निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
२२ अ० १ पा० १ ख० १ । के ही साथ रहेगा। जिसमें उस क्रियाके रहनेका सम्भव हो, सुतराम्, क्रियावाचकके साथ क्रियावाचक मिल कर एक वाक्य- में कभी नहीं रहेगा, यही क्रियाका स्वभाव है। इसके अनुसार हम देखते हैं, तो नामपदके साथ नामपद या क्रियापद देखा जाता है, किन्तु क्रियापदके साथ क्रियापद नहीं देखा जाता, जैसे-‘देवदत्तः पचति’ ‘देवदत्त पकाता है’ ‘यज्ञदत्तः पठति’ ‘यज्ञदत्त पढता है’ यह नाम और क्रिया पद या आख्यातका जोड़ा है, तथा ‘राज्ञः पुरुषः’ ‘राजाका पुरुष’ यह एक वाक्यमें दो नामोंका योग है, किन्तु ‘पचति’ पठति’ (पकाता है-पढ़ता है) ऐसे दो स्वतन्त्र क्रियापदोंका एक वाक्यमें मेल नहीं देखा जाता। ऐसी अवस्थामें हम ‘पचति’ और ‘पठति’ आदि आख्यात पदोंको क्रिया प्रधान न कहें, तो क्या करेंगे? अर्थात् पढ़ना कभी लिखना करता, या लिखना पढ़ना, तो ‘पचति पठति’ आदि प्रयोग होते। यदि यह इसी लिए ऐसा है तो— आख्यातका क्रिया-प्रधानत्व अनिवार्य है। आख्यातमें द्रव्य-प्रधानता नहीं। जिन शब्दोंमें द्रव्य प्रधान होता है, ऐसे शब्दो में लिङ्ग (स्त्री-पुं-नपुंसकत्व) का योग भी रहता है, जैसे—पाचक—पाठक आदि शब्द। इनका पुँल्लिङ्गमें ‘पाचकः’ स्त्रीलिङ्गमें ‘पाचिका और नपुंसक लिङ्गमें ‘पाचकम्’ बनता है, जब कि लिङ्गके भेदसे इनमें विकृति देखी जाती है तो इनमें लिङ्गका योग भी स्वीकार्य ही होगा। जिन शब्दोंमें लिङ्गके कारण कोई विकृति नहीं देखी जाती उनमें लिङ्गके सम्बन्धके होनेका कोई प्रमाण न होने से वे निर्विवाद लिङ्ग-सम्बन्ध-रहित ही माने जायेंगे। इस विचारके साथ हम आख्यात पदोंको देखते हैं तो वे भी---‘ब्राह्मणः
पठति' 'ब्राह्मणी पठति' तथा 'ब्राह्मणकुलं पठति' इन तीनो ही वाक्योंमें पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग एवम् नपुंसकलिङ्ग पदोंके साथ लग कर भी एक ही रूपसे रहते है, इसका कारण यही हो सकता है कि—वह द्रव्य—प्रधान नहीं है। इस द्रव्य प्रधानताके खण्डनसे भी परिशेषसे आख्यातमें क्रिया प्रधानता ही आती है। इसी अभिप्रायसे किसी प्राचीन आचार्य्यने कहा है— "क्रियावाचक माख्यातं, लिङ्गतो न विशिष्यते । त्रींश्च पुरुषान्विद्यात् कालतस्तु विशिष्यते ॥ आख्यात क्रिया—वाचक या क्रियाप्रधान है। (द्रव्यवाचक नहीं) क्योकि इसमें लिङ्गकी विशेषणता नही देखी जाती। जैसे कि—हिन्दीभाषामें 'पकाता है' 'पकाती है' इत्यादि। इसके अतिरिक्त—३ पुरुषो और कालका योग भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेका मूल है। अर्थात् द्रव्यवाचक नाम पदोंमे प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष तथा भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान कालकी विशेषणता नहीं देखी जाती, यह विलक्षणता भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेमें कारण है। प्रश्न। शाब्दिक लोगोंने लिङ्ग और संख्याके सम्बन्धको द्रव्यका लक्षण बताया है, क्योंकि—संख्या और लिङ्ग ये दोनो ही द्रव्यके धर्म हैं, हम जहां तक समझतेहै, इसी सिद्धान्तके अवलम्बन पर यह वचन उतरा है, किन्तु कोई यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि—'अकेली संख्या भी किसी अद्रव्य पदार्थमें रह सकती है' इस लिए जब कि—आख्यातपदोंमें 'पचति' पचतः, पचन्ति' इत्यादि रूपसे संख्याका योग व्यापक है, तो वे क्यों नहीं द्रव्यवाचक समझे जाते ? जैसे कि—घटः घटौ घटाः । अर्थात् 'पकाता है' और 'पकाते हैं' ऐसे प्रयोगोमें संख्याकां प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है।
