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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

५२४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


गौरीदेवीके प्रति कहा हुआ पर्वतोपाख्यान है। तत्पश्चात् जालन्धरकी कथा, श्रीशैल आदिका माहात्म्यकीर्तन और राजा सगरकी पुण्यमयी कथा है। उसके बाद गङ्गा, प्रयाग, काशी और गयाका अधिक पुण्यदायक माहात्म्य कहा गया है। फिर अन्नादि दानका माहात्म्य और महाद्वादशीव्रतका उल्लेख है। तत्पश्चात् चौबीस एकादशियोंका पृथक्-पृथक् माहात्म्य कहा गया है। फिर विष्णुधर्मका निरूपण और विष्णुसहस्रनामका वर्णन है। उसके बाद कार्तिकव्रतका माहात्म्य, माघ-स्नानका फल तथा जम्बूद्वीपके तीर्थोंकी पापनाशक महिमाका वर्णन है। फिर साभ्रमती (साबरमती)-का माहात्म्य, नृसिंहोत्पत्तिकथा, देवशर्मा आदिका उपाख्यान और गीतामाहात्म्यका वर्णन है। तदनन्तर भक्तिका आख्यान, श्रीमद्भागवतका माहात्म्य और अनेक तीर्थोंकी कथासे युक्त इन्द्रप्रस्थकी महिमा है। इसके बाद मन्त्ररत्नका कथन, त्रिपादविभूतिका वर्णन तथा मत्स्य आदि अवतारोंकी पुण्यमयी अवतार-कथा है। तत्पश्चात् अष्टोत्तरशत दिव्य राम-नाम और उसके माहात्म्यका वर्णन है। वाडव ! फिर महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुके वैभवकी परीक्षाका उल्लेख है। इस प्रकार यह पाँचवाँ 'उत्तरखण्ड' कहा गया है, जो सब प्रकारके पुण्य देनेवाला है। जो श्रेष्ठ मानव पाँच खण्डोंसे युक्त पद्मपुराणका श्रवण करता है, वह इस लोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको भोगकर वैष्णव धामको प्राप्त कर लेता है। यह पद्मपुराण पचपन हजार श्लोकोंसे युक्त है। मानद ! जो इस पुराणको लिखवाकर पुराणज्ञ ब्राह्मणका भलीभाँति सत्कार करके ज्येष्ठकी पूर्णिमाको स्वर्णमय कमलके साथ इस लिखित पुराणका उक्त पुराणवेत्ता ब्राह्मणको दान करता है, वह सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित होकर वैष्णव धामको चला जाता है। जो पद्मपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका पाठ तथा श्रवण करता है, वह भी सम्पूर्ण पद्मपुराणके श्रवणजनित फलको प्राप्त कर लेता है।


विष्णुपुराणका स्वरूप और विषयानुक्रमणिका

**श्रीब्रह्माजी कहते हैं—**वत्स ! सुनो, अब मैं वैष्णव महापुराणका वर्णन करता हूँ। इसकी श्लोक-संख्या तेईस हजार है। यह सब पातकोंका नाश करनेवाला है। इसके पूर्वभागमें शक्तिनन्दन पराशरजीने मैत्रेयको छः अंश सुनाये हैं, उनमेंसे प्रथम अंशमें इस पुराणकी अवतरणिका दी गयी है। आदिकारण सर्ग, देवता आदिकी उत्पत्ति, समुद्रमन्थनकी कथा, दक्ष आदिके वंशका वर्णन, ध्रुव तथा पृथुके चरित्र, प्राचेतसका उपाख्यान, प्रह्लादकी कथा और ब्रह्माजीके द्वारा देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि वर्गोंके प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंको पृथक्-पृथक् राज्याधिकार दिये जानेका वर्णन—इन सब विषयोंको प्रथम अंश कहा गया है।

प्रियव्रतके वंशका वर्णन, द्वीपों और वर्षोंका वर्णन, पाताल और नरकोंका कथन, सात स्वर्गोंका निरूपण, पृथक्-पृथक् लक्षणोंसे युक्त सूर्य आदि

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५२५ ---|---

ग्रहोंकी गतिका प्रतिपादन, भरत-चरित्र, मुक्तिमार्ग-निदर्शन तथा निदाघ एवं ऋभुका संवाद—ये सब विषय द्वितीय अंशके अन्तर्गत कहे गये हैं।

मन्वन्तरोंका वर्णन, वेदव्यासका अवतार तथा इसके बाद नरकसे उद्धार करनेवाला कर्म कहा गया है। सगर और और्वके संवादमें सब धर्मोंका निरूपण, श्राद्धकल्प तथा वर्णाश्रमधर्म, सदाचार-निरूपण तथा मायामोहकी कथा—यह सब विषय तीसरे अंशमें बताया गया है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।

मुनिश्रेष्ठ! सूर्यवंशकी पवित्र कथा, चन्द्रवंशका वर्णन तथा नाना प्रकारके राजाओंका वृत्तान्त चतुर्थ अंशके अन्तर्गत है।

श्रीकृष्णावतारविषयक प्रश्न, गोकुलकी कथा, बाल्यावस्थामें श्रीकृष्णद्वारा पूतना आदिका वध, कुमारावस्थामें अघासुर आदिकी हिंसा, किशोरावस्थामें उनके द्वारा कंसका वध, मथुरापुरीकी लीला, तदनन्तर युवावस्थामें द्वारकाकी लीलाएँ, समस्त दैत्योंका वध, भगवान्‌के पृथक्-पृथक् विवाह, द्वारकामें रहकर योगीश्वरोंके भी ईश्वर जगन्नाथ श्रीकृष्णके द्वारा शत्रुओंके वध आदिके साथ-साथ पृथ्वीका भार उतारा जाना और अष्टावक्रजीका उपाख्यान—ये सब बातें पाँचवें अंशके अन्तर्गत हैं।

कलियुगका चरित्र, चार प्रकारके महाप्रलय तथा केशिध्वजके द्वारा खाण्डिक्य जनकको ब्रह्मज्ञानका उपदेश इत्यादि विषयोंको छठा अंश कहा गया है।

इसके बाद विष्णुपुराणका उत्तर भाग प्रारम्भ होता है, जिसमें शौनक आदिके द्वारा आदरपूर्वक पूछे जानेपर सूतजीने सनातन ‘विष्णुधर्मोत्तर’ नामसे प्रसिद्ध नाना प्रकारके धर्मोंकी कथाएँ कही हैं। अनेकानेक पुण्य-व्रत, यम-नियम, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, वंशवर्णनके प्रकरण, स्तोत्र, मन्त्र तथा सब लोगोंका उपकार करनेवाली नाना प्रकारकी विद्याएँ सुनायी हैं। यह विष्णुपुराण है, जिसमें सब शास्त्रोंके सिद्धान्तका संग्रह हुआ है। इसमें वेदव्यासजीने वाराहकल्पका वृत्तान्त कहा है। जो मनुष्य भक्ति और आदरके साथ विष्णुपुराणको पढ़ते और सुनते हैं, वे दोनों यहाँ मनोवाञ्छित भोग भोगकर विष्णुलोकमें चले जाते हैं। जो इस पुराणको लिखवाकर या स्वयं लिखकर आषाढ़की पूर्णिमाको घृतमयी धेनुके साथ पुराणार्थवेत्ता विष्णुभक्त ब्राह्मणको दान करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठधाममें जाता है। ब्रह्मन्! जो विष्णुपुराणकी इस विषयानुक्रमणिकाको कहता अथवा सुनता है, वह समूचे पुराणके पठन एवं श्रवणका फल पाता है।


वायुपुराणका परिचय तथा उसके दान एवं श्रवण आदिका फल

ब्रह्माजी कहते हैं—ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं वायुपुराणका लक्षण बतलाता हूँ, जिसके श्रवण करनेपर परमात्मा भगवान् शिवका धाम प्राप्त होता है। यह पुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बतलाया गया है। जिसमें वायुदेवने श्वेतकल्पके प्रसङ्गसे धर्मोंका उपदेश किया है, उसे वायुपुराण कहा गया है। वह पूर्व और उत्तर दो भागोंसे युक्त है। ब्रह्मन्! जिसमें सर्ग आदिका लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहाँ भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें राजाओंके वंशका वर्णन है और जहाँ गयासुरके वधकी कथा विस्तारके साथ कही गयी है, जिसमें सब मासोंका माहात्म्य बताकर माघमासका अधिक फल कहा गया है, जहाँ दानधर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तारसे कहे गये हैं, जिसमें पृथ्वी, पाताल, दिशा और आकाशमें विचरनेवाले जीवोंके और व्रत आदिके सम्बन्धमें निर्णय किया गया है, वह वायुपुराणका पूर्वभाग कहा गया है।

मुनीश्वर! उसके उत्तरभागमें नर्मदाके तीर्थोंका

श्रीमद्भागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दानजनित फल

५२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


वर्णन है और विस्तारके साथ शिवसंहिता कही गयी है। जो भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय और सनातन हैं, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते हैं, वही यह नर्मदाका जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात् शिव है। यह नर्मदाजल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है। निश्चय ही भगवान् शिवने समस्त लोकोंका हित करनेके लिये अपने शरीरसे इस नर्मदा नदीके रूपमें किसी दिव्य शक्तिको ही धरतीपर उतारा है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे भगवान् रुद्रके अनुचर होते हैं और जिनका दक्षिण तटपर निवास है, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते हैं। ॐकारेश्वरसे लेकर पश्चिम समुद्रतक नर्मदा नदीमें दूसरी नदियोंके पैंतीस पापनाशक संगम हैं, उनमेंसे ग्यारह तो उत्तर तटपर हैं और तेईस दक्षिण तटपर। पैंतीसवाँ तो स्वयं नर्मदा और समुद्रका संगम कहा गया है। नर्मदाके दोनों तटोंपर इन संगमोंके साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ हैं। मुनीश्वर! इनके सिवा अन्य साधारण तीर्थ तो रेवाके दोनों तटोंपर पग-पगपर विद्यमान हैं, जिनकी संख्या साठ करोड़ साठ हजार है। यह परमात्मा शिवकी संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवताने नर्मदाके चरित्रका वर्णन किया है। जो इस पुराणको लिखकर गुड़मयी धेनुके साथ श्रावणकी पूर्णिमाको भक्तिपूर्वक कुटुम्बी ब्राह्मणके हाथमें दान देता है, वह चौदह इन्द्रोंके राज्यकालतक रुद्रलोकमें निवास करता है। जो मनुष्य नियमपूर्वक हविष्य भोजन करते हुए इस वायुपुराणको सुनाता अथवा सुनता है, वह साक्षात् रुद्र है, इसमें संशय नहीं है। जो इस अनुक्रमणिकाको सुनता और सुनाता है, वह भी समस्त पुराणके श्रवणका फल पा लेता है।

श्रीमद्भागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दानजनित फल

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मरीचे! सुनो, वेदव्यासजीने जो वेदतुल्य श्रीमद्भागवत नामक महापुराणका सम्पादन किया है, वह अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया गया है। यह पुराण सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह बारह शाखाओंसे युक्त कल्पवृक्षस्वरूप है। विप्रवर! इसमें विश्वरूप भगवान्‌का ही प्रतिपादन किया गया है। इसके पहले स्कन्धमें सूत और शौनकादि ऋषियोंके समागमका प्रसंग उठाकर व्यासजी तथा पाण्डवोंके पवित्र चरित्रका वर्णन किया गया है। इसके बाद परीक्षित्‌के जन्मसे लेकर प्रायोपवेशनतककी कथा कही गयी है। यहींतक प्रथम स्कन्धका विषय है। फिर परीक्षित्-शुकसंवादमें स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी धारणाओंका निरूपण है। तदनन्तर ब्रह्म-नारद-संवादमें भगवान्‌के अवतारसम्बन्धी अमृतोपम चरित्रोंका वर्णन है। फिर पुराणका लक्षण कहा गया है। बुद्धिमान् व्यासजीने यह द्वितीय स्कन्धका विषय बताया है, जो सृष्टिके

