भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 449

हिन्दी निरुक्त ( ३० ) ४ अ० १ पा० ३ खं० 'शितिमांसतो मेदस्तः' इतिगालवः । 'शितिः श्यतेः । 'मांसं' माननं वा । मानसंवा । मनो- ऽस्मिन् सीदति-इतिवा । 'मेदः' मेद्यतेः ॥ ३ ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-'प्रियमेधाः' यज्ञ से प्यार करने वाले 'ऋषयः' प्रकाशक 'सुपतनाः' अच्छे उड़ने वाले ' नाथमानाः ' याचना करते हुए 'वयः' आदित्य के रश्मि 'इन्द्रम्' 'उप' आदित्य के पास 'सेदुः' गए कि-'ध्वान्तम्' अन्धकार को 'अप-ऊर्णुहि' दूर करो । 'चक्षुः' मनुष्यों को दृष्टि 'पूर्द्धि' पूरो (दो) 'नि- धया' जाल से 'बद्धान्-इव' बँधे हुए पक्षियोंको जैसे 'अस्मान्' हमें ' मुमुग्धि ' छोड़ो ॥ निरुक्तार्थ- 'वयः' 'वि' का बहुवचन है । ( 'सुपर्णाः । ) ' सुपतन ' अच्छे उड़ने वाले आदित्य के रश्मि या किरणें याचना करती हुई आदित्य के पास गईं । खोलो अँधेरे से ढांपे हुए चक्षुः (नेत्र) को । 'चक्षुष' शब्द 'ख्या' (अदा०प०) धातु से है । अथवा 'चक्ष' ( अदा० आ० ) धातु से । पूरण कर या दे । (४र्थपा०) छोड़ हमें जालोंसे बँधे हुओं को जैसे । [शिताम ३-] “पार्श्वतः” पसवाड़े से “श्रोणितः” कूले से “शितामतः” शिताम से 'पार्श्व' पर्शुओं (आंतों) से बना हुवा (पांसू) अङ्ग होता है । 'पर्शु' स्पृश् ( तु० प० ) धातु से है [क्योंकि-] पृष्ठ (पीठ) के स्थान को छूए हुए होती है । 'पृष्ठ' स्पृश् (तु०प०) धातु से है [क्योंकि-] अङ्गों से छूया हुआ होता है । 'अङ्ग' [क्यों?] अङ्कन (चलने) से अथवा अञ्चन (चलने) से 'श्रोणि' गत्यर्थक 'श्रुश' (भ्वा० प ) धातु से है ।