२४ अं० १ पा० १ खं० १ । • इसके अतिरिक्त 'देवदत्तः पचति' 'ओदनः पच्यते' ( 'देवदत्त पकाता है, ओदन पकाया जाता है) इन वाक्योंमें द्रव्यवाचकता या द्रव्यके सामानाधिकरण्यके कारण क्रियामें विकृति होती है, अन्यथा उस विकृतिका मूल ही क्या है। अपि च "लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः” “कर्त्तरि शप्” । इत्यादि अनेक पाणिनि सूत्र इसका साक्ष्य भी देते हैं कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता रहती है। लिङ्गकी विकृतिका अभाव भी पूर्णरूपसे प्रमाण नहीं हो सकता कि--'आख्यात द्रव्यवाचक नहीं', क्योंकि कति और युष्मद्-अस्मद् आदि बहुत द्रव्यवाचक शब्द ऐसे है, जिनमें लिङ्ग की विकृति नही देखी जाती जैसे-'त्वं पुमान्' 'त्वंस्त्री' 'त्वं ब्रह्म' 'कति पुरुषाः' 'कति स्त्रियः' 'कति कुलानि' इत्यादि । • यह कहें कि-- कति आदि शब्दोमे लिङ्ग है, किन्तु प्रतीत नहीं होता, तो हम भी 'पचति' आदिके लिये यह कह सकते है, इस लिये यह शब्दका स्वभाव है कि-कहीं लिङ्गकी विकृति प्रतीत होतो है, और कहीं नहीं। जब कि-पच् धातुसे लट् लकार होता है, और वह 'शतृ' आदेश होनेकी अवस्था में द्रव्यवाचक स्वीकृत है, तो तिप् आदेश- की अवस्था में उस लट्के अर्थको कौन उड़ा ले जायगा, या उड़ भी जाता है, तो उसमें क्या प्रमाण है ? अपि च 'देवदत्तः पचति' यहा पर पचति द्रव्यवाचक नहीं तो देवदत्त शब्दमें प्रथमा विभक्तिका क्या मूल है ? और पचति पचसि तथा पचामि में पुरुष नियम किसने किया ? • यदि इन सब बातोंका मूल निकालेंगे तो आप समझेंगे कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता है, या द्रव्य-प्रधानता है, या नहीं।
हिन्दी निरुक्त । २५ अपि च—यदि आख्यातमें सर्वत्र भाव—प्रधानता ही होती तो पाणिनि मुनि उक्त सूत्रमे कर्त्ता और कर्मके अतिरिक्त भावमें लकारको क्यो विधान करते ? यद्यपि यहां एक आपत्ति और हो सकती है ! वह यह है— कि—आख्यातकी द्रव्य—प्रधानता शब्दानुशासन तक है, फिर अपना कार्य करके लोकव्यवहारमे शब्दके आनेसे पहले ही वह लय हो जाती है ? तथापि उसके लिये यह कहा जा सकता है कि—वह पीछे किस कारणसे लय हो जाती है, और उसके लय होने मे क्या प्रमाण है ? यदि कोई प्रमाण तुम्हारे पास अनिवार्य होता तो प्रथमान्त- विशेष्यक शाब्दबोध माननेवाले नैयायिक तुमसे अलग क्यो होने ? इससे सार यह निकला कि—आख्यात हो या नाम जहां भाव-वाचक प्रत्यय होगा, वही भाव-प्रधानता है, अन्यत्र नही । जैसे—'देवदत्तेन भूयते' पच्यते, 'ओदनेन पच्यते, कृतिः भूतिः भवनम्, भावः, पाचकता, पाठकता इत्यादि ! उत्तर—यह ठीक है कि—आख्यातपद भाव, क्रिया, काल और संख्याके समान द्रव्यका वाचक भी होता है, तथापि उन सब अर्थोमे भावकी ही प्रधानता रहती है, इसके लिये विशेष- प्रत्ययाधान आदि बहुत युक्तिया दी जाचुकी हैं, इसलिए यहा अन्य विस्तारकी उपेक्षा की जाती है । प्रकृत्यर्थकी प्रधानता । और प्रत्ययार्थकी अप्रधानता । आख्यातके चार विभाग हे, कर्तृ-वाचक, कर्म-वाचक, भाव-
२६ अ० १ पा० १ ख० १ । वाचक और कर्म-कर्तृ-वाचक । जैसे—कर्तृ० 'पचति', कर्म० 'पच्यते', भाव० 'भूयते', और क० क० 'पच्यते-स्वयमेव' । इन चारों आख्यातोंमें अवयव या प्रत्यय (तिप् आदि) के अर्थ द्रव्य हैं, वे अप्रधान हैं, और प्रकृति जो धातु (पच आदि) है, उसका अर्थ (क्रिया) प्रधान है। उसका अभिधान करनेसे यह आख्यात कहाता है अर्थात् प्रधानीभूत क्रिया ही इसका लक्षण है। अथ नामलक्षणम् । (संगति) आचार्य्यने चारों पदोंकी गणनाके समय 'नामाख्याते' इस पदमें व्याकरणके नियमके अनुरोधसे आख्यातकी अपेक्षा नामकी गणना पहिले की है, किन्तु लक्षणका क्रम उत्पत्तिके क्रमानुसार किया है, उत्पत्तिमें आख्यात पहिले है, और नाम आख्यातसे उत्पन्न होनेके कारण उससे पीछे है। इसी उत्पत्ति के क्रमके अनुरोधसे गणनाक्रमको भङ्ग करके आख्यातके लक्षणके अनन्तर नामका लक्षण किया। लक्षण । (नि०) “सत्वप्रधानानि नामानि” लिङ्ग और संख्यावाले पदार्थको द्रव्य या सत्व कहते हैं, जिस पदमें द्रव्य प्रधानतासे कहा जावे, और क्रिया गौणभावसे वह 'नाम' कहाता है। नाम शब्दकी व्युत्पत्ति । (क) नमन्ति आख्यातशब्दे गुण- भावेन यानि, तानि नामानि । जहां वाक्यमें नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होते हैं
