भारतकोश
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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

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088/ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ (Header in blue bar)


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Page number: 55 (Bottom right corner)


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इस पृष्ठ पर अधिकांश अक्षर फॉन्ट अनुपलब्धता (Font missing/corrupted tofu glyphs - □) के कारण अपठनीय आयताकार बॉक्स के रूप में प्रदर्शित हैं। दृश्यमान चिह्नों, विरामचिह्नों एवं संख्याओं के साथ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रतिलेखन नीचे प्रस्तुत है:

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माता-पिता पारिवारिक सम्बंध तथा इस रस द्वारा सांसारिक जीवनपर्यन्त जो सुखानुभव प्राप्त कर रहे थे उन सब आत्मिकसुखप्रद आनन्द रूपी रसयुक्त मधुर सम्बंध, सम्बन्ध को काल-रूपी विष का मिश्रण करके इस प्रकार नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाता पश्चात् जिस सांसारिक जीव को सुख दुःख देने का निमित्त सम्बन्ध जोड़ा था वह सम्बन्ध रहा ही नहीं, सदा रहने वाला, अमर तो केवल एक परमात्मा ही सत्यस्वरूप है, सो ही सत्य पदार्थ मानव तन द्वारा प्राप्त हो सकता, सो ही सच्चा सुखदायक है जो सदा रहता है जो सुख अपने साथ परलोकपर्यन्त अखण्ड सुख- रस पहुँचा सकता है, इसलिए उसका त्याग

093/ कर्तव्य

भाई लोगो, जिस का कर्त्तव्य हो उसको तो पूरा करना हमारा धर्म तथा इन्सानियत धर्म माना ही जाता है सो, पर मनुष्य इन्सान बनकर अपने धर्म को तो भूल गया कि मेरा धर्म इन्सान का मानव का केवल उदर पोषण का साधन मात्र करना ही? जो सब जीव पशु पक्षी भी, तो फिर पशु मानव अन्तर क्या? सो मनुष्य विचार शक्ति द्वारा अपने कर्तव्य को भूल कर संसारिक अन्य सांसारिक रस को भोग करके स्वयं असन्तोषी बना सो सब दुःख का मूल बन गया जिसका फल यह पाया सुख की जगह दुःख भोगना ही? पर कल्याण जन-हित सुख की भावना जो लोक-कल्याण की भावना द्वारा अखण्ड आनन्द सुख को पहुँचा सकती, उस का विचार ही, त्याग दिया, निज, परमार्थ, का कल्याण का परोपकार का रूप ही त्याग दिया! केवल अपना ही पेट भरना चाहा, सो किया; जिससे मन चंचलताई के वश होकर अन्य सब को तो सो तो, पर खुद को आप ही कष्ट दिया जा रहा! पर अपने को सब कुछ ज्ञानी समझ रहा। जब संसार सुखमय था तब सुखद भावनाएँ थीं सब सुखी रहते, किसी को दुःखदायी बात केवल पेट पालन तक सीमित ज्ञान न होकर कल्याण पर, सो परोपकार के कार्यकलापों द्वारा सब सुखी थे सो कारण सुख का था तथा जीवन सुखमय व्यतीत था सुख दाता विचार मन में जागृत या वास हुआ मन निर्मल था जिस का लाभ, कि मनमुख जीव संसार व संसार सुख की इच्छा को त्याग कर चला, पर सन्मुख जीव संसार व सांसारिक सुख 'ज्ञान' द्वारा नष्ट कर मन को शान्ति प्रदान किया 'ज्ञान' पर तन मन धन अर्पण कर दिया, 'ज्ञान' दाता को सब का स्वामी माना

094/ संसार सुख का त्याग

जब मानव विचार शक्ति द्वारा सन्त महापुरुषों की शरण ग्रहण कर सन्मुख बना तो सब कुछ त्याग कर सन् मुख भाव रूपी साधन अपनाया जो उस का साधन बना सो सब त्यागने योग्य-वस्तुएँ ज्ञान थी, सो असत्यता को त्याग कर सन्मार्ग अपनाया सो ही सब कुछ सुख मन-मुख होकर मन की इच्छा सांसारिक विचार द्वारा नष्ट हो जाता था, जिसको सच्चा सुख स्वरूप कहा जा सकता। उस पर तो सब कुछ न्यौछावर करने योग्य साधन आवश्यकता रूप ज्ञान का उपदेश था, जिस का त्याग रूप ही जीवनपर्यन्त सुखद बना रहा सो सब कुछ सत्य स्वरूप अजर अमर परमात्मा स्वरुप ही त्याग साधन रूप था सन्मुखता का ही सच्चा स्वरूप रूपी त्याग-स्वरूप माना गया जिस द्वारा सब कुछ संसार त्याग पाया इसलिए संसार त्याग केवल त्याग नाम से नहीं था, 'संसार का त्यागकरणा' मनमुख की अज्ञानता त्याग का अभिमान उत्पन्न करता था! केवल मुण्डन करा, वस्त्र रँगवा लिए, यह सब केवल दिखावा मात्र, या अज्ञान त्याग स्वरूप कहा? त्याग केवल सो वासना-कामना का त्याग जो जीवात्मा को बन्धनमुक्त करता है? सन्मुखता का सच्चा त्याग ज्ञान, जो सब रूप से त्याग रूप का स्वरूप माना सो सच्चा त्याग ज्ञान महापुरुषों की शरण ग्रहण करने, से मानव रूप को समझ संसार त्याग सहज स्वरूप रूप में समझा जा सकता जब मानव ज्ञान द्वारा संसार त्याग सच्चा रूप जान संसार त्याग विचार द्वारा संसार त्याग सुखद स्वरूप रूप से जाना था, इसलिए सन्मुख महापुरुषों द्वारा संसार का त्याग