  • पूर्वभाग-चतुर्थ पाद * ५२७

कारणतत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रतिपादक है। तत्पश्चात् विदुरका चरित्र, मैत्रेयजीके साथ विदुरका समागम, परमात्मा ब्रह्मासे सृष्टिक्रमका निरूपण और महर्षि कपिलद्वारा कहा हुआ सांख्य—यह सब विषय तृतीय स्कन्धके अन्तर्गत बताया गया है। तदनन्तर पहले सतीचरित्र, फिर ध्रुवका चरित्र, तत्पश्चात् राजा पृथुका पवित्र उपाख्यान, फिर राजा प्राचीनबर्हिष्की कथा—यह सब विसर्गविषयक परम उत्तम चौथा स्कन्ध कहा गया है। राजा प्रियव्रत और उनके पुत्रोंका पुण्यदायक चरित्र, ब्रह्माण्डके अन्तर्गत विभिन्न लोकोंका वर्णन तथा नरकोंकी स्थिति—यह संस्थानविषयक पाँचवाँ स्कन्ध है। अजामिलका चरित्र, दक्ष प्रजापतिद्वारा की हुई सृष्टिका निरूपण, वृत्रासुरकी कथा और मरुद्गणोंका पुण्यदायक जन्म—यह सब व्यासजीके द्वारा छठा स्कन्ध कहा गया है। वत्स! प्रह्लादका पुण्यचरित्र और वर्णाश्रमधर्मका निरूपण यह सातवाँ स्कन्ध बताया गया है। यह ‘ऊति’ अथवा कर्मवासनाविषयक स्कन्ध है। इसमें उसीका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् मन्वन्तरनिरूपणके प्रसंगमें गजेन्द्रमोक्षकी कथा, समुद्रमन्थन, बलिके ऐश्वर्यकी वृद्धि और उनका बन्धन तथा मत्स्यावतारचरित्र—यह आठवाँ स्कन्ध कहा गया है। महामते! सूर्यवंशका वर्णन और चन्द्रवंशका निरूपण—यह वंशानुचरितविषयक नवाँ स्कन्ध बताया गया है। श्रीकृष्णका बालचरित, कुमारावस्थाकी लीलाएँ, व्रजमें निवास, किशोरावस्थाकी लीलाएँ, मथुरामैं निवास, युवावस्था, द्वारकामें निवास और भूभारहरण—यह निरोधविषयक दसवाँ स्कन्ध है। नारद-वसुदेव-संवाद, यदु-दत्तात्रेय-संवाद और श्रीकृष्णके साथ उद्धवका संवाद, आपसके कलहसे यादवोंका संहार—यह सब मुक्तिविषयक ग्यारहवाँ स्कन्ध है। भविष्य राजाओंका वर्णन, कलिधर्मका निर्देश, राजा परीक्षित्के मोक्षका प्रसङ्ग, वेदोंकी शाखाओंका विभाजन, मार्कण्डेयजीकी तपस्या, सूर्यदेवकी विभूतियोंका वर्णन, तत्पश्चात् भागवती विभूतिका वर्णन और अन्तमें पुराणोंकी श्लोक-संख्याका प्रतिपादन—यह सब आश्रयविषयक बारहवाँ स्कन्ध है। वत्स! इस प्रकार तुम्हें श्रीमद्भागवतका परिचय दिया गया है। वह वक्ता, श्रोता, उपदेशक, अनुमोदक और सहायक—सबको भक्ति, भोग और मोक्ष देनेवाला है। जो भगवान्की भक्ति चाहता हो, वह भाद्रपदकी पूर्णिमाको सोनेके सिंहासनके साथ इस भागवतका भगवद्भक्त ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक दान करे। उसके पहले वस्त्र और सुवर्ण आदिके द्वारा ब्राह्मणकी पूजा कर लेनी चाहिये। जो मनुष्य भागवतकी इस विषयानुक्रमणिकाका दूसरेको श्रवण कराता अथवा स्वयं सुनता है, वह समस्त पुराणके श्रवणका उत्तम फल प्राप्त कर लेता है।

५२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नारदपुराणकी विषय-सूची, इसके पाठ, श्रवण और दानका फल

**ब्रह्माजी कहते हैं—**ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं नारदीय पुराणका वर्णन करता हूँ। इसमें पचीस हजार श्लोक हैं। इसमें बृहत्कल्पकी कथाका आश्रय लिया गया है। इसमें पूर्वभागके प्रथम पादमें पहले सूत-शौनक-संवाद है; फिर सृष्टिका संक्षेपसे वर्णन है। फिर महात्मा सनकके द्वारा नाना प्रकारके धर्मोंकी पुण्यमयी कथाएँ कही गयी हैं। पहले पादका नाम ‘प्रवृत्तिधर्म’ है। दूसरा पाद ‘मोक्षधर्म’के नामसे प्रसिद्ध है। उसमें मोक्षके उपायोंका वर्णन है। वेदाङ्गोंका वर्णन और शुकदेवजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग विस्तारके साथ आया है। सनन्दनजीने महात्मा नारदको इस द्वितीय पादका उपदेश किया है। तृतीय पादमें सनत्कुमार मुनिने नारदजीको महातन्त्रवर्णित ‘पशुपशविमोक्ष’का उपदेश दिया है। फिर गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति आदिके मन्त्रोंका शोधन, दीक्षा, मन्त्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम और स्तोत्रका क्रमशः वर्णन किया है। तदनन्तर चतुर्थ पादमें सनातन मुनिने नारदजीसे पुराणोंका लक्षण, उनकी श्लोक-संख्या तथा दानका पृथक्-पृथक् फल बताया है। साथ ही उन दानोंका अलग-अलग समय भी नियत किया है। इसके बाद चैत्र आदि सब मासोंमें पृथक्-पृथक् प्रतिपदा आदि तिथियोंका सर्वपापनाशक व्रत बताया है। यह ‘बृहदाख्यान’ नामक पूर्वभाग बताया गया है। इसके उत्तर भागमें एकादशी व्रतके सम्बन्धमें किये हुए प्रश्नके उत्तरमें महर्षि वसिष्ठके साथ राजा मान्धाताका संवाद उपस्थित किया गया है। तत्पश्चात् राजा रुक्माङ्गदकी पुण्यमयी कथा, मोहिनीकी उत्पत्ति, उसके कर्म, पुरोहित वसुका मोहिनीके लिये शाप, फिर शापसे उसके उद्धारका कार्य, गङ्गाकी पुण्यतम कथा, गयायात्रावर्णन, काशीका अनुपम माहात्म्य, पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन, उस क्षेत्रकी यात्राविधि, तत्सम्बन्धी अनेक उपाख्यान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र और हरिद्वारका माहात्म्य, कामोदाकी कथा, बदरीतीर्थका माहात्म्य, कामाक्षा और प्रभासक्षेत्रकी महिमा, पुष्करक्षेत्रका माहात्म्य, गौतममुनिका आख्यान, वेदपादस्तोत्र, गोकर्णक्षेत्रका माहात्म्य, लक्ष्मणजीकी कथा, सेतुमाहात्म्यकथन, नर्मदाके तीर्थोंका वर्णन, अवन्तीपुरीकी महिमा, तदनन्तर मथुरा-माहात्म्य, वृन्दावनकी महिमा, वसुका ब्रह्माके निकट जाना, तत्पश्चात् मोहिनीका तीर्थोंमें भ्रमण आदि विषय हैं। इस प्रकार यह सब नारदमहापुराण है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो इस पुराणको सुनता अथवा सुनाता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जो आश्विनकी पूर्णिमाके दिन सात धेनुओंके साथ इस पुराणका श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान करता है, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है। जो एकचित्त होकर नारदपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका वर्णन अथवा श्रवण करता है, वह भी स्वर्गलोकमें जाता है।

मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य

  • पूर्वभाग-चतुर्थ पाद * | ५२९ ---|---

मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—मुने! अब मैं तुम्हें मार्कण्डेयपुराणका परिचय देता हूँ। यह महापुराण पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके लिये सदा पुण्यदायक है। जिसमें पक्षियोंको प्रवचनका अधिकारी बनाकर उनके द्वारा सब धर्मोंका निरूपण किया गया है, वह मार्कण्डेयपुराण नौ हजार श्लोकोंका है, ऐसा कहा जाता है। इसमें पहले मार्कण्डेयमुनिके समीप जैमिनिके प्रश्नका वर्णन है। फिर धर्मसंज्ञक पक्षियोंके जन्मकी कथा कही गयी है। फिर उनके पूर्वजन्मकी कथा और देवराज इन्द्रके कारण उन्हें शापरूप विकारकी प्राप्तिका कथन है। तदनन्तर बलभद्रजीकी तीर्थयात्रा, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंकी कथा, हरिश्चन्द्रकी पुण्यमयी कथा, आडी और बक पक्षियोंका युद्ध, पिता और पुत्रका उपाख्यान, दत्तात्रेयजीकी कथा, महान् आख्यानसहित हैहयचरित्र, अलर्कचरित्रके साथ मदालसाकी कथा, नौ प्रकारकी सृष्टिका पुण्यमय वर्णन, कल्पान्तकालका निर्देश, यक्ष-सृष्टि-निरूपण, रुद्र आदिकी सृष्टि, द्वीपचर्याका वर्णन, मनुओंकी अनेक पापनाशक कथाओंका कीर्तन और उन्हींमें दुर्गाजीकी अत्यन्त पुण्यदायिनी कथा है, जो आठवें मन्वन्तरके प्रसङ्गमें कही गयी है। तत्पश्चात् तीन वेदोंके तेजसे प्रणवकी उत्पत्ति, सूर्यदेवके जन्मकी कथा, उनका माहात्म्य, वैवस्वत मनुके वंशका वर्णन, वत्सप्रीका चरित्र, तदनन्तर महात्मा खनित्रकी पुण्यमयी कथा, राजा अविक्षित्का चरित्र, किमिच्छिक व्रतका वर्णन, नरिष्यन्त-चरित्र, इक्ष्वाकु-चरित्र, नल-चरित्र, श्रीरामचन्द्रजीकी उत्तम कथा, कुशके वंशका वर्णन, सोमवंशका वर्णन, पुरूरवाकी पुण्यमयी कथा, नहुषका अद्भुत वृत्तान्त, ययातिका पवित्र चरित्र, यदुवंशका वर्णन, श्रीकृष्णकी बाललीला, उनकी मथुरा और द्वारकाकी लीलाएँ, सब अवतारोंकी कथा, सांख्यमतका वर्णन, प्रपञ्चके मिथ्यात्वका वर्णन, मार्कण्डेयजीका चरित्र तथा पुराणश्रवण आदिका फल—ये सब विषय हैं। वत्स! जो मनुष्य इस मार्कण्डेयपुराणका भक्तिभावसे आदरपूर्वक श्रवण करता है, वह परम गतिको पाता है। जो इसकी व्याख्या करता है, वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है। जो इसे लिखकर हाथीकी स्वर्णमयी प्रतिमाके साथ कार्तिककी पूर्णिमाके दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान देता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। जो मार्कण्डेयपुराणकी इस विषय-सूचीको सुनता अथवा सुनाता है, वह मनोवाञ्छित फल पाता है।

