निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ३० ) ४ अ० १ पा० ३ खं० 'शितिमांसतो मेदस्तः' इतिगालवः । 'शितिः श्यतेः । 'मांसं' माननं वा । मानसंवा । मनो- ऽस्मिन् सीदति-इतिवा । 'मेदः' मेद्यतेः ॥ ३ ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-'प्रियमेधाः' यज्ञ से प्यार करने वाले 'ऋषयः' प्रकाशक 'सुपतनाः' अच्छे उड़ने वाले ' नाथमानाः ' याचना करते हुए 'वयः' आदित्य के रश्मि 'इन्द्रम्' 'उप' आदित्य के पास 'सेदुः' गए कि-'ध्वान्तम्' अन्धकार को 'अप-ऊर्णुहि' दूर करो । 'चक्षुः' मनुष्यों को दृष्टि 'पूर्द्धि' पूरो (दो) 'नि- धया' जाल से 'बद्धान्-इव' बँधे हुए पक्षियोंको जैसे 'अस्मान्' हमें ' मुमुग्धि ' छोड़ो ॥ निरुक्तार्थ- 'वयः' 'वि' का बहुवचन है । ( 'सुपर्णाः । ) ' सुपतन ' अच्छे उड़ने वाले आदित्य के रश्मि या किरणें याचना करती हुई आदित्य के पास गईं । खोलो अँधेरे से ढांपे हुए चक्षुः (नेत्र) को । 'चक्षुष' शब्द 'ख्या' (अदा०प०) धातु से है । अथवा 'चक्ष' ( अदा० आ० ) धातु से । पूरण कर या दे । (४र्थपा०) छोड़ हमें जालोंसे बँधे हुओं को जैसे । [शिताम ३-] “पार्श्वतः” पसवाड़े से “श्रोणितः” कूले से “शितामतः” शिताम से 'पार्श्व' पर्शुओं (आंतों) से बना हुवा (पांसू) अङ्ग होता है । 'पर्शु' स्पृश् ( तु० प० ) धातु से है [क्योंकि-] पृष्ठ (पीठ) के स्थान को छूए हुए होती है । 'पृष्ठ' स्पृश् (तु०प०) धातु से है [क्योंकि-] अङ्गों से छूया हुआ होता है । 'अङ्ग' [क्यों?] अङ्कन (चलने) से अथवा अञ्चन (चलने) से 'श्रोणि' गत्यर्थक 'श्रुश' (भ्वा० प ) धातु से है ।
[क्योंकि ]श्रोणि(कूल्हा)चलते हुए की चलती हुई जैसी होती है । 'शिताम' दो: या बाहु होता है । 'दो:' ' ' गतौ (भ्वा० प०) धातु से है । 'शिताम योनि (गुह्य) होती है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं । 'शिताम' क्यों? । वह विषित या मल से व्याप्त होता है । जो अर्थ 'श्यामतः' पद से होता है, वही अर्थ 'शितामतः' पद से होता है । अर्थात् "पार्श्वतः" इत्यादि गद्य मन्त्र में 'शिताम' नाम श्वास का है और 'श्याम' नाम यकृत् (पेटकी कोई आंत) का है ।-यह तैटीकि आचार्य मानते हैं । 'श्याम' शब्द 'श्यै' (भ्वा० आ०) धातु से है । [ क्योंकि-वह सम्पर्क से होती है ] 'यकृत्' क्यों? । जैसे तैसे (विना परिश्रम) ही काटी जा सकती है । 'शितिमांस अर्थात् मेदा से' यह गालव आचार्य मानते हैं । अर्थात् उनके मत में उक्त गद्य मन्त्र में 'शिताम' नाम शितिमांस (श्वेतमांस) का है । 'शिति' शब्द 'शो' (दि० प०) धातु से है 'मांस' क्यों? । जो कोई ही मान्य होता है, उसके लिये बनाया जाता है। अथवा सुमनस् या सुन्दर मनसे लिया जाता है । अथवा इस में मन सदन (स्थान) करता है इस से यह मांस है । 'मेदस्' स्नेहार्थक 'मिद्' (दि० प०) धातुसे है॥३॥ १ (खं०४) [निरु०-]"यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिवः । १-"यदिन्द्र चित्र०" इति अग्रेर्भौमस्यार्षम् । अनुष्टुप् छन्दः ऐन्द्री । स्वरपृष्ठानां स्वरसाम्नां प्रथमे स्वरसाम्नि "यज्जायथा अपूर्व्य" इति स्तोत्रियः, स्वरपृष्ठानां "यदिन्द्रचित्रमेहना"इति द्वे, "या इन्द्र भुज आभर" इति तृतीयानुरूपस्य-इति विनियोगः