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इस प्रकार श्रीगुरु जीव-सत्त्वको अपने रूप तथा नाम 'जीव' प्रदान करते, उनको अपने परम धाम रूपी निज अङ्गसङ्ग 'जीव' प्रदान करते, तब जीव कृतार्थ होता। 097/ गुरुदेव शिष्यका कल्याण क्यों गुरुदेव का शिष्यका यह कल्याण रूप स्वरूप कृपा केवल जीवकी आत्मिक कल्याण दिशा तक ही सीमित नह रहकर यह सर्व दिशा प्रसारित भी होत रहता है। इस हेतु श्रीगुरु शिष्यके व्यावहारिक जीवनका भी ध्यान रखते। ऐसा नहीं होता कि शिष्यके सम्पूर्ण रूप शरण गत न होने, अथवा पूर्णरूपेण वह आज्ञा वहन नहीं कर रहा, अथवा मनमुखता आचरण करता भी हो सकता हो लेकिन, वह शिष्य रूपी जल जीव स्वरूप बनकर, गुरुके तट शरण आया होकर उसकी जीवन प्यास को गुरुदेव तृप्त तो करते ही रहते हैं। उसका व्यावहारिक जीवन सुखी रहे। इसीलिए वह 'गुरुदेव' रूप धारण करके जीव अज्ञानी अवस्था दौरान सांसारिक जीवन तक भी 'उपकार' की सीमा विस्तारक कर शिष्यका भला ही सोचते रहते। इस दृष्टिसे विचारने पर यह प्रत्यक्ष प्रतीत होता अवश्य होगा कि यह 'भू-लोक' केवल एक पाठशाला स्वरूप ही, इस हेतु शिष्यको 'भू-लोक' रूप ज्ञान शाला रूप संसारकी सर्व समस्या हल करने का अवसर प्रदान करते, जो कि सांसारिक कल्याण रूप दिखाई देकर जीव के इस व्यावहारिक जीवन को सार्थक तो बनाता ही रहता, पर उसके मन को सम्पूर्ण रूप यह नहीं समझाता कि यह शारीरिक रूप अवसर ही अन्तिम है, पर उसके मन को जीवकी पूर्ण रूप से उस अद्वैत रूप जीवन धारण तक इस प्रकार का साधन, उसका मन स्थिर रूप से केवल गुरु चरणामृत पान तक ही नहीं पर उस अमृत स्वरूप जीवन धारण की दिशा विचारने हेतु भी अवसर प्रदान करने का निमित्त न केवल इस सांसारिक सुख साधन उपलब्ध कर करने का कारण रूपसे शिष्यको यह अवसर प्रदान करते हुए कि सांसारिक सुख, इस हेतु शिष्यको यह अवसर प्रदान, शिष्यको यह ज्ञान देते। 098/ आत्म-कल्याण प्राथमिकता है यह विचारणीय भी गुरुदेव शिष्यके सम्बन्ध में इस बात रूपी सत्य-तथ्य को ज्ञान-गोचरता से जान लेना व्यावहारिक भी ध्यान का विषय, आत्म-कल्याण की प्राथमिकता को पर रख गुरुदेव शिष्यके इस सूक्ष्म जीवन रहस्य विषय, उसके व्यावहारिक जीवन की चिन्ता आत्म-कल्याणकी चिन्ता उपरान्त प्राथमिक विचार मानते। शिष्यकी आत्मिक दुर्बलता गुरु रूपी चरणो की शरण रूप जल प्राप्ति का कारण बन सके, इस हेतुसे शिष्य का मन जब सांसारिक सुख की इच्छा से प्रेरित होकर गुरु शरण में आया, सांसारिक इच्छाओंकी तृष्णा का शमन केवल इसलिए नहीं, ताकि शिष्यको सांसारिक सुख मिले! इसलिए कि जीव का मन तृप्त हो कर केवल शान्त हो सांसारिक विषय से; उसके मन की यह तृष्णा ही आत्म ज्ञान की पिपासा का कारण बन सके। इस हेतुसे जहां सांसारिक सुख रूप जल का पान, उस शिष्य को गुरु द्वारा मिले, उसके मन हेतु जल रूपी अमृत का तो काम सांसारिक तृष्णा शमन करने का ही स्वरूप बन सके तथा गुरुदेव सांसारिक सुखोंद्वारा उस आत्म-कल्याण रूपी पिपासाको पूर्ण कर सांसारिक सुख केवल निमित्त स्वरूप सांसारिक सुख को साधन-स्वरूप बनायें यह भाव निहित था, नकि इस प्रकार सांसारिक सुख केवल ही, जो केवल सांसारिक दृष्टि द्वारा जीव रूप को सीमित करता था उस दिशा को बदल कर, उस रूप को गुरुदेव जीव रूप को दिशा प्रदान कर सकने तक। इस कारण जहां यह स्वरूप इस बात विचारने को ध्यान दिलाता, शिष्य की अन्य कल्याण की दिशा पर उस अन्य दिशा को केवल उस इस बात-विचारकी प्राथमिक दिशा रूप ही समझ कर चलना चाहिए, ताकि इस सांसारिक सुख के रूप को निमित्त ही जान जीव का उस दिशा का विचार ही प्रमुख न बन सके। उस अवस्था सांसारिक सुखोंको पूर्ण समझ जीव सांसारिक सुख-दुख रूपी सांसारिक बन्धन सांसारिक जीवन का लक्ष्य न, वह उस आत्मिक कल्याण साधन दिशा का मार्ग ही, सांसारिक सुख भोगने का ही लक्ष्य मान कर न उस सुख को भोग कर सके। 60