५३० * संक्षिप्त नारदपुराण *


अग्निपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल

श्रीब्रह्माजी कहते हैं— अब मैं अग्निपुराणका वर्णन करता हूँ। जिसमें अग्निदेवने महर्षि वसिष्ठसे ईशान-कल्पका वर्णन किया है, वह अग्निपुराण पंद्रह हजार श्लोकोंसे पूर्ण है। उसमें अनेक प्रकारके चरित्र हैं। यह पुराण अद्भुत है। जो लोग इसका पाठ और श्रवण करते हैं, उनके समस्त पापोंको यह हर लेनेवाला है। इसमें पहले पुराणविषयक प्रश्न है, फिर सब अवतारोंकी कथा कही गयी है। तत्पश्चात् सृष्टिका प्रकरण और विष्णुपूजा आदिका वर्णन है। तदनन्तर अग्निकार्य, मन्त्र, मुद्रादिलक्षण, सर्वदीक्षाविधान और अभिषेकनिरूपण है। इसके बाद मण्डल आदिका लक्षण, कुशापामार्जन, पवित्रारोपणविधि, देवालयविधि, शालग्राम आदिकी पूजा तथा मूर्तियोंके पृथक्-पृथक् चिह्नका वर्णन है। फिर न्यास आदिका विधान, प्रतिष्ठा, पूर्तकर्म, विनायक आदिका पूजन, नाना प्रकारकी दीक्षाओंकी विधि, सर्वदेवप्रतिष्ठा, ब्रह्माण्डका वर्णन, गङ्गादि तीर्थोंका माहात्म्य, द्वीप और वर्षका वर्णन, ऊपर और नीचेके लोकोंकी रचना, ज्योतिश्चक्रका निरूपण, ज्योतिः-शास्त्र, युद्धजयार्णव, षट्कर्म, मन्त्र, यन्त्र, औषधसमूह, कुब्जिका आदिकी पूजा, छः प्रकारकी न्यासविधि, कोटिहोमविधि, मन्वन्तरनिरूपण, ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंके धर्म, श्राद्धकल्पविधि, ग्रहयज्ञ, श्रौतस्मार्तकर्म, प्रायश्चित्तवर्णन, तिथि-व्रत आदिका वर्णन, वार-व्रतका कथन, नक्षत्रव्रतकी विधिका प्रतिपादन, मासिक व्रतका निर्देश, उत्तम दीपदानविधि, नवव्यूहपूजन, नरक-निरूपण, व्रतों और दानोंकी विधिका प्रतिपादन, नाडीचक्रका संक्षिप्त वर्णन, संध्याकी उत्तम विधि, गायत्रीके अर्थका निर्देश, लिङ्गस्तोत्र, राज्याभिषेकके मन्त्रका प्रतिपादन, राजाओंके धार्मिक कृत्य, स्वप्नसम्बन्धी विचारका अध्याय (या प्रसङ्ग), शकुन आदिका निरूपण, मण्डल आदिका निर्देश, रत्नदीक्षाविधि, रामोक्त नीतिका वर्णन, रत्नोंके लक्षण, धनुर्विद्या, व्यवहारदर्शन, देवासुरसंग्रामकी कथा, आयुर्वेद-निरूपण, गज आदिकी चिकित्सा, उनके रोगोंकी शान्ति, गोचिकित्सा, मनुष्यादि चिकित्सा, नाना प्रकारकी पूजा-पद्धति, विविध प्रकारकी शान्ति, छन्दःशास्त्र, साहित्य, एकाक्षर आदि कोष, सिद्ध शब्दानुशासन (व्याकरण), स्वर्गादि वर्गोंसे युक्त कोश, प्रलयका लक्षण, शारीरक (वेदान्त)-का निरूपण, नरक-वर्णन, योगशास्त्र, ब्रह्मज्ञान तथा पुराणश्रवणका फल—इन विषयोंका प्रतिपादन हुआ है। ब्रह्मन्! यही अग्निपुराण कहा गया है। जो अग्निपुराणको लिखकर सुवर्णमय कमल और तिलमयी धेनुके साथ मार्गशीर्षकी पूर्णिमाके दिन पौराणिक ब्राह्मणको विधिपूर्वक दान देता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार तुम्हें अग्निपुराणकी अनुक्रमणिका बतायी गयी है, जो इसे पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको इहलोक और परलोकमें भी मोक्ष देनेवाली है।

पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३१

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३१

भविष्यपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— अब मैं तुम्हें सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले भविष्यपुराणका वर्णन करता हूँ, जो सब लोगोंके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध करनेवाला है; जिसमें मैं ब्रह्मा सम्पूर्ण देवताओंका आदि स्रष्टा बताया गया हूँ। पूर्वकालमें सृष्टिके लिये स्वयम्भू मनु उत्पन्न हुए। उन्होंने मुझे प्रणाम करके सर्वार्थसाधक धर्मके विषयमें प्रश्न किया। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें धर्मसंहिताका उपदेश किया। परम बुद्धिमान् व्यास जब पुराणोंका विस्तार करने लगे तो उन्होंने उस धर्मसंहिताके पाँच विभाग किये। उनमें नाना प्रकारकी आश्चर्यजनक कथाओंसे युक्त अघोरकल्पका वृत्तान्त है। उस पुराणमें पहला पर्व 'ब्रह्मपर्व' के नामसे प्रसिद्ध है। इसीमें ग्रन्थका उपक्रम है। सूत-शौनक-संवादमें पुराणविषयक प्रश्न है। इसमें अधिकतर सूर्यदेवका ही चरित्र है। अन्य सब उपाख्यान भी इसमें आये हैं। इसमें सृष्टि आदिके लक्षण बताये गये हैं। शास्त्रोंका तो यह सर्वस्वरूप है। इसमें पुस्तक, लेखक और लेख्यका भी लक्षण दिया गया है। सब प्रकारके संस्कारोंका भी लक्षण बताया गया है। पक्षकी आदि सात तिथियोंके सात कल्प कहे गये हैं। अष्टमी आदि तिथियोंके शेष आठ कल्प 'वैष्णवपर्व' में बताये गये हैं। 'शैवपर्व' में ब्रह्मपर्वसे भिन्न कथाएँ हैं। 'सौरपर्व' में अन्तिम कथाओंका सम्बन्ध देखा जाता है। तत्पश्चात् 'प्रतिसर्ग पर्व' है, जिसमें पुराणके उपसंहारका वर्णन है। यह नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे युक्त पाँचवाँ पर्व है। इन पाँच पर्वोंमेंसे पहलेमें मुझ ब्रह्माकी महिमा अधिक है। दूसरे और तीसरे पर्वोंमें धर्म, काम और मोक्ष विषयको लेकर क्रमशः भगवान् विष्णु तथा शिवकी महिमाका वर्णन है। चौथे पर्वमें सूर्यदेवकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। अन्तिम या पाँचवाँ पर्व प्रतिसर्ग नामसे प्रसिद्ध है। इसमें सब प्रकारकी कथाएँ हैं। बुद्धिमान् व्यासजीने इस पर्वका भविष्यकी कथाओंके साथ उल्लेख किया है। भविष्यपुराणकी श्लोक-संख्या चौदह हजार बतायी गयी है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंकी समताका प्रतिपादन किया गया है। ब्रह्म सर्वत्र सम है। गुणोंके तारतम्यसे उसमें विषमता प्रतीत होती है। ऐसा श्रुतिका कथन है। जो विद्वान् ईर्ष्या-द्वेष छोड़कर सुवर्ण, वस्त्र, माला, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और भक्ष्य-भोज्य आदि नैवेद्योंसे विधिपूर्वक वाचक और पुस्तककी पूजा करता है और भविष्यपुराणकी पुस्तकको लिखकर गुड़धेनुके साथ पौषकी पूर्णिमाको उसका दान करता है तथा जो जितेन्द्रिय, निराहार अथवा एक समय हविष्यभोजी एवं एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ और श्रवण करता है, वह भयंकर पातकोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें चला जाता है। जो भविष्यपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भी भोग एवं मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

५३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दान आदिकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं—वत्स! सुनो, अब मैं तुम्हें दसवें पुराण ब्रह्मवैवर्तका परिचय देता हूँ, जो वेदमार्गका साक्षात्कार करानेवाला है। जहाँ देवर्षि नारदको उनके प्रार्थना करनेपर भगवान् सावर्णिने सम्पूर्ण पुराणोक्त विषयका उपदेश किया था। यह पुराण अलौकिक एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका सारभूत है। इसके पाठ और श्रवणसे भगवान् विष्णु और शिवमें प्रीति होती है। उन दोनोंमें अभेद-सिद्धिके लिये इस उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराणका उपदेश किया गया है। मैंने रथन्तर कल्पका जो वृत्तान्त बताया था, उसीको वेदवेत्ता व्यासने संक्षिप्त करके शतकोटिपुराणमें कहा है। व्यासजीने ब्रह्मवैवर्तपुराणके चार भाग किये हैं, जिनके नाम हैं—'ब्रह्मखण्ड', 'प्रकृतिखण्ड' 'गणेशखण्ड' और 'श्रीकृष्णखण्ड'। इन चारों खण्डोंसे युक्त यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बताया गया है। उसमें सूत और महर्षियोंके संवादमें पुराणका उपक्रम है। उसमें पहला प्रकरण सृष्टिवर्णनका है। फिर नारदके और मेरे महान् विवादका वर्णन है, जिसमें दोनोंका पराभव हुआ था। मरीचे! फिर नारदका शिवलोकगमन और भगवान् शिवसे नारदमुनिको ज्ञानकी प्राप्तिका कथन है। तदनन्तर शिवजीके कहनेसे ज्ञानलाभके लिये सावर्णिके सिद्धसेवित आश्रममें, जो परम पुण्यमय तथा त्रिलोकीको आश्चर्यमें डालनेवाला था, नारदजीके जानेकी बात कही गयी है। यह 'ब्रह्मखण्ड' है, जो श्रवण करनेपर सब पापोंका नाश कर देता है। तदनन्तर नारद-सावर्णि-संवादका वर्णन है। इसमें श्रीकृष्णका माहात्म्य तथा नाना प्रकारके आख्यान और कथाएँ हैं। प्रकृतिकी अंशभूत कलाओंके माहात्म्य और पूजन आदिका विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन किया गया है। यह 'प्रकृतिखण्ड' है, जो श्रवण करनेपर ऐश्वर्य प्रदान करता है। तदनन्तर गणेशजन्मके विषयमें प्रश्न किया गया है। पार्वतीजीके द्वारा पुण्यक नामक महाव्रतके अनुष्ठानकी चर्चा है। तत्पश्चात् कार्तिकेय और गणेशजीकी उत्पत्ति कही गयी है। इसके बाद कार्तवीर्य अर्जुन और जमदग्निनन्दन परशुरामजीके अद्भुत चरित्रका वर्णन है, फिर गणेश और परशुरामजीमें जो महान् विवाद हुआ था, उसका उल्लेख किया गया है। यह 'गणेशखण्ड' है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। तदनन्तर श्रीकृष्णजन्मके विषयमें प्रश्न और उनके जन्मकी अद्भुत कथा है। फिर गोकुलमें गमन तथा पूतना आदिके वधकी आश्चर्यमयी कथा है। तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी बाल्यावस्था और कुमारावस्थाकी विविध लीलाओंका वर्णन है। उसके बाद शरत्पूर्णिमाकी रात्रिमें गोपसुन्दरियोंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ाका वर्णन है। रहस्यमें श्रीराधाके साथ उनकी क्रीड़ाका बहुत विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् अक्रूरजीके साथ श्रीकृष्णके मथुरागमनकी कथा है। कंस आदिका वध हो जानेके बाद श्रीकृष्णके द्विजोचित संस्कारका उल्लेख है। फिर काश्य गोत्रोत्पन्न सान्दीपनि मुनिसे उनके विद्याग्रहणकी अद्भुत कथा है। तदनन्तर कालयवनका वध, श्रीकृष्णका द्वारकागमन तथा वहाँ उनके द्वारा की हुई नरकासुर आदिके वधकी अद्भुत लीलाओंका वर्णन है। ब्रह्मन्! यह 'श्रीकृष्णखण्ड' है, जो पढ़ने, सुनने, ध्यान करने, पूजा करने अथवा नमस्कार करनेपर भी मनुष्योंके संसार-दुःखका खण्डन करनेवाला है। व्यासजीके द्वारा कहे हुए इस प्राचीन और अलौकिक ब्रह्मवैवर्तपुराणका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला मनुष्य ज्ञान-विज्ञानका नाश करनेवाले भयंकर संसार-सागरसे मुक्त हो जाता है। जो इस पुराणको लिखकर

पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३३

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३३

माघकी पूर्णिमाको प्रत्यक्ष धेनुके साथ इसका दान करता है, वह अज्ञानबन्धनसे मुक्त हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है। जो इस विषय-सूचीको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मनोवाञ्छित फल पा लेता है।


लिङ्गपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल

ब्रह्माजी कहते हैं—बेटा! सुनो, अब मैं लिङ्गपुराणका वर्णन करता हूँ, जो पढ़ने तथा सुननेवालोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् शङ्करने अग्निलिङ्गमें स्थित होकर अग्नि-कल्पकी कथाका आश्रय ले धर्म आदिकी सिद्धिके लिये मुझे जिस लिङ्गपुराणका उपदेश किया था, उसीको व्यासदेवने दो भागोंमें बाँटकर कहा है। अनेक प्रकारके उपाख्यानोंसे विचित्र प्रतीत होनेवाला यह लिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंसे युक्त है और भगवान् शिवकी महिमाका सूचक है। यह सब पुराणोंमें श्रेष्ठ तथा त्रिलोकीका सारभूत है। पुराणके आरम्भमें पहले प्रश्न है। फिर संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् योगाख्यान और कल्पाख्यानका वर्णन है। इसके बाद लिङ्गके प्रादुर्भाव और उसकी पूजाकी विधि बतायी गयी है। फिर सनत्कुमार और शैल आदिका पवित्र संवाद है। तदनन्तर दधीचि-चरित्र, युगधर्मनिरूपण, भुवन-कोश-वर्णन तथा सूर्यवंश और चन्द्रवंशका परिचय है। तत्पश्चात् विस्तारपूर्वक सृष्टिवर्णन, त्रिपुरकी कथा, लिङ्गप्रतिष्ठा तथा पशुपाश-विमोक्षका प्रसङ्ग है। भगवान् शिवके व्रत, सदाचार-निरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी तथा श्रीशैलका वर्णन है। फिर अन्धकासुरकी कथा, वाराह-चरित्र, नृसिंह-चरित्र और जलन्धर-वधकी कथा है। तदनन्तर शिवसहस्रनाम, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस, मदन-दहन और पार्वतीके पाणिग्रहणकी कथा है। तत्पश्चात् विनायककी कथा, भगवान् शिवके ताण्डव-नृत्य-प्रसङ्ग तथा उपमन्युकी कथा है। ये सब विषय लिङ्गपुराणके पूर्वभागमें कहे गये हैं। मुने! इसके बाद विष्णुके माहात्म्यका कथन, अम्बरीषकी कथा तथा सनत्कुमार और नन्दीश्वरका संवाद है। फिर शिव-माहात्म्यके साथ ज्ञान, याग आदिका वर्णन, सूर्यपूजाकी विधि तथा मुक्तिदायिनी शिवपूजाका वर्णन है। तदनन्तर अनेक प्रकारके दान कहे गये हैं। फिर श्राद्ध-प्रकरण और प्रतिष्ठातन्त्रका वर्णन है। तत्पश्चात् अघोरकीर्तन, वज्रेश्वरी महाविद्या, गायत्री-महिमा, त्र्यम्बक-माहात्म्य और पुराणश्रवणके फलका वर्णन है। इस प्रकार मैंने तुम्हें व्यासरचित लिङ्गपुराणके उत्तरभागका परिचय दिया है। यह भगवान् रुद्रके माहात्म्यका सूचक है। जो इस पुराणको लिखकर फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक इसका दान करता है। वह जरा-मृत्युरहित शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य पापनाशक लिङ्गपुराणका पाठ या श्रवण करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्तमें शिवलोकको चला जाता है। वे दोनों भगवान् शिवके भक्त हैं और गिरिजावल्लभ शिवके प्रसादसे इहलोक और परलोकका यथावत् उपभोग करते हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

५३४* संक्षिप्त नारदपुराण *

वाराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य

**श्रीब्रह्माजी कहते हैं—**वत्स! सुनो, अब मैं वाराहपुराणका वर्णन करता हूँ। यह दो भागोंसे युक्त है और सनातन भगवान् विष्णुके माहात्म्यका सूचक है। पूर्वकालमें मेरे द्वारा निर्मित जो मानव-कल्पका प्रसङ्ग है, उसीको विद्वानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् नारायणस्वरूप वेदव्यासने भूतलपर इस पुराणमें लिपिबद्ध किया है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार है। इसमें सबसे पहले पृथ्वी और वाराहभगवान्‌का शुभ संवाद है। तदनन्तर आदि सत्ययुगके वृत्तान्तमें रैभ्यका चरित्र है। फिर दुर्जयके चरित्र और श्राद्धकल्पका वर्णन है। तत्पश्चात् महातपाका आख्यान, गौरीकी उत्पत्ति, विनायक, नागगण, सेनानी (कार्तिकेय), आदित्यगण, देवी, धनद तथा वृषका आख्यान है। उसके बाद सत्यतपाके व्रतकी कथा दी गयी है। तदनन्तर अगस्त्यगीता तथा रुद्रगीता कही गयी है। महिषासुरके विध्वंसमें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनोंकी शक्तियोंका माहात्म्य प्रकट किया गया है। तत्पश्चात् पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदानिक इत्यादि सत्ययुगका वृत्तान्त मैंने प्रथम भागमें दिखाया है। फिर भगवद्धर्ममें व्रत और तीर्थोंकी कथाएँ हैं। बत्तीस अपराधोंका शारीरिक प्रायश्चित्त बताया गया है। प्रायः सभी तीर्थोंके पृथक्-पृथक् माहात्म्यका वर्णन है। मथुराकी महिमा विशेषरूपसे दी गयी है। उसके बाद श्राद्ध आदिकी विधि है। तदनन्तर ऋषिपुत्रके प्रसङ्गसे यमलोकका वर्णन, कर्मविपाक एवं विष्णुव्रतका निरूपण है। गोकर्णके पापनाशक माहात्म्यका भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार वाराहपुराणका यह पूर्वभाग कहा गया है। उत्तर भागमें पुलस्त्य और पुरुराजके संवादमें विस्तारके साथ सब तीर्थोंके माहात्म्यका पृथक्-पृथक् वर्णन है। फिर सम्पूर्ण धर्मोंकी व्याख्या और पुष्कर नामक पुण्य-पर्वका भी वर्णन है। इस प्रकार मैंने तुम्हें पापनाशक वाराहपुराणका परिचय दिया है। यह पढ़ने और सुननेवालोंके मनमें भगवद्भक्ति बढ़ानेवाला है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर और सोनेकी गरुड़-प्रतिमा बनवाकर तिलधेनुके साथ चैत्रकी पूर्णिमाके दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दान देता है, वह देवताओं तथा महर्षियोंसे वन्दित होकर भगवान् विष्णुका धाम प्राप्त कर लेता है। जो वाराहपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका श्रवण या पाठ करता है, वह भी भगवान् विष्णुके चरणोंमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाली भक्ति प्राप्त कर लेता है।


पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३५

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३५

स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—वत्स ! सुनो, अब मैं स्कन्दपुराणका वर्णन करता हूँ, जिसके पद-पदमें साक्षात् महादेवजी स्थित हैं। मैंने शतकोटि पुराणमें जो शिवकी महिमाका वर्णन किया है, उसके सारभूत अर्थका व्यासजीने स्कन्दपुराणमें वर्णन किया है। उसमें सात खण्ड किये गये हैं। सब पापोंका नाश करनेवाला स्कन्दपुराण इक्यासी हजार श्लोकोंसे युक्त है। जो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह साक्षात् भगवान् शिव ही है। इसमें स्कन्दके द्वारा उन शैव धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, जो तत्पुरुष कल्पमें प्रचलित थे। वे सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। इसके पहले खण्डका नाम 'माहेश्वरखण्ड' है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। इसमें बारह हजारसे कुछ कम श्लोक हैं। यह परम पवित्र तथा विशाल कथाओंसे परिपूर्ण है। इसमें सैकड़ों उत्तम चरित्र हैं तथा यह खण्ड स्कन्दस्वामीके माहात्म्यका सूचक है। माहेश्वरखण्डके भीतर केदारमाहात्म्यमें पुराणका आरम्भ हुआ है। इसमें पहले दक्षयज्ञकी कथा है। इसके बाद शिवलिङ्ग-पूजनका फल बताया गया है। इसके बाद समुद्र-मन्थनकी कथा और देवराज इन्द्रके चरित्रका वर्णन है। फिर पार्वतीका उपाख्यान और उनके विवाहका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् कुमारस्कन्दकी उत्पत्ति और तारकासुरके साथ उनके युद्धका वर्णन है। फिर पाशुपतका उपाख्यान और चण्डकी कथा है। फिर दूतकी नियुक्तिका कथन और नारदजीके साथ समागमका वृत्तान्त है। उसके बाद कुमार-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पञ्चतीर्थकी कथा है। धर्मवर्मा राजाकी कथा तथा नदियों और समुद्रका वर्णन है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्न और नाड़ीजङ्घकी कथा है। फिर महीनदीके प्रादुर्भाव और दमनककी कथा है। तत्पश्चात् मही-सागर-संगम और कुमारेशका वृत्तान्त है। इसके बाद नाना प्रकारके उपाख्यानोंसहित तारकयुद्ध और तारकासुरके वधका वर्णन है। फिर पञ्चलिङ्ग-स्थापनकी कथा आयी है। तदनन्तर द्वीपोंका पुण्यमय वर्णन, ऊपरके लोकोंकी स्थिति, ब्रह्माण्डकी स्थिति और उसका मान तथा वर्केरेशकी कथा है। महाकालका प्रादुर्भाव और उसकी परम अद्भुत कथा है। फिर वासुदेवका माहात्म्य और कोटितीर्थका वर्णन है। तदनन्तर गुप्तक्षेत्रमें नाना तीर्थोंका आख्यान कहा गया है। पाण्डवोंकी पुण्यमयी कथा और बर्बरीककी सहायतासे महाविद्याके साधनका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् तीर्थयात्राकी समाप्ति है। तदनन्तर अरुणाचलका माहात्म्य तथा सनक और ब्रह्माजीका संवाद है। गौरीकी तपस्याका वर्णन तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका वर्णन है। महिषासुरकी कथा और उसके वधका परम अद्भुत प्रसङ्ग कहा गया है। द्रोणाचल पर्वतपर भगवान् शिवका नित्य निवास बताया गया है। इस प्रकार स्कन्दपुराणमें यह अद्भुत 'माहेश्वरखण्ड' कहा गया है।

