पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पातालखण्ड ] * राजा सुरथके द्वारा अश्वका पकड़ा जाना और राजाका युद्धके लिये तैयार होना * ५०५ ****************************************************************************************
बोले—'नृपश्रेष्ठ ! मुझे बालिपुत्र अङ्गद समझो। श्रीशत्रुघ्नजीने मुझे दूत बनाकर तुम्हारे निकट भेजा है। इस समय तुम्हारे कुछ सेवकोंने आकर मेरे यज्ञ-सम्बन्धी घोड़ेको पकड़ लिया है। अज्ञानवश उनके द्वारा सहसा यह बहुत बड़ा अन्याय हो गया है; अब तुम प्रसन्नतापूर्वक श्रीशत्रुघ्नजीके पास चलो और उनके चरणोंमें पड़कर अपने राज्य और पुत्रोंसहित वह अश्व शीघ्र ही समर्पित कर दो। अन्यथा श्रीशत्रुघ्नके बाणोंसे घायल होकर पृथ्वीतलकी शोभा बढ़ाते हुए सदाके लिये सो जाओगे; तुम्हें अपना मस्तक कटा देना होगा।'
अङ्गदके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर राजा सुरथने उत्तर दिया—'कपिश्रेष्ठ ! तुम सब कुछ ठीक ही कह रहे हो, तुम्हारा कहना मिथ्या नहीं है; परंतु मैं शत्रुघ्न आदिके भयसे उस अश्वको नहीं छोड़ सकता। यदि भगवान् श्रीराम स्वयं ही आकर मुझे दर्शन दें तो मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करके पुत्रोंसहित अपना राज्य, कुटुम्ब, धन, धान्य तथा प्रचुर सेना—सब कुछ समर्पण कर दूँगा। क्षत्रियोंका धर्म ही ऐसा है कि उन्हें स्वामीसे भी विरोध करना पड़ता है। उसमें भी यह धार्मिक युद्ध है। मैं केवल श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे ही युद्ध कर रहा हूँ। यदि श्रीरघुनाथजी मेरे घरपर नहीं पधारेंगे तो मैं इस समय शत्रुघ्न आदि सभी प्रधान वीरोंको क्षणभरमें जीतकर कैद कर लूँगा।'
अङ्गद बोले—राजन् ! जिन्होंने मान्धाताके शत्रु लवण नामक दैत्यको खेलमें ही मार डाला था, जिनके द्वारा संग्राममें कितने ही बलवान् वैरी परास्त हुए हैं तथा जिन्होंने इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठे हुए विद्युन्माली नामक राक्षसका वध किया है, उन्हीं वीरशिरोमणि श्रीशत्रुघ्नको तुम कैद करोगे ! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है। श्रेष्ठ अस्त्रोंका ज्ञाता महाबली पुष्कल, जिसने युद्धमें रुद्रके प्रधान गण वीरभद्रके छक्के छुड़ा दिये थे, श्रीशत्रुघ्नका भतीजा है। श्रीरघुनाथजीके चरण-कमलोंका चिन्तन करनेवाले हनुमान्जी भी सदा उनके निकट ही रहते हैं। तुमने हनुमान्जीके अनेकों पराक्रम सुने होंगे। उन्होंने त्रिकूट पर्वतसहित समूची लङ्कापुरीको क्षणभरमें फूँक डाला और दुष्ट बुद्धिवाले राक्षसराज रावणके पुत्र अक्षयकुमारको मौतके घाट उतार दिया। अपने सैनिकोंकी जीवन-रक्षाके लिये वे देवताओंसहित द्रोण पर्वतको अपनी पूँछके अग्रभागमें लपेटकर कई बार लाये हैं। हनुमान्जीका चरित्र-बल कैसा है, इस बातको श्रीरघुनाथजी ही जानते हैं; इसीलिये अपने प्रिय सेवक इन पवनकुमारको वे मनसे तनिक भी नहीं बिसारते। वानरराज सुग्रीव आदि वीर, जो सारी पृथ्वीको ग्रस लेनेकी शक्ति रखते हैं, राजा शत्रुघ्नका रुख जोहते हुए उनकी सेवा करते हैं। कुशध्वज, नीलरत्न, महान् अस्त्रवेत्ता