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Below is the line-by-line transcription of the visible characters, numbers, and punctuation:

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099/ □□ □□□□□□□□□□□□ □□

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विचारशीलता मात्र का होना जीव मात्रके कल्याण का कारण या कारक बनसकता तो फिर सभी विचारवान् लोग एक ही विषय स्वतः सम्पन्न कर ही लेते।लेकिन जो ऐसा नहीं अनुभव करते, सत्य के साक्षात्कार के कारण ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि एकत्व के प्रभाव मात्र से ही आत्मा सब प्रकार के सन्देह से मुक्त हो जाता तथा एक ही पथगामी बन कर यह समस्त जगत् एक ही मार्ग का अनुगामी बनकर न जाने कब का कृत कृत्य हो चुका होता ।। अतएव, विचार से व्यवहार के स्वरूप को, 'यथा वत्', या वास्तविक रूप नहीं मिलता बल्कि मन में उथल पुथल और बढ़ जाती है, मन अनियन्त्रित होता है, वासनायें सिर उठा कर आगे बढ़ कर मन को विषय से वशीभूत कर सकती हैं। हाँ, विचार के प्राधान्य मात्र, विशेषाधिकार रूप से आगे बढ़कर जब विवेक रूप, अपनी ज्योति बिखेरता है तब मन को शान्ति की प्राप्ति होती, सत्य विचार मात्र का उदय उस स्थिति में जीवात्मा स्वरूप में होता है जो कि, न केवल मन को लय कर देता अपितु वासना रूपी बीज ही को सर्वथा नष्ट कर देता, उसे शान्ति पूर्ण 101/ विवेक से शान्ति लाभ यह सत्य बात सदैव से जन वर्ग के हित कार्य में सदैव ही उपयोगी सिद्ध- तो रही ही है, भले रूप भले विचार मात्र से किसी तरह भिन्न-हो क्यों नपड़े, किन्तु यह तो सत्य ही सिद्ध परिणामकारी रूप सिद्ध होगी ही, विचार में गति कम हो, भले रूप गति प्रत्येक के मन में ही उत्पन्न हो किन्तु विवेक सदा अपनी स्थिति मात्र से प्रत्येक को प्रकाश मय करता है, जिससे कि हर प्रकार के हर प्रकार विश्लेषक के सब सन्देह को, विवेक के उदय रूप मात्र सब ही स्वतः समाप्त होकर लय हो जाते ही देखे हैं, फिर चाहे स्थिति कोई रूप क्यों नहो। संयम, तप, जप, भक्ति- के कारण सब, जो धारण किए गये त्याग पत्र- स्वरूप विवेक के प्रभाव रूप विचार मात्र से ही त्याग रूप न रह कर, या त्याग तो जो कि स्वभाव सिद्ध का रूप स्वतः- ही बन जाता था, या जिसे त्याग भी नकहें बल्कि मात्र यह सम्प्रदाय या सम्प्रदाय रूप, या स्वरूप स्थिति का रूप, स्थिति के नाम से स्वरूप के स्वरूप सम्बन्ध जीवात्मा स्वतः ही पा लेता था। जो केवल ही केवल ही बात ज्ञान सिद्ध रूप विशुद्ध के द्वारा स्वतः ही सम्भव था। अपने अपने स्वरूप के दर्शन मात्र से ही सम्भव है, जो प्रत्येक के अन्तर का प्रकाश सदा से सदा रूप होकर प्रकाश के रूप मात्र जीवात्मा स्वरूप को देता था। विशुद्धता ही केवल सदा सिद्ध रूप में, सब काल सब देश, कार्य, स्थिति मात्र प्रकाश का रूप सदा, केवल ही केवल मात्र रहा है।। विशुद्ध स्वरूप, सत्य, आनन्द, का प्रकाश मात्र ही, जो शुद्ध रूप, स्वरूप रूप सदा ही सर्वत्र सब काल में रहा पाया गया, जो सब ही रूपों का बीज रूप मात्र आत्मा रूप से सदा रहा है, जिस रूप प्रकाश को, हर रूप का बीज कहना था। 102/ वशीकार किसका हो? जब प्राण ही सब कुछ कार्य कारण रूप सब रूप से हो जीव मात्र रूप से हो रूप मात्र स्वरूप से ही सदा सदा से ही रूप मात्र है! तब विचार का स्वरूप सब रूप जीवात्मा सदा रूप से सिद्ध है, तो फिर यह प्रश्न ही नहीं रह या सम्प्रदायों रूप में विचार का प्रभाव रूप या प्रभाव भाव- रूप सदा सदा सदा रहा जीवात्मा स्वरूप मात्र से ही सब कुछ रूप रहा 62