राधस्तन्नो विदद्वस उभया हस्त्याभर ॥” [ऋ०सं० ४, २, १०, ३९] (भा०) [चित्रं] चायनीयं मंहनीयं धनमस्ति, 'यत् मे इहनास्ति'-इतिवा । त्रीणि मध्यमानि पदा- नि । त्वया नस्तद् दातव्यम् अद्रिवव् ! । 'अद्रिः' आहणाति एतेन । अपिवा अत्तेःस्यात् । 'ते सो- मादः' इति हविर्जायते । 'राधः' इति धन नाम । राध्नुवन्ति एनेन । तत् नः त्वं वित्तधन! उभाभ्यां हस्ताभ्याम् आहर । 'उभौ' समुब्धौ भवतः ॥ दमूनाः (५) दममनावा । दानमनावा । दान्त- मनावा । अपिवा 'दम' इति गृहनाम । तन्मनाः स्यात् । 'ममो' मनोतेः ॥ ४ ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-हे इन्द्र ! 'यत्' जो 'चित्रम्' पूजनीय 'मेहना' मँहगा अथवा 'यत् मेहह्न' मुझे यहां अप्राप्त 'त्वादात्म' हमारे लिये तुझसे देने योग्य 'राधः' तेरा धन 'अस्ति' है, 'तत्' वह 'नः' हमारे लिये हे 'अद्रिवः' वज्रके धारण करने वाले! हेविद्- द्वसो ! धन को प्राप्त किए हुए ! 'उभया' दोनों 'हस्ति'हाथों से 'आभर' ले आओ ॥ निरुक्तार्थ- "चित्र" 'चायनीय, पूजनीय या 'मंहनीय' ( मंहगा ) धन है । ( शाकल्यमत ) अथवा 'जो मेरे यहां नहीं है'-यह ( गार्ग्यमत ।) 'यत्' 'मे' 'इह' 'न,' 'अस्ति' इस
हिन्दी निरुक्त ( ३३ ) ४ अ० १ पा० ४ख० प्रकार बीच में तीन पद हैं । (सन्धिसे ‘मेहना’ एक पद जैसा होगया है ।) हे अद्रिवन् ! वज्रके धारण करने वाले ! तुमसे हमारे लिये वह (धन) देने योग्य है । 'अद्रि' क्यों ? इस से आदरता या विदारण करता है। अथवा भक्षणार्थक ‘अद्’ (अदा० प०) धातु से है। क्योंकि “ते सोमादः” (वे सोम के भक्षण करने वाले ) [“हरी इन्द्रस्य निंसते”] [ऋ० सं० ८, ४, ३०, ४] इस मन्त्र को विचारते हुए ऐसा ही जान पड़ता है । ‘राधस्’ यह धन का नाम है। क्यों कि-इससे सब कार्यों को राधन (साधन) करते हैं। “तत्” सो “नः” हमारे लिये ‘त्वम्’ तू ‘वित्तधन’ हे प्राप्तधन ! ‘उभाभ्याम्’ दोनों ‘हस्ताभ्याम्’ हाथों से “आहर” लेआ। ‘उभ’ क्यों ? सम्पूर्णा (पूरे) होते हैं ॥ (दमूनाः (५) । 'दमूना' क्यों ? दममनाः या मनको दमन करनेवाला (दबाने वाला) है। अथवा दान में मन वाला है । अथवा दान्त (दबे हुवे) मन वाला है। अथवा ‘दम’ यह घरका नाम है। उसमें मन रखता है । ‘मनः’ क्यों ? ‘मन’ (तनो०आ०) धातु से है। (इससे मनन किया जाता है ।) ॥ ४ ॥ 'मेहना' (४) पद में पद-विकल्प है । बह्वृच (ऋग्वेदी) 'मेहना' इतना एक पद मानते हैं, और छन्दोग (सामवेदी) इस में 'मे-इह-न' ऐसे तीन पद मानते हैं। इन दोनों ही मतों पर ध्यान देते हुए भाष्यकार ने शाकल्य और गार्ग्य दोनों, आचार्यों के अभिप्राय यहां पर दिखाए हैं। प्रयोजन, ऐसे ऐसे निर्वचन और दोनों आचार्यों के प्रामाण्य का दिखाना है । पदकारों का पद विकल्प में अभिप्राय । विद्यावान् या धनवान् किसी उत्तम वस्तु को मांगता है, ५
हिन्दी निरुक्त (३४) ४ अ० १ पा० ५ खं० जो कि उसके घर में नहीं हैं, चाहे कोई विलक्षण वस्तु हो, या अपने घर में विद्यमान वस्तु की सदृशीय वस्तु । किन्तु इन दोनों प्रकार की प्रार्थनीय वस्तुओं में एक ही के मांगने में कोई प्रमाण नहीं है, इस लिये 'संहगा' या 'प्रार्थनीय', इस अर्थ की बुद्धि से शाकल्य 'मेहना' को एक पद मानता है । अर्थात् इन के मत में ऐसी व्याख्या से उक्त दोनों प्रकार की वस्तु मांगी जा सकती है । दूसरे गार्ग्य आचार्य के मत में 'मेहना' पद से वही वस्तु मांगी गई है, जो 'मेइह नास्ति' (मेरे इस घर में नहीं है) इस वाक्य से आती है, इस लिये यहां तीन पद ही होने चाहिएं । “यदिन्द्र” मन्त्र के “मेहना” पद में किसी एक पक्ष को पुष्ट करने वाला कोई लिङ्ग या प्रमाण नहीं, इसी से ऐसी विप्रतिपत्ति (विरुद्ध उक्ति) हुई है । ऐसेही शाखा भेद से पदों के विकल्पों में अर्थ के अविरोध से व्याख्या करनी होगी ॥