हिन्दी निरुक्त । २७ वहां नाम पद गौण होकर आख्यात पदसे झुक जाते हैं, इसीसे ये नाम कहाते हैं । (ख) नमन्ति स्वमर्थम् आख्यातशब्द- वाच्येगुणभावेन इति नामानि । आख्यातके क्रियारूप अर्थमे० अपने अर्थको गौण भावसे झुका देते हैं, इससे ये नाम कहाते हैं । जिस प्रकार आख्यातमें रहता हुआ भी द्रव्य इच्छासे छोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार नाममै रहती हुई भी क्रिया गणना नहीं की जाती । क्योकि नाम पदकी द्रव्यमे परता या अभि निवेश होता है इसीसे उसमे जो क्रिया रहती है वह अपने विकार से उत्पन्न होनेवाले नामार्थको बताकर वहांसे हट जाती है । ॅमानो 'पाचक' शब्दमे जो पाकक्रिया प्रतीत होती है, वह जन समुदायमे पाचक पुरुषकी पहिचान कराके फिर वहांसे चली जाती है। इसी कार्यके लिए उसका वहां निवास था । जब उस द्रव्यका पता चल गया तो फिर वहां वह अपना प्रयोजन नहीं देखती । नाममें क्रियाका रहना । नाम पदमें तीन भाग होते हैं, —प्रकृति, (धातु) प्रत्यय (अ क आदि) और विभक्ति (प्रथमा आदि) जैसे—'पाचक:' इस- ॅमें पच् (धा०) अक (प्र०) और विसर्ग (:) विभक्ति है । यहां प्रकृति और धातु एक ही बात है। धातु क्रियाका वाचक होता है, और वह नाममें विद्यमान है, इससे उसकी वाच्य क्रिया भी वहां होनी चाहिए । जैसे कि—जहां जो अर्थ है, वहां उसका वाचक शब्द भी अवश्य रहता है ।
२८ अ० १ पा० १ ख० १ । जहां शब्द है वहां उसका वाच्य अर्थ है, क्यों कि—शब्द और अर्थ दोनों वाच्य-वाचक।सम्बन्धसे नित्य सम्बन्धी हैं, इस रीति से सिद्ध हुआ कि नाम में क्रिया है। नाममें रहती हुई भी क्रियाकी अविवक्षा। नाममें जो धातु रहता है, उसकी क्रियाको कहनेकी शक्ति कृत् प्रत्ययसे बने हुए प्रातिपदिकसे तिरस्कृत हो जाती है। अर्थात् उसकी वृत्ति प्रातिपदिकके भीतर ही लय हो जाती है, ऐसी अवस्थामें अपने अर्थको प्रगट करनेमे असमर्थ होकर प्रातिपदिक- के अर्थका ही अनुसरण करता है। इस लिए वह द्रव्यप्रधान ही हो जाता है, और क्रियाकी विवक्षा नहीं रहती। यह भाव है कि-जिस समयमें नामका विग्रह करते हैं, उस समय धातु प्रातिपदिकके बन्धनसे मुक्त होकर द्रव्यमें रहते हुए अपने अर्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु विग्रहसे पहिले नही, यही नाम शब्दकी द्रव्यपरता है। जिस प्रकार राजाकी शासन शक्ति परराष्ट्र- में तिरस्कृत हो जाती है और उसकी सीमासे बाहिर होते ही उसकी शक्तिका उद्दीपन हो जाता है, वैसेही नामके भीतर आये हुए धातुकी शक्तिका वृत्त है। आख्यातमें क्रिया और नाममे द्रव्यका राज्य है। श्लोकोंमे नामके लक्षण। शब्देनोच्चारितेनेह, येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं, नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥ अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते, नानार्थेषु विभक्तयः । तन्नाम कवयः प्राहु, र्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥ २ ॥
हिन्दी निरुक्त । २६ निर्देशः कर्म करणं, प्रदानमपकर्षणम् । स्वाम्यर्थोप्यधिकरणं, विभक्त्यर्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥३॥ १—लक्षण, जिस शब्दके उच्चारण करनेसे द्रव्य प्रतीत हो, उस को शब्दशास्त्रमें नाम कहते हैं । २—लक्षण, जिस शब्दमें भिन्न २ अर्थोंमें ८ विभक्तियां होती हों और वचनं तथा लिङ्गका भेद हो, उसको नाम कहते है। विभक्तियोंके अर्थ । १ माका, शब्द निर्देश, २ याका कर्मकारक, ३ याका कर्तृ और करण कारक, ४ र्थीका सम्प्रदान कारक, ५ मीका अपादान कारक, ६ ष्ठीका स्वामिभाव आदि सम्बन्ध और ७ मीका अधिकरण कारक अर्थ है। 