समाज का हर नर नारी धर्म का नाम लेत हैं और धर्म ही मनुष्य रूप को सार्थक कर मुक्तिलाभ तक लेजा सक्ता है! पर जिसे मनुष्य आज धर्म समझ रहा होगा वह यथार्थ का रूप बना रक्खा होगा क्या नहिं? उस धर्म जिसे धर्म या तो माना जाताहै या ही है, उसका फल मुक्ति कैसे होगा! जो धर्म बिना किसी के रोके सब देश, समस्त काल में एक सा ही फल देता रहता वही यथार्थ धर्म हो सक्ता? उत्तर- हा, यथार्थ धर्म, या उत्तम क्षमादि लक्षण धर्म! सम्पूर्ण जीवात्मा का स्वभाव किसी भी काल में बदल तो नहीं सक्ता भला जो विकारी भावों का रूप है, उसको ही यथार्थ धर्म मानकर संतुष्ट होने का क्या प्रयोजन रहता है? विकारी वा विभाविक ही तो संसार चक्र का रूप बन रहा है, सो इन विभावों से रहित शुद्ध रूप को ही अपना मान कर उपादान ही यथार्थ धर्म समझना होगा 103/ निश्चल धर्म ‘जो जीव सदा सम्यग्दर्शन आदि रूप धर्म तथा सदा निर्दोष धर्ममय अपने आत्म रूप को ध्यावे है, वह जीव सम्यग्ज्ञान को ही प्राप्त हो रहा’ इस लोक में तो सब पदार्थ या द्रव्य सदा अपने स्वभाव रूप होकर परिणम रहेहैं, केवल इस जीव रूप द्रव्य को छोड़कर सो ऐसा क्यों हो, इस विषय का विचार कभी किया है! सब द्रव्यों का जो रूप, गुण पर्याय से तो सदा ही काल में जैसा था वैसा ही परिणामन स्वरूप ही दिखाई दे सक्ता है किन्तु कभी इस जीव रूप द्रव्य को भी देखा कि इस जीव रूप द्रव्य के स्वभाव को छोड़कर कभी नहीं देखा, सदा केवल मात्र ‘द’ या ‘प’ रूपी कर्मों द्वारा उपाधि रूप जो सब कर्म रूप परिणमन होता है, उस समय कभी जीव का स्वभाव या रूप तो नहीं बदल गया अब देखना यह, 'कि जो भी, जिस रूप से धर्म या धर्मात्मा कहा है, सो भी ‘पर से’ भिन्न स्वरूप का रूप है'या कि 'पर से'- भिन्न स्वरूप रूप ‘स्व से’-युक्त स्वरूप निश्चय से कहा जा सक्ता सो समझ लो तब कहीं धर्म या धर्मात्मापना का यथार्थ स्वरूप-पहचान रूप से प्रगट रूप से स्वीकार उपादान स्वांगपने से नहीं यथार्थ जैसा जैसा रूप स्वरूप का होगा, सो सब ही रूप ‘स्वयं’ ही देखना ही यथार्थ निश्चय रूप से समझ कर स्वांगपने का व्यवहार स्वरूप त्यागना समझना यह यथार्थ धर्म कैसा यथार्थ धर्म? सब ही प्रकार के भाव, मन रूप व वचन अथवा काय रूप रूप सब क्रिया ही, आत्मा रूप स्व द्रव्य रूप स्वयं ही स्वरूप का कारण मान लिया जा रहा व्यवहार ही मान कर सब पर भाव, सो सब क्रिया ही, सो अज्ञान ही रूप फल को फल को ‘न धर्म’ रूप, सो अज्ञान रूप ही परिणाम ही, यह अ-धर्म रूप 104/ ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’ यह जानना सब जन का प्रथम ही कार्य होना ही योग्य है, ‘हमारा तो नाश होता है?’ वा ऐसा ही रूप, ‘हमारा कभी विनाश होगा? सो ऐसा ही विचार योग्य रूप होगा, ‘हमारा विनाश तो हो सकता ही!’ सो ही विचार हो जाना, ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’ तब ही योग्य ही हो उपादान का रूप सब जन व्यवहारिक से भिन्न ही देखना होगा कैसा सो विचार? सो ही विचार ऐसा होगा कि, सब संसारी ही मनुष्य पर्याय प्रमाण से नाश ही स्वरूप का दिखाई देता है, सो विचार; सो व्यवहार से, सब जन रूप से व्यवहार सब जन ऐसा कहते सुना जाताकि यह पर्याय संबंधी ही सारा नाश होना देखा जाता व्यवहार- रूप विचार तो हो रहा देखा जा व्यवहार ही रूप सब व्यवहारिक जन स्वरूप कह रहे, व्यवहार मात्र से ही; सब पिता का, सब माता का, सब पुत्र का, सब संबंध सब ही व्यवहार ही पर्याय के अनुसार देखा गया माना जाता 63

