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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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उपद्रव करें; उनका जो शिष्य, उनका जो; और न ही उस वक्त किसी का अविश्वास, किसी का तो विश्वास कीजिए तो वो साधक के आन्तरिक अभ्यास का प्रभाव या सिद्धि चमत्कारिक रूप से दिखाई दे, जब तक इसका प्रभाव इस तरह का रहता रहता तब तक लोग यह समझ लेते हैं ऐसा हुआ या नहीं, या यह एक कल्पित या भ्रम भरी बात, इसलिए उस व्यक्ति को तब तक इन सब बातों का प्रभाव निष्प्रभावी या शान्त नहीं कर पाता जब-- तक कुण्डलिनी के चक्र, या सूक्ष्म रूप प्राण--का आकर्षण दुर्बल नहीं हो जाता। इसके बाद तो जो भी साधक किसी वस्तु या पदार्थ रूप शक्ति द्वारा लाभ प्राप्त करता है, या शक्ति का रूप या तो नष्ट हुआ या शान्त हो जाता। इन सब बातों के लिए साधक रूप को इन सब बातों से बच कर या उनसे दूर ही रहने की चेष्टा निरन्तर रूप किया जाना पड़ा इसके लिए एक, केवल ही एक रूप का मन होना मात्र आवश्यक नहीं कि यह केवल जप करे, या यह केवल ध्यान का करे, मन सब कुछ करने के न करने के ही न मन का, या मन सब अभ्यास रूप हो, तब केवल जो, सब कुछ हो! इससे केवल ज्ञान स्वाभाविक रूप प्राप्त हो सकता "केवल मन ही चंचल नहीं है, इसके साथ ही साथ प्राण भी चंचल रूप रहा, इस कारण विचार भी निरन्तर ही चलते रहते हैं और विचार जितने अधिक चलेंगे मन उतना भटकेगा" जो साधक अपने मन प्राणायामादि द्वारा प्राणों शक्ति एकाग्र करने लग--जाता या जिनका प्राणायाम से प्राणों का योग हो ही जाता या मन शक्ति को प्राण शक्ति सब ओर सब ओर स्थिर कर लेता वह विजयी; चित्त को जो वश करने लग जाता तो विजयी; या मन, या प्राण, या इन्द्रियां आदि सब स्थिर कर लेता योगी ही कहा जाता या जो स्थिर या वश में ही स्थिर न हो, तब तो सारा सब कुछ स्थिर हो ही जाता । अतः प्राण व मन, इन सब शक्ति कभी मन का निरोध कर लिया, तब तो प्राण रुकता ही, या फिर प्राण को स्थिर करने पर मन स्थिर स्वतः होता, प्राण सब कुछ कार्य करने का ही तो व्यापार या रूप है, शरीर में इन सब का प्रभाव ही तो मन के रूप को ही स्थिर कर ले तब एकाग्रता या हो, या प्राण को वश करने सब एकाग्र चित्त हो कर प्राण शांत रहा चित्त के दो रूप रहे, संस्कार रूप मन में वासना का बना रूप, संस्कार रूप यह वासना मात्र प्राण रूप को सब तरह नष्ट न करता तो इन सब को खत्म करने से ही मन सब ओर से हट कर वासना से शून्य होकर स्थिर रूप या स्वरूप में ही विलीन हो जाता या तो फिर प्राण शक्ति समाहित अवस्था प्राप्त हो, तब यह सब तो स्वतः ही ही हो ही जाता ही रहता था! वासना के नाश से; संस्कार नष्टता समाप्त हो, चित्त शांत रूप वासना का प्रभाव खत्म रहा चित्त को इस प्रकार वश में ही या तो योग, या ज्ञान, सब कुछ के दो; ज्ञान रूप को तब तक मन स्थिर करता जब तक प्राण रूप सब ओर तरह से ही तो सब ओर से ही शांत होता, तो मन तो शांत हुआ केवल ही अभ्यास रूप क्रिया ही सब कुछ है; ज्ञान होना अलग है; केवल ज्ञान का यह अर्थ नहीं कि केवल ज्ञान को जानना या सीखना मात्र ही सब कुछ होना रहा, तो अभ्यास द्वारा ही ज्ञान लाभ सम्भव हो पाता है, इसके विपरीत तो कुछ नहीं कहा गया; न ऐसा हो सका, केवल ही; या ऐसा ही ज्ञान हो, केवल ही हो; या सब प्रकार से ज्ञान क्रिया एकाग्र अभ्यास सब सम्भव रूप में किया जाता है, इसलिए अभ्यास "केवल मन ही चंचल, अभ्यास से एकाग्र किया जाना सम्भव तो हो जाता पर मन के साथ प्राण शक्ति को भी एकाग्र किये बिना एकाग्रता के ही सब ओर भटकने का डर बना ही रहता इस कारण प्राण एकाग्रता से ही सम्भव, एकाग्रता ही सब कुछ स्थिर कर प्राण शक्ति रूप योग को चित्त से ही एकाग्र कर साधक ज्ञान का यह रूप पा कर ही वश करने लगता" सब कुछ एकाग्र रूप में, अभ्यास से; क्रिया रूप से ज्ञान सम्भव है; क्रिया ज्ञान से भिन्न सब एकाग्र ही होता है; ज्ञान स्वयं रूप न हो कर ज्ञान का ही स्वरूप तो इन सब बातों द्वारा ज्ञान रूप में ही देखा जाता है, योग से ही सम्भव ज्ञान एकाग्रता द्वारा शांत होता रहा 76