'नामानि' बहुवचनका कारण । “सत्वप्रधानानि नामानि” इस नाम लक्षणमें “क्रियाप्रधान- माख्यातम्” इस लक्षणमें 'आख्यातम्' पदके समान 'नामानि' के स्थानमें 'नाम' यह एक बचन ही देना चाहिये था, तथापि बहुव- चन करनेका प्रयोजन यह है कि-कही निपात और उपसर्गोंमें भी स्त्रीलिङ्ग, पुलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गोंका भेद देखा जाता है, इसलिए उनका भी नामोंमें संग्रह करनेके लिए बहुबचन दिया है । अन्य आचार्योंके मतमें नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद । कोई आचार्य नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद इस प्रकारसे करते हैं, कि—भाव, काल, कारक और संख्या ये चार अर्थ आख्या- तके हैं, और उनमें भावकी प्रधानता है, इसीसे आख्यातको भाव प्रधान कहते हैं। एवम् नामके भी सत्ता, द्रव्य, संख्या और लिङ्ग ये चार अर्थ होते हैं। और उनमें द्रव्य प्रधान होता है, इसीसे नाम सत्वप्रधान कहे जाते हैं।
३० अ० १ पा० १ ख० १ । नाम और आख्यातके समुदायमें भावकी प्रधानता । (नि०) - तद्यत्रोभे भावप्रधाने भवतः । जहाँपर नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होजाते हैं, वहां भाव- की ही प्रधानता रहती है । यद्यपि स्वतन्त्रताकी अवस्था में एक भावप्रधान और दूसरा द्रव्यप्रधान है, तथापि वह प्रधानता एक पदके विचार तक ही रहती है, लोक तथा वेदमे इनसे जब कार्य निकलता है, तो दोनोंके मेलसे ही निकलता है, अर्थात् व्यवहार स्थलमें इनमें से एकके बिना एक नहीं रहता है, सुतराम्, दोनोको परस्परकी अत्यन्त अपेक्षा बनी रहती है । जैसे—व्यवहारमें 'पचति' से भी कुछ प्रयोजन नहीं मालूम होता, और ऐसे ही एक 'देवदत्तः' पदसे भी । इससे ये दोनो जहां इकट्ठे रहेंगे, वहां, अर्थात् वाक्यमें भावकी प्रधानता और द्रव्यकी गौणता रहेगी । क्योंकि—क्रिया-साध्य होती है, और कारक जो द्रव्य है, वे उसके साधनके लिए होते है । इस उपरि लिखित व्याख्यानसे वाक्यमें आख्यातकी प्रधानता सिद्ध हुई । आख्यातमें भावकी अवस्था । (नि०) पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे । व्रजति-पचति--इत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम् । भावकी दो अवस्था होती है, एक साध्यावस्था जो उसके बनते हुएकी असम्पूर्ण अवस्था कही जा सकती है । दूसरी सिद्धावस्था होती है, जिसको उसकी सम्पूर्ण होनेकी अवस्था कह सकते हैं । इनमें भावकी पहिली अवस्था आख्यातसे कही जाती या प्रतीत होती है । शब्द और अर्थका जो सम्बन्ध है, वह लोक व्यवहारसे ही
हिन्दी निरुक्त । ३१ ग्रहण किया जाता है। क्योंकि मनुष्य लोकमे रहकर लोकही से शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसलिए यहां भावकी अवस्था दिख- लानेके लिए भी लोकही अवलम्बनीय है। आख्यात नाम 'पचति-पठति' इत्यादि तिङन्त पदोंका है। भाषामें इनकी जगह 'पकाता है-पढ़ता है' इत्यादि धर सकते हैं। इन पदोंका स्वभाव है कि—जबसे क्रियाका आरम्भ होता है, वहांसे लेकर उसकी समाप्ति तक जो अवस्था है, वह आख्यात पदसे प्रका- शित की जाती है। उदाहरण में हम 'गङ्गां व्रजति' यह वाक्य रखते हैं। जिसका अर्थ 'गङ्गाको जाता है-यह होता है। यहां पर 'व्रजति' से जो क्रिया प्रतीत होती है, उसको गमन कहते हैं। इस गमन क्रियाका आरम्भ जूतीके पहिननेसे होता है, अर्थात् जूती का पहिनना, आगे पीछे पैरोका धरना, मार्गमे भोजन करना, सोना, बैठना तथा जलपान करना आदि क्रियाओमे गमन ही व्याप्त हुआ दिखाई देता है, जब तक वह गङ्गा तक पहुंचे। अर्थात् चलते, बैठते, खाते, पीते हुए भी पूछते है कि क्या करता है, तो उसका यही उत्तर मिलता है, कि—गङ्गाको जाता है। सार यह निकला कि—घरसे गङ्गातक जितनी क्रिया देवदत्तके शरीरमें होती हैं, उन सभीमे गमन क्रिया व्यापक रूपसे प्रतीत होती है। जब वह गङ्गाके ऊपर पहुँच जाता है, तब वह गमन क्रिया सम्पूर्ण हो जाती है। उस अवस्थामें यदि पूछा जाय तो 'व्रजति' इस पदसे उत्तर नहीं दिया जायगा, किन्तु 'गतः-प्राप्तः' इत्यादि पदोंसे ही उत्तर दिया जायगा। क्योकि-अब वह गमन करता नहीं किन्तु कर चुका। इसीसे स्पष्ट होता है कि—आख्यात पद क्रिया की साध्यवस्थाको ही कथन करता है। ऐसे ही पचन तथा पठन क्रियाओंका भी आरम्भ और समाप्ति एवम्, आख्यातके वाच्यार्थ को निर्णय करना होगा।