रिपुताप, प्रतापाग्र्य, सुबाहु, विमल, सुमंद और श्रीरामभक्त सत्यवादी राजा वीरमणि—ये तथा अन्य भूपाल श्रीशत्रुघ्नकी सेवामें रहते हैं। इन वीरोंके समुद्रमें एक मच्छरके समान तुम्हारी क्या हस्ती है। इन बातोंको भलीभाँति समझकर चलो। शत्रुघ्नजी बड़े दयालु हैं; उन्हें पुत्रोंसहित अश्व समर्पित करके तुम कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीके पास जाना। वहीं उनका दर्शन करके अपने शरीर और जन्म दोनोंको सफल बना सकते हो।
५०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
शेषजी कहते हैं—इस प्रकार अनेक तरहकी बातें करते हुए दूतसे राजाने कहा—'यदि मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा श्रीरामका ही भजन करता हूँ, तो वे मुझे शीघ्र दर्शन देंगे, अन्यथा श्रीरामभक्त हनुमान् आदि वीर मुझे बलपूर्वक बाँध लें और घोड़ेको छीन ले जायें। दूत ! तुम जाओ, राजा शत्रुघ्नसे मेरी कही हुई बातें सुना दो। अच्छे-अच्छे योद्धा तैयार हों, मैं अभी युद्धके लिये चलता हूँ।' यह सुनकर वीर अङ्गद मुस्कराते हुए वहाँसे चल दिये। वहाँ पहुँचकर राजा सुरथकी कही हुई बातें उन्होंने ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं।
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युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्कलका बाँधा जाना, हनुमान्जीका चम्पकको मूर्च्छित करके पुष्कलको छुड़ाना, सुरथका हनुमान् और शत्रुघ्न आदिको जीतकर अपने नगरमें ले जाना तथा श्रीरामके आनेसे सबका छुटकारा होना
शेषजी कहते हैं—अङ्गदके मुखसे सुरथका सन्देश सुनकर युद्धकी कलामें निपुणता रखनेवाले समस्त योद्धा संग्रामके लिये तैयार हो गये। सभी वीर उत्साहसे भरे थे, सब-के-सब रण-कर्ममें कुशल थे। वे नाना प्रकारके स्वरोंमें ऐसी गर्जनाएँ करते थे, जिन्हें सुनकर कायरोंको भय होता था। इसी समय राजा सुरथ अपने पुत्रों और सैनिकोंके साथ युद्धक्षेत्रमें आये। जैसे समुद्र प्रलयकालमें पृथ्वीको जलसे आप्लावित कर देता है, उसी प्रकार वे हाथी, रथ, घोड़े और पैदल योद्धाओंको साथ ले सारी पृथ्वीको आच्छादित करते हुए दिखायी दिये। उनकी सेनामें शङ्ख-नाद और विजय-गर्जनाका कोलाहल छा रहा था। इस प्रकार राजा सुरथको युद्धके लिये उद्यत देख शत्रुघ्नने सुमतिसे कहा—'महामते ! ये राजा अपनी विशाल सेनासे घिरकर आ पहुँचे; अब हमलोगोंका जो कर्तव्य हो उसे बताओ।'
सुमतिने कहा—अब यहाँ सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले पुष्कल आदि युद्ध-विशारद वीरोंको अधिक संख्यामें उपस्थित होकर शत्रुओंसे लोहा लेना चाहिये। वायुनन्दन हनुमान्जी महान् शौर्यसे सम्पन्न हैं; अतः ये ही राजा सुरथके साथ युद्ध करें।