दूसरा 'वैष्णवखण्ड' है। अब उसके आख्यानोंका मुझसे श्रवण करो। पहले भूमि-वराह-संवादका वर्णन है, जिसमें वेङ्कटाचलका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। फिर कमलाकी पवित्र कथा और श्रीनिवासकी स्थितिका वर्णन है। तदनन्तर कुम्हारकी कथा तथा सुवर्णमुखरी नदीके माहात्म्यका वर्णन है। फिर अनेक उपाख्यानोंसे युक्त भरद्वाजकी अद्भुत कथा है। इसके बाद मतङ्ग और अञ्जनके पापनाशक संवादका वर्णन है। फिर उत्कलप्रदेशके पुरुषोत्तमक्षेत्रका माहात्म्य कहा गया है। तत्पश्चात् मार्कण्डेयजीकी कथा, राजा अम्बरीषका वृत्तान्त, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और विद्यापतिकी शुभ कथाका उल्लेख है। ब्रह्मन् ! इसके बाद जैमिनि और नारदका आख्यान है,

५३६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कार्तिकमासमें प्रत्येक दिनके कृत्यका वर्णन है। अन्तमें भीष्मपञ्चकव्रतका प्रतिपादन किया गया है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है।

तत्पश्चात् मार्गशीर्षके माहात्म्यमें स्नानकी विधि बतायी गयी है। फिर पुण्ड्रादि-कीर्तन और माला-धारणका पुण्य कहा गया है। भगवान्‌को पञ्चामृतसे स्नान करानेका तथा घण्टा बजाने आदिका पुण्य फल बताया गया है। नाना प्रकारके फूलोंसे भगवत्पूजनका फल और तुलसीदलका माहात्म्य कहा गया है। भगवान्‌को नैवेद्य लगानेकी महिमा, एकादशीके दिन कीर्तन, अखण्ड एकादशी-व्रत रहनेका पुण्य और एकादशीकी रातमें जागरण करनेका फल बताया गया है। इसके बाद मत्स्योत्सवका विधान और नाममाहात्म्यका कीर्तन है। भगवान्‌के ध्यान आदिका पुण्य तथा मथुराका माहात्म्य बताया गया है। मथुरातीर्थका उत्तम माहात्म्य अलग कहा गया है और वहाँके बारह वनोंकी महिमाका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् इस पुराणमें श्रीमद्भागवतके उत्तम माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रसङ्गमें वज्रनाभ और शाण्डिल्यके संवादका उल्लेख किया गया है, जो व्रजकी आन्तरिक लीलाओंका प्रकाशक है। तदनन्तर माघमासमें स्नान, दान और जप करनेका माहात्म्य बताया गया है, जो नाना प्रकारके आख्यानोंसे युक्त है। माघ-माहात्म्यका दस अध्यायोंमें प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् वैशाख-माहात्म्यमें शय्यादान आदिका फल कहा गया है। फिर जलदानकी विधि, कामोपाख्यान, शुकदेवचरित, व्याधकी अद्भुत कथा और अक्षयतृतीया आदिके पुण्यका विशेषरूपसे वर्णन है। इसके बाद अयोध्या-माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें चक्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, पापमोचनतीर्थ, सहस्रधारातीर्थ, स्वर्गद्वारतीर्थ, चन्द्रहरितीर्थ, धर्महरितीर्थ, स्वर्णवृष्टितीर्थकी कथा और तिलोदा-सरयू-संगमका वर्णन है। तदनन्तर सीताकुण्ड, गुप्तहरितीर्थ, सरयू-घाघरा-संगम,

फिर नीलकण्ठ और नृसिंहका वर्णन है। तदनन्तर अश्वमेध यज्ञकी कथा और राजाका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया है। तत्पश्चात् रथयात्रा-विधि और जप तथा स्नानकी विधि कही गयी है। फिर दक्षिणामूर्तिका उपाख्यान और गुण्डिचाकी कथा है। रथ-रक्षाकी विधि और भगवान्‌के शयनोत्सवका वर्णन है। इसके बाद राजा श्वेतका उपाख्यान कहा गया है। फिर पृथु-उत्सवका निरूपण है। भगवान्‌के दोलोत्सव तथा सांवत्सरिक-व्रतका वर्णन है। तदनन्तर उद्दालकके नियोगसे भगवान् विष्णुकी निष्काम पूजाका प्रतिपादन किया गया है। फिर मोक्ष-साधन बताकर नाना प्रकारके योगोंका निरूपण किया गया है। तत्पश्चात् दशावतारकी कथा और स्नान आदिका वर्णन है। इसके बाद बदरिकाश्रम-तीर्थका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। उस प्रसङ्गमें अग्नि आदि तीर्थों और गरुड़-शिलाकी महिमा है। वहाँ भगवान्‌के निवासका कारण बताया गया है। फिर कपालमोचन-तीर्थ, पञ्चधारा-तीर्थ और मेरुसंस्थानकी कथा है। तदनन्तर कार्तिकमासका माहात्म्य प्रारम्भ होता है। उसमें मदनालसके माहात्म्यका वर्णन है। धूम्रकेशका उपाख्यान और

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५३७ ---|---

गोप्रचारतीर्थ, क्षीरोदकतीर्थ और बृहस्पतिकुण्ड आदि पाँच तीर्थोंकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् घोषार्क आदि तेरह तीर्थोंका वर्णन है। फिर गयाकूपके सर्वपापनाशक माहात्म्यका कथन है। तदनन्तर माण्डव्याश्रम आदि, अजित आदि तथा मानस आदि तीर्थोंका वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह दूसरा 'वैष्णवखण्ड' कहा गया है।

मरीचे ! इसके बाद परम पुण्यदायक 'ब्रह्म-खण्ड' का वर्णन सुनो, जिसमें पहले सेतुमाहात्म्य प्रारम्भ करके वहाँके स्नान और दर्शनका फल बताया गया है। फिर गालवकी तपस्या तथा राक्षसकी कथा है। तत्पश्चात् देवीपत्तनमें चक्रतीर्थ आदिकी महिमा, वेतालतीर्थका माहात्म्य और पापनाश आदिका वर्णन है। मङ्गल आदि तीर्थोंका माहात्म्य, ब्रह्मकुण्ड आदिका वर्णन, हनुमत्कुण्डकी महिमा तथा अगस्त्यतीर्थके फलका कथन है। रामतीर्थ आदिका वर्णन, लक्ष्मीतीर्थका निरूपण, शङ्ख आदि तीर्थोंकी महिमा तथा साध्यामृत आदि तीर्थोंके प्रभावका वर्णन है। इसके बाद धनुषकोटि आदिका माहात्म्य, क्षीरकुण्ड आदिकी महिमा तथा गायत्री आदि तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन है। फिर रामेश्वरकी महिमा, तत्त्वज्ञानका उपदेश तथा सेतु-यात्रा-विधिका वर्णन है, जो मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है। तत्पश्चात् धर्मारण्यका उत्तम माहात्म्य बताया गया है, जिसमें भगवान् शिवने स्कन्दको तत्त्वका उपदेश किया है। फिर धर्मारण्यका प्रादुर्भाव, उसके पुण्यका वर्णन, कर्मसिद्धिका उपाख्यान तथा ऋषिवंशका निरूपण है। तदनन्तर वहाँ अप्सरा-सम्बन्धी मुख्य तीर्थोंका माहात्म्य कहा गया है। इसके बाद वर्णाश्रम-धर्मके तत्त्वका निरूपण किया गया है। तदनन्तर देवस्थान-विभाग और बकुलादित्यकी शुभ कथाका वर्णन है। वहाँ छत्रानन्दा, शान्ता, श्रीमाता, मातङ्गिनी और पुण्यदा—ये पाँच देवियाँ सदा स्थित बतायी गयी हैं। इसके बाद वहाँ इन्द्रेश्वर आदिकी महिमा तथा द्वारका आदिका निरूपण है। लोहासुरकी कथा, गङ्गाकूपका वर्णन, श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र तथा सत्यमन्दिरका वर्णन है। फिर जीर्णोद्धारकी महिमाका कथन, आसन-दान, जातिभेद-वर्णन तथा स्मृति-धर्मका निरूपण है। तत्पश्चात् अनेक उपाख्यानोंसे युक्त वैष्णव-धर्मोंका वर्णन है। तदनन्तर पुण्यमय चातुर्मास्यका माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें पालन करने योग्य सब धर्मोंका निरूपण किया गया है। फिर दानकी प्रशंसा, व्रतकी महिमा, तपस्या और पूजाका माहात्म्य तथा सच्छूद्रका कथन है। तदनन्तर प्रकृतियोंके भेदका वर्णन, शालग्रामके तत्त्वका निरूपण, तारकासुरके वधका उपाय, गरुड़-पूजनकी महिमा, विष्णुका शाप, वृक्षभावकी प्राप्ति, पार्वतीका अनुनय, भगवान् शिवका ताण्डवनृत्य, राम-नामकी महिमाका निरूपण, शिव-लिङ्गपतनकी कथा, पैजवन शूद्रकी कथा, पार्वतीजीका जन्म और चरित्र, तारकासुरका अद्भुत वध, प्रणवके ऐश्वर्यका कथन, तारकासुरके चरित्रका पुनर्वर्णन, दक्ष-यज्ञकी समाप्ति, द्वादशाक्षरमन्त्रका निरूपण, ज्ञानयोगका वर्णन, द्वादश सूर्योंकी महिमा तथा चातुर्मास्य-माहात्म्यके श्रवण आदिके पुण्यका वर्णन किया गया है, जो मनुष्योंके लिये कल्याणदायक है। तदनन्तर ब्राह्मोत्तर भागमें भगवान् शिवकी अद्भुत महिमा, पञ्चाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य तथा गोकर्णकी महिमाका वर्णन है। तत्पश्चात् शिवरात्रिकी महिमा, प्रदोषव्रतका वर्णन तथा सोमवार-व्रतकी महिमा एवं सीमन्तिनीकी कथा है। फिर भद्रायुकी उत्पत्तिका वर्णन, सदाचार-निरूपण, शिवकवचका उपदेश, भद्रायुके विवाहका वर्णन, भद्रायुकी महिमा, भस्म-माहात्म्य-वर्णन, शबरका उपाख्यान, उमा-महेश्वर-व्रतकी महिमा, रुद्राक्षका माहात्म्य, रुद्राध्यायके पुण्य तथा ब्रह्मखण्डके श्रवण आदिकी पुण्यमयी महिमाका वर्णन है। इस प्रकार यह