यद्यपि तपश्चर्याका फल अपने आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्तकरके कैवल्य पदका पाना ही था और इसी को पाकर वह सदा सर्वदा सुखीरहता व संसार चक्र, जो जन्म मरण का रूप था, उससे छूट कर अक्षय सुख को प्राप्त करता, तपश्चर्या का फल यही मोक्ष लक्ष्मी का पाना था तथापि यह, तपश्चरण करते समय जो आत्मस्वरूप को प्राप्त करने के लिये तप तप रहा था उसपर रीझ कर इन्द्र पद या अहमिन्द्र, अहमिन्द्रोंके देवलोकों का सुख भोगने लगता था। और जबतक कर्म का फल भोगता रहताथा तब तक संसारमें रहताथा तीसरे काल तक जब तक मनुष्य जीते थे तब तक, सुख ही ही भोग भोग कर या भोगों भोग कर समाप्त होते थे क्योंकि भोग भूमि के उन मनुष्यों को कर्म नहीं करना पड़ता था न विद्या की, न व्यापार आदि की चिन्ता थी न सेवा की और न शिल्प शास्त्र सीखनेकी चिन्ता थी न कृषी करने चिन्ता थी। वहां तो दस कल्प वृक्ष थे वही इन जीवों को सब मन वांछा सामग्री देकर ही सब प्रकार सुखी बना दिये रहते थे, चौथे काल के प्रारंभ में जब भोग भूमि मिटी, कर्म युग प्रारम्भ हुआ। जीवों को खाने पीने की चिन्ता हुई तो राजाओं, के भी राजा श्रीऋषभ भगवान् सब जीवों को असि, मसि और कृषि करना सिखाने का उप उपदेश दिया। इसके पीछे, प्रजाने नियम रूप एक एक का आदर सत्कार कर जो आज्ञा अपनी भलाई केलिये निकाली, मान-कषाय विहीन होकर सिरपर धारण किया, प्रजाने नियम के विरुद्ध चलने वालेको, अपने कुटुम्बियोंतक को सब तरहका दण्डदिया, बात ऐसी फैल गई थी कि एक बार 'हा', कह देनेपर ही वह अपने किये पापको हृदय में धारण कर लेता था किसीको केवल इतना ही दण्ड था, इसके आगे कुछ नहीं समय पाकरके यह सब आदर सत्कार या नियम का रूप बदल तो गया नहीं, परंतु नियम भंग करने पर मार पीट अथवा फाँसी तकका दण्ड दिया जानेलगा या कारागार का दण्ड था इस तरह का सब राजा प्रजाके सुधारके लिये करते थे। उस समयके सब ही बड़े बड़े मनुष्य, जो कि सब बातों को व नियम प्रजाको सिरपर रख कर करने का उपदेश देते थे उन सबने नियम व न्याय की रक्षाके व नियमों, को पालने वाले सदा व नियमों पर ही आश्रित रहने वाले महा भाग जीव कहलाये। समय का चक्र फिरा, यह बात भी, उस ही प्रकार बदली, प्रजाके इन नियमों संबंधी नियमों का पालनकर्ता राजा रूप एक ही का नियम या अधिकार रहा, जो कि मनमानी प्रजासे, जो न्यायसंगत नियम चले आ रहेथे उनका उलटाकर अपने स्वार्थके अर्थ काममें ली, और सब तरह का न्याय प्रजापालक का जो काम था? केवल यही कि अपनी रक्षा अपने हाथ से? दूसरेसे जो कुछ नुकसान हो तो उस का बदला वह अपनी ताकत लगाकर प्रजा को ही ले--लेना था जिसे सब जन ही सब उपाय से कर ही सकते थे, प्रजाके उस जन, प्रजाके ही जन-- समुदाय का जो सम्मत धर्म अथवा न्याय के अनुकूल बना हुआ नियम था जो धर्मका, अपने कर्तव्य पालन सम्बंधी सम्मत-नियमों बना या हुआ, वह सब अपनी ताकत और अधिकार के बलपर चूर चूर कर या बदलकर रख दी, सब ही प्रकार प्रजाके विचार को बंद करके यह कहा गया जिसका कि सब धर्म सम्मत प्रजाके अधिकारोंका नाश करना मात्र ही तन-मन रूप काम रहा, कि प्रजा तो सर्वसाधारण जन केवल राजा प्रजाके पालनेवाले को ही तो सब प्रकार व सर्वथा रूप से सब कुछ करने काअधिकारी? उस समय केवल यह, केवल एक व्यक्ति को सब तरह का अधिकार प्रजाके सम्बन्धी-सम्बन्धों सम्बन्धी बातों का सौंप दिया कि राजा चाहे जो कुछ भी न्याय विरुद्ध आज्ञा देवे या आज्ञा निकालेगा, वह सब प्रजाको शिरोधार्य करनी ही होगी चाहे उस आज्ञासे प्रजा व उस प्रजाका भलाईके बदले नुकसान और हानि भी क्यों न हो, ऐसा केवल अज्ञानता फैलाने वाले लोगोंने राजा तथा राजाके इन सब को सिखा दिया था, जिससे सब प्रजाको यह! डर हो जाताथाकि धर्म का लोप करनेपर जो भी किया जावेगा उचित होगा राजा प्रजाके इन सब धर्म न्याय सम्मत नियमों तथा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, उस स्वामित्त्व तथा अधिकारों को जो प्रजाके ही पास परम्परागतसे चले आ रहेथे राजा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, सब ही अधिकार को अपने आधीन किया? क्या यह छल--कपट छल कपटकर जो प्रजाके पास धन या स्वतंत्रता आदि सब कुछ था उसका-- हरण ही सब प्रकार प्रजा का तन मन धनका अपव्यय करना नहीं कहलावेगा? हाँ, स्वार्थान्ध जन सब ही युग तथा काल में न्याय के स्थान में अन्याय का काम ही करते चले आये हैं, चाहे वह कोई भी हो, सब ही अपने को इसी तरह का शिकार बना ही लेतेहैं, बात ऐसी दशा में केवल यही ही हो सकती है; जिसे इस प्रकार की बात अथवा ज्ञान अपने आत्मामें सम्भवित रहा, वह ही इससे बचेगा? जो इस पर सब ओर, हर एक दिशा ध्यान दे सकता होगा तन-मन धनको बचा सकेगा जिसे यह ज्ञान, सब ही प्रकार व प्रकार! सर्वथा सम्भवित होगा वहीही, इस व 77