शेषजी कहते हैं—प्रधान मन्त्री सुमति इस प्रकारकी बातें बता ही रहे थे कि सुरथके उद्धत राजकुमार रण-भूमिमें पहुँचकर अपनी धनुषकी टङ्कार करने लगे। उन्हें देखकर पुष्कल आदि महाबली योद्धा धनुष लिये अपने-अपने रथोंपर बैठकर आगे बढ़े। उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता वीर पुष्कल चम्पकके साथ भिड़ गये और महावीरजीसे सुरक्षित होकर द्वैरथ युद्धकी रीतिसे लड़ने लगे। जनककुमार लक्ष्मीनधिने कुशध्वजको साथ लेकर मोहकका सामना किया। रिपुञ्जयके साथ विमल, दुर्वारके साथ सुबाहु, प्रतापीके साथ प्रतापाग्र्य, बलमोदसे अङ्गद, हर्यक्षसे नीलरत्न, सहदेवसे सत्यवान्, भूरिदेवसे महाबली राजा वीरमणि और असुंतापके साथ उग्राश्व युद्ध करने लगे। ये सभी युद्ध-कर्ममें कुशल, सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंमें प्रवीण तथा बुद्धिविशारद थे; अतः सबने घोर द्वन्द्वयुद्ध किया। वात्स्यायनजी ! इस प्रकार घमासान युद्ध छिड़ जानेपर सुरथके पुत्रोंद्वारा शत्रुघ्नकी सेनाका भारी संहार हुआ। युद्ध आरम्भ होनेके पहले पुष्कलने चम्पकसे कहा—'राजकुमार ! तुम्हारा क्या नाम है ? तुम धन्य हो, जो मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आ पहुँचे।'
चम्पकने कहा—वीरवर ! यहाँ नाम और कुलसे युद्ध नहीं होगा; तथापि मैं तुम्हें अपने नाम और बलका परिचय देता हूँ। श्रीरघुनाथजी ही मेरी माता तथा वे ही मेरे पिता हैं, श्रीराम ही मेरे बन्धु और श्रीराम ही मेरे स्वजन हैं। मेरा नाम रामदास है, मैं सदा श्रीरामचन्द्रजीकी ही सेवामें रहता हूँ। भक्तोंपर कृपा करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ही मुझे इस युद्धसे पार लगायेंगे। अब लौकिक दृष्टिसे अपना परिचय देता
पातालखण्ड ] * युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्कलका बाँधा जाना तथा श्रीरामके आनेसे सबका छुटकारा * ५०७
हूँ—मैं राजा सुरथका पुत्र हूँ, मेरी माताका नाम वीरवती है। [अपने नामका उच्चारण निषिद्ध है, इसलिये मैं उसे सङ्केतसे बता रहा हूँ] मेरे नामका एक वृक्ष होता है, जो वसन्तऋतुमें खिलकर अपने आस-पासके सभी प्रदेशोंको शोभासम्पन्न बना देता है। यद्यपि उसका पुष्प रसका भण्डार होता है; तथापि मधुसे मोहित भ्रमर उसका परित्याग कर देते हैं—उससे दूर ही रहते हैं। वह फूल जिस नामसे पुकारा जाता है, उसे ही मेरा भी मनोहर नाम समझो। अच्छा, अब तुम इस संग्राममें अपने बाणोंद्वारा युद्ध करो; मुझे कोई भी जीत नहीं सकता। मैं अभी अपना अद्भुत पराक्रम दिखाता हूँ।
चम्पककी बात सुनकर पुष्कलका चित्त सन्तुष्ट हो गया। अब वे उसके ऊपर करोड़ों बाणोंकी वर्षा करने लगे। तब चम्पकने भी कुपित होकर अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और शत्रु-समुदायको विदीर्ण करनेवाले तीखे बाणोंको छोड़ना आरम्भ किया। किन्तु महावीर पुष्कलने उसके उन बाणोंको काट डाला। यह देख चम्पकने पुष्कलकी छातीमें प्रहार करनेके लिये सौ बाणोंका सन्धान किया; किन्तु पुष्कलने तुरंत ही उनके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले तथा अत्यन्त कोपमें भरकर बाणोंकी बौछार आरम्भ कर दी। बाणोंकी वह वर्षा अपने ऊपर आती देख चम्पकने 'साधु-साधु' कहकर पुष्कलकी प्रशंसा करते हुए उन्हें अच्छी तरह घायल किया। पुष्कल सब शस्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने चम्पकको महापराक्रमी जानकर अपने धनुषपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया। उधर चम्पक भी कुछ कम नहीं था, उसने भी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्वत्ता प्राप्त की थी। पुष्कलके छोड़े हुए अस्त्रको देखकर उसे शान्त करनेके लिये उसने भी ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग किया। दोनों अस्त्रोंके तेज जब एकत्रित हुए, तो लोगोंने समझा अब प्रलय हो जायगा। किन्तु जब शत्रु का अस्त्र अपने अस्त्रसे मिलकर एक हो गया तो चम्पकने पुनः उसे शान्त कर दिया।