२॥ (५ खं०) १ [निरु०] “जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमन्नो यज्ञमुपयाहिविद्वान् । विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रूयता माभरा भोजनानि ॥” [ ऋ० सं० ३, ८, १८, ४ ] १ 'जुष्टो दमूनाः' इति वसुश्रुतस्य आत्रेयस्य इयमार्षम् । त्रिष्टुप्छन्दः । आग्नेयी । प्रातरनुवाकाश्विनयोःशस्यते । स्विष्ट- कृतपुरोनुवाक्येयं चातुर्मास्येषुसाकमेधे ।
हिन्दी निरुक्त ( ३५ ) ४ अ० १ पा० ५ ख०
(भा०) 'अतिथिः' अभ्यातितो गृहान् भवति । अभ्येति तिथिषु परकुलानि-इति वा । गृहाणि- इति वा । (अयमपि इतरः अतिथिः एतस्मादेव) 'दुरोण' इति गृहनाम । दुरवा भवन्ति, दुस्तर्पाः । [२यपा०] “ इमं नो यज्ञ मुपयाहि विद्वान् ” [३यपा०] सर्वा अग्ने अभियुजो विहत्य [४र्थपा०] शत्रूयताम्आभर भोजनानि । [ व्याख्यान्तरम् ] विहत्य अन्येषां बलानि, शत्रूणां भवनात् आहर भोजनानि-इति वा । धनानि-इतिवा । 'मूषः' (६) मूषिका इत्यर्थः । 'मूषिकाः' पुनः मुष्णातेः । 'मूषो' ऽपि एतस्मादेव ॥५॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः- हे भगवन्! अग्नि देव! 'जुष्टः' हमसे स्तुतियों द्वारा सेवा किया हुआ, 'दमूनाः' कठोर मन न हुआ हुआ, या 'यह मेरा घर है' ऐसा मानता हुआ अथवा 'इन्हें देनाही चाहिये'-ऐसा मन करता हुआ, अथवा 'दमन शीलों में तेरा मन है, और वैसे है,-यह जानता हुआ, 'अतिथि' सांझ सवेरे अग्निहोत्रियों के अतिथि (सद्यमान' 'विद्वान्' हमारी भक्ति को जानने वाला 'नः' हमारे 'दुरोणे' घर में 'इमम्' इस 'यज्ञम्' यज्ञ को 'उपयाहि' आ । [और-] हे अग्ने ! अग्नि देव ! 'विश्वा' सब 'अभियुजः' सामना करने वालों को 'विहत्य'
हिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ४ अ० १ पा० ६ खं० मार कर ‘शत्रूयताम्’ शत्रुता करने वालोंके ‘भोजनानि’ अन्नों को ‘आभर’ ले आ ॥ निरुक्तार्थः-‘अतिथि’ क्यों ? घरों के संमुख जाता है । अथवा तिथियों में पर कुलों को जाता है। अथवा घरों को । ( यह भी दूसरा अतिथि इसी से है । ) ‘दुरोण’ यह घर का नाम है। क्योंकि? वे दुरव या दुस्तर्प [जिनमें कितना ही कुछ लाकर रखो भरते ही नहीं] हैं। जानने वाले (आप) इस हमारे यज्ञ को आओ । हे अग्ने ! सब साम्हना करने वालों को मार कर, वैर करने वालों के भोजनों को, अथवा औरों के बलों को नष्ट करके शत्रुओं के घर से भोजनों को ले आ । अथवा धनों को ॥ ‘मूषः’ (६) । ‘मूष’ का मूषिका या मूसिए'-यह अर्थ है । ‘मूषिका’ चोरी अर्थ में ‘मुष्’ (क्र्या० प०) धातु से है। [क्यों कि- वे धान्य आदि द्रव्यों को चोरते हैं ।] ‘मूष’ भी इसी धातु से है । ॥५॥ १ ( ६ खं० ) [निरु०-] “संमा तपन्त्यभितः सपत्निरिव पर्शवः मूषो न शिश्नाव्यदन्ति माध्यः स्तोतारन्ते शतक्रतो वित्तंमे अस्य रोदसी ॥” [१, ७, २१, १०५] [ भा०-] सन्तपन्ति माम् अभितः सपत्न्यइव इमाः पर्शवः, कूपपर्शवः । मूषिका इवास्नातानि सूत्राणि १- “संमातपन्ति” इति आप्त्यस्य त्रितस्य कुत्सस्यवेयमा- र्षम् । पङ्क्तिश्छन्दः । ऐन्द्री एषा ।