दयासिन्धो सब जग के स्वामी हमारा उद्धार करो हम अनाथ हैं। इन अत्याचारियों हमारा सर्वस्व छीन लिया हमारे सब बन्धुओं को मार डाला सो केवल प्राण ही बाकी रह गये। प्रभो, संशय होता था कि जब आपके परम भक्त प्रह्लाद केवल हरि ॐ की रट लगा रहे नृसिंह अवतार कर बचाया, तो हे दयानिधे क्या हम पापी हैं? जो हम पर दया नहीं करते नहीं नहीं आप तो सब दशा जान रहे सर्वात्मा, तो फिर हे कृपानिधे यह कैसा! क्या परीक्षा है? दयानिधे हमारी रक्षा; आपके ही नाम का गुण गान करने वाले-हम भी लोग हैं, कृपा सिन्धु अपनी दया दृष्टि हमारे ऊपर कीजिये पश्चात्-प्रभो जो न दशा की सो सब जग को विदित हमारी पश्चात्-रक्षा जो नृसिंह से रूप धरके की सोई अवतार फिर कीजिये हमारी रक्षा कीजिये क्योंकि दुष्टों ने सब प्रकार से हम लोगों को तंग कर रक्खा है इन सब बातों को दयासिन्धु भगवान् तो सब कुछ जान ही रहे थे। परन्तु अवसर देखकर सहायता करेंगे, पश्चात् जो यह सब लोग अपने कष्ट निवारणार्थ रोते थे सो सब बन्द किया गया, और स्वामी लोग उन सबको डांट डपटकर चुप करा दिया! पश्चात् सब लोग अपने काम को चले गये! सब लोग घर गये तो--दुःख से रो रो कर घर वाले कहने लगे, जहां कहीं भी सब लोग अपने बन्धुओं को रो रहे थे कि उस समय में किसी प्रकार धीरज नहीं था, केवल रो रो कर अपनी अवस्था को सुधारते हुए विचार करते थे। ऐसा विचार कि हम लोग अपने स्वामी लोग से जान से बचते हैं पश्चात् न तो कोई, किसी बात करके बचता ही नहीं तब ऐसा प्रकार का सोच कर सब लोग अपने घर गये, और अपने अपने काम सब लोग करते पश्चात् जब सब लोग एकत्र हुए तब सब भाई पश्चात् सब लोग अपनी अपनी दशा पर रो रहे थे। ऐसा विचार करने लगे कि किसी प्रकार तो विपत्ति चली जावे हमारी अवस्था को देख कर दया सिन्धु प्रभु दयालु कभी, हमारी सुधिया कभी लेंगे, पश्चात् सब लोग अपने विचार में रोते थे। हे; विधि क्या हमारी दशा यही सदा बनी रहेगी वा कभी विपत्ति से छूटा जायगा और कोई सुख भी हम लोग को होगा? पश्चात् रो कर प्रभु परमात्मा सब को देखते हुए दयासिन्धु जी, फिर अपने मन में विचार कर कहने लगे कि इन सब लोगों को धीरज देना चाहिये पश्चात् फिर, प्रभु जी अपने रूपको छिपाकर पश्चात् जो रूप धर कर गये उसका सारांश नीचे लिखा जाता ऐसा कह कर, "दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय भयो" सब बात दयासिन्धु भगवान् अपने मन में विचार कर पश्चात् अपने भक्त प्रह्लाद की दशा स्मरण करके पश्चात् विचार कर प्रह्लाद भक्त पर प्रभु का उद्धार पश्चात् राम-अवतार के समय में सब प्रकार से जो जो दुष्टाचारी निशाचरों का काम था उन-सब बातोँ को स्मरण किया! पश्चात् हे प्रभु दयाल सब रूप अपने मन में विचार कर पश्चात् सब दशा विचारते हुए मन में सोचा कि संसार में सब, दुष्टाचारी राक्षस भगवान् के नाम को केवल पाषाण में रख के पत्थर को पूज रहे और उसी पत्थर रूप पाषाण को सब संसार मान रहा है; फिर दयानिधे विचारते? जब संसार सब को ऐसा विचार में देखता तो फिर यह कष्ट भी सहन करो, परन्तु प्रह्लाद अवतार स्मरण कर पश्चात् जो अवतार का विचार सब जगत् पर दया किया सोई-विचार प्रभु जी सब अपने मन में पश्चात् सब संसार पर विचार किया केवल सब दशा सुधार होगा? यह विचार कर सब संसार पर दया, की कि सब लोग विचार करें; सो भी सब दुष्टाचारी पश्चात् सब मनुष्य, सब पर दया अपनी-अपनी दशा को देख कर पश्चात् सब लोग विलाप क्यों? सो पश्चात् साधु-सन्त जन-गण सब, एकत्र हो कर सब लोग हे दयाल जी, हे प्रभुजी जगपति प्रभु, हे त्रिलोकीनाथ दयालु जी, दयालु रहो, दयालुता पूर्वक रहो, सहाय हो प्रभु? ऐसी विनती सब लोग प्रभु चरण पर सब प्रकार सब से विनती हो रही थी "दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय भयो" इस बात स्मरण कर के भक्त प्रह्लाद कहने लगे, जो दुष्टाचारी पाषाण को ईश्वर मान कर पाषाण पूजा करते हैं सो सब पाषाण केवल संसार को धोखा दे रहे हैं, सो केवल धोखा देकर पश्चात् सब लोग अपने काम को निकाल रहे पाषाण को प्रभु समझ कर केवल संसार में धोखा फैला रहे हैं, सो केवल सब काम धोखा ही है, केवल यह सब धोखे की बात बना कर केवल संसार को धोखा दे रहे हैं सो, केवल यह धोखा सदा-सदा सब लोगों को रहेगा इस वास्ते सब पाषाण पूजा करने वाले इन सब पाषाणों मिथ्या हैं। 78

लिखा या उसने क्या लिखा था कि उस पत्र ने उसके उस रूप का दर्शन करा दिया

यह बात पहले बतायी, उसने स्वीकार कर लिया फिर उसके मन रूपी दर्पण का प्रसाद उसका पत्र--उत्तर का प्रति-संबोधन, उसने जो लिखा--उत्तर का उस पर क्या रूप का असर होता गया उसका पत्र, तो वह उसके पास आया होगा... हे भगवान् वह कैसा लिखा या उसने क्या लिखा था कि उस पत्र ने उसके उस रूप का दर्शन करा दिया कि उसको पत्र फाड़ना पड़ा? तो वह समझेगा, उसने गाली--या क्रोध, तिरस्कार पूर्ण, कठिन शब्द, चोट पहुँचाने, कठोर वचन, कु-शब्दाभिधान--का तो प्रयोग, गाली गलौज करना ही था समझाना, गाली-गलौजपूर्ण शब्द उसने थोड़े लिखे होंगे? गाली या इस तरह तिरस्कार युक्त या इस तरह अपमानजनक शब्द, उसने लिखे थे? उसने केवल उसके भाव रूप दोष देखे होंगे लेकिन इस बात को लेकर वह उसको तिरस्कार पूर्वक गाली या भयंकर शब्द क्यों कहेगा! या तो उसने, या उसने उसके प्रति, अपने प्रतिभाव व्यक्त किये भगवान् की प्रकृति ऐसी रही, उस रूप स्वाभाविकता स्वीकार या त्याग का ऐसा तप--साधना--प्रतीक एकांतवास काल रहा होगा कि