चम्पकका वह अद्भुत कर्म देखकर पुष्कलने 'खड़ा रह, खड़ा रह' कहते हुए उसपर असंख्य बाणोंका प्रहार किया। किन्तु महामना चम्पकने पुष्कलके छोड़े हुए बाणोंकी परवा न करके उनके प्रति भयङ्कर बाण— रामास्त्रका प्रयोग किया। पुष्कल उसे काटनेका विचार कर रहे थे कि उस बाणने आकर उन्हें बाँध लिया। इस प्रकार वीरवर चम्पकने पुष्कलको बाँधकर अपने रथपर बिठा लिया। उनके बाँधे जानेपर सेनामें महान् हाहाकार मचा। समस्त योद्धा भागकर शत्रुघ्नके पास चले गये। उन्हें भागते देख शत्रुघ्नने हनुमान्जीसे पूछा—'मेरी सेना तो बहुतेरे वीरोंसे अलङ्कृत है; फिर किस वीरने उसे भगाया है।' तब हनुमान्जीने कहा—'राजन्! शत्रुवीरोंका दमन करनेवाला वीरवर चम्पक पुष्कलको बाँधकर लिये जा रहा है।' उनकी ऐसी बात सुनकर शत्रुघ्न क्रोधसे जल उठे और पवनकुमारसे बोले— 'आप शीघ्र ही पुष्कलको राजकुमारके बन्धनसे छुड़ाइये।' यह सुनकर हनुमान्जीने कहा—'बहुत अच्छा।' फिर वे पुष्कलको चम्पककी कैदसे मुक्त करनेके लिये चल दिये। हनुमान्जीको उन्हें छुड़ानेके लिये आते देख चम्पकको बड़ा क्रोध हुआ और उसने उनके ऊपर सैकड़ों-हजारों बाणोंका प्रहार किया। परन्तु उन्होंने शत्रुके छोड़े हुए समस्त सायकोंको चूर्ण कर डाला और एक शाल हाथमें लेकर राजकुमारपर दे मारा। चम्पक भी बड़ा बलवान् था। उसने हनुमान्जीके चलाये हुए शालको तिल-तिल करके काट डाला। तब हनुमान्जीने उसके ऊपर बहुत-सी शिलाएँ फेंकीं; परन्तु उन सबको भी उसने क्षणभरमें चूर्ण कर दिया। यह देख हनुमान्जीके हृदयमें बहुत क्रोध हुआ। वे यह सोचकर कि यह राजकुमार बहुत पराक्रमी है; उसके पास आये और उसे हाथसे पकड़कर आकाशमें उड़ गये। अब चम्पक आकाशमें ही खड़ा होकर हनुमान्जीसे युद्ध करने लगा। उसने बाहुयुद्ध करके कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीको बहुत चोट पहुँचायी। उसका बल देखकर हनुमान्जीने हँसते-हँसते पुनः उसका एक पैर पकड़ लिया और उसे सौ बार घुमाकर हाथीके हौदेपर पटक दिया। वहाँसे धरतीपर गिरकर वह बलवान् राजकुमार मूर्च्छित हो गया। उस समय चम्पकके अनुगामी सैनिक
५०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * । [संक्षिप्त पद्मपुराण
हाहाकार करके चीख उठे और हनुमान्जीने चम्पकके पाशमें बँधे हुए पुष्कलको छुड़ा लिया।
