पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ९९६ | * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * | [ संक्षिप्त पद्मपुराण |
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२२ कौसलेयः—कौसल्याजीके पुत्र। २३ खरध्वंसी—खर नामक राक्षसका नाश करनेवाले। २४ विराधवध-पण्डितः—विराध नामक दैत्यका वध करनेमें कुशल। २५ विभीषणपरित्राता—विभीषणके रक्षक। २६ दशग्रीवशिरोहरः—दशशीश रावणके मस्तक काटनेवाले। २७ सप्ततालप्रभेत्ता—सात तालवृक्षोंको एक ही बाणसे बींध डालनेवाले। २८ हरकोदण्ड-खण्डनः—जनकपुरमें शिवजीके धनुषको तोड़नेवाले। २९ जामदग्न्यमहादर्पदलनः—महान् अभिमानको चूर्ण करनेवाले। ३० ताडकान्तकृत्—ताड़का नामवाली राक्षसीका वध करनेवाले। ३१ वेदान्तपारः—वेदान्तके पारङ्गत विद्वान् अथवा वेदान्तसे भी अतीत। ३२ वेदात्मा—वेदस्वरूप। ३३ भवबन्धैकभेषजः—संसारबन्धनसे मुक्त करनेके लिये एकमात्र औषधरूप। ३४ दूषणत्रिशिरोऽरिः—दूषण और त्रिशिरा नामक राक्षसोंके शत्रु। ३५ त्रिमूर्तिः—ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीन रूप धारण करनेवाले। ३६ त्रिगुणः—त्रिगुणस्वरूप अथवा तीनों गुणोंके आश्रय। ३७ त्रयी—तीन वेदस्वरूप। ३८ त्रिविक्रमः—वामन अवतारमें तीन पगोंसे समस्त त्रिलोकीको नाप लेनेवाले। ३९ त्रिलोकात्मा—तीनों लोकोंके आत्मा। ४० पुण्यचारित्रकीर्तनः—जिनकी लीलाओंका कीर्तन परम पवित्र है, ऐसे। ४१ त्रिलोकरक्षकः—तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले। ४२ धन्वी—धनुष धारण करनेवाले। ४३ दण्डकारण्यवासकृत्—दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले। ४४ अहल्यापावनः—अहल्याको पवित्र करनेवाले। ४५ पितृभक्तः—पिताके भक्त। ४६ वरप्रदः—वर देनेवाले। ४७ जितेन्द्रियः—इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाले। ४८ जितक्रोधः—क्रोधको जीतनेवाले। ४९ जितलोभः—लोभकी वृत्तिको परास्त करनेवाले। ५० जगद्गुरुः—अपने आदर्श चरित्रोंसे सम्पूर्ण जगत्को शिक्षा देनेके कारण सबके गुरु।
५१ ऋक्षवानरसंघाती—वानर और भालुओंकी सेनाका संगठन करनेवाले। ५२ चित्रकूट-समाश्रयः—वनवासके समय चित्रकूटपर्वतपर निवास करनेवाले। ५३ जयन्तत्राणवरदः—जयन्तके प्राणोंकी रक्षा करके उसे वर देनेवाले। ५४ सुमित्रापुत्र-सेवितः—सुमित्रानन्दन लक्ष्मणके द्वारा सेवित। ५५ सर्वदेवाधिदेवः—सम्पूर्ण देवताओंके भी अधिदेवता। ५६ मृतवानरजीवनः—मरे हुए वानरोंको जीवित करनेवाले। ५७ मायामारीचहन्ता—मायामय मृगका रूप धारण करके आये हुए मारीच नामक राक्षसका वध करनेवाले। ५८ महाभागः—महान् सौभाग्यशाली। ५९ महाभुजः—बड़ी-बड़ी बाँहोंवाले। ६० सर्वदेवस्तुतः—सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसे। ६१ सौम्यः—शान्तस्वभाव। ६२ ब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंके हितैषी। ६३ मुनिसत्तमः—मुनियोंमें श्रेष्ठ। ६४ महायोगी—सम्पूर्ण योगोंके अधिष्ठान होनेके कारण महान् योगी। ६५ महोदारः—परम उदार। ६६ सुग्रीवस्थिर-राज्यदः—सुग्रीवको स्थिर राज्य प्रदान करनेवाले। ६७ सर्वपुण्याधिकफलः—समस्त पुण्योंके उत्कृष्ट फलरूप। ६८ स्मृतसर्वाघनाशनः—स्मरण करने-मात्रसे ही सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले। ६९ आदिपुरुषः—ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेके कारण सबके आदिभूत अन्तर्यामी परमात्मा। ७० महापुरुषः—समस्त पुरुषोंमें महान्। ७१ परमः पुरुषः—सर्वोत्कृष्ट पुरुष। ७२ पुण्योदयः—पुण्यको प्रकट करनेवाले। ७३ महासारः—सर्वश्रेष्ठ सारभूत परमात्मा। ७४ पुराणपुरुषोत्तमः—पुराणप्रसिद्ध क्षर-अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ लीलापुरुषोत्तम। ७५ स्मितवक्त्रः—जिनके मुखपर सदा मुसकानकी छटा छायी रहती है, ऐसे। ७६ मितभाषी—कम बोलनेवाले। ७७ पूर्वभाषी—पूर्ववक्ता। ७८ राघवः—रघुकुलमें अवतीर्ण। ७९ अनन्तगुण-