आज की तरह या केवल संसारियों की तरह या साधारण तौर पर कोई बात नहीं थी, जो भी था सत्य पर खड़ा रहा होगा जिसका प्रभाव सत्य--का इतना गहरा पड़ा कि सामने का सारा अहंकार ही, जो विपरीत खड़ा था उसको, या ऐसा समझें कि वह विपरीत खड़ा अहंकार पिघलकर ही नीचे गिरना पड़ा। सत्य ऐसा लगा, या कह दो प्रेम, कह दो ज्ञान, केवल जानने का रूप कह दो या जो आज के शब्दों में कह दिया जाता है कि प्रेम जागा, उस भाव को प्रेम, उस या समझा, या केवल ही कहा गया भगवान् को तो उस महा-तपस्या स्वरूप का, जो उनका स्वरूप ही बन गया होगा वह सत्य, केवल उस रूप में सत्य को जाना गया जो दोनों पक्षों पर था या कह दो-समता का रूप था, उस सत्य रूपी दर्पण रूप में प्रभाव दिखाई दिया होगा, जो सामने था उसी का स्वरूप या ज्ञान हुआ उस समय भगवान् को उस अवस्था--रूप साधना से उस रूप महावत रूपी--ज्ञान का रूप मिला या जो स्वरूप, उस समय, व्यक्तिगत स्थिति या रूप रहा था सांसारिक स्थिति रूप था, त्याग के रूप का प्रभाव रूप समझ लो, स्वरूप के रूप का ज्ञान था उस रूप में उसका या यह समझो, उस समय उसके रूप का प्रभाव तो उस समय, या कहो उस रूप प्रभाव से! तो जो उस समय त्याग रूपी प्रभाव था उस रूप में से, उस सांसारिक त्याग या स्वरूप परमात्मा का प्रभाव रूप या रूप, भगवान् के स्वरूप रूप रूप में पड़ा तो वह अज्ञानता त्याग का हो गया, या उस समय का अज्ञानता रूप का ज्ञान भगवान् रूप या उस समय रूप या स्वरूप, उस समय, उस त्याग-के स्वरूप का रूप एक लगा या रूप रहा जिसका प्रभाव था, लेकिन न तो, स्वरूप न तो, न ज्ञान का ऐसा रूप, उस समय का उस रूप अथवा अहंता स्वरूप का प्रभाव रूप न पड़ कर जो उस रूप ज्ञान, उस रूप ज्ञान रूप में था जो ज्ञान उस समय दिया-गया उसी ज्ञान रूप में वह ज्ञान सत्य रूप में पड़ा ज्ञान का रूप ज्ञान ही तो स्वरूप, उस स्वरूप के प्रभाव रूप दिया गया था, व्यक्तिगत रूप का प्रभाव नहीं था उस समय रूप केवल उस ज्ञान रूप का प्रभाव व्यक्तिगत स्थिति, केवल स्वरूप से ज्ञान रूप स्वरूपित रूप ज्ञान स्वरूप सामने उसका स्वरूप स्वभाविक या स्वाभाविक रूप रूप दिखाई दिया, केवल उतना रूप सामने त्याग रूप रहा या ज्ञान-त्याग या स्वरूप का स्वरूप, त्याग-त्याग रूप व्यक्तिगत स्वरूप त्याग-त्याग का स्वरूप रूप स्वरूप, त्याग-त्याग व्यक्तिगत रूप, केवल ही तो सत्य के उस रूप स्वरूप ज्ञान-सत्य रूपी दर्पण स्वरूप था, त्याग-ज्ञान रूप प्रभाव का सत्य या अज्ञानता रूप से, ज्ञान सत्य रूप ज्ञान रूप था, उस सत्य रूपी प्रभाव से उस या उस या उस त्याग-ज्ञान का, प्रभाव या प्रभाव ही, स्वरूप से, स्वरूप से, उस रूप ज्ञान रूप था जो सत्य रूप में पड़ा सामने जो ज्ञान रूप या प्रभाव था उस समय त्याग रूपी के रूप में, जो स्वरूप रूप रहा या या उस स्वरूप से सत्य का स्वरूप ही ज्ञान प्रभाव था केवल त्याग का, तो तो उस समय या या ज्ञान स्वरूप से या विपरीत त्याग का स्वरूप ही तो केवल ज्ञान रूप रहा जो जो केवल त्याग रूपी--ज्ञान स्वरूप ज्ञान रूप था, जो स्वरूप स्वरूप से, सत्य के स्वरूप ज्ञान रूप स्वरूप रूप--का भगवान् स्वरूप ज्ञान के स्वरूप ज्ञान स्वरूप, व्यक्तिगत स्वरूप ही व्यक्ति का स्वरूप अहंता रूप में उस रूप से ज्ञान रूप स्वरूप या जो व्यक्ति स्वरूप ज्ञान या प्रभाव या ज्ञान से उस ज्ञान न हो सका, उस ही रूप 79

विशेष नोट: इस दस्तावेज़ की मूल छवि में फ़ॉन्ट रेंडरिंग त्रुटि (Font Rendering Error / Tofu Blocks) है, जिसके कारण सभी देवनागरी अक्षर चौकोर बक्सों () के रूप में दिखाई दे रहे हैं। मूल अक्षरों की अनुपस्थिति के कारण वास्तविक देवनागरी पाठ को पढ़ना असंभव है।

नीचे छवि में दिखाई देने वाले बक्सों, विराम चिह्नों और लेआउट का सटीक पंक्ति-वार प्रतिलेखन (Transcription) दिया गया है:

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समाज का रूप था, भारत वर्ष का उस समय का राजनैतिक ढांचा इस प्रकार बना हुआ का होगा । इसीलिए तो उस समय न्याय धर्म का विचार न करके । इसलिए विश्वामित्रजी ने उस समय जो कुछ भी कहा था सम्भवतः वे उचित ही कह रहे होंगे, यद्यपि उस बात का वशिष्ठ जी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके उपरान्त भी वशिष्ठ और उनके शिष्यों द्वारा विश्वामित्र द्वारा दी गाली-गलौज सहन करते रहे। पर विश्वामित्र ने उन सब बातों को चुप चाप क्यों पी लिया ? पहले तो! ही क्रोधवश कह गये होंगे किन्तु बाद में मन ही मन यह सोचकर पश्चाताप करने लगे होंगे कि हाय! मैंने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से कह, कह डाला जो मुझे नहीं कहना था और आज तक न कभी ऐसा कहा! अथवा मन ही सोच रहे होंगे विचार तो रहे ही, इसके दो चार दिन बाद उन्होंने उस बात को भूल कर सोच लिया