चम्पकको पृथ्वीपर पड़ा देख बलवान् राजा सुरथ पुत्रके दुःखसे व्याकुल हो उठे और रथपर सवार हो हनुमान्जीके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहा—'कपिश्रेष्ठ! तुम धन्य हो! तुम्हारा बल और पराक्रम महान् है; जिसके द्वारा राक्षसोंकी पुरी लङ्कामें तुमने श्रीरघुनाथजीके बड़े-बड़े कार्य सिद्ध किये हैं। निःसन्देह तुम श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके सेवक और भक्त हो। तुम्हारी वीरताके लिये क्या कहना है। तुमने मेरे बलवान् पुत्र चम्पकको रण-भूमिमें गिरा दिया है। कपीश्वर! अब तुम सावधान हो जाओ। मैं इस समय तुम्हें बाँधकर अपने नगरमें ले जाऊँगा। मैंने बिल्कुल सत्य कहा है।'
हनुमान्जीने कहा—राजन्! तुम श्रीरघुनाथजीके चरणोंका चिन्तन करनेवाले हो और मैं भी उन्हींका सेवक हूँ। यदि मुझे बाँध लोगे तो मेरे प्रभु बलपूर्वक तुम्हारे हाथसे छुटकारा दिलायेंगे। वीर! तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे पूर्ण करो। अपनी प्रतिज्ञा सत्य करो। वेद कहते हैं, जो श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करता है, उसे कभी दुःख नहीं होता।
शेषजी कहते हैं—उनके ऐसा कहनेपर राजा सुरथने पवनकुमारकी बड़ी प्रशंसा की और सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए भयंकर बाणोंद्वारा उन्हें अच्छी तरह घायल किया। वे बाण हनुमान्जीके शरीरसे रक्त निकाल रहे थे; तो भी उन्होंने उनकी परवा न की और राजाके धनुषको अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर तोड़ डाला। हनुमान्जीके द्वारा अपने धनुषको प्रत्यञ्चासहित टूटा हुआ देख राजाने दूसरा धनुष हाथमें लिया। किन्तु पवनकुमारने उसे भी छीनकर क्रोधपूर्वक तोड़ डाला। इस प्रकार उन्होंने राजाके अस्सी धनुष खण्डित कर दिये तथा क्षण-क्षणपर महान् रोषमें भरकर वे बारम्बार गर्जना करते थे। तब राजाके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने भयंकर शक्ति हाथमें ली। उस शक्तिसे आहत होकर हनुमान्जी गिर पड़े, किन्तु थोड़ी ही देरमें उठकर खड़े हो गये। फिर अत्यन्त क्रोधमें भर उन्होंने राजाका रथ पकड़ लिया और उसे लेकर बड़े वेगसे आकाशमें उड़ गये। ऊपर जाकर बहुत दूरसे उन्होंने रथको छोड़ दिया और वह रथ धरतीपर गिरकर क्षणभरमें चकनाचूर हो गया। राजा दूसरे रथपर जा चढ़े और बड़े वेगसे हनुमान्जीका सामना करनेके लिये आये। किन्तु क्रोधमें भरे हुए पवनकुमारने तुरंत ही उस रथको भी चौपट कर डाला। इस प्रकार उन्होंने राजाके उनचास रथ नष्ट कर दिये। उनका यह पराक्रम देखकर राजाके सैनिकों तथा स्वयं राजाको भी बड़ा विस्मय हुआ। वे कुपित होकर बोले—'वायुनन्दन! तुम धन्य हो! कोई भी पराक्रमी ऐसा कर्म न तो कर सकता है और न करेगा। अब तुम एक क्षणके लिये ठहर जाओ, जबतक कि मैं अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा रहा हूँ। तुम वायुदेवताके सुपुत्र श्रीरघुनाथजीके चरण-कमलोंके चञ्चरीक हो [अतः मेरी बात मान लो]!' ऐसा कहकर रोषमें भरे हुए राजा सुरथने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और भयङ्कर बाणमें पाशुपत अस्त्रका सन्धान किया। लोगोंने देखा हनुमान्जी पाशुपत अस्त्रसे बँध गये। किन्तु दूसरे ही क्षण उन्होंने मन-ही-मन भगवान् श्रीरामका स्मरण करके उस बन्धनको तोड़ डाला और सहसा मुक्त होकर वे राजासे युद्ध करने लगे। सुरथने जब उन्हें बन्धनसे मुक्त देखा तो महाबलवान् मानकर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया। परन्तु