इस लिए जब तक जीव इस बात को, कि भगवान् सब जगह व्याप्त हैं ऐसा जाने? संसार के सम्मुख आकर कोई भी ऐसा काम न करे जो बुरा, पाप कहलाता हो तब पहिले ऐसा करने से, सब सम्बन्धी अपने ही हो कर धोखा देने लगें ऐसा रूप विचार कर, पर जीव ऐसा अभ्यास बनाये तब मन से भगवान् के दर्शन सदा सर्वव्यापक स्वरूप आ- कार से जाने पर सर्वथा संशय जाता रहे। जब ऐसा ही सब संशय मिट- कर ज्ञान हो जाय तब उस से भी बढ़ कर ज्ञान रूप हो ‘गो पाल’- नाम उच्चारण रूप से मन को परमात्मा को सर्वव्यापक समझकर जो ‘गो पाल’ का ध्यान करता है, भगवान् तो उस रूप आ- कारवान् रहता है, शरीर में चेष्टा से, शरीर के भीतर सब ही में एक रूप से, सबमें ही सब का एक रूप ही रहता न हो, पर उस रूप में भगवान् जाने बिना प्राणी को शान्ति, सुख शान्ति न हो सके, सुख शान्ति ही सब चाहै, भगवान् कृपा से कृपा रूप दर्शन से सब शान्ति ही हो भगवान् से जाने बिना सुख न मिल कर सब सन्देह ही सन्देह रूप रहता है, सन्देह ही का नाश सब ओर से, भगवान् की, शरण बिना ही, संसार सब जन्म भर में ही संशय से, सन्देह युक्त रहकर ही काल वश हुआ। ऐसा न जान कर ही अभ्यास ही करना था।

105/ ज्ञान दशा का

ज्ञान स्वरूप सब परमात्मा के ज्ञान रूप सब लीला लीला भाव से ऊपर उठ कर सब से ऊपर मन को ले जाकर वैकुण्ठ मण्डल में उस रूप से देख कर ऊपर सब सुख ही पाता जाय, उस के अभ्यास से जब सब परमात्मा के आनन्द रूप ही स्वरूप आनन्दरूप शान्ति भाव देख- ता हुआ मन को सब काम बिना सब ही बात को विस्मृत समझता हुआ उस ज्ञान दशा- भाव दशा को पाता हुआ सब संसार के सम्बन्ध मात्र भाव से छूट कर आत्म-समर्पणरूप से शांत, शांत स्वरूप सब ओर से ध्यान रूप मन को कर दिया तब उस भाव दशा में स्थित हो, जो संसार भाव-सम्बन्ध सब जन्म-मरण का दाता है, पर उस को ज्ञान में ‘गो गौ’- ही ही समझता हुआ ही उस ज्ञान को समझता हुआ ही सब ओर ही ज्ञान ही ज्ञान रूप में संसार का रूप सब एक रूप ही जान कर भगवान् सब ओर ही सब ओर जान कर, जो परमात्मा सब ओर सब ही में ‘गो’ के स्वरूप से, ही परमात्मा रूप जान ऐसा जान लेता है, पर ‘गो’ वा ‘इ न्द्री’ सब परमात्मा ज्ञान रूप से व्याप ‘गो’ का सब रूप जान कर, ‘गो’ वा ‘इ न्द्री’ का ज्ञान हो, सो आत्म-समर्पण रूप वैकुण्ठ में ऐसा ही, न ‘आत्म-समर्पण’ कर सब को सब ओर जान कर उस रूप दर्शन ही सब सब भगवान् को ‘गो’ ही ही समझ कर सब रूप से ‘गो’ ही ही स्वरूप सब ओर ही ही हो जाता है, पर भगवान् उस परमात्मा के चरण में सदा ही आत्म-समर्पण ही रहता है। परमात्मा का ध्यान हो जाय तो, ‘सकल जगतमय हो पावै प्रभु को रूप’तो सब जान कर, ‘परमात्मा सब ही रूप, का भगवान् का रूप समझता’।