उत्तरखण्ड ] * श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य * ९९७
गम्भीरः — अनन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त एवं गम्भीर। ८० धीरोदात्तगुणोत्तरः* — धीरोदात्त नायकके लोकोत्तर गुणोंसे युक्त। ८१ मायामानुषचारित्रः — अपनी मायाका आश्रय लेकर मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करनेवाले। ८२ महादेवाभिपूजितः — भगवान् शङ्करके द्वारा निरन्तर पूजित। ८३ सेतुकृत् — समुद्रपर पुल बाँधनेवाले। ८४ जितवारीशः — समुद्रको जीतनेवाले। ८५ सर्वतीर्थमयः — सर्वतीर्थस्वरूप। ८६ हरिः — पाप-तापको हरनेवाले। ८७ श्यामाङ्गः — श्याम विग्रहवाले। ८८ सुन्दरः — परम मनोहर। ८९ शूरः — अनुपम शौर्यसे सम्पन्न वीर। ९० पीतवासाः — पीताम्बरधारी। ९१ धनुर्धरः — धनुष धारण करनेवाले। ९२ सर्वयज्ञाधिपः — सम्पूर्ण यज्ञोंके स्वामी। ९३ यज्ञः — यज्ञस्वरूप। ९४ जरामरणवर्जितः — बुढ़ापा और मृत्युसे रहित। ९५ शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता — रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गकी स्थापना करनेवाले। ९६ सर्वाघगणवर्जितः — समस्त पाप-राशिसे रहित। ९७ परमात्मा — परमश्रेष्ठ, नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव। ९८ परं ब्रह्म — सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापी एवं सर्वाधिष्ठान परमेश्वर। ९९ सच्चिदानन्दविग्रहः — सत्, चित् और आनन्द ही जिनके स्वरूपका निर्देश करानेवाला है, ऐसे परमात्मा अथवा सच्चिदानन्दमयदिव्यविग्रह। १०० परं ज्योतिः — परम प्रकाशमय, परम ज्ञानमय। १०१ परं धाम — सर्वोत्कृष्ट तेज अथवा साकेतधामस्वरूप। १०२ पराकाशः — त्रिपाद विभूतिमें स्थित परमव्योम नामक वैकुण्ठधामरूप, महाकाशस्वरूप ब्रह्म। १०३ परात्परः — पर—इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे भी परे परमेश्वर। १०४ परेशः — सर्वोत्कृष्ट शासक। १०५ पारगः — सबको पार लगानेवाले अथवा मायामय जगत्की सीमासे बाहर रहनेवाले। १०६ पारः — सबसे परे विद्यमान अथवा भवसागरसे पार जानेकी इच्छा रखनेवाले प्राणियोंके प्राप्य परमात्मा। १०७ सर्वभूतात्मकः — सर्वभूतस्वरूप। १०८ शिवः — परम कल्याणमय — ये श्रीरामचन्द्रजीके एक सौ आठ नाम हैं। देवि! ये नाम गोपनीयसे भी गोपनीय हैं; किन्तु स्नेहवश मैंने इन्हें तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है।†
* कहीं-कहीं 'धीरो दान्तगुणोत्तरः' पाठ मिलता है, यह छपाईकी भूल जान पड़ती है। यदि ऐसा ही पाठ मानें तो ऐसा अर्थ करना चाहिये—'धीर एवं जितेन्द्रिय पुरुषके श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त।'
† ॐ श्रीरामो रामचन्द्रश्च रामभद्रश्च शाश्वतः। राजीवलोचनः श्रीमान् राजेन्द्रो रघुपुङ्गवः॥
जानकीवल्लभो जैत्रो जितामित्रो जनार्दनः। विश्वामित्रप्रियो दान्तः शरण्यत्राणतत्परः॥
बालिप्रमथनो वाग्मी सत्यवाक् सत्यविक्रमः। सत्यव्रतो व्रतफलः सदा हनुमदाश्रयः॥
कौसलेयः खरध्वंसी विराधवधपण्डितः। विभीषणपरित्राता दशग्रीवशिरोहरः॥