३२ अ० १ पा० १ ख० १ । अन्त्य क्रियासे भावकी सिद्धि। यहांपर ऐसी आपत्ति उठाई जा सकती है कि जब हम अन्त्य क्रियाके पास ही भावकी सिद्धिको देखते है, तो क्यो नहीं अन्तकी क्रिया ही आख्यातका वाच्य समझा जाय ? यद्यपि जिस पदविहरणसे देवदत्त गङ्गाके तटपर पहुंचता है, ठीक उसी पदविहरण ( पैंड ) पर भावकी सिद्धि प्रतीत होती है, तथापि जिस क्रियासे गङ्गाके तटपर पहुंचता है, यदि उससे पहलेकी क्रियाएं न हो तो उसीका होना असम्भव है, इसीलिए गृहके त्याग और गङ्गाकी प्राप्ति तक जितनी क्रिया है, सभीमें गमन की व्याप्ति माननी होगी । इसके अतिरिक्त गृह और गङ्गाके मध्य देशमें खान, पान आदि क्रियाओके समय भी 'किङ्करोति' का उत्तर 'गङ्गां व्रजति' यही मिलता है जब कि अन्त्यक्रियाका जन्म भी नही है, तो किस प्रकारसे अन्त्य क्रियाको ही आख्यातका वाच्य कह सकते है। तात्पर्य यह है कि-आरम्भ से जितनी क्रियाए होती हैं, उनसे कुछ २ भाव सिद्ध होता रहता है, किन्तु उसकी पूर्त्ति अन्त्य-क्रिया ही में होती है, इससे वह अन्त्यक्रियासे ही सिद्ध हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में उन सभी क्रियाओंमे जो आरम्भसे अन्ततक होती हैं, भावकी सिद्धि होती है। यद्यपि वृक्षका पूर्ण स्वरूप फलपाक पर ही प्रतीत होता है किन्तु अङ्कुरसे आदि लेकर उसकी जितनी अवस्था हो चुकी है सभीकी कारणता माननी होगी । वही प्रकार इस प्रकरण मे है। प्रसिद्धिसे भावकी अनेक क्रियाश्रितता। मार्ग के मध्यमे जाते हुए किसी मनुष्यको देखो कि-वह गमन के कुछ भागको कर चुका है, कुछ कर रहा है, और कुछको करेगा, किन्तु कहनेवाले उन भूत भविष्यत् तथा वर्तमान क्रियाओ को एक
हिन्दी निरुक्त । २५ अपि च—यदि आख्यातमें सर्वत्र भाव—प्रधानता ही होती तो पाणिनि मुनि उक्त सूत्रमें कर्त्ता और कर्मके अतिरिक्त भावमें लकारको क्यो विधान करते ? यद्यपि यहां एक आपत्ति और हो सकती है। वह यह है कि—आख्यातकी द्रव्य—प्रधानता शब्दानुशासन तक है, फिर अपना कार्य करके लोकव्यवहारमें शब्दके आनेसे पहले ही वह लय हो जाती है ? तथापि उसके लिये यह कहा जा सकता है कि—वह पीछे किस कारणसे लय हो जाती है, और उसके लय होने मे क्या प्रमाण है ? यदि कोई प्रमाण तुम्हारे पास अनिवार्य होता तो प्रथमान्त- विशेष्यक शाब्दबोध माननेवाले नैयायिक तुमसे अलग क्यों होते ? इससे सार यह निकला कि—आख्यात हो या नाम जहां भाव-वाचक प्रत्यय होगा, वही भाव-प्रधानता है, अन्यत्र नही । जैसे—'देवदत्तेन भूयते' एध्यते, 'ओदनेन पच्यते, कृतिः भूतिः भवनम्, भावः, पाचकता, पाठकता इत्यादि । उत्तर—यह ठीक है कि—आख्यातपद भाव, क्रिया, काल और संख्याके समान द्रव्यका वाचक भी होता है, तथापि उन सब अर्थोंमें भावकी ही प्रधानता रहती है, इसके लिये विशेष प्रत्ययाधान आदि बहुत युक्तियां दी जाचुकी हैं, इसलिए यहां अन्य विस्तारकी उपेक्षा की जाती है । प्रकृत्यर्थकी प्रधानता । और प्रत्ययार्थकी अप्रधानता । आख्यातके चार विभाग हैं, कर्तृ-वाचक, कर्म-वाचक, भाव्- ४
२६ अ० १ पा० १ ख० १ । वाचक और कर्म-कर्तृ-वाचक । जैसे—कर्तृ० 'पचति', कर्म० 'पच्यते', भाव० 'भूयते', और क० क० 'पच्यते-स्वयमेव' । इन चारों आख्यातोंमें अवयव या प्रत्यय (तिप् आदि) के अर्थ द्रव्य हैं, वे अप्रधान हैं, और प्रकृति जो धातु (पच आदि) है, उसका अर्थ (क्रिया) प्रधान है। उसका अभिधान करनेसे यह आख्यात कहाता है अर्थात् प्रधानोभूत क्रिया ही इसका लक्षण है । अथ नामलक्षणम् । (संगति) आचार्यने चारो पदोंकी गणनाके समय 'नामाख्याते' इस पदमे व्याकरणके नियमके अनुरोधसे आख्यातकी अपेक्षा नामकी गणना पहिले की है, किन्तु लक्षणका क्रम उत्पत्तिके क्रमानुसार किया है, उत्पत्तिमे आख्यात पहिले है, और नाम आख्यातसे उत्पन्न होनेके कारण उससे पीछे है। इसी उत्पत्ति के क्रमके अनुरोधसे गणनाक्रमको भङ्ग करके आख्यातके लक्षणके अनन्तर नामका लक्षण किया । लक्षण । (नि०) “सत्वप्रधानानि नामानि” लिङ्ग और संख्यावाले पदार्थको द्रव्य या सत्व कहते हैं, जिस पदमें द्रव्य प्रधानतासे कहा जावे, और क्रिया गौणभावसे वह 'नाम' कहाता है । नाम शब्दकी व्युत्पत्ति । (क) नमन्ति आख्यातशब्दे गुण- भावेन यानि, तानि नामानि । जहां वाक्यमे नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होते हैं,