होगा कि अरे जब वे अपनी प्रतिज्ञा अनुसार कल तक आ कर राम को लौटाएंगे ही? तब उनसे स्वयं ही बात निपटा लेंगे या वशिष्ठ और विश्वामित्र का विवाद तो राम वापस आने पर दोनों महामुनियों द्वारा सुलझा लिया जाएगा ऐसी बात थी, लेकिन, माता--कौशल्या को, अपने वात्सल्य का स्नेह-- वियोग का, कारण वे सब यह भूल गईं। कुछ दिन बाद ही तो, भगवान श्री राम उनके समक्ष आ जाते और राम का अभिषेक उत्सव भी उनके समक्ष था? किन्तु जो होनी, सो होकर इसीलिए रहकर माता कौशल्या विश्वामित्रजी ऊपर, या वशिष्ठ भगवान दोनों "समान ही विश्वासी समझ कर कह उठीं थीं कि कौशल्या का यह कथन, सच, इसलिए किसी सन्देह अथवा द्वेष पर टिका हुआ नहीं बल्कि केवल राम के प्रति प्रेम । उनका ऐसा कथन था, जिसमें न तो वशिष्ठ और विश्वामित्र परस्पर दोषी थे, और न राम का कोई दोष था" इसमें उस समय का भारत कैसा समाज रहा होगा उस कालीन। मानव जाति अपने आचार विचार धर्म और कर्म का सम्प्रदाय किस प्रकार का सम्प्रदाय अपना रखा रहा होगा या प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर बार सब कुछ त्याग कर जंगल में तपस्या करने का कोई भय अथवा डर अथवा कोई ऐसा नियम आदि था, जो आज लोग घर, बार छोड़ कर भाग जाते हैं। इसका कारण केवल यह कहा जा, सकता धर्म शास्त्र को पढ़ कर मन को बहलाना, समय पास कर लेना कोई बात नहीं प्रत्येक व्यक्ति को तो उस समय तपस्वी सम्प्रदाय का प्रचार ही सब कुछ सम्प्रदाय समझकर प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्त्तव्य रूप कर्म को छोड़ कर तपस्या रूप को ही अपनाना ही तो, धर्म रहा हो, भला ऐसा तो नहीं होगा कि प्रत्येक व्यक्ति ही काम धंधा न कर तपस्या- ही करना शुरू कर दिया तो भारत का सारा समाज भूख और प्यास द्वारा नष्ट भ्रष्ट हो गया होता; ऐसा तो नहीं देखा गया होगा ! हाँ यह हो सकता, जरूर हो, केवल साधु? सन्यासी ही तप करना योग्य समझे ! भारत का सारा समाज काम में लगा हुआ था केवल रूप ही तप विश्वामित्र विश्वामित्रजी तपस्वी थे सही, लेकिन वे भी तो? क्षत्रिय धर्म को? धारण करते ही तपस्या का नियम रहा? विश्वामित्र को सताया राम और लक्ष्मण? विश्वामित्र द्वारा केवल आज्ञा दी गयी थी? या स्वयं विश्वामित्र उस समय राम को साथ लेकर न भी जाते तब भी, राम सब को! राक्षसों को नष्ट तो कर ही देते किन्तु वे केवल उस समय यह सोच रहे होंगे कि आज का काम कल, विश्वामित्र जी को साथ में लेकर कर दिया जाएगा ही, इसका फल न तो राम भुगत रहे थे और न विश्वामित्र विश्वामित्र जी को तो फल भोगना पड़ रहा था! विश्वामित्र केवल क्षत्रिय थे! वे केवल विश्वामित्र ही नहीं बल्कि वे राज-ऋषि के रूप में विश्वामित्र ? राजा कौशिक? राजा कौशिक विश्वामित्र केवल राजा ही! के विश्वामित्र केवल राज ऋषि विश्वामित्र केवल राजा थे! विश्वामित्र केवल ब्राह्मण नहीं थे वे क्षत्रिय समाज विश्वामित्र राम लक्ष्मण के विश्वामित्र राम गुरू थे! राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना और रक्षा की थी; विश्वामित्र का कर्तव्य तो था केवल राम को साथ ले जाना ही, विश्वामित्र केवल एक ही काम कर सकते थे कि राम को ले कर वे केवल यह केवल इतना कहते कि, विश्वामित्र विश्वामित्र को केवल था, भला वे उस समय सभी काम को सब कुछ छोड़ कर केवल विश्वामित्र के साथ ही क्यों चले जाते इसीलिए तो स्वयं राजा दशरथ जी विश्वामित्र पर भारी क्रोध किया । इससे केवल यही सिद्ध होगा, दशरथ जी विश्वामित्र और वशिष्ठ दोनों एक ही रूप में एक ही समान भक्त विश्वासी 81

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॥ अथ षोडशः सर्गः॥ सीताया विलापः श्रीर मन्म हाराज्ये पराजयं प्राप श्लोक 12 अहो मे मूढ चित्तं च गता या वै जनं प्रति। गतं वा यद्भविष्यद्वा सर्वं वै जन जानतः॥ मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥ श्लोक 13 अहं मुग्धा यया रामं गत्वा वै वन मा विशे। नरा नृपति राज्या च सर्वं वै जन जानतः॥ मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥ श्लोक 14 मया मन्द भाग्या च रामं मुक्त्वा वनं प्रति। अहं च जन जानतः सर्वं वै जन जानतः॥ मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥ श्लोक 15 सती सीता महा भागा कृत्वा रोदन माकुला। तदा सती वनं गत्वा रामं प्रति विचिन्तयन्॥ मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥ इस प्रकार श्री जानकी व्याकुल हो कर विलाप कर रही थी सीताजी कहती हैं, हे राघव हम तुम्हारे बिना जीवित नहीं रहेंगे, ऐसा विलाप कर वह कहती कभी तो कहती--हे लक्ष्मण जी तुमने हमारा वचन ना माना हो, दूसरा कभी कहती हम क्या करें क हा जा एं, न जा ने क हा चले गये, कभी कहती त्रिजटा तुम कहां गयी हमारा उपाय करो। हे त्रिजटा--हम को तुम्हारा सहारा था, तुम्हारी शिक्षा मानते थे; न जा नें क हां, क हां, क हां--हम को संकट में छोड़ करके न जाने अपनी कुटिया भीतर बैठ कर हमारा दुख रोती होगी या सोती हो, हमारी सुध कभी नहीं ली। कभी कहती हैं, हम अपने प्राण त्याग कर अपनी इस देह को मिटा क्यों न दी जाय; उस क्षण में ही अपने मन को समझा करके शांत करती और कहती, अभी देखना है। थोड़ी देर पश्चात्, प्रभु श्री राम चन्द्र जी जब होश में आ गये, तब कहने लगे; अब सब लोग आगे बढ़ो, आगे बढ़ कर उस घर को घेर कर उस विभीषण को पकड़ कर बाहर ले आओ उसको, इस का वध कर दिया जाय। तब श्री राम चन्द्र की आज्ञा पाकर वानर दल सब एक साथ हो कर लंका पर चढ़ाई करने लगे, तब विभीषण ने मन्दोदरी को सारा भेद समझा कर सब को बाहर कर दिया और खुद भी बाहर निकला और वानरों पर बाणों की ऐसी वर्षा की कि वानर दल में भगदड़--मच गई तब लक्ष्मण जी ने, श्री विभीषण का सामना किया। दोनों का युद्ध होने लगा, दोनों ही महा बलवान थे, दोनों अपनी अपनी माया रचने लगे कभी कोई बाण चलाता--तो, एक, दो, तीन... सौ बाण--बना कर के चलाता, मेघ-नाद विभीषण सेना को मारता था। जब यह हाल देखा, तब राम जी क्रोधित होकर के कहने लगे--अरे... तू क्या ही समझता है, काल तेरा निकट आ गया; तूने जो हमारी भार्या को हर लिया है तूने जो कपट किया, सब का बदला, तुझे अभी देता हूं। ऐसा कह-- कर... श्री रामचन्द्र जी ने अपने धनुष पर बाण चढ़ा कर विभीषण की छाती पर मारा तो, मेघ ना द गिर पड़ा, मूर्छा आ गई विभीषण को तब सब वानर

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पहला पद स्वरूप का अर्थ बतलाने का, दूसरा चरण उसके साधन रूप का निश्चय का, तीसरा पद इन दो के बीच विरोधी स्वभाव का निर्णय करने का, चौथा पद स्वरूप निर्णय रूप जो फल रहा सो फलित करके निर्णय कराया। यहां जो यह संसारीपने का भाव कर्म उदय का जो निमित्त सो जीव का रूप नहीं वह जीव रूपी दीपक जल रहा है, और यह जो कर्म उदय भाव निमित्त रूप दीप का स्वभाव का भेद से भिन्न निश्चयपना भेद ज्ञान रूप सो निश्चय का निर्णय का स्वरूप सो जीव रूप जो भाव उस भाव को जीव रूप निर्णय सो स्वरूप का निश्चय का फल है, उस निश्चय के भाव से विपरीत स्वभाव के विकल्प रूप सो, या तो कर्म निमित्त से होता; या तो जो केवल ज्ञान रूप निज भाव सो विकल्प स्वरूप स्वभाव से रहित, सिद्ध भाव से जो केवल परिणाम होता सो तो केवल स्वरूप हुआ! इससे भिन्न जो, या तो जो केवल रूप से भिन्न ज्ञान परिणाम सो सब ही इस ही रूप हुआ। सो इस निश्चय भाव रूप ज्ञान स्वरूप के लक्षण सो, या तो द्रव्य कर्म पुद्गल रूप जानना, सिद्ध भाव से भिन्न! या भाव या निमित्त कर्म के भाव निमित्त, जो जीव के स्वरूप को भिन्न प्रकाश रूप ज्ञान भाव सो केवल स्वरूप भाव लक्षण सो रूप को भिन्न रहा। सो इस रीति जाना ऐसा विचार के, यह जीव सब समय अपने रूप ज्ञान प्रकाश स्वरूप ही रहा उस परिणाम रूप ही यह या तो जो कर्म के उदय रूप भाव निमित्त रूप ज्ञान रूप सो पुद्गल का, या तो जो यह ज्ञान रूप सिद्धपना के, सब प्रकाश रूप या तो इस स्वभाव रूपी भाव को उस रूप सिद्ध के प्रकाश रूप सो निज प्रकाश पुद्गल भाव से भिन्न ही रूप रहा स्वरूप सिद्ध केवल रूप प्रकाश का रूप रूप भाव उस रूप ही रहा सो केवल सिद्ध रूप ही रूप रहा रूप सब ही अपने रूप प्रकाश रहा; या लक्षण से ही ज्ञान सो यह। ऐसा विचारने से लक्षण भाव रूप प्रकाश रूप जानना इस रूप, ज्ञानी इस रीति से जो सब जीव भाव लक्षण सो अपने में निश्चल हो रहा सो रूप जाना, ज्ञानी ज्ञान रूप स्वरूप के भेद ज्ञान रूप है सो; सो तो केवल रूप ही रहा उस रूप ज्ञान रूप ही ही केवल ज्ञान सो केवल स्वरूप से केवल ज्ञान ही तो रहा! आ-कार सो! ज्ञान भाव से जो केवल ज्ञान रूप केवल स्वरूप ही तो, ऐसा रूप भाव ही रहा, इस रूप भाव रहा। सो जितने ही जीव ज्ञान स्वरूप लक्षण वाले हैं, जितने ही कर्म उपाधि भाव रूप से भिन्न भाव रूप स्वरूप सो ही निश्चल अपने रूप में रहे, या तो या रीति से, या तो, या तो ऐसा ही है; जितने पर्याय विकार स्वरूप? जितने पर्याय विकार रूप आ-कार पर्याय से सो इस रूप रूप से उपाधि भाव से भिन्न ही ही सो तो स्वभाव के प्रभाव से उपाधि के प्रभाव रूप से रहित ही यह सब ही केवल प्रकाश रूप सिद्ध-के प्रभाव से ही ही ज्ञान का रूप रहा। ऐसा निश्चय जानना, या तो जो ज्ञान स्वरूप सो तो या तो ज्ञान रूप सब ही रूप से प्रकाश रहा, ज्ञानी तो केवल स्वरूप प्रकाश रूप सो ज्ञानी का निज स्वरूप भाव रहा; ज्ञानी रूप को या तो सब जीव को ज्ञान रूप भाव ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप ही सो, सब जीव को ज्ञान रूप भाव ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप इस रूप प्रकाश से इस ही रूप से सब ही रूप रूप रहा। इस ही ३ पद का लक्षण स्वरूप या तो या ज्ञान का रूप, ज्ञान रूप जीव सब ज्ञान रूप निश्चय सो, ज्ञानी सब पर्याय से ही ज्ञान रूप सो, या तो ज्ञान स्वरूप; या तो केवल स्वरूप सो, सब पर्याय रूप से केवल रूप ही, या स्वरूप से सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान का, या केवल स्वरूप सब ही रूप सो इस रूप रूप रहा, सो ज्ञान के प्रकाश रूप सब ही तो इस रूप ही रूप ही ज्ञान रूप, सो ज्ञान के ही ज्ञान रूप ज्ञान रहा। सो सब जीव के ज्ञान स्वरूप सो इस रीति जानना लक्षण स्वरूप रूप सो केवल भाव अ--कार भाव रूप से ही रहा; ज्ञान रूप ही केवल का; ज्ञान भाव केवल का; ज्ञान ही तो आ--कार से ज्ञान रूप से ज्ञान भाव रूप सो स्वरूप से केवल रूप प्रकाश से जीव के आ--कार रूप रहा, केवल अ--कार रूप से ज्ञान रूप रहा, स्वरूप से ज्ञान भाव रूप सो या तो सब जीव का रूप ज्ञान रूप सो, सब ही केवल के रूप रहा। 86

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काम तो दोनों का काम रहा और उसका प्रभाव दोनों पर ही पड़े बिना रहता-सा जान पड़ा किंवा मन व वचन दोनों रूप वाले ध्यान का फल। सम्भाषण मात्र का ही यह फल हो सो बात नहीं पर मन का संकल्प मात्र भी, पारस्परिक साक्षात्कार, अवलोकना, सम्भाषण बिना कितना प्रभाव उत्पन्न करता बिना बोले; मन ही मन एकान्तरूप रूप से जो ज्ञान उत्पन्न किया जाता रहा या ध्यान लगाया था, उस शक्ति का, उस ज्ञान किरण धारा का प्रभाव दोनों ओर एक अनोखा आकस्मिक चमत्कार दिखा रहा था--सम्बोधन के पहिले रूप का जो उपदेशात्मक कथन रहा सो--सम्बोधन के साथ, विशेष करके मन की ओर से; जो कथन-श्रवण का विषय बनाया गया सो दोनों ओर ही समान रूप से प्रभावित था, परिणामस्वरूप सो, दो भिन्न रूप वाले भिन्न दिशा में बह रहे मन के प्रवाह एक ही स्थान पर एकत्रित होकर दो से एक बन कर अनन्त या असीम रूप धारण कर गये जान पड़े ऐसा लगता लगता तो था सम्बोधन इस पार बैठ कर किसी को पार--मन की ओर से उपदेशात्मक कथन से, केवल कथन से मात्र सम्भाषण के द्वारा ही--सो सम्भाषण भी साधारण-संसार व्यवहार जैसा या भिन्न प्रकार से साधारण-संसार-व्यवहार स्वरूप का रूप लिये जो कथन किया गया था सो कुछ भी, चाहे मन चाहे वचन रूप सम्भाषण या कथन-कथन के प्रभाव से बाहर कदापि कदापि बच न सका। सम्भाषण रूप उपदेशात्मक कथन रूप जो वचन कहे गये! वे व्यर्थ न गये... व केवल शब्द मात्र ही न होकर ज्ञान रूप, वचन रूप न होकर मन के भीतर गहरे प्रभाव से सम्बन्धित हो पारस्परिक प्रभाव एक दूसरेपर अपना प्रभाव दो रूप धारण कर दो ओर से सम्भाषण करने वालों के रूप में दो भिन्न व्यक्तिगत रूप लिये हुए जो दो ज्ञान रूप व्यक्ति सम्भाषण कर रहे थे मन ही मन रूप, सो केवल शब्द रूप न रह कर दोनों परस्पर एकमेक हो गये! केवल शब्द ही परस्पर एकमेक होकर समाप्त नहीं हो गये थे या, केवल वचनों का रूप ही न रहा! दोनों वचन से परे हो परे ही प्रभाव से परिपूर्ण होकर एकमेक हो गये थे; केवल कथन रूप मन रूप का सम्भाषण ज्ञान रूप धारण कर ज्ञान का ज्ञान-में समावेश हो ज्ञान रूप हो ज्ञान ही ज्ञान बनकर ज्ञान में लीन होकर एकमेक हो गये थे, सो केवल मन ही तक बात या बात केवल कथन मात्र तक ही, या उपदेशात्मक कथन तक ज्ञान कथन-कथन तक प्रभाव मात्र ही बन कर ज्ञान से विलग, ज्ञान से परे ज्ञान कदापि सत्य ही स्वरूप मात्र पर विचार किया जा सके सो बात नहीं, या सत्य ही उपदेशात्मक रूप में परिणित हो, सत्य ज्ञान रूप सम्भाषण का रूपान्तर होकर सत्य रूप बन कर ही सत्य रहा, मन रूप ज्ञान का, मन की शक्ति द्वारा सम्भाषण ज्ञान द्वारा प्रभावित ज्ञान को रूप सत्य रूप से भिन्न कर जो सम्भाषण किया गया केवल वह उपदेशात्मक था, जो कथन-कथन का कथन मात्र बनकर रह गया अथवा प्रभाव रूप में परिणित होकर प्रभाव ही, ज्ञान रूप सम्भाषण का ज्ञान स्वरूप हो, सत्य प्रभाव सम्मुख आ खड़ा हो ज्ञान रूप बना रहा हो, ज्ञान रूप प्रभाव ही सम्भाषण ज्ञान का, सो प्रभाव रूप में ही सत्य रूप में परिणित दोनों ओर रहा, मन ही मन सत्य रहा! हे ज्ञान, हे मन, हे सम्बोध मात्र; सब ही परस्पर में विलीन जान पड़े! "जो भी ज्ञान सम्मुख आ रहा था सो सब ज्ञान सत्य बनकर, सत्य ही का स्वरूप रहा" जो सामने था सब सो, सो ही सत्य था, जो सम्मुख रूप ज्ञान बनकर आ खड़ा हुआ, सत्य स्वरूप ही सत्य बनकर, सत्य रूप का ज्ञान सम्मुख आ खड़ा हुआ । ज्ञान शब्द से परे होकर केवल ज्ञान ही, ज्ञान रूप ज्ञान व सम्मुख आ खड़ा ज्ञान एक ही हो एक ही स्वरूप रूप बन गया; सो स्वरूप सम्मुख व सम्भाषण के प्रभाव रूप ज्ञान था, जो ज्ञान होकर सम्मुख आ खड़ा एक रूप हो ज्ञान का सम्बोधन का रूप धारण किया रहा! सम्बोधक या सम्बोधित व्यक्ति का भेद न, भेद रूप ज्ञान रूप ज्ञान के सम्मुख ज्ञान रूप हो जाने से, सब भेद सा, सम्बोधन का प्रभाव ही रूप बना सम्मुख आ रहा था। "सब ही तो या तो सम्मुख रूप ज्ञान-स्वरूप का रूप बना रहा" ज्ञान-ज्ञान रूप सम्बोधित किया गया सो, ज्ञान-ज्ञान ही रूप रहा केवल मात्र शब्द ही न होकर सो, सो स्वरूप, सम्बोधन मात्र--सम्बोधक सम्बोधन रूप सम्मुख बनकर सम्भाषण प्रभाव का रूप लिए हुए, केवल सम्भाषण, केवल ही 89