सप्ततालप्रभेत्ता च हरकोदण्डखण्डनः। जामदग्न्यमहादर्पदलनस्ताडकान्तकृत् ॥
वेदान्तपारो वेदात्मा भवबन्धैकभेषजः। दूषणत्रिशिरोऽरिश्च त्रिमूर्तिस्त्रिगुणेश्वरः॥
त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा पुण्यचारित्रकीर्तनः। त्रिलोकरक्षको धन्वी दण्डकारण्यवासकृत्॥
अहल्यापावनश्चैव पितृभक्तो वरप्रदः। जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितलोभो जगद्गुरुः॥
ऋक्षवानरसङ्घाती चित्रकूटसमाश्रयः। जयन्तत्राणवरदः सुमित्रापुत्रसेवितः॥
सर्वदेवाधिदेवश्च मृतवानरजीवनः। मायामारीचहन्ता च महाभागो महाभुजः॥
सर्वदेवस्तुतः सौम्यो ब्रह्मण्यो मुनिसत्तमः। महायोगी महोदारः सुग्रीवस्थिरराज्यदः॥
सर्वपुण्याधिकफलः स्मृतसर्वाघनाशनः। आदिपुरुषो महापुरुषः परमः पुरुषस्तथा॥
पुण्योदयो महासारः पुराणपुरुषोत्तमः। स्मितवक्त्रो मितभाषी पूर्वभाषी च राघवः॥
अनन्तगुणगम्भीरो धीरोदात्तगुणोत्तरः। मायामानुषचारित्रो महादेवाभिपूजितः॥
सेतुकृज्जितवारीशः सर्वतीर्थमयो हरिः। श्यामाङ्गः सुन्दरः शूरः पीतवासा धनुर्धरः॥
सर्वयज्ञाधिपो यज्ञो जरामरणवर्जितः। शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता सर्वाघगणवर्जितः॥
२६६- त्रिदेवोंमें श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्थका उपसंहार
९९८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम्।* [संक्षिप्त पद्मपुराण
जो भक्तियुक्त चित्तसे इन नामोंका पाठ या श्रवण करता है, वह सौ कोटि कल्पोंमें किये हुए समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। पार्वती! इन नामोंका भक्तिभावसे पाठ करनेवाले मनुष्योंके लिये जल भी स्थल हो जाते हैं, शत्रु मित्र बन जाते हैं, राजा दास हो जाते हैं, जलती हुई आग शान्त हो जाती है, समस्त प्राणी अनुकूल हो जाते हैं, चञ्चल लक्ष्मी भी स्थिर हो जाती है, ग्रह अनुग्रह करने लगते हैं तथा समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं। जो इन नामोंका पाठ करता है, तीनों लोकके प्राणी उसके वशमें हो जाते हैं तथा वह मनमें जो-जो कामना करता है, वह सब इन नामोंके कीर्तनसे पा लेता है। जो दूर्वादलके समान श्यामसुन्दर कमलनयन, पीताम्बरधारी भगवान् श्रीरामका इन दिव्य नामोंसे स्तवन करते हैं, वे मनुष्य कभी संसार-बन्धनमें नहीं पड़ते। राम, रामभद्र, रामचन्द्र, वेधा, रघुनाथ, नाथ एवं सीतापतिको नमस्कार है।* देवि! केवल इस मन्त्रका भी जो दिन-रात जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रेमवश भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके वेदानुमोदित माहात्म्यका वर्णन किया है। यह परम कल्याणकारक है।
वसिष्ठजी कहते हैं— भगवान् शङ्करके द्वारा कहे हुए परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीके माहात्म्यको सुनकर पार्वती देवी ‘रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥’ इस मन्त्रका ही सदा—सब अवस्थाओंमें जप करती हुई कैलासमें अपने पतिके साथ सुखपूर्वक रहने लगीं। राजा दिलीप! यह मैंने तुमसे परम गोपनीय विषयका वर्णन किया है। जो भक्तियुक्त हृदयसे इस प्रसङ्गका पाठ या श्रवण करता है, वह सबका वन्दनीय, सब तत्त्वोंका ज्ञाता और महान् भगवद्भक्त होता है। इतना ही नहीं, वह समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त कर लेता है। राजन्! तुम इस संसारमें धन्य हो; क्योंकि तुम्हारे ही कुलमें पुराणपुरुषोत्तम श्रीहरि सब लोकोंका हित करनेके लिये दशरथनन्दनके रूपमें अवतार लेंगे। अतः इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय देवताओंके लिये भी पूजनीय होते हैं; क्योंकि उनके कुलमें राजीवलोचन भगवान् श्रीरामका अवतार होता है।