हिन्दी निरुक्त । २७ वहां नाम पद गौण होकर आख्यात पदसे झुक जाते हैं, इसीसे ये नाम कहाते हैं । ( ख ) नमन्ति स्वमर्थम् आख्यातशब्द- वाच्येगुणभावेन इति नामानि आख्यातके क्रियारूप अर्थमे अपने अर्थको गौण भावसे झुका देते हैं, इससे ये नाम कहाते है । जिस प्रकार आख्यातमें रहता हुआ भी द्रव्य इच्छासे छोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार नाममे रहती हुई भी क्रिया गणना नहीं की जाती । क्योकि नाम पदकी द्रव्यमे परता या अभि निवेश होता है इसीसे उसमे जो क्रिया रहती है वह अपने विकार से उत्पन्न होनेवाले नामार्थको बताकर वहांसे हट जाती है। मानों 'पाचक' शब्दमे जो पाकक्रिया प्रतीत होती है, वह जन समुदायमे पाचक पुरुषकी पहिचान कराके फिर वहांसे चली जाती है। इसी कार्यके लिए उसका वहां निवास था। जब उस द्रव्यका पता चल गया तो फिर वहां वह अपना प्रयोजन नहीं देखती । नाममें क्रियाका रहना । नाम पदमें तीन भाग होते है,—प्रकृति, (धातु) प्रत्यय (अ क आदि) और विभक्ति (प्रथमा आदि) जैसे—'पाचक:' इस- में पच् (धा०) अक (प्र०) और विसर्ग (:) विभक्ति है। यहां प्रकृति और धातु एक ही बात है। धातु क्रियाका वाचक होता है, और वह नाममें विद्यमान है, इससे उसकी वाच्य क्रिया भी वहां होनी चाहिए। जैसे कि—जहां जो अर्थ है, वहां उसका वाचक शब्द भी अवश्य रहता है।
२८ अ० १ पा० १ ख० १ । जहां शब्द है वहां उसका वाच्य अर्थ है, क्यों कि—शब्द और अर्थ दोनों वाच्य-वाचक।सम्बन्धसे नित्य सम्बन्धी हैं, इस रीति से सिद्ध हुआ कि नाम में क्रिया है। नाममें रहती हुई भी क्रियाको अविवक्षा । नाममें जो धातु रहता है, उसकी क्रियाको कहनेकी शक्ति कृत् प्रत्ययसे बने हुए प्रातिपदिकसे तिरस्कृत हो जाती है। अर्थात् उसकी वृत्ति प्रातिपदिकके भीतर हो लय हो जाती है, ऐसी अवस्थामें अपने अर्थको प्रगट करनेमें असमर्थ होकर प्रातिपदिक- के अर्थका ही अनुसरण करता है। इस लिए वह द्रव्यप्रधान ही हो जाता है, और क्रियाकी विवक्षा नही रहती। यह भाव है कि—जिस समयमें नामका विग्रह करते हैं, उस समय धातु प्रातिपदिकके बन्धनसे मुक्त होकर द्रव्यमे रहते हुए अपने अर्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु विग्रहसे पहिले नहीं, यही नाम शब्दकी द्रव्यपरता है। जिस प्रकार राजाकी शासन शक्ति परराष्ट्र- में तिरस्कृत हो जाती है और उसकी सीमासे बाहिर होते ही उसकी शक्तिका उद्दीपन हो जाता है, वैसेही नामके भीतर आये हुए धातुकी शक्तिका वृत्त है। आख्यातमें क्रिया और नाममें द्रव्यका राज्य है। श्लोकोंमें नामके लक्षण । शब्देनोच्चारितेनेह, येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं, नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥ अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते, नानार्थेषु विभक्तयः । तन्नाम कवयः प्राहु, र्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥ २ ॥
