसके 'अतिरि अतिरिणी अतिरीणि' ये रूप हैं। तृतीया विभक्तिसे इस प्रकार रूप चलते हैं—अतिरिणा, अतिराभ्याम् ३ अतिराभिः। अतिरिणे अतिराभ्यः २। अतिरिणः २। अतिरिणोः २ अतिरीणाम्। अतिरिणि अतिरासु। ६. इसके रूप इस प्रकार है—'अतिनु अतिनुनी अतिनूनि। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमें—'अतिनुना, अतिनुने, अतिनुनः २, अतिनुनि'—ये रूप होते हैं। शेष भानुवत्। ७. रूप इस प्रकार हैं—स्वनडुत् स्वनडुही स्वनड्वांहि। शेष पुँल्लिङ्गवत्। ८. रूप इस प्रकार हैं—विमलद्यु विमलदिवी विमलदिवि। तृतीया आदि विभक्तियोंमें 'विमलदिवा विमलद्युभ्याम्' इत्यादि रूप होते हैं। ९. इसके रूप इस प्रकार हैं—'वाः वारी वारि। वारा वारभ्याम् वार्भिः' इत्यादि। १०. पुँल्लिङ्गमें इसके सब रूप इस प्रकार हैं—ब्रह्मा, ब्रह्माणौ, ब्रह्माणः। ब्रह्माणं ब्रह्माणौ ब्रह्मणः। ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः। ब्रह्मणे ब्रह्मभ्यम् ब्रह्मभ्यः। ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः। ब्रह्मणः ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम्। ब्रह्मणि ब्रह्मणो ब्रह्मसु। ११. इसके रूप इस प्रकार हैं—'अहः अह्नी अहानि। अह्ना अहोभ्याम् अहोभिः' इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें अह्नि, अहनि—ये दो रूप होते हैं। १२. इसके रूप इस प्रकार हैं—'असृक् असृजी असृञ्जि। असृजा असृग्भ्याम् असृग्भिः' इत्यादि।