'ब्रह्मखण्ड' बताया गया है।

५३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

'ब्रह्मखण्ड' बताया गया है।

इसके बाद चौथा परम उत्तम 'काशीखण्ड' है, जिसमें विन्ध्यपर्वत और नारदजीके संवादका वर्णन है। फिर सत्यलोकका प्रभाव, अगस्त्यके आश्रममें देवताओंका आगमन, पतिव्रताच्ररित्र तथा तीर्थयात्राकी प्रशंसा है। तदनन्तर सप्तपुरीका वर्णन, संयमिनीका निरूपण, शिवशर्माको सूर्य, इन्द्र और अग्निके लोककी प्राप्तिका उल्लेख है। अग्निका प्रादुर्भाव, निर्ऋति तथा वरुणकी उत्पत्ति, गन्धवती, अलकापुरी और ईशानपुरीके उद्भवका वर्णन, चन्द्र, सूर्य, बुध, मङ्गल तथा बृहस्पतिके लोक, ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, ध्रुवलोक और तपोलोकका वर्णन है। तत्पश्चात् ध्रुवलोककी पुण्यमयी कथा, सत्यलोकका निरीक्षण, स्कन्द-अगस्त्य-संवाद, मणिकर्णिकाकी उत्पत्ति, गङ्गाजीका प्राकट्य, गङ्गासहस्रनाम, काशीपुरीकी प्रशंसा, भैरवका आविर्भाव, दण्डपाणि तथा ज्ञानवापीका उद्भव, कलावतीकी कथा, सदाचारनिरूपण, ब्रह्मचारीका आख्यान, स्त्रीके लक्षण, कर्तव्याकर्तव्यका निर्देश, अविमुक्तेश्वरका वर्णन, गृहस्थ योगीके धर्म, कालज्ञान, दिवोदासकी पुण्यमयी कथा, काशीका वर्णन, भूतलपर मायागणपतिका प्रादुर्भाव, विष्णुमायाका प्रपञ्च, दिवोदासका मोक्ष, पञ्चनदतीर्थकी उत्पत्ति, बिन्दुमाधवका प्राकट्य, तदनन्तर काशीका वैष्णवतीर्थ कहलाना; फिर शूलधारी शङ्करका काशीमें आगमन, जैगीषव्यके साथ संवाद, महेश्वरका ज्येष्ठेश्वर नाम होना, क्षेत्राख्यान, कन्दुकेश्वर और व्याघ्रेश्वरका प्रादुर्भाव, शैलेश्वर, रत्नेश्वर तथा कृत्तिवासेश्वरका प्राकट्य, देवताओंका अधिष्ठान, दुर्गासुरका पराक्रम, दुर्गाजीकी विजय, ॐकारेश्वरका वर्णन, पुनः ॐकारका माहात्म्य, त्रिलोचनका प्रादुर्भाव, केदारेश्वरका आख्यान, धर्मेश्वरकी कथा, विष्णुभुजाका प्राकट्य, वीरेश्वरका आख्यान, गङ्गा-माहात्म्यकीर्तन, विश्वकर्मेश्वरकी महिमा, दक्षयज्ञोद्भव, सतीश और अमृतेश आदिका माहात्म्य, पराशरनन्दन व्यासजीकी भुजाओंका स्तम्भन, क्षेत्रके तीर्थोंका समुदाय, मुक्तिमण्डपकी कथा, विश्वनाथजीका वैभव, तदनन्तर काशीकी यात्रा और परिक्रमाका वर्णन—ये 'काशीखण्ड'के विषय हैं।

तदनन्तर पाँचवें 'अवन्तीखण्ड'का वर्णन सुनो। इसमें महाकालवनका आख्यान, ब्रह्माजीके मस्तकका छेदन, प्रायश्चित्तविधि, अग्निकी उत्पत्ति, देवताओंका आगमन, देवदीक्षा, नाना प्रकारके पातकोंका नाश करनेवाला शिवस्तोत्र, कपालमोचनकी कथा, महाकालवनकी स्थिति, कलकलेश्वरका सर्वपापनाशक तीर्थ, अप्सराकुण्ड, पुण्यदायक रुद्रसरोवर, कुटुम्बेश, विद्याधरेश्वर तथा मर्कटेश्वर तीर्थका वर्णन है। तत्पश्चात् स्वर्गद्वार, चतुःसिन्धुतीर्थ, शङ्करवापिका, शङ्करादित्य, पापनाशक गन्धवतीतीर्थ, दशाश्वमेधिकतीर्थ, अनशंतीर्थ, हरिसिद्धिप्रदतीर्थ, पिशाचादियात्रा, हनुमदीश्वर, कवचेश्वर, महाकालेश्वरयात्रा, वल्मीकेश्वरतीर्थ, शुक्रेश्वर और नक्षत्रेश्वरतीर्थका उपाख्यान, कुशस्थलीकी परिक्रमा, अक्रूरतीर्थ, एकपादतीर्थ, चन्द्रार्कवैभवतीर्थ, करभेशतीर्थ, लड्डुकेश आदि तीर्थ, मार्कण्डेश्वरतीर्थ, यज्ञवापीतीर्थ, सोमेश्वरतीर्थ, नरकान्तकतीर्थ, केदारेश्वर, रामेश्वर, सौभाग्येश्वर तथा नरादित्यतीर्थ, केशवादित्य, शक्तिभेदतीर्थ, स्वर्णसारमुखतीर्थ, ॐकारेश्वर आदि तीर्थ, अन्धकासुरके द्वारा स्तुति-कीर्तन, कालवनमें शिवलिङ्गोंकी संख्या तथा स्वर्णशृङ्गेश्वरतीर्थका वर्णन है। फिर कुशस्थली, अवन्ती एवं उज्जयिनीपुरीके पद्मावती, कुमुद्वती, अमरावती, विशाला तथा प्रतिकल्प—इन नामोंका उल्लेख है। इनका उच्चारण ज्वरकी शान्ति करनेवाला है। तत्पश्चात् शिप्रामें स्नान आदिका फल, नागोंद्वारा की हुई भगवान् शिवकी स्तुति, हिरण्याक्षवधकी कथा, सुन्दरकुण्डकतीर्थ, नीलगङ्गा, पुष्करतीर्थ, विन्ध्यवासनतीर्थ, पुरुषोत्तमतीर्थ, अघनाशनतीर्थ, गोमतीतीर्थ, वामनकुण्ड, विष्णुसहस्रनाम, वीरेश्वर सरोवर, कालभैरवतीर्थ, नागपञ्चमीकी महिमा,

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५३९ ---|--- नृसिंहजयन्ती, कुटुम्बेश्वरयात्रा, देवसाधककीर्तन, कर्कराज नामक तीर्थ, विघ्नेशादितीर्थ और सुरोहनतीर्थका वर्णन किया गया है। रुद्रकुण्ड आदिमें अनेक तीर्थोंका निरूपण किया गया है। तदनन्तर आठ तीर्थोंकी पुण्यमयी यात्राका वर्णन है। इसके बाद नर्मदानदीका माहात्म्य बतलाया गया है, जिसमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके वैराग्य तथा मार्कण्डेयजीके साथ उनके समागमका वर्णन है।<br><br>तदनन्तर पहलेके प्रलयकालीन अनुभवका वर्णन, अमृत-कीर्तन, कल्प-कल्पमें नर्मदाके पृथक्-पृथक् नामोंका वर्णन, नर्मदाजीका आर्षस्तोत्र, कालरात्रिकी कथा, महादेवजीकी स्तुति, पृथक् कल्पकी अद्भुत कथा, विशल्याकी कथा, जालेश्वरकी कथा, गौरीव्रतका वर्णन, त्रिपुरदाहकी कथा, देहपातविधि, कावेरीसङ्गम, दारुतीर्थ, ब्रह्मावर्त, ईश्वरकथा, अग्नितीर्थ, सूर्यतीर्थ, मेघनादादितीर्थ, दारुकतीर्थ, देवतीर्थ, नर्मदेशतीर्थ, कपिलातीर्थ, करञ्जकतीर्थ, कुण्डलेशतीर्थ, पिप्पलादतीर्थ, विमलेश्वरतीर्थ, शूलभेदनतीर्थ, शचीहरणकी कथा, अभ्रकका वध, शूलभेदोद्भवतीर्थ, पृथक्-पृथक् दानधर्म, दीर्घतपाकी कथा, ऋष्यशृङ्गका उपाख्यान, चित्रसेनकी पुण्यमयी कथा, काशिराजका मोक्ष, देवशिलाकी कथा, शबरीतीर्थ, पवित्र व्याधोपाख्यान, पुष्करिणीतीर्थ, अर्कतीर्थ, आदित्येश्वरतीर्थ, शक्रतीर्थ, करोटिकतीर्थ, कुमारेश्वरतीर्थ, अगस्त्येश्वरतीर्थ, आनन्देश्वरतीर्थ, मातृतीर्थ, लोकेश्वर, धनेश्वर, मङ्गलेश्वर तथा कामजतीर्थ, नागेश्वरतीर्थ, गोपारीतीर्थ, गौतमतीर्थ, शङ्खचूडतीर्थ, नारदेश्वरतीर्थ, नन्दिकेश्वरतीर्थ, वरणेश्वरतीर्थ, दधिस्कन्दादितीर्थ, हनुमदीश्वरतीर्थ, रामेश्वर आदि तीर्थ, सोमेश्वर, पिङ्गलेश्वर, ऋणमोक्षेश्वर, कपिलेश्वर, पूतिकेश्वर, जलेशय, चण्डार्क, यमतीर्थ, काल्होडीश्वर, नन्दिकेश्वर, नारायणेश्वर, कोटीश्वर, व्यासतीर्थ, प्रभासतीर्थ, नागेश्वरतीर्थ, संकर्षणतीर्थ, प्रश्रयेश्वरतीर्थ, पुण्यमय एरण्डी-सङ्गमतीर्थ, सुवर्णशिलतीर्थ, करञ्जतीर्थ, | कामरतीर्थ, भाण्डीरतीर्थ, रोहिणीभवतीर्थ, चक्रतीर्थ, धौतपापतीर्थ, आङ्गिरसतीर्थ, कोटितीर्थ, अन्योन्यतीर्थ, अङ्गारतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, इन्द्रेशतीर्थ, कम्बुकेशतीर्थ, सोमेशतीर्थ, कोहलेशतीर्थ, नर्मदातीर्थ, अर्कतीर्थ, आग्नेयतीर्थ, उत्तम भार्गवेश्वरतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ, दैवतीर्थ, मार्गेशतीर्थ, आदिवाहेश्वर, रामेश्वरतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ, अहल्यातीर्थ, कंकटेश्वरतीर्थ, शक्रतीर्थ, सोमतीर्थ, नादेशतीर्थ, कोयेशतीर्थ, रुक्मिणीसम्भवतीर्थ, योजनेशतीर्थ, वराहेशतीर्थ, द्वादशीतीर्थ, शिवतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ, मङ्गलेश्वरतीर्थ, लिङ्गवाराहतीर्थ, कुण्डेशतीर्थ, श्वेतवाराहतीर्थ, भार्गवेशतीर्थ, रवीश्वरतीर्थ, शुक्ल आदि तीर्थ, हुङ्कारस्वामितीर्थ, सङ्गमेश्वरतीर्थ, नहुषेश्वरतीर्थ, मोक्षणतीर्थ, पञ्चगोपदतीर्थ, नागशावकतीर्थ, सिद्धेशतीर्थ, मार्कण्डेयतीर्थ, अक्रूरतीर्थ, कामोदतीर्थ, शूलारोपतीर्थ, माण्डव्यतीर्थ, गोपकेश्वरतीर्थ, कपिलेश्वरतीर्थ, पिङ्गलेश्वरतीर्थ, भूतेश्वरतीर्थ, गङ्गातीर्थ, गौतमतीर्थ, अश्वमेधतीर्थ, भृगुकच्छतीर्थ, पापनाशक केदारेशतीर्थ, कलकलेश (या कनखलेश) तीर्थ, जालेशतीर्थ, शालग्रामतीर्थ, वराहतीर्थ, चन्द्रप्रभाततीर्थ, आदित्यतीर्थ, श्रीपदतीर्थ, हंसतीर्थ, मूलस्थानतीर्थ, शूलेश्वरतीर्थ, उग्रतीर्थ, चित्रदैवकतीर्थ, शिखीश्वरतीर्थ, कोटितीर्थ, दशकन्यतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, भारभूतितीर्थ, पुङ्खमुण्डित तीर्थ, आमलेशतीर्थ, कपालेशतीर्थ, शृङ्गेरण्डीतीर्थ, कोटितीर्थ और लोटलेशतीर्थ आदिका वर्णन है। इसके बाद फलस्तुति कही गयी है। तदनन्तर कृमिजङ्गलमाहात्म्यके प्रसङ्गमें रोहिताश्वकी कथा, धुन्धुमारका उपाख्यान, उसके वधका उपाय, धुन्धु-वध, चित्रवहका उद्भव, उसकी महिमा, चण्डीशका प्रभाव, रतीश्वर, केदारेश्वर, लक्षतीर्थ, विष्णुपदी तीर्थ, मुखारतीर्थ, च्यवनान्त्यतीर्थ, ब्रह्मसरोवर, चक्रतीर्थ, ललितोपाख्यान, बहुगोमुखतीर्थ, रुद्रावर्ततीर्थ, मार्कण्डेयतीर्थ, पापनाशकर्तीर्थ, श्रवणेशतीर्थ, शुद्धपटतीर्थ, देवान्धुप्रेततीर्थ,