हिन्दी निरुक्त । २६ निर्देशः कर्म करणं, प्रदानमपकर्षणम् । स्वाम्यर्थोऽप्यधिकरणं, विभक्त्यर्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥३॥ १—लक्षण, जिस शब्दके उच्चारण करनेसे द्रव्य प्रतीत हो, उस को शब्दशास्त्रमें नाम कहते हैं । २—लक्षण, जिस शब्दमे भिन्न २ अर्थोंमें ८ विभक्तियां होती हों और वचन तथा लिङ्गका भेद हो, उसको नाम कहते है । विभक्तियोंके अर्थ । १ माका, शब्द निर्देश, २ याका कर्मकारक, ३ याका कर्तृ और करण कारक, ४ र्थीका सम्प्रदान कारक, ५ मीका अपादान कारक, ६ ष्ठीका स्वामिभाव आदि सम्बन्ध और ७ मीका अधिकरण कारक अर्थ है। 'नामानि' बहुवचनका कारण । "सत्त्वप्रधानानि नामानि" इस नाम लक्षणमें "क्रियाप्रधान माख्यातम्" इस लक्षणमें 'आख्यातम्' पदके समान नामानि' के स्थानमें 'नाम' यह एक वचन ही देना चाहिये था, तथापि बहुव- चन करनेका प्रयोजन यह है कि-कही निपात और उपसर्गोंमें भी स्त्रीलिङ्ग, पुलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गोंका भेद देखा जाता है, इसलिए उनका भी नामोंमें संग्रह करनेके लिए बहुवचन दिया है । अन्य आचार्योंके मतमें नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद । कोई आचार्य नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद इस प्रकारसे करते हैं, कि—भाव, काल, कारक और संख्या ये चार अर्थ आख्या- तके हैं, और उनमें भावकी प्रधानता है, इसीसे आख्यातको भाव प्रधान कहते हैं। एवम् नामके भी सत्ता, द्रव्य, संख्या और लिङ्ग ये चार अर्थ होते हैं। और उनमें द्रव्य प्रधान होता है, इसीसे नाम सत्वप्रधाने कहे जाते हैं।
३० अ० १ पा० १ ख० १ । नाम और आख्यातके समुदायमें भावकी प्रधानता । (नि०) । तद्यत्रोभे भावप्रधाने भवतः । जहाँपर नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होजाते हैं, वहां भाव- की ही प्रधानता रहती है। यद्यपि स्वतन्त्रताकी अवस्थामें एक भावप्रधान और दूसरा द्रव्यप्रधान है, तथापि वह प्रधानता एक पदके विचार तक ही रहती है, लोक तथा वेदमें इनसे जब कार्य निकलता है, तो दोनोंके मेलसे ही निकलता है, अर्थात् व्यवहार स्थलमे इनम से एकके बिना एक नहीं रहता है, सुतराम्, दोनोंको परस्परकी अत्यन्त अपेक्षा बनी रहती है। जैसे—व्यवहारमें 'पचति' से भी कुछ प्रयोजन नहीं मालूम होता, और ऐसे ही एक 'देवदत्तः' पदसे भी। इससे ये दोनों जहां इकट्ठे रहेंगे, वहां, अर्थात् वाक्यमे भावकी प्रधानता और द्रव्यकी गौणता रहेगी। क्योंकि—क्रिया-साध्य होती है, और कारक जो द्रव्य है, वे उसके साधनके लिए होते है। इस उपरि लिखित व्याख्यानसे वाक्यमें आख्यातकी प्रधानता सिद्ध हुई। आख्यातमें भावकी अवस्था । (नि०) पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे । ब्रजति-पचति--इत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम् । भावकी दो अवस्था होती हैं, एक साध्यावस्था जो उसके बनते हुएकी असम्पूर्ण अवस्था कही जा सकती है। दूसरी सिद्धावस्था होती है, जिसको उसकी सम्पूर्ण होनेकी अबस्था कह सकते हैं। इनमें भावकी पहिली अवस्था आख्यातसे कही जाती या प्रतीत होती है। शब्द और अर्थका जो सम्बन्ध है, वह लोक व्यवहारसे ही
हिन्दी निरुक्त । ३१ ग्रहण किया जाता है। क्योंकि मनुष्य लोकमे रहकर लोकही से शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसलिए यहां भावकी अवस्था दिख- लानेके लिए भी लोकही अवलम्बनीय है। आख्यात नाम 'पचति-पठति' इत्यादि तिङन्त पदोंका है। भाषामें इनकी जगह 'पकाता है-पढता है' इत्यादि धर सकते है। इन पदोंका स्वभाव है कि—जबसे क्रियाका आरम्भ होता है, वहांसे लेकर उसकी समाप्ति तक जो अवस्था है, वह आख्यात पदसे प्रका- शित की जाती है। उदाहरण मे हम 'गङ्गां व्रजति' यह वाक्य रखते है। जिसका अर्थ 'गङ्गाको जाता है-यह होता है। यहां पर 'व्रजति' से जो क्रिया प्रतीत होती है, उसको गमन कहते हैं। इस गमन क्रियाका आरम्भ जूतीके पहिननेसे होता है, अर्थात् जूतो का पहिनना, आगे पीछे पैरोंका धरना, मार्गमें भोजन करना, सोना, बैठना तथा जलपान करना आदि क्रियाओमें गमन ही व्याप्त हुआ दिखाई देता है, जब तक वह गङ्गा तक पहुंचे। अर्थात् चलते, बैठते, खाते, पीते हुए भी पूछते हैं कि क्या करता है, तो उसका यहो उत्तर मिलता है, कि—गङ्गाको जाता है। सार यह निकला कि—घरसे गङ्गातक जितनी क्रिया देवदत्तके शरीरमें होती है, उन सभीमे गमन क्रिया व्यापक रूपसे प्रतीत होती है। जब वह गङ्गाके ऊपर पहुँच जाता है, तब वह गमन क्रिया सम्पूर्ण हो जाती है। उस अवस्थामें यदि पूछा जाय तो 'व्रजति' इस पदसे उत्तर नहीं दिया जायगा, किन्तु 'गतः-प्राप्तः' इत्यादि पदोंसे ही उत्तर दिया जायगा। क्योंकि-अब वह गमन करता नहीं किन्तु कर चुका। इसीसे स्पष्ट होता है कि—आख्यात पद क्रिया की साध्यावस्थाको ही कथन करता है। ऐसे ही पचन तथा पठन क्रियाओंका भी आरम्भ और समाप्ति एवम्, आख्यातके वाच्यार्थ को निर्णय करना होगा।