हिन्दी निरुक्त ( ३७ ) ४ अ० १ पा० ६ ख० व्यदन्ति । स्वाङ्गाभिधानं वा स्यात्,-‘शिशनानि व्यदन्ति,-इति । सन्तपन्ति मा आध्यः कँहमाः स्तोतारं ते शतक्रतो! (वित्तं मे अस्य रोदसी ।) जानीतं मे अस्य द्यावापृथिव्यौ-इति । त्रितं कूपे अवहितम् एतत् सूक्तं प्रतिबभौ । तत्र ब्रह्म इतिहासमिश्रम् ऋङ्मिश्रं गाथामिश्रं भवति । ‘त्रितः’ तीर्णतमो मेधया बभूव । अपिवा संख्यानामैव अभिप्रेतं स्यात्,-एकतो, द्वितः त्रितः इति त्रयो बभूवुः॥६॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः व निरुक्तार्थः- ‘शतक्रतोः’ हे इन्द्र' ‘मा’ मुझे ‘सपत्नीः’-‘इव’ सौतियों (सौकों) के समान ‘पर्शवः’ कूप की १ अत्र शाट्यायनिन इतिहासमाचक्षते-एकतो द्वितस्त्रित इति पुरा त्रय ऋषयो बभूवुः, ते कदाचिन्मरुभूमावरण्ये वर्त्त- मानाः पिपासया सन्तप्तगात्राःसन्तः एकं कूपमविन्दन् तत्र त्रिताख्य एको जलपानाय कूपं प्राविशत् स्वयं पीत्वा इतरयोश्च कूपादुदकमुद्धृत्य मादात् तौ उदकं पीत्वा त्रितंकूपे पातयित्वा तदीयं धनं सर्वमपहृत्य कूपंच रथचक्रेण पिधाय प्रास्थिषाताम्। ततः कूपे पतितः स त्रितः कूपात् उत्तरीतुम् अशक्नुवन् सर्वे देवा मामुद्धरन्तु -इति मनसा सस्मार ततस्तेषां स्तावकमिदं सूक्तं ददर्श । ( साय० भा० )
हिन्दी निरुक्त ( ३८ ) ४ अ० १ पा० ७ खं०
कंकरिए' 'अभितः' चारों ओर से 'सं-तपन्ति' पीड़ा करती हैं ।
'मूषः' मूसै 'न' जैसे 'शिश्ना' अन्न आदि से लिप्त सूत्रों को
चाबते हैं । अथवा अङ्ग का नाम हो सकता है। पूंछों को
'व्यदन्ति' घृत तैल के पात्रों में डुबों कर चाटते या चबाते
हैं। हे देव ! 'ते' तेरे 'स्तोतारम्' स्तुति करने वाले मुझको
'आधयः' मनकी कामनाएं 'या व्यथाएं पीड़ा करती हैं। हे 'रो-
दसी' द्यावापृथिवीओ ! 'मे' मुझ 'अस्य' इस जन के दुःखको
'वित्तम्' तुम दोनों जानते हो ॥
कूप में गिरे हुए त्रित ऋषि को यह सूक्त प्रतीत हुआ ।
इस विषय में इतिहास से मिला हुआ, ऋचाओं से मिला
हुआ, और गाथा या कथा से मिला हुआ ब्रह्म या वेद है ।
'त्रित' क्यों? मेधा (बुद्धि) से तीर्णतम (बहुत तैरा हुआ) था ।
अथवा संख्या से ही नाम माना हुआ हो सकता है । [जैसे-]
एकत, द्वित, और त्रित ये तीन ऋषि हुए थे ॥६॥
व्याख्या
इतिहासमिश्रम् । इस से भाष्यकार ने यह दिखाया कि
यह भी एक सूक्तों का स्वभाव है, उन में इतिहास जैसा भी
होता है । अतः-उन में प्रकरण से भी संदेह युक्त पद का अर्थ
निश्चय कर लेना, जैसे कि-भाष्यकार ने 'पर्शु' शब्द को
समझा ॥ ६ ॥
१ ( ख० ७ )
[निरु०-] “इषिरेण ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि
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१-“इषिरेण ते मनसा” इति प्रगाथस्य द्वयमार्षम्
त्रिष्टप छन्दः । सौमी । ७ ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ४ अ० १ पा० ७ खं० पित्र्यस्येव रायः । सोमराजन् प्रण आयूं ॑ षि त रीरहानीव सूर्यो वासराणि ” ॥ [ ऋ० सं० ६, ४, १२, २ ] (भा०) ईषणेन वा, एषणेन वा, अर्पणेन बा ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि, पित्र्यस्येवधनस्य । प्रव- र्द्धय च नः आयूं ॑ षि सोमराजन् । “ अहानीव सूर्यो वासराणि” । ‘वासराणि’ ‘वेसराणि’ विवा- सनानि’ गमनानि-इतिवा ॥ ‘ कुरुतन ’ ( ८ ) इति । अनर्थका उपजनाः भवन्ति,-कर्त्तन, हन्तन, यातन,-इति । ‘जठरम्’ ( ९ ) उदरंभवति । जग्धम् अस्मिन् ध्रियते, धीयते वा ॥७॥ अनुवादः । [ इषिर (७) ] । मन्त्रार्थः- हे भगवन् ' सोम ! 'इषिरेण' सब प्रकार से तेरे प्रति गए हुए 'मनसा'मनसे 'सुतस्य' निचोड़े हुए का 'ते' तेरा ( अंश, जो हमारा,भाग है, उसे ) 'पित्र्यस्य' बाप के 'रायः--इव' धन को जैसे 'भक्षीमहि' खाएं । हे 'सोम- राजन् ' तू 'नः' हमारी 'आयूंषि' आयुओं को 'प्र-तारीः' बढा, 'सूर्यः' सूर्य 'वासराणि' वसन्त के 'अहानि-इव' दिनों को जैसे बढाता है॥ निरुक्तार्थः 'इषिर नाम ईषणा ( गत ) या गए हुए का