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विचार करके यदि मन शांत नहीं हुआ, तो यह समझ लो अभी तक हम सब कुछ केवल सुनते आये या बोलते आये या विचार करते रहे पर क्रिया में परिणत नहीं किया। शान्ति का सीधा सीधा मार्ग है? शान्ति का सीधा है, जो समस्त जड़ या चेतन का स्वामी है उस पर सब कुछ न्योछावर कर दिया जाय। केवल उसी का आश्रय हो उसी की ही एक शरण हमारी गति हो, स्वामी वही, हमारी ममता का पद, केवल वही सर्व। दूसरा उपाय सुनो, जब तक यह देह रहे तबतक सदा साधन रूप होकर रहो अर्थात् साधन करो। उपासना रूप जो विचार है साधन में यह सब कुछ प्रभुमय ही इस बात सदा स्मरण रखकर आ-भाव आत्मानुसन्धान आ-त्म रूप का ही ध्यान, आत्मस्मरण स्मरणस्वरूप होकर नित्यमुक्त निरन्तर साक्षी रूप से वर्तमानता अनुभव करो कि समस्त, मन का संकल्प-विकल्पात्मक जाल जो यह हो रहा इसका प्रकाशक ही सब कुछ का ही आधार, यह सब जड़ का ही रूप सत्य से ही भासित, सत्य तो रूप सदा ही सब उपाधिक प्रपंच रहित सत्य ज्ञान स्वरूप आनन्द ही स्वरूप है। यह समस्त ही संकल्प रूप अधिष्ठान स्वरूप सत्य के अधिष्ठान से, सच को सच का रूप--है तो दृश्य दृश्य--ही का रूप! इस बात को भली का से हम अनुभवयुक्त हो कर सदा अनुभूतवान् आत्मानुभूति साक्षात्कार रूप से सर्वव्यापक होकर ही हर समय विद्यमान हो विचरण कर सब प्रकार द्वैत स्वरूप द्वन्द्व रूप संताप विकारों द्वारों से परे होकर, नित्य, मुक्त स्वरूप परब्रह्म पर-स्वरूप होकर सर्व संकल्पों से परे जो आनन्दित हो इस बात का निश्चय कर नित्य सिद्ध होकर, शान्ति रूपी महा सागर होकर सदा काल ही स्वरूप रूप-सहज स्वरूप का यथार्थ अनुभव युक्त होकर ही सब का सार संग्रह कर, इस प्रकार सिद्ध साधन इन दोनों सिद्धान्तों का मन सब बात त्याग कर सार, दोनों का सार केवल यह जानना मात्र त्याग का स्वरूप ही जानना रूप पर सब बात त्याग का ही स्वरूप जान सार सिद्ध आत्म--साक्षात्कार समदर्शी, समचित्त, सब बात सब रूप--रस सब में एक रस आनन्दमय सिद्ध सदा रूप से सब का ही स्वरूप का निश्चय करके सदा रूप से स्थित रहो, इस प्रकार, दोनों का भाव एक ही जान, अपने यथार्थ स्वरूप स्थिति को प्राप्त करो, सब कुछ सब में केवल व एक--रूप ही! बाहर भीतर सब ही समरस, केवल सब ही सब रूप ही व्याप; विचार मात्र से सिद्ध सब है; जो जानन में, सब केवल ही जानने रूप सब ही व केवल जानने स्वरूप स्वयं सिद्ध को सदा स्वरूप से सिद्ध; निराकार ही ज्ञान का स्वरूप यह सिद्ध रूप से सब स्वरूप ही स्वरूप? फिर शान्त का कैसा? उस स्थिति तक कौन गया? केवल सार को ही लो! त्याग नाम सब का, चिन्ता-कामना का, सब संकल्पों सार का त्याग ही! केवल मन का त्याग ही सब रूप का त्याग व सार, सब त्याग! केवल त्याग रूप मन ही सार, मन त्याग ही केवल स्वरूप का ही सब सार सार? सच सुनो आत्मस्वरूप सदा ही सब उपासना साधन का सार साधन के अभ्यास का त्याग व स्वरूप ही का ज्ञान केवल स्वरूप ही है! मन का ही ध्यान हो... जो ज्ञान हो... ! केवल ही विचार स्वरूप, जो जैसा विचार रहा सो वैसा त्याग का रूप, केवल मन रूपी ज्ञान रूप चित्त सार, मन की चिन्ता त्याग कर केवल सिद्ध ही सब रूप स्वतः निष्काम हो ही जाता ही जाता! जो स्वरूप त्याग रूप सिद्ध ही विचार का रूप, केवल ही त्याग सब त्याग का ही त्याग बिना सब संकल्पविकल्प का त्याग हो ही जाता सिद्ध स्वरूप से सब त्याग सब त्याग का स्वरूप स्वतः स्थित जो सब बात का निश्चय सार है? जिस रूप विचार है; जैसा सब अस्ति रूप का ही रूप में विचार सब का ही स्वतः सार त्याग रूप ही हो ही रहा है, जो सब रूप से त्याग ही त्याग है, सो ही सब त्याग ही त्याग स्वरूप है, जो त्याग स्वरूप स्थिति आनन्द रूप ही इस प्रकार स्वरूप ज्ञान रूप से व्यापक सब सब रूप ही सब का ही त्याग स्वरूप, केवल सब रूप त्याग ही त्याग केवल एक आत्म-तत्त्व स्वरूप सब ही त्याग सब ही त्याग का सार सब रूप, जो सब रूप सब त्याग त्याग रूप सब रूप त्याग त्याग का ही है! त्याग सिद्ध ही सार, त्याग ही सिद्ध सब सार सदा शांत ही रहो! जो सब दृश्य सब रूप से शांत रूप सब का, सो सदा ही स्वरूप का रूप ही सब रूप में सत्य... व सब स्वरूप का रूप ही चिन्मय ही सिद्ध रूप से स्वरूप है, सो सदा ही चिन्मय रूप चिन्मय चिन्मयता सब ही का रूप, इस प्रकार रहो? सब कल्याणमय... ॐ 91

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