३२ अ० १ पा० १ ख० १ । अन्त्य क्रियासे भावकी सिद्धि । यहांपर ऐसी आपत्ति उठाई जा सकती है कि जब हम अन्त्य क्रियाके पास ही भावकी सिद्धिको देखते हैं, तो क्यों नहीं अन्तकी क्रिया ही आख्यातका वाच्य समझा जाय ? यद्यपि जिस पदविहरणसे देवदत्त गङ्गाके तटपर पहुंचता है, ठीक उसी पदविहरण (पैड) पर भावकी सिद्धि प्रतीत होती है, तथापि जिस क्रियासे गङ्गाके तटपर पहुंचता है, यदि उससे पहलेकी क्रियाएं न हों तो उसीका होना असम्भव हैं, इसीलिए गृहके त्याग और गङ्गाकी प्राप्ति तक जितनी क्रिया है, सभीमें गमन की व्याप्ति माननी होगी। इसके अतिरिक्त गृह और गङ्गाके मध्य देशमें खान, पान आदि क्रियाओके समय भी 'किङ्करोति' का उत्तर 'गङ्गां व्रजति' यही मिलता है जब कि अन्त्यक्रियाका जन्म भी नहीं है, तो किस प्रकारसे अन्त्य क्रियाको ही आख्यातका वाच्य कह सकते है । तात्पर्य यह है कि-आरम्भ से जितनी क्रियाए होती हैं, उनसे कुछ २ भाव सिद्ध होता रहता है, किन्तु उसकी पूर्त्ति अन्त्य-क्रिया ही में होती है, इससे वह अन्त्यक्रियासे ही सिद्ध हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में उन सभी क्रियाओम्मे जो आरम्भसे अन्ततक होती है, भावकी सिद्धि होती है। यद्यपि वृक्षका पूर्ण स्वरूप फलपाक पर ही प्रतीत होता है किन्तु अङ्कुरसे आदि लेकर उसकी जितनी अवस्था हो चुकी है सभीकी कारणता माननी होगी। वही प्रकार इस प्रकरण मे है। प्रसिद्धिसे भावकी अनेक क्रियाश्रितता । मार्ग के मध्यमें जाते हुए किसी मनुष्यको देखो कि-वह गमन के कुछ भागको कर चुका है, कुछ कर रहा है, और कुछको करेगा, किन्तु कहनेवाले उन भूत भविष्यत् तथा वर्तमान क्रियाओं को एक
, हिन्दी निबन्ध । ४१ ऐसी स्थितिमें नाम, आख्यात, निपात और उपसर्ग चारों ही एकसाथ वर्तमान रहते हैं इसलिए उनकी गणना जो हमारे मतमें है युक्ति-सम्पन्न है । इस मतमें शब्द नित्य है इससे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, अभि- व्यक्ति (प्रकटता) होती है, जैसे—नवीन मृन्मय पात्रमें जलके योग से गन्ध और निर्वात देशमें व्यजनके हिलानेसे वायु प्रकट होता है, किन्तु उत्पन्न नहीं, ऐसे ही वायुके ताल्वाद्यभिघातसे शब्द व्यक्त होता है उत्पन्न नहीं । सुतराम्, पदकी चतुष्ट्व संख्याकी उपपत्ति इस मतमें अच्छी रीतिसे होजाती है । । गोविषाणके दृष्टान्तसे परस्पर पदोंके गौणमुख्यभावका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योकि एककालम उत्पन्न होनेवाले मन्त्रिपुत्र और राजपुत्रका गौणमुख्यभाव देखा जाता है अतः नामकी आख्यातमें गौणता और उसकी उसमें मुख्यता युक्ति संगत है । शास्त्रकृत योग, जो धातु उपसर्ग तथा आगम, आदेश आदिका परस्पर सम्बन्ध है वह पहिले अयुक्त ठहराया गया है, सोभी ठीक नहीं हैं क्योंकि इस सिद्धान्तके अनुसार पुरुषके अन्तःकरणमें शब्द और उसका अभिधेय (वाच्य) तथा सम्बन्ध ये तीनों बुद्धि रूपसे स्थित रहते है, उन्हीं बुद्धिमय शब्दोंमें व्याकरणके बताये हुए सब विकार होते है, और वास्तविक शब्दोंमें आरोप किये जाते हैं, जब पुरुष किसी अर्थको दूसरेके लिए प्रकाशित करना चाहता है, उस समय उस अर्थके वाचक शब्दको अभिव्यक्तिके लिए अपने आत्माके गुणभूत प्रयत्नसे नाभिदेशसे वायुको प्रेरित करता है, वह वायु उठकर वक्षःस्थल आदि देशमें टकराता हुआ मुखके द्वारसे बाहर आता है, भीतरसे बाहर आनेके ६