हिन्दी निरुक्त (४०) ४ अ० १ पा० ८ खं०
है। क्योंकि- 'ईषति' (धा० गत्यर्थों में पढ़ा हुआ है। अथवा
'एषण' शब्द से है। क्योंकि-वह इच्छावाला होता है। ('इष्'
इच्छायाम् (तु० प०) धातु है।) अथवा 'ऋर्षण' या
'ऋषण' शब्द से है। [क्योंकि-वह सब पदार्थों का दर्शन
करने वाला होता है।] 'ते' तेरा, जो हमारा भाग है 'सुत'
निचोड़कर तैयार किया हुआ रस उसे मनसे बाप के धन के
समान भक्षण करें। और हे सोम राजन् ! तुम हमारी आयुयों
को बढ़ाओ। सूर्य जिस प्रकार वासर या वसन्त के दिनों को
(बढ़ाता है।)
'वासर' क्यों ? वे वेसर हैं, अर्थात् शीत और उष्ण
(गर्मी) दोनों से चलते हैं। रात्रि में ठंडक, दिन में गरमी
अथवा विवासन या शीत को नाश करते हैं। अथवा गमन या
फैलने वाले होते हैं॥
'कुरुतन' (८) "अनर्थक जिन का कोई अर्थ नहीं)
उपजन (प्रत्यय) होते हैं।" अर्थात् जो ही अर्थ 'कुरुत'
(तुम सब करो) पद से होता है, वही अर्थ 'कुरुतन' पद से
होता है। सुतराम् यहां 'न' का कोई अर्थ नहीं, इसी से यह
अनर्थक है। इसी प्रकार और और स्थलों में अनर्थक प्रत्यय
आते हैं। जैसे—'कर्त्तन' 'हन्तन' 'यातन'।
'जठर' (६) 'जठर नाम उदर (पेट) का है। क्यों ?
इस में जग्ध (खाया हुआ) धरा जाता या रखाजाता है ॥७॥
१ (ख०८)
[निरु०] "मरुत्वाँइन्द्रवृषभो रणाय पिबासोम
१—"मरुत्वां इन्द्र" इति विश्वामित्रस्येयमार्षम् ।
त्रिष्टप् छन्दः। महाव्रते पृष्ठ्यस्य चतुर्थेऽहनि शस्यते।" ॥४,१॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१ ) ४ अ० १ पा० ८ सं० मनुष्वधं मदाय । आसिञ्च स्वजठरे मध्वऊर्मिं त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम् ॥ ( ऋ० सं० ३, ३, ११, १ ) ( भा० ) “ मरुत्वानिन्द्र ” मरुद्भिस्तद्वान् । 'वृषभः' वर्षिता अपाम् 'रणाय' रमणीयाय संग्रामाय । पिब सोमम् अनुष्वधम् अन्वन्नम् 'मदाय' मदनीयाय जैत्राय । आसिञ्चस्वजठरे मधुनः ऊर्मिम् । 'मधु' सोमम्-इतिऔपमिकम् । माद्यतेः। इदमपि इतरत् मधु एतस्मादेव । त्वंराजासि पूर्वेषु अपि अहःसु सुतानाम् ॥८॥ इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥४,१॥ अनुवादः । मन्त्रार्थ व निरुक्तार्थ ।— हे ' इन्द्र ! ' जोतू मरुत्वान् मरुतों ( वायुओं ) से उन वाला ( मरुतों वाला ) या उनका स्वामी [ कहलाता है ] 'वृषभः' जलों का वर्षने वाला है, रण या रमण के देने वाले संग्राम के उद्देश्य से ' मदाय ' मदनीय या हर्ष-दायक या ' जैत्र ' जय-दायक मद के अर्थ ' सोमम् ' सोम रस को ' अनुष्वधम् ' अन्न खा-खाकर 'पिब' पी । [ कम नहीं, बल कि ] ' स्वजठरे ' अपने पेट में 'मधुनः' सोम की ' ऊर्मिम् ' लहरी को ' आसिञ्च ' खूब सींच । 'मधु' सोम का औपमिक ( उपमा से ) नाम है । [अर्थात् मद्य के समान मद का देने वाला है । ] हर्ष अर्थ में ' मद् ' ६
हिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ४ अ० २ पा० १ ख० ( दिवा० प० ) धातु से है । यह भी मधु (शहद या मद्य ) इसी धातु से है । हे इन्द्र ! 'प्रदिवः' पहिले दिनों में 'सुता- नाम्' बनाए हुये सोम रसों का भी 'त्वम्' तू 'राजा' 'असि' है ॥ ८ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ४,१ ॥ चतुर्थेऽध्याये द्वितीयः पादः ( ख० १ ) [निरु०] तितउ (१०) परिपवनं भवति । ततवद्वा । तुन्नवद्वा । तिलमात्रतुन्नमिति वा ॥ १ ( ९ ) ॥ अनुवादः । [निरुक्तार्थः-] 'तितउ' (१०) परिपवन अर्थात् जिससे सत्त छाने जावें ऐसी चालनी का नाम है । 'तितउ' क्यों ? तत (चर्म) से मँढा हुआ होता है । अथवा तुन्नों (छिद्रों) वाला होता है । अथवा उसमें तिलके बराबर तुन्न ( छिद्र ) होते हैं ॥ १ ( ९ ) ॥ १ ( खं०२) [निरु०-] “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसावाचमक्रत अत्रासखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ ” [ ऋ० सं० ८, २, २३, २ ] १-“सक्तुमिव तितउना” इति विद्यासूक्तं बृहस्पतेरार्षम् ।
हिन्दी निरुक्त ( ४३ ) ४ अ० २ पा० २ ख० (भा०) सक्तुमिव परिपवनेन पुनन्तः । 'सक्तुः' सचतेः । दुर्धावोभवति । कसतेर्वा स्याद् विपरीत- तस्य । विकसितो भवति । [ द्वि० पा०- ] “ यत्र धीरा मनसा वाच-” मकृषत । [व्याख्यान्तरम्-] प्रज्ञानं धीराः,-प्रज्ञानवन्तः, ध्यानवन्तः । [तृ०च० पा०-] तत्र “सखायः सख्यानि” सं “ जानते ” “ भद्रैषां लक्ष्मी र्निहिताधिवाचि” ॥ ‘ भद्रं ’ भगेन व्याख्यातम् । भजनीयं भूता- नाम् । अभिद्रवणीयंम् । भवदूरमयति- इतिवा । भाजनवद्वा । 'लक्ष्मीः' लाभाद्वा । लक्षणाद्वा ( लप्स्यनाद्वा । ) लञ्छनाद्वा । लषतेर्वा स्यात् प्रेप्साकर्मणः । लग्यतेर्वा स्याद्- आश्लेषकर्मणः । लज्जतेर्वा स्याद्-अश्लाघाकर्मणः ॥ ‘ शिप्रे ( ११ ) ’ इति उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः ॥ २ ( १० ) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः- 'यत्र' जहां 'इव' जैसे (कोई) 'तितउना' परि- पवन या चालनी से 'सक्तुम् सत्तू को 'पुनन्तः' पवित्र करते हैं ( करते हुये होते हैं ) 'धीराः' विद्वान् पुरुष 'मनसा' मन से शब्द और अर्थ का निश्चय करके 'वाचम् वाणीको 'अक्रत'
हिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ४ अ० २ पा० २ खं० न्याय युक्त करते हैं, । 'अत्र' वहां 'सखायः' समान ज्ञान वाले 'सख्यानि' समान शास्त्रों में परिश्रम किये हुओं के विज्ञानाँ को 'जानते' जानते हैं । [किन्तु दूसरा नहीं ।] क्योंकि-'एषाम्' इनकी 'अधि-वाचि' वाणी के ऊपर 'भद्रा' सुखदायक 'लक्ष्मीः' लक्ष्मी 'निहिता' स्थापित है ॥ [निरुक्तार्थ-] सक्तूके समान परिपवन (चालनी) से पवित्र करते हुए । 'सक्तु' , लगना अर्थ में 'सञ्च' ( भ्वा०प०) धातु से है क्योंकि-वह दुर्धाव या कठिनाई से धोया जाने वाला होता है । अथवा उलटे हुए 'कस' (भ्वा०प०) धातु से हो-सकता है। क्योंकि ! वह विकसित या फूला हुआ होता है। यहां धीर पुरुष मन से बाणी को न्याययुक्त करते हैं। अथवा 'धीर' धी या प्रज्ञावाले, वा धी या ध्यान-वाले पुरुष 'वाच्' नाम प्रज्ञान ( प्रकृष्ट ज्ञान ) को करते हैं। तहां 'सखा' समान विद्यावाले सख्य समानविद्यावालों की विद्याकी उन्नति को अच्छी तरह जानते हैं । इनकी बाणीके ऊपर भद्र (वाञ्छनीय) लक्ष्मी स्थापित है । 'भद्र' 'भग' शब्दसे व्याख्यान किया गया । ( दोनों शब्दोंकी समान व्याख्या है । ) 'भग' क्यों ? प्राणियों का भजने योग्य है, या प्राणी उसे भजते हैं । अथवा उसकी ओर भागते हैं । अथवा 'भवत्' (होता हुआ) रमण (रति) देता है । ( क्योंकि- जिसके वह होता है, वह रमता है ) अथवा सुकृती जन उस के भाजन होते हैं, इस से भग है । 'लक्ष्मी' क्यों ! लाभ से । ( क्योंकि-उसे लक्ष्मीवाले ही लभते या प्राप्त होते हैं । अथवा लक्षण से । ( क्योंकि- लक्ष्मी- वान् पुरुष लक्षित ( चिन्हित ) जैसा हो जाता है । ) अथवा