त्रिदेवोंमें श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्थका उपसंहार
वसिष्ठजी कहते हैं— पूर्वकालकी बात है—स्वायम्भुव मनु परम उत्तम एवं दीर्घकालतक चालू रहनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करनेके लिये मुनियोंके साथ मन्दराचल पर्वतपर गये। उस यज्ञमें कठोर व्रतोंका पालन करनेवाले, अनेक शाखाओंके ज्ञाता, बालसूर्य एवं अग्निके समान तेजस्वी, समस्त वेदोंके विद्वान् तथा सब धर्मोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहनेवाले मुनि पधारे थे। वह महायज्ञ जब आरम्भ हुआ तो पापरहित मुनि, देवता-तत्त्वका अनुसन्धान करनेके लिये परस्पर बोले—'वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके लिये कौन देवता सर्वश्रेष्ठ एवं पूज्य है? ब्रह्मा, विष्णु और शिवमेंसे किसकी अधिक स्तुति हुई है? किसका चरणोदक सेवन करनेयोग्य है? किसको भोग लगाया हुआ प्रसाद परम पावन है? कौन अविनाशी, परमधामस्वरूप एवं सनातन परमात्मा है? किसके प्रसाद और चरणोदक पितरोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले होते हैं?'
परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः। परं ज्योतिः परं धाम पराकाशः परात्परः॥
परेशः पारगः पारः सर्वभूतात्मकः शिवः। इति श्रीरामचन्द्रस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।
गुह्याद्गुह्यतरं देवि तव स्नेहात् प्रकीर्तितम्॥
(२८१। ३०—४८)
* रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ (२८१। ५५)
उत्तरखण्ड ]
१० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
श्रीहरिका कितना मनोहर रूप है, कैसी शान्ति है, कैसा ज्ञान है, कितनी दया है, कैसी निर्मल क्षमा और कितना पावन सत्त्वगुण है। भगवन् ! आप गुणोंके समुद्र हैं। आपमें ही स्वाभाविक रूपसे कल्याणमय सत्त्वगुणका निवास है। आप ही ब्राह्मणोंके हितैषी, शरणागतोंके रक्षक और पुरुषोत्तम हैं। आपका चरणोदक पितरों, देवताओं तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके लिये सेव्य है। यह पापोंका नाशक और मुक्तिका दाता है। भगवन् ! आपहीका भोग लगा हुआ प्रसाद देवता, पितर और के सेवन करनेयोग्य है। इसलिये ब्राह्मणको उचित है कि वह प्रतिदिन आप सनातन पुरुषका पूजन करके आपका चरणोदक ले और आपके भोग लगाये हुए प्रसादस्वरूप अन्नका भोजन करे। प्रभो ! जो आपको निवेदित किये हुए अन्नका हवन या दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त करता तथा अक्षय फलका भागी होता है। अतः आप ही ब्राह्मणोंके पूजनीय हैं।
आप सम्पूर्ण देवताओंमें ब्राह्मणत्वको प्राप्त हों; क्योंकि आप ब्राह्मणोंके पूज्य और शुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं। ब्राह्मणलोग सदा आप पुरुषोत्तमका ही भजन करते हैं। जो आपका पूजन करते हैं, वे ही विप्र वास्तवमें ब्राह्मण हैं, दूसरे नहीं। इस विषयमें सन्देहके लिये स्थान नहीं है। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ब्राह्मणोंके हितैषी हैं। श्रीमधुसूदन ब्राह्मणोंके हितचिन्तक हैं। श्रीपुण्डरीकाक्ष ब्राह्मणोंके प्रेमी हैं। अविनाशी भगवान् विष्णु ब्राह्मणहितैषी हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् वासुदेव एवं अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीहरि ब्राह्मणोंके हितकारक हैं। भगवान् नृसिंह तथा अविनाशी नारायण भी ब्राह्मणोंपर कृपा करनेवाले हैं। श्रीधर, श्रीश, गोविन्द एवं वामन आदि नामोंसे प्रसिद्ध भगवान् श्रीहरि ब्राह्मणोंपर स्नेह रखते हैं। यज्ञवराह-रूपधारी पुरुषोत्तम भगवान् केशव ब्राह्मणोंका कल्याण करनेवाले हैं। रघुकुलभूषण राजीवलोचन श्रीरामचन्द्रजी भी ब्राह्मणोंके सुहृद् हैं। भगवान् पद्मनाभ तथा दामोदर (श्रीकृष्ण) भी ब्राह्मणोंका हित चाहनेवाले हैं। माधव, यज्ञपुरुष एवं भगवान् त्रिविक्रम भी ब्राह्मणहितैषी हैं। पीताम्बरधारी हृषीकेश श्रीजनार्दन ब्राह्मणोंके हितकारी हैं। शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले ब्राह्मणहितैषी देवता श्रीवासुदेवको नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाले लक्ष्मीपति श्रीनारायणको नमस्कार है। ब्राह्मणहितैषी देवता सर्वव्यापी वासुदेवको नमस्कार है। कल्याणमय गुणोंसे परिपूर्ण, सृष्टि, पालन और संहारके कारणरूप आप परमात्माको नमस्कार है। ब्राह्मणोंके हितैषी देवता प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा सङ्कर्षणको नमस्कार है। शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले ब्रह्मण्यदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाले श्रीरघुनाथजीको बारम्बार नमस्कार है। प्रभो! सम्पूर्ण देवता और ऋषि आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी आप परमात्माको नहीं जानते। भगवन् ! सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् भी आपके तत्त्वको नहीं जानते।* भगवन् ! मैं महर्षियोंके भेजनेपर आपके पास आया हूँ। आपके शील और गुणोंका ज्ञान प्राप्त करनेके
* सर्वेषामेव देवानां ब्राह्मणत्वमवाप्नुहि। त्वामेव हि सदा विप्रा भजन्ति पुरुषोत्तमम्॥
ब्राह्मणास्ते बभूवुस्तु नान्यास्तत्र न संशयः। ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः॥
ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरव्ययः। ब्रह्मण्यो भगवान्कृष्णो वासुदेवोऽच्युतो हरिः॥
ब्रह्मण्यो नारसिंहः स्यात्तथा नारायणोऽव्ययः। ब्रह्मण्यः श्रीधरः श्रीशो गोविन्दो वामनस्तथा॥
ब्रह्मण्यो यज्ञवराहः केशवः पुरुषोत्तमः। ब्रह्मण्यो राघवः श्रीमान्रामो राजीवलोचनः॥
ब्रह्मण्यः पद्मनाभश्च तथा दामोदरः प्रभुः। ब्रह्मण्यो माधवो यज्ञस्तथा त्रिविक्रमः प्रभुः॥
ब्रह्मण्यश्च हृषीकेशः पीतवासा जनार्दनः। नमो ब्रह्मण्यदेवाय वासुदेवाय शार्ङ्गिणे॥
नारायणाय श्रीशाय पुण्डरीकेक्षणाय च। नमो ब्रह्मण्यदेवाय वासुदेवाय विष्णवे॥
कल्याणगुणपूर्णाय नमस्ते परमात्मने। नमो ब्रह्मण्यदेवाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे॥
उत्तरखण्ड ] * त्रिदेवोंमें श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्थका उपसंहार * १००१
लिये ही मैंने आपकी छातीपर पैर रखा है। गोविन्द! कृपानिधे! मेरे इस अपराधको क्षमा करें।'