106/ सब का साक्षात्कार

जो संसार सब रूप आ-कार युक्त ही सब जगत् में ही सब आ-कार युक्त

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The text in the provided image cannot be transcribed because the font glyphs failed to render properly (displaying only placeholder boxes/tofu instead of characters).

Only the numbers and punctuation marks are visible:

□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□, ‘□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□’□ 110/ □□□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□-□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□□□□□ □□□□-□□□□□□□ □□ □□□ □□□-□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□, □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□-□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ ‘□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□-□□□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ ‘□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□’□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□ □□□ □□□□ 111/ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ ‘□□□□□ □□?’- □□□□ □□□□□ □□□□□ ‘□□□□□ □□?’- □□□□ □□□□□ □□□□□ ‘□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□?’- □□□□ □□□□□ □□□□□ ‘□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□?’- □□□□ □□□□□ □□□□□ ‘□□□□ □□□□□ □□□□’ □□ □□ □□ □□□□ □□□□-□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ ‘□□’ □□ □□□□□ □□□, □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ ‘□□□’ □□, □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ ‘□□’ □□□ □ □□ □□, □□ □□ ‘□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□- □□□□□ □□□□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□


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112/ ▯▯▯▯-▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ‘▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯’▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ‘▯▯▯’ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ‘▯▯▯ ▯▯▯’▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ‘▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯’ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ‘▯▯’, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ 113/ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯- ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ‘▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?’ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ‘▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯’▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ‘▯▯, ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯?’ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ‘▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯’▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ‘▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯’▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ‘▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯’▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯- ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ 114/ ‘▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯-▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯’ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯- ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯- ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ 68