हिन्दी निरुक्त ( ४५ ) ४ अ० २ पा० ३ खं० लञ्छन से। (क्योंकि- लक्ष्मीवान् उससे लञ्छित जैसा हो जाता है।) अथवा प्रेप्सा (बड़ी लालसा) अर्थमें 'लष' (भ्वा०प०) धातु से हो। क्योंकि- सभी उसे बहुत चाहते हैं।) अथवा आश्लेष (चपकना) अर्थ में 'लग' (स्वा० प०) धातु से है। (क्योंकि- वह पुरुष के साथ लगी हुई जैसी होती है॥) 'शिप्रे' (११) इसकी आगे व्याख्या करेंगे॥ ३ (१०)॥ १ (३ खं०) [निरु०] "तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्त्तोर्विततं सञ्जभार। यदेदयुक्तं हरितः सध- स्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै॥" (ऋ० सं० १, ८, ७, ४,) (भा०) तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं, मध्ये यत्कर्मणां क्रियमाणानां विततं संह्रियते। यदा- असौ-अयुक्त हरणान् आदित्यरश्मीन्। हरितः अश्वान्-इतिवा। अथ रात्री वासस्तनुते सिमस्मै। वेसरम् अहः-अवयुवती सर्वस्मात्। अपिवा उप- मार्थे स्यात्-'रात्री-इव वासस्तनुते' इति। तथापि निगमो भवति। "पुनः समव्यद् विततं वयन्ती" [ऋ० सं० २, ८, २, ४, ]। (भा०) समनात्सीत्॥ ३ (११) १ "तत्सूर्य्यस्य देवत्वम्" इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य इयमार्षम् त्रिष्टुप् छन्दः। सौर्य्यस्य पशोः षडर्चे वपाया याज्या
हिन्दी निरुक्त ( ४६ ) ४ अ० २ पा० ३ खं० अनुवादः । मन्त्रार्थः—मैं 'सूर्यस्य' भगवान् सूर्य के 'तत्' उस 'देवत्वम्' देवताभाव को 'तत्' उस 'महित्वम्' महिमा को जानता हूँ कि-उसने 'कर्त्तोः' कुल कर्मकर्त्ताओं के 'मध्या' मध्य में या साझने 'विततम्' यह प्रकाश जाल फैलाया । और भी बड़ी भारी महिमा यह है कि 'संजभार' जो प्रकाश समूह औरों से बहुत काल में भी हटाया जाना कठिन है, उसे बिना ही परिश्रम के एक ही क्षण में सायंकाल के समय स्वयम् सूर्य देव हटा देते हैं । यदा-इत् जिसी समय सूर्य भगवान् अस्त होते हुये 'हरितः' रस (जल) के हरने वाले किरणों को 'सध- स्थात्' पृथिवी लोक से खैंच कर 'अयुक्त' अपने में रख लेते हैं 'आत्' उसी समय 'रात्री' 'वासः' सब लोक से दिन को खैंच कर 'सिमस्मै' सब लोक के लिये 'तनुते' अन्धकार को फैला देती है । अर्थात् यह सूर्य देव की ही महिमा है, कि उस के निकट होने से अँधेरा नष्ट होता है, और उस से त्यागे हुए देश में अन्धकार छा जाता है ॥ निरुक्तार्थ—सूर्य का वह देव भाव और वह महिमा है, जो किये जाते हुए कर्मों के स्थल में फैला, हुआ (प्रकाश) संहार किया जाता है । जब उस ने (वह) हरणों या आदित्य की रश्मियों को जोड़ा (जोड़ता है) । अथवा हरितों नाम अश्वों को । उसी समय सब के लिये रात्री दिन को (हटाकर) (अँधेरे को) फैलाती है । 'वेसर' नाम दिन को सब से हटा कर अपने में मिलाती हुई । अथवा उपमा अर्थ में हो-'जैसे रात्री दिन को (हटा कर) (अँधेरे को) फैलाती है' यह
हिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ४ अ० २ पा० ४खं० वैसा भी निगम (बोधक मन्त्र) है ।—"पुनः समव्यत्००" [ ऋ० सं० ३, ८, २, ४, ] अर्थात् जैसे कोई स्त्री वस्त्र को बिनती हुई अस्त काल में फैलाए हुए तन्तुओं को फिर समे- टती है, और फिर उदय काल में फैलाती है, ऐसे यह रात्रि उदय काल में तम को समेटती है, और अस्तकाल में फिर उसे फैला देती है ! ( भा० ) 'समानात्सीत्' लपेट लेती थी या लपेट लेती है ॥ ३ ( ११ ) ॥ ( खं ४ ) १ [निरु-०] " इन्द्रेण संहिदृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा । मन्दूसमानवर्चसा ॥" [ ] (भा-०) इन्द्रेणाहि सन्दृश्यसे, सङ्गच्छमानः- अबिभ्युषा गणेन । मन्दू मदिष्णू युवांस्थः । अपि वा 'मन्दुना तेन-' इति स्यात्, 'समानवर्चसा'- इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ ४(१२) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थ- निरुक्तार्थ- हे भगवन् ! इन्द्र ! तू 'अबिभ्युषा' भय रहित 'इन्द्रेण' ईश्वर के अथवा प्रदीप्त मरुद्-गण के साथ 'सञ्जग्मानः' नित्य ही मिलता हुआ 'संदृक्षसे' दिखाई देता है १ "इन्द्रेण संहि दृक्षसे" इति मधुच्छन्दसः इदमार्र्षम् । महाव्रते मरुदुक्थे तृचाशीतिषु शस्यते । सात्रिकेषु च अहःसु स्तो- मातिवृद्धौ प्रातःसवने ब्राह्मणाच्छंसि शस्त्रे इन्द्र उच्यते ।
हिन्दी निरुक्त ( ४८ ) ४ अ० २ पा० ५ खं० तुम दोनों [इन्द्र और मरुद्गण] 'मन्दू' हर्ष-स्वभाव और 'स- मान वर्चसा' समान तेज वाले हो । [ यह व्याख्यान 'मन्दू 'समान वर्चसा' इन दोनों पदों को द्विवचन समझ कर किया (१३) गया । ] अथवा 'मन्दू' (मन्दुना) हर्ष स्वभाव 'समान वर्चसा' समान तेज वाले 'मरुद्गणेन' मरुद्गण के साथ,*-इस रीति से दोनों ['मन्दू' 'समान वर्चसा'] पदों को तृतीया विभक्ति के एकवचन में समझ कर व्याख्यान हो सकता है । 'समानवर्चसा' यह पद 'मन्दू' इस पदके साथ व्याख्यान किया गया ॥४(१२)॥ (खं० ५) १ (१४) [निरु०-] “ईर्मा॒न्तास॑: सि॒लि॒कम॑ध्यमासः संशू॒- रणासो॑ दि॒व्यासो॒ अत्या॑: । हंसा इ॑व श्रेणि॒शो यतन्ते॒ यदाक्षि॑षु॒र्दिव्य॒मज्म॒मश्वा॑:॥” [ २,३,१२,१०] (भा०) इर्मान्ताः समीरि॑तान्ताः (सुसमीरितान्ताः) पृथ्वन्तावा । ‘सिलिकमध्यमाः' संसृतमध्यमाः । शीर्षमध्यमा वा । अपिवा शिर आदित्यो भवति । यदनुशेते सर्वाणि भूतानि, मध्ये च एषां तिष्ठति । इद- मपि इतरत् ‘शिरः’ एतस्मादेव । समाश्रितानि एतत् इन्द्रियाणि भवन्ति । ‘संशूरणासः’ (दिव्यासो- १-“ईर्मान्तासः” इति दीर्घतमसः आर्षम् । “यमेन दत्तम्” इति द्वयं च, द्वे अप्येते अश्वस्तोमीये सूक्ते, तेन च अश्वः स्तूयते अश्वमेधे, आदित्यस्य रथे ये अश्वा युक्तास्ते उच्यन्ते ।
हिन्दी निरुक्त \qquad ( ४६ ) \qquad ४ अ० २ पा० ५ खं० अत्याः) 'शूरः' शवतेर्गतिकर्मणः । 'दिव्याः' दिवि- जाः । 'अत्याः' अतनाः । "हंसाइव श्रेणिशो य- तन्ते ।” 'हंसाः' हन्तेः। घ्नन्ति-अध्वानम्। (श्रेणि- शः इति) 'श्रेणिः' श्रयतेः । समाश्रिता भवन्ति । “यदाक्षिषुः” यदापन् । “दिव्यम्-अज्मम्” अजनि- म्, आ।जिम्-अश्वाः। अस्ति-आदित्यस्तुतिः-अश्व- स्य । “आदित्यादश्वो निस्तष्ट” इति । “सूरादश्वं वसवो निरतष्ट” [ऋ० सं० २, ३, ११, २] इत्यपि निगमो भवति ॥ ५ (१३) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-निरुक्तार्थः-सूर्य के रथ में जुते हुए घोड़ों की स्तुति है ।-सात (७) घोड़ों में से चार (४) घोड़े 'हेमन्तासः' विरल या आपस में अन्तर दिये हुए हैं । अथवा पृथ्वन्त ( चौड़ी छाती वाले ) या मोटी जांघ वाले हैं । उन सातों में से जो बीच के तीन घोड़े हैं, वे 'सिलिकमध्यमासः' एक से एक सटे हुए हैं । अथवा सातों घोड़े जघन और छाती में मोटे या चौड़े, तथा पेट में पतले या बिलकुल बिना पेट के हैं । [ऐसे भी स्तुति हो जाती है ।] अथवा शीर्षमध्यस हैं, या उन सातों के बीचका घोड़ा शिरोमणि है । अथवा 'सिलिक' नाम शिर और वह आदित्य है, क्यों कि- सब भूत (प्राणी) उसी पर टिके हुए हैं, और वो ही इनके मध्य में स्थित है । [प्रा- ७