५४० * संक्षिप्त नारदपुराण *

जिह्वोदतीर्थका प्राकट्य, शिवोद्भेदतीर्थ और फल-श्रुति—इन विषयोंका वर्णन है। यह सब 'अवन्ती-खण्ड'का वर्णन किया गया है, जो श्रोताओंके पापका नाश करनेवाला है।

इसके अनन्तर 'नागरखण्ड'का परिचय दिया जाता है। इसमें लिङ्गोत्पत्तिका वर्णन, हरिश्चन्द्रकी शुभ कथा, विश्वामित्रका माहात्म्य, त्रिशंकुका स्वर्गलोकमें गमन, हाटकेश्वर-माहात्म्यके प्रसङ्गमें वृत्रासुरका वध, नागबिल, शङ्खतीर्थ, अचलेश्वरका वर्णन, चमत्कारपुरकी चमत्कारपूर्ण कथा, गयशीर्षतीर्थ, बालशतीर्थ, बालमण्डतीर्थ, मृगतीर्थ, विष्णुपद, गोकर्ण, युगरूप, समाश्रय तथा सिद्धेश्वरतीर्थ, नागसरोवर, सप्तर्षितीर्थ, अगस्त्यतीर्थ, भ्रूणगर्त, नलेश्वतीर्थ, भीष्मतीर्थ, वैडूरमरकततीर्थ, शर्मिष्ठातीर्थ, सोमनाथतीर्थ, दुर्गातीर्थ, आनर्तकेश्वरतीर्थ, जमदग्निवधकी कथा, परशुरामद्वारा क्षत्रियोंके संहारका कथानक, रामह्रद, नागपुरतीर्थ, षड्लिङ्कतीर्थ, यज्ञभूतीर्थ, मुण्डीरादित्यतीर्थ, त्रिकार्कतीर्थ, सतीपरिणयतीर्थ, रुद्रशीर्षतीर्थ, योगेशतीर्थ, बालखिल्यतीर्थ, गरुड़तीर्थ, लक्ष्मीजीका शाप, सप्तविंशतीर्थ, सोमप्रासादतीर्थ, अम्बावृद्धतीर्थ, अग्नितीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, गोमुखतीर्थ, लोहयष्टितीर्थ, अजापालेश्वरीदेवी, शनैश्चरतीर्थ, राजवापी, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, कुशेश्वर, लवेश्वरलिङ्ग, सर्वोत्तमत्तम अड़सठ तीर्थोंके नाम, दमयन्तीपुत्र त्रिजातकी कथा, रेवती अम्बाकी स्थापना, भक्तिकातीर्थका आविर्भाव, क्षेमङ्करीदेवी, केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव, शुक्लतीर्थ, मुखारकतीर्थ, सत्यसन्ध्येश्वरका आख्यान, कर्णोत्पलाकी कथा, अटेश्वरतीर्थ, याज्ञवल्क्यतीर्थ, गौरीगणेशतीर्थ, वास्तुपदतीर्थका आख्यान, अजागृहादेवीकी कथा, सौभाग्यनन्दतीर्थ, शूलेश्वरलिङ्ग, धर्मराजकी कथा, मिष्टान्न देवेश्वरका आख्यान, तीन गणपतिका आविर्भाव, जावालचरित, मकरेशकी कथा, कालेश्वरी और अन्धकका आख्यान, अप्सरसकुण्ड, पुष्यादित्यतीर्थ, रोहिताश्वतीर्थ, नागर ब्राह्मणोंकी उत्पत्तिका कथन, भार्गवचरित, विश्वामित्रचरित, सारस्वततीर्थ, पिप्पलादतीर्थ, कंसारीश्वरतीर्थ, पिण्डकतीर्थ, ब्रह्माका यज्ञानुष्ठान, सावित्रीकी कथा, रैवतका आख्यान, भर्तृयज्ञका वृत्तान्त, मुख्य तीर्थोंका निरीक्षण, कुरुक्षेत्र, हाटकेश्वरक्षेत्र और प्रभासक्षेत्र—इन तीनों क्षेत्रोंका वर्णन, पुष्करारण्य, नैमिषारण्य तथा धर्मारण्य—इन तीन अरण्योंका वर्णन, वाराणसी, द्वारका तथा अवन्ती—इन तीन पुरियोंका वर्णन, वृन्दावन, खाण्डववन और अद्वैतवन—इन तीन वनोंका उल्लेख, कल्पग्राम, शालग्राम तथा नन्दिग्राम—इन तीन उत्तम ग्रामोंका प्रतिपादन, असीतीर्थ, शुक्लतीर्थ और पितृतीर्थ—इन तीन तीर्थोंका निरूपण, श्रीशैल, अर्बुदगिरि तथा रैवतगिरि—इन तीन पर्वतोंका वर्णन, गङ्गा, नर्मदा और सरस्वती—इन तीन नदियोंका नाम-उच्चारण, इनमेंसे एक-एकका कीर्तन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंका फल देनेवाला है—इत्यादि विषयोंका प्रतिपादन किया गया है। कूपिकातीर्थ, शङ्खतीर्थ, चामरतीर्थ और बालमण्डनतीर्थ—इन चारोंका उच्चारण, हाटकेश्वरक्षेत्रका फल देनेवाला है। इन सब तीर्थोंके वर्णनके पश्चात् साम्बादित्यकी महिमा, श्राद्धकल्पका निरूपण, युधिष्ठिर-भीष्म-संवाद, अन्धक (अन्धकारपूर्ण नरक), जलशायीका माहात्म्य, चातुर्मास्य-व्रत, अशून्यशयनव्रत, मङ्कणेशकी महिमा, शिवरात्रिका माहात्म्य, तुलापुरुषदान, पृथ्वीदान, बालकेश्वर, कपालमोचनेश्वर, पापपिण्ड, सासलिङ्ग, युगमान आदिका वर्णन, निम्बेश्वर और शाकम्भरीकी कथा, ग्यारह रुद्रोंके प्राकट्यका वर्णन, दानमाहात्म्य तथा द्वादशादित्यका कीर्तन—इन सब विषयोंका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार यह 'नागर-खण्ड' कहा गया ।

अब 'प्रभासखण्ड'का वर्णन किया जाता है, जिसमें सोमनाथ, विश्वनाथ, महान् पुण्यप्रद अर्कस्थल तथा सिद्धेश्वर आदिका आख्यान पृथक्-पृथक् कहा गया है। तत्पश्चात् अग्नितीर्थ, कपर्दीश्वर,

* पूर्वभाग- चतुर्थ पाद *५४१

उत्तम गतिदायक केदारेश्वर, भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, चन्द्रेश्वर, मङ्गलेश्वर, बुधेश्वर, बृहस्पतीश्वर, शुक्रेश्वर, शनैश्चरेश्वर, राहीश्वर, केत्वीश्वर आदि शिवविग्रहोंका वर्णन है। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर आदि अन्य पाँच रुद्रोंकी स्थितिका वर्णन किया गया है। वरारोहा, अजापाला, मङ्गला, ललितेश्वरी, लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, उर्वीश्वर, कामेश्वर, गौरीश्वर, वरुणेश्वर, दुर्वासेश्वर, गणेश्वर, कुमारेश्वर, चण्डकल्प, शकुलीश्वर, कोटीश्वर तथा बालरूपधारी ब्रह्मा आदिकी उत्तम कथा है। तत्पश्चात् नरकेश्वर, संवर्तेश्वर, निधीश्वर, बलभद्रेश्वर, गङ्गा, गणपति, जाम्बवती नदी, पाण्डुकूप, शतमेध, लक्षमेध और कोटिमेधकी श्रेष्ठ कथा है। दुर्वासादित्य, घटस्थान, हिरण्यासङ्गम, नागरादित्य, श्रीकृष्ण, संकर्षण, समुद्र, कुमारी, क्षेत्रपाल, ब्रह्मेश्वर, पिङ्गलासङ्गेश्वर, शङ्करादित्य, घटेश्वर, ऋषितीर्थ, नन्दादित्य, त्रितकूप, सोमपान, पर्णादित्य और न्युङ्कुमतीकी भी अद्भुत कथाका उल्लेख है। तदनन्तर बाराहस्वामीका वृत्तान्त, छायालिङ्ग, गुल्फ, कनकनन्दा, कुन्ती और गङ्गेेशकी कथा है। फिर चमसोद्भेदेश्वर, विदुरेश्वर, त्रिलोकेश्वर, मङ्कणेश्वर, त्रैपुरेश्वर तथा षण्डतीर्थकी कथा है। फिर सूर्यप्राची, त्रीक्षण और उमानाथकी कथा है। पृथिव्युद्धार, शूलस्थल, च्यवनादित्य और च्यवनेश्वरका वृत्तान्त है। उसके बाद अजापालेश्वर, बालादित्य, कुबेरस्थल तथा ऋषितोयाकी पुण्यमयी कथा एवं शृगालेश्वरका माहात्म्यकीर्तन है। फिर नारदादित्यकी कथा, नारायणके स्वरूपका निरूपण, तप्तकुण्डकी महिमा तथा मूलचण्डीश्वरका वर्णन है। चतुर्मुख गणेश और कलम्बेश्वरकी कथा, गोपालस्वामी, बकुलस्वामी और मरुद्रणकी भी कथा है। तत्पश्चात् क्षेमादित्य, उन्नतविघ्नेश, तलस्वामी, कालमेध, रुक्मिणी, दुर्वासेश्वर, भद्रेश्वर, शङ्खावर्त, मोक्षतीर्थ, गोष्पदतीर्थ, अच्युतगृह, जालेश्वर, ॐकारेश्वर, चण्डीश्वर, आशापुरनिवासी विघ्नेश और कलाकुण्डकी अद्भुत कथा है। कपिलेश्वर और जरद्गव शिवकी भी विचित्र कथाका उल्लेख है। नलेश्वर, कर्कोटकेश्वर, हाटकेश्वर, नारदेश्वर, यन्त्रभूषा, दुर्गकूट और गणेशकी कथाका भी उल्लेख है। सुपर्णभैरवी और एलाभैरवी तथा भल्लतीर्थकी भी महिमा है। तत्पश्चात् कर्दमालतार्थ और गुप्त सोमनाथका वर्णन है। इसके बाद बहुस्वर्णेश्वर, भृङ्गेश्वर, कोटीश्वर, मार्कण्डेश्वर, कोटीश तथा दामोदरगृहकी माहात्म्य-कथा है। तदनन्तर स्वर्णरेखा, ब्रह्मकुण्ड, कुन्तीश्वर, भीमेश्वर, मृगीकुण्ड तथा सर्वस्व—ये वस्त्रापथक्षेत्रमें कहे गये हैं। तत्पश्चात् दुर्गाभल्लेश, गङ्गेश, रैवतेश, अर्बुदेश्वर, अचलेश्वर, नागतीर्थ, वसिष्ठाश्रम, भद्रकर्ण, त्रिनेत्र, केदार, तीर्थगमन, कोटीश्वर, रूपतीर्थ और हृषीकेश—ये अद्भुत माहात्म्यकथाएँ हैं। इसके बाद सिद्धेश्वर, शुक्रेश्वर, मणिकर्णीश्वर, पङ्कतीर्थ, यमतीर्थ और वाराहीतीर्थ आदिके माहात्म्यका वर्णन है। फिर चन्द्रप्रभास, पिण्डोदक, श्रीमाता, शुक्लतीर्थ, कात्यायनीदेवी, पिण्डारकतीर्थ, कनकखलतीर्थ, चक्रतीर्थ, मानुषतीर्थ, कपिलाग्रीतीर्थ तथा रक्तानुबन्ध आदि माहात्म्यकथाका उल्लेख है। तदनन्तर गणेशतीर्थ, पार्थेश्वरतीर्थ और उज्ज्वलतीर्थकी यात्रामें चण्डीस्थान, नागोद्भव, शिवकुण्ड, महेशतीर्थ तथा कामेश्वरका माहात्म्यवर्णन और मार्कण्डेयजीकी उत्पत्तिकथा है। फिर उद्दालकेश और सिद्धेशके समीपवर्ती तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् कथाएँ हैं। इसके बाद श्रीदेवमाताकी उत्पत्ति, व्यास और गौतमतीर्थकी कथा, कुलसन्तार्तीर्थका माहात्म्य तथा रामतीर्थ एवं कोटितीर्थकी महिमा है। चन्द्रोद्भेदतीर्थ, ईशानतीर्थ और ब्रह्मस्थानकी उत्पत्तिका अद्भुत माहात्म्य तथा त्रिपुष्कर, रुद्रह्रद और गुहेश्वरकी शुभ कथा है। तत्पश्चात् अविमुक्तकी महिमा, उमामहेश्वरका माहात्म्य, महौजका प्रभाव और जम्बूतीर्थका महत्त्व कहा गया है। गङ्गाधर और मिश्रककी कथा एवं फलस्तुतिका भी वर्णन है। तदनन्तर द्वारकामाहात्म्यके प्रसङ्गमें चन्द्रशर्माकी