उसको इतना बड़ा फल नहीं मिलता जो प्रतिदिन वेद पाठ करता रहता हो, इसलिए जो प्रतिदिन वेद पाठ अथवा स्वाध्याय करता रहेगा उसे विशेष फल अवश्य मिलेगा ही इसमें संदेह करने योग्य गुंजाइश लेशमात्र भी नजर नहीं आती, अतः जो लोग नित्य वेदों का पाठ नहीं करते वह भी, सप्ताह में कम से कम एक दिन अथवा महीने में चार दिन, या प्रतिदिन थोड़ा पाठ तो अवश्य किया करें तब ही फल प्राप्त होगा नहीं, तो विशेष लाभ प्राप्त हो यह कहना ठीक नहीं होगा स्वाध्यायशील जन विशेष आदरणीय हैं, सर्व जन, सर्व जन समाज आदरणीयता सदा बनाए रखने का प्रयत्न करते रहें ताकि समाज सदा सुखी रहे, जो स्वाध्याय करता रहेगा स्वयं तथा दूसरों सुख पहुंचाता ही रहेगा, तो ऐसा अवसर सबको प्राप्त हो यह हम सब लोगों की कामना है। आ-ओ३म् शम् नो मित्रः शं- नो भवतु अर्यमा शं नो मित्रावरुण इन्द्रो वृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। सो भो, तन मन धन तीनों जिस जन को प्राप्त नहीं हुए सो जन तो प्रभु का भजन सिमरन कर के प्रभु से अपने उद्धार का साधन बना सकता है, क्योंकि सब कुछ सामर्थ्यवान् ही कर सकता ऐसी बात नहीं, जो निर्धन प्रभु नाम जप कर के निष्कामता से सिमरन का उत्तम फल पाता रहेगा सो वह जन अपने उत्तम 'ओ३म् ज्योतिर्मय- तेज को प्रकाश'ता ही जाता देखा गया, अन्य जन विचार कर प्रभु स्मरण करते रहें। सारांश, सब उत्तम अवस्था का फल दाता ईश्वर ही सबको अपने कर्मों का फल दाता स्वामी बना रहता सदा से अपने ज्ञान से सबको ज्ञान देता ही है इसलिए सो ऐसा जन भी अपना जीवन सुधारे स्वाध्याय जन से ज्ञान लाभ प्राप्त कर लिया करे। तो वो स्वाध्याय जन सब को प्रभु ज्ञान दे कर धन्य हो सकता है, इसलिए सब प्रेम से, प्रभु भजन किया करो! 115/ भगवान् का प्रकाश हर मानव मन में परमात्मा जन कल्याण का दाता, हर कर्म फलदायक व हर का पालक होने से स्वाध्याय जन द्वारा सब विधि प्रकाश रूप में सत्य, सब को बतलाता है; सो सो जन, प्रभु परमात्मा का स्वाध्याय करें। स्वाध्याय विद्या का उत्तम महा-विद्या का फल सब को मिले, सो इसके लिए सब को यत्न करना सो उत्तम परमात्मा की शरण, 'ओ३म्' का जाप सब जन तो नित्य प्रातः सायं करते रहें जो 'ओ३म्' वा- प्रभा-प्रकाश 'ओ३म्' का प्रकाश सब मानव प्रभु चिन्तन से जन जन को 'ओ३म्' रूप प्रभु सब स्वाध्याय का ज्ञान प्रदान किया करें, स्वाध्याय जन परमात्मा का रूप समझ कर ही स्वाध्याय जन विचार किया करें। सो ऐसा अभ्यास करना चाहिए तो ही, सब लोग प्रभु सत्य-धर्म को समझ कर चलेंगे सो, सब जन प्रभु का आश्रय सदा ही बना करके ही कल्याण पाया करें, कल्याणकारी परमात्मा ही सदा रक्षा करे। इसलिए मानव को, परमात्मा का दिया हुआ उत्तम जन्म सत्य स्वाध्याय द्वारा, तन मन से, सफल किया जा सके यह यत्न हर जन मानव सदा ही प्रभु शरण धारण करे, सदा जन प्रभु का ज्ञान पाकर जन परोपकार कर्मों का ही पालन करे ताकि परमात्मा का ज्ञान सब में व्याप्त हो सदा सत्य ही जाने 'ओ३म्' को, उत्तम दाता जो हर प्रकार से कल्याण दाता प्रभु 'ओ३म्' का प्रभु ध्यान किया जाया करे। मानव जन जब ज्ञान द्वारा प्रभु का उत्तम ज्ञान प्राप्त किया करते तो परमात्मा के कृपा पात्र बन जाते मुक्ति-द्वार तक पहुंच कर, वो मुक्त आत्माएं बन कर अमर स्वरूप प्राप्त कर मुक्ति के सुख को भोग कर फिर मानव तन, जो पाकर फिर ज्ञान पा, जो मुक्ति से वंचित रहे उस मानव, प्रभु ज्ञान रूप गुरु कृपा द्वारा प्रश्न हुआ कि 'हे भगवान् ज्ञान-दाता तू दाता है, सो अ- ज्ञानी पर प्रकाश कब तक अपना प्रभाव रखेगा?' भगवान् ने कहा, 'मानव का मन उत्तम कर्मों से- ही तो बनता है, सो मानव को मन द्वारा परमात्मा प्रकाशित हो'। सो मानव सदा सत्य को ही धारण कर के चले, भला करके सब भला करें परमात्मा का ध्यान तो अवश्य किया करो, सो मन, मलीन अविद्या कर्मों से ही दूर रहा करे। 69

‘□□□’ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□, ‘□□ □□□ □□□□ □□□□?’ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□’ 116/ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□, □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ ‘□□□’ □□□□ □□, □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□, □ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ ‘□□’□ □□□□□ ‘□□□’, □□□□□□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□□, □□ ‘□□ □□’, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ ‘□□’ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□, □□□□□□ □□□ 117/ ‘□□□’ □□□□□ □□, ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□, ‘□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□’□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□- □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□- □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□! □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ ‘□□□’ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ ‘□□□’ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□, □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□□□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□, □□ □□ □□□□ ‘□□□’ □□□□, □□□ □□□□ □□ ‘□□□’ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□, □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□ 70