ऐसा कहकर महर्षि भृगुने बारम्बार भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया। भगवान्के धाममें रहनेवाले दिव्य महर्षियोंने भृगुजीका भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। वहाँसे प्रसन्नचित्त होकर वे यज्ञमें महर्षियोंके पास लौट आये। उन्हें आया देख महर्षियोंने उठकर नमस्कार किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की। तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ भृगुने उन महर्षियोंसे सब बातें बतायीं। उन्होंने कहा— 'ब्रह्माजीमें रजोगुणका आधिक्य है और रुद्रमें तमोगुणका। केवल भगवान् विष्णु शुद्ध सत्त्वमय हैं। वे कल्याणमय गुणोंके सागर, नारायण, परब्रह्म तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके देवता हैं। वे ही विप्रोंके लिये पूजनीय हैं। उनके स्मरणमात्रसे पापियोंकी भी मुक्ति हो जाती है। उनका चरणोदक तथा भोग लगाया हुआ प्रसाद समस्त मनुष्यों और विशेषतः ब्राह्मणोंके सेवन करनेयोग्य, परमपावन तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् विष्णुको निवेदन किये हुए हविष्यका ही देवताओंके लिये हवन करे और वही पितरोंको भी दे। वह सब अक्षय होता है। अतः द्विजवरो ! तुम आलस्य छोड़कर जीवनभर भगवान् विष्णुका पूजन करो। वे ही परम धाम हैं और वे ही सत्य ज्योति। अष्टाक्षरमन्त्रके द्वारा विधिपूर्वक पुरुषोत्तमका पूजन और उनके प्रसादका सेवन करना चाहिये। श्रीविष्णु ही सब यज्ञोंके भोक्ता परमेश्वर हैं—ऐसा जानकर उन्हींके उद्देश्यसे सदा हवन, दान और जप करे।
वसिष्ठजी कहते हैं— भृगुजीके ऐसा कहनेपर समस्त निष्पाप महर्षियोंने उन्हें नमस्कार किया और उन्हींसे मन्त्रकी दीक्षा ले भगवान् विष्णुका पूजन किया। राजन् ! ये सब बातें मैंने प्रसङ्गवश तुम्हें बतलाई हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब देवताओंमें पावन एवं पुरुषोत्तम हैं। अतः यदि तुम परम पदको प्राप्त करना चाहते हो तो उन श्रीरघुनाथजीकी ही शरणमें जाओ। राजन् ! यह समस्त पुराण वेदके तुल्य है। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें साक्षात् ब्रह्माजीने इसका उपदेश किया था। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, उसकी भगवान् लक्ष्मीपतिमें अनन्य भक्ति होती है। वह विद्यार्थी हो तो विद्या, धर्मार्थी हो तो धर्म, मोक्षार्थी हो तो मोक्ष और कामार्थी हो तो सुख पाता है। द्वादशी तिथिको, श्रवण नक्षत्रमें, सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणके अवसरपर, अमावास्या तथा पूर्णिमाको इसका भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये। जो एकाग्रचित्त हो प्रतिदिन इसके आधे या चौथाई श्लोकका भी पाठ करता है वह निश्चय ही एक हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। इस प्रकार यह परम गुह्य पद्मपुराण कहा गया। यदि परम पदकी प्राप्ति चाहते हो तो सदा भगवान् हृषीकेशकी आराधना करो।
सूतजी कहते हैं— अपने गुरु वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर नृपश्रेष्ठ राजा दिलीपने उनको प्रणाम किया और यथायोग्य पूजा करके उनसे विधिपूर्वक विष्णुमन्त्रकी दीक्षा ली। फिर आलस्यरहित हो उन्होंने जीवनभर श्रीहृषीकेशकी आराधना करके समयानुसार योगियोंको प्राप्त होनेयोग्य सनातन विष्णुधामको प्राप्त कर लिया।
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उत्तरखण्ड सम्पूर्ण
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श्रीपद्मपुराण समाप्त
| प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तथा संकर्षणाय च। | नमो ब्रह्मण्यदेवाय सर्वदेवस्वरूपिणे ॥ | | वाराहवपुषे नित्यं त्रयीनाथाय ते नमः। | नमो ब्रह्मण्यदेवाय नागपर्यङ्कशायिने ॥ | | राजीवदलनेत्राय राघवाय नमो नमः। | मायया मोहिताः सर्वे देवाश्च ऋषयस्तव ॥ | | न जानन्ति महात्मानं सर्वलोकेश्वरं प्रभो। | त्वां न जानन्ति भगवन्सर्ववेदविदोऽपि हि ॥ |
(२८२।७०—८२)