वामनपुराणकी विषय-सूची और उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य

५४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कथा है। जागरण और पूजन आदिका आख्यान, एकादशीव्रतकी महिमा, महाद्वादशीका आख्यान, प्रह्लाद और ऋषियोंका समागम, दुर्वासाका उपाख्यान, यात्राकी प्रारम्भिक विधि, गोमतीकी उत्पत्तिकथा, उसमें स्नान आदिका फल, चक्रतीर्थका माहात्म्य, गोमतीसागर-सङ्गम, सनकादि कुण्डका आख्यान, नृगतीर्थकी कथा, गोप्रचारकी पुण्यमयी कथा, गोपियोंका द्वारकामें आगमन, गोपीसरोवरका आख्यान, ब्रह्मतीर्थ आदिका कीर्तन, पाँच नदियोंके आगमनकी कथा, अनेक प्रकारके उपाख्यान, शिवलिङ्ग, गदातीर्थ और श्रीकृष्णपूजन आदिका वर्णन है। त्रिविध-मूर्तिका वर्णन, दुर्वासा और श्रीकृष्ण-संवाद, कुश दैत्यके वधकी कथा, विशेष, पूजनका फल, गोमती और द्वारकामें तीर्थोंके आगमनका वर्णन, श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन, द्वारवतीमें अभिषेक, वहाँ तीर्थोंके निवासकी कथा और द्वारकाके पुण्यका वर्णन है। ब्राह्मणो ! इस प्रकार सर्वोत्तम कथाओंसे युक्त शिवमाहात्म्य-प्रतिपादक स्कन्दपुराणमें यह सातवाँ प्रभासखण्ड बताया गया है। जो इसे लिखकर सुवर्णमय त्रिशूलके साथ माघकी पूर्णिमाके दिन सत्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान देता है, वह सदा भगवान् शिवके लोकमें आनन्दका भागी होता है।

वामनपुराणकी विषय-सूची और उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— वत्स! सुनो, अब मैं त्रिविक्रमचरित्रसे युक्त वामनपुराणका वर्णन करता हूँ। इसकी श्लोक-संख्या दस हजार है। इसमें कूर्म कल्पके वृत्तान्तका वर्णन है और त्रिवर्णकी कथा है। यह पुराण दो भागोंसे युक्त है और वक्ता-श्रोता दोनोंके लिये शुभकारक है। इसमें पहले पुराणके विषयमें प्रश्न है। फिर ब्रह्माजीके शिरश्छेदकी कथा, कपालमोचनका आख्यान और दक्ष-यज्ञ-विध्वंसका वर्णन है। तत्पश्चात् भगवान् हरकी कालरूप संज्ञा, मदनदहन, प्रह्लादनारायणयुद्ध, देवासुर-संग्राम, सुकेशी और सूर्यकी कथा, काम्यव्रतका वर्णन, श्रीदुर्गाचरित्र, तपतीचरित्र, कुरुक्षेत्रवर्णन, अनुपम सत्या-माहात्म्य, पार्वती-जन्मकी कथा, तपतीका विवाह, गौरी-उपाख्यान, कौशिकी-उपाख्यान, कुमारचरित, अन्धकवधकी कथा, साध्योपाख्यान, जाबालिचरित, अरजाकी अद्भुत कथा, अन्धकासुर और भगवान् शङ्करका युद्ध, अन्धकको गणत्वकी प्राप्ति, मरुद्गणोंके जन्मकी कथा, राजा बलिका चरित्र, लक्ष्मी-चरित्र, त्रिविक्रम-चरित्र, प्रह्लादकी तीर्थयात्रा और उसमें अनेक मङ्गलमयी कथाएँ, धुन्धु-चरित, प्रेतोपाख्यान, नक्षत्र पुरुषकी कथा, श्रीदामाका चरित्र, त्रिविक्रमचरित्रके अन्तमें ब्रह्माजीके द्वारा कहा हुआ उत्तम स्तोत्र तथा प्रह्लाद और बलिके संवादमें सुतललोकमें श्रीहरिकी प्रशंसाका उल्लेख है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें इस पुराणका पूर्वभाग बताया है। अब इस वामनपुराणके उत्तरभागका श्रवण करो। उत्तरभागमें चार संहिताएँ हैं। वे पृथक्-पृथक् एक-एक

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५४३

सहस्र श्लोकोंसे युक्त हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—माहेश्वरी, भागवती, सौरी और गाणेश्वरी। माहेश्वरी संहितामें श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तोंका वर्णन है। भागवती संहितामें जगदम्बाके अवतारकी अद्भुत कथा दी गयी है। 'सौरीसंहिता'में भगवान् सूर्यकी पाप-नाशक महिमाका वर्णन है। 'गाणेश्वरीसंहिता'में भगवान् शिव तथा गणेशजीके चरित्रका वर्णन किया गया है। यह वामन नामका अत्यन्त विचित्र पुराण महर्षि पुलस्त्यने महात्मा नारदजीसे कहा है। फिर नारदजीसे महात्मा व्यासको प्राप्त हुआ है और व्यासजीसे उनके शिष्य रोमहर्षणको मिला है। रोमहर्षणजी नैमिषारण्यनिवासी शौनकादि ब्रह्मर्षियोंसे यह पुराण कहेंगे। इस प्रकार यह मङ्गलमय वामनपुराण परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो इसका पाठ और श्रवण करते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इस पुराणको लिखकर शरत्कालके विषुव योगमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको घृतधेनुके साथ इसका दान करता है, वह अपने पितरोंको नरकसे निकालकर स्वर्गमें पहुँचा देता है और स्वयं भी अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग करके देह-त्यागके पश्चात् वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है।

कूर्मपुराणकी संक्षिप्त विषय-सूची और उसके पाठ, श्रवण तथा दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं—वत्स मरीचे! अब तुम कूर्मपुराणका परिचय सुनो। इसमें लक्ष्मी-कल्पका वृत्तान्त है। इस पुराणमें कूर्मरूपधारी दयामय श्रीहरिने इन्द्रद्युम्नके प्रसङ्गसे महर्षियोंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका पृथक्-पृथक् माहात्म्य सुनाया है। यह शुभ पुराण चार संहिताओंमें विभक्त है। इसकी श्लोक-संख्या सत्रह हजार है। मुने! इसमें अनेक प्रकारकी कथाओंके प्रसङ्गसे मनुष्योंको सद्गति प्रदान करनेवाले नाना प्रकारके ब्राह्मणधर्म बताये गये हैं। इसके पूर्वभागमें पहले पुराणका उपक्रम है। तत्पश्चात् लक्ष्मी और इन्द्रद्युम्नका संवाद, कूर्म और महर्षियोंकी वार्ता, वर्णाश्रमसम्बन्धी आचारका कथन, जगत्की उत्पत्तिका वर्णन, संक्षेपसे काल-संख्याका निरूपण, प्रलयके अन्तमें भगवान्का स्तवन, संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन, शङ्करजीका चरित्र, पार्वतीसहस्रनाम, योगनिरूपण, भृगुवंशवर्णन, स्वायम्भुव मनु तथा देवता आदिकी उत्पत्ति, दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षसृष्टि-कथन, कश्यपके वंशका वर्णन, अत्रिवंशका परिचय, श्रीकृष्णका शुभ चरित्र, मार्कण्डेय-श्रीकृष्ण-संवाद, व्यास-पाण्डव-संवाद, युगधर्मका वर्णन, व्यास-जैमिनिकी कथा, काशी एवं प्रयागका माहात्म्य, तीनों लोकोंका वर्णन और वैदिक शाखाका निरूपण है। इस पुराणके उत्तरभागमें पहले ईश्वरीय-गीता फिर व्यास-गीता है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका उपदेश देनेवाली है। इसके सिवा नाना प्रकारके तीर्थोंका पृथक्-पृथक् माहात्म्य बताया गया है। तदनन्तर प्रतिसर्गका वर्णन है। यह 'ब्राह्मीसंहिता' कही गयी है। इसके बाद 'भागवतीसंहिता' के विषयोंका निरूपण है, जिसमें वर्णोंकी पृथक्-पृथक् वृत्ति बतायी गयी है। इसके प्रथम पादमें ब्राह्मणोंकी सदाचाररूप स्थिति बतायी गयी है, जो भोग और सुख बढ़ानेवाली है। द्वितीय पादमें क्षत्रियोंकी वृत्तिका भलीभाँति निरूपण किया गया है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने पापोंका यहीं नाश करके स्वर्गलोकमें चला जाता है। तृतीय पादमें वैश्योंकी चार प्रकारकी वृत्ति कही गयी है, जिसके सम्यक् आचरणसे उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। उसी प्रकार इसके चतुर्थ पादमें शूद्रोंकी वृत्ति कही गयी है, जिससे मनुष्योंके कल्याणकी वृद्धि करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपति संतुष्ट होते हैं। तदनन्तर भागवतीसंहिताके पाँचवें पादमें संकरजातियोंकी वृत्ति कही गयी है,