इस 'ज्ञान' का नाम चाहे कितना उछालो जी, पर तत्व तो केवल ज्ञान ही; सो ज्ञान मात्र स्वयं सिद्ध है, उसे कोई मिटाने वाला नहीं। यह प्रत्यक्ष जाना प्रयोजनवान ही रहा, इसलिए ही तो पहले कहा कि 'ज्ञान' मात्र कहकर 'ज्ञेय' का नाम मात्र भी नहीं निकाला कि जैसा जो भाया, वैसा जाना सो यह भी ज्ञान रूप ही रहा तथा अन्य भिन्न प्रकार से प्रतिपादन भी किया ही, सो ऐसा अभ्यास ही प्रत्येक का होना रहा। इसलिए तो 'ज्ञान' मात्र कहा गया कि केवल उस ज्ञान को ग्रहण किया गया कि जिसके बल से समस्त का स्वरूप ही सिद्ध हो जाता गया होता ही, उस स्वरूप मात्र पर ही तो ठहरना रहा प्रत्येक का, केवल ही जो स्थिर ही ठहरा सो, अपने स्वरूप मात्र रहा ज्ञान रूप ही तो 'ज्ञान' का नाम ही रहा सिद्ध हुआ कहा गया जो कि केवल स्वकीय रूप, सो तो सदा ही तो सब ही को 'ज्ञान' का यह नाम ही तो सिद्ध ही सो प्रमाण ही कहा गया रहा। वास्तव में जहां गैर- भाव असम्भव ही रहता तो वहां सत्य ही तो ही रहा गया सो, सो सत्य ही कहा गया, जो प्रत्येक का ही सर्व ही रूप से ग्रहण किया गया प्रकाश रूप ही। तो 'ज्ञान' का ही स्वरूप तो सत्य ठहराया ही, सो असत्यता का कोई भी अभाव ही रहा सो 'ज्ञान' का स्वरूप- असत्यता से, सदा ही, पृथक ही, पृथक रहा सो प्रकाश के स्वरूप मात्र प्रकाश ही तो प्रकाश कहा गया, सो तो केवल सिद्ध मात्र ही रहा सब का ही सो अप्रमेय असत्यता से, तो सत्य का स्वरूप ही प्रकाश का स्वरूप ही प्रकाश मात्र रहा। 118/ 'सर्वव्यापी तो स्वयं ही ही रहा, ना कि असत्यता का असत्यता ही' शून्य को जब शून्य ठहराया ही, तो शून्य का रूप शून्य ही रहा ठहरा, पर शून्य ठहराने वाला ज्ञान मात्र था सो व्यापक ही तो स्वयं ही ठहराया ही कहा रहा। शून्य का रूप तो सब प्रकार से स्वरूप शून्य रहा कहा असत्यता ही प्रकार से शून्य स्वरूप ठहरा स्वरूप व्यापक रहा तो स्वरूप ठहराने वाला ज्ञान मात्र था सो असत्यता स्वरूप नहीं था, सो प्रत्यक्ष ही स्वयं स्वरूप ही असत्यता को शून्य रूप ही ठहरा ठहराया, जिसने शून्य को जाना व कहा, ज्ञान स्वरूप ज्ञान-रूप रहा जो कि शून्य रूप नहीं सो सत्य ही ठहरा सो, सो तो रूप ही रहा, ज्ञान का स्वरूप ठहरा ज्ञान ही तो सत्य का स्वरूप ही ठहरा सिद्ध सत्य रहा सो ज्ञान, ना कि शून्य का स्वरूप रहा, ना तो असत्य ही ठहराया 'ना' ही था, 'ज्ञान' का स्वरूप ठहरा तो ज्ञान ही, ना तो रूप ही शून्य था, ज्ञान का, मात्र रूप तो, ज्ञान रहा। स्वरूप तो रहा ही, 'सत्य ही ठहर रहा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप, पर स्वरूप का ना रहा सो असत्य'। रूप तो सत्य स्वरूप ठहरा ही रहा सो स्वरूप स्वरूप ही, सो स्वरूप ही सत्य रहा तो सब प्रकार सिद्ध ही, सो स्वरूप ही, स्वरूप ही तो सब रूप कहा सो, सब ही स्वरूप का स्वरूप रूप ही तो सत्य रहा। सो असत्यता का तो ना कोई रूप ठहरा सो स्वरूप ही स्वरूप ज्ञान ज्ञान स्वरूप ही रहा ज्ञान असत्यता का केवल ही सत्य स्वरूप रहा सत्य ही रहा स्वरूप स्वयं का सब का ही सत्य ही रहा सो, सब ही सत्य ही स्वरूप मात्र सत्य मात्र रहा ज्ञान मात्र सब रूप सत्य ठहरा हुआ सो ही सत्य रहा सो, 'सत्य, ना असत्यता का रूप, ना सत्य शून्य रहा; ना तो असत्यता का रूप, ना सत्य शून्य ही स्वरूप का रूप रहा'। रूप तो ही स्वरूप सो ज्ञान सत्य स्वरूप मात्र ठहरा असत्यता का रूप असत्यता का ठहरा रूप मात्र रूप ज्ञान स्वरूप रहा सो 'असत्यता ही मात्र ना तो ना ठहरा, ना ही असत्यता का असत्यता रूप ही असत्यता स्वरूप का रूप रहा, ना ही तो असत्य ही ठहरा सो, ना तो असत्यता रूप असत्य रूप रहा हो?' 71

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119/ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ ‘□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□-□□□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□- □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□- □□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□□’□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□□□ □□ ‘□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□- □□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□, □□□□ □□□, □□□□ □□□□□□- □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□□-□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□- □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□- □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ 120/ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□-□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□-□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ 72

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