महावीर पवनकुमार उस अस्त्रको हँसते-हँसते निगल गये। यह देख राजाने श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया। उनका स्मरण करके उन्होंने अपने धनुषपर रामास्त्रका प्रयोग किया और हनुमान्जीसे कहा—'कपिश्रेष्ठ! अब तुम बँध गये।' हनुमान्जी बोले—'राजन्! क्या करूँ, तुमने मेरे स्वामीके अस्त्रसे ही मुझे बाँधा है, किसी दूसरे प्राकृत अस्त्रसे नहीं; अतः मैं उसका आदर करता हूँ। अब तुम मुझे अपने नगरमें ले चलो। मेरे प्रभु दयाके सागर हैं; वे स्वयं ही आकर मुझे छुड़ायेंगे।'
हनुमान्जीके बाँधे जानेपर पुष्कल कुपित हो
पातालखण्ड ] * युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्कलका बाँधा जाना तथा श्रीरामके आनेसे सबका छुटकारा * ५०९
राजाके सामने आये। उन्हें आते देख राजाने आठ बाणोंसे बींध डाला। यह देख बलवान् पुष्कलने राजापर कई हजार बाणोंका प्रहार किया। दोनों एक-दूसरेपर मन्त्र-पाठपूर्वक दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते और दोनों ही शान्त करनेवाले अस्त्रोंका प्रयोग करके एक-दूसरेके चलाये हुए अस्त्रोंका निवारण करते थे। इस प्रकार उन दोनोंमें बड़ा घमासान युद्ध हुआ, जो वीरोंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। तब राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने एक नाराचका प्रयोग किया। पुष्कल उसको काटना ही चाहते थे कि वह नाराच उनकी छातीमें आ लगा। वे महान् तेजस्वी थे, तो भी उसका आघात न सह सके, उन्हें मूर्च्छा आ गयी !
पुष्कलके गिर जानेपर शत्रुओंको ताप देनेवाले शत्रुघ्नको बड़ा क्रोध हुआ। वे रथपर बैठकर राजा सुरथके पास गये और उनसे कहने लगे—'राजन् ! तुमने यह बड़ा भारी पराक्रम कर दिखाया, जो पवनकुमार हनुमान्जीको बाँध लिया। अभी ठहरो, मेरे वीरोंको रण-भूमिमें गिराकर तुम कहाँ जा रहे हो। अब मेरे सायकोंकी मार सहन करो।' शत्रुघ्नका यह वीरोचित भाषण सुनकर बलवान् राजा सुरथ मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीके मनोहर चरण-कमलोंका चिन्तन करते हुए बोले—'वीरवर ! मैंने तुम्हारे पक्षके प्रधान वीर हनुमान् आदिको रणमें गिरा दिया; अब तुम्हें भी समराङ्गणमें सुलाऊँगा। श्रीरघुनाथजीका स्मरण करो, जो यहाँ आकर तुम्हारी रक्षा करेंगे; अन्यथा मेरे सामने युद्धमें आकर जीवनकी रक्षा असम्भव है।' ऐसा कहकर राजा सुरथने शत्रुघ्नको हजारों बाणोंसे घायल किया। उन्हें बाण-समूहोंकी बौछार करते देख शत्रुघ्नने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया। वे शत्रुके बाणोंको दग्ध करना चाहते थे। शत्रुघ्नके छोड़े हुए उस अस्त्रको राजा सुरथने वारुणास्त्रके द्वारा बुझा दिया और करोड़ों बाणोंसे उन्हें घायल किया। तब शत्रुघ्नने अपने धनुषपर मोहन नामक महान् अस्त्रका सन्धान किया। वह अद्भुत अस्त्र समस्त वीरोंको मोहित करके उन्हें निद्रामें निमग्न कर देनेवाला था। उसे देख राजाने भगवान्का स्मरण करते हुए कहा—'मैं श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके ही मोहित रहता हूँ, दूसरी कोई वस्तु मुझे मोहनेवाली नहीं जान पड़ती। माया भी मुझसे भय खाती है।' वीर राजाके ऐसा कहनेपर भी शत्रुघ्नने वह महान् अस्त्र उनके ऊपर छोड़ ही दिया। किन्तु राजा सुरथके बाणसे कटकर वह रण-भूमिमें गिर पड़ा। तदनन्तर, सुरथने अपने धनुषपर एक प्रज्वलित बाण चढ़ाया और शत्रुघ्नको लक्ष्य करके छोड़ दिया। शत्रुघ्नने अपने पास पहुँचनेसे पहले उसे मार्गमें ही काट दिया, तो भी उसका फलवाला अग्रिम भाग उनकी छातीमें धँस गया। उस बाणके आघातसे मूर्च्छित होकर शत्रुघ्न रथपर गिर पड़े; फिर तो सारी सेना हाहाकार करती हुई भाग चली। संग्राममें रामभक्त सुरथकी विजय हुई। उनके दस पुत्रोंने भी अपने साथ लड़नेवाले दस वीरोंको मूर्च्छित कर दिया था। वे रणभूमिमें ही कहीं पड़े हुए थे।
तदनन्तर, सुग्रीवने जब देखा कि सारी सेना भाग गयी और स्वामी भी मूर्च्छित होकर पड़े हैं, तो वे स्वयं ही राजा सुरथसे युद्ध करनेके लिये गये और बोले—'राजन् ! तुम हमारे पक्षके सब लोगोंको मूर्च्छित करके कहाँ चले जा रहे हो ? आओ और शीघ्र ही मेरे साथ युद्ध करो।' यों कहकर उन्होंने डालियोंसहित एक विशाल वृक्ष उखाड़ लिया और उसे बलपूर्वक राजाके मस्तकपर दे मारा। उसकी चोट खाकर महाबली नरेशने एक बार सुग्रीवकी ओर देखा और फिर अपने धनुषपर तीखे बाणोंका सन्धान करके अत्यन्त बल तथा पौरुषका परिचय देते हुए रोषमें भरकर उनकी छातीमें प्रहार किया। किन्तु सुग्रीवने हँसते-हँसते उनके चलाये हुए सभी बाणोंको नष्ट कर दिया। इसके बाद वे राजा सुरथको अपने नखोंसे विदीर्ण करते हुए पर्वतों, शिखरों, वृक्षों तथा हाथियोंको फेंक-फेंककर उन्हें चोट पहुँचाने लगे। तब सुरथने अपने भयङ्कर रामास्त्रसे सुग्रीवको भी तुरंत ही बाँध लिया। बन्धनमें पड़ जानेपर कपिराज सुग्रीवको यह विश्वास हो गया कि राजा सुरथ वास्तवमें श्रीरामचन्द्रजीके सच्चे सेवक हैं।
इस प्रकार महाराज सुरथने विजय प्राप्त की। वे
५१० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
शत्रुपक्षके सभी प्रधान वीरोंको रथपर बिठाकर अपने नगरमें ले गये। वहाँ जाकर वे राज-सभामें बैठे और बँधे हुए हनुमान्जीसे बोले—'पवनकुमार ! अब तुम भक्तोंकी रक्षा करनेवाले परमदयालु श्रीरघुनाथजीका स्मरण करो, जिससे सन्तुष्ट होकर वे तुम्हें तत्काल इस बन्धनसे मुक्त कर दें।' उनका कथन सुनकर हनुमान्जीने अपनेसहित समस्त वीरोंको बँधा देख रघुकुलमें अवतीर्ण, कमलके समान नेत्रोंवाले, परमदयालु सीतापत्ति श्रीरामचन्द्रजीका सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे स्मरण किया। वे मन-ही-मन कहने लगे—'हा नाथ ! हा पुरुषोत्तम !! हा दयालु सीतापते !!! [आप कहाँ हैं? मेरी दशापर दृष्टिपात करें] प्रभो ! आपका मुख स्वभावसे ही शोभासम्पन्न है, उसपर भी सुन्दर कुण्डलोंके कारण तो उसकी सुषमा और भी बढ़ गयी है। आप भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। मनोहर रूप धारण करते हैं। दयामय ! मुझे इस बन्धनसे शीघ्र मुक्त कीजिये; देर न लगाइये। आपने गजराज आदि भक्तोंको संकटसे बचाया है, दानव-वंशनरूपी अग्निकी ज्वालामें जलते हुए देवताओंकी रक्षा की है तथा दानवोंको मारकर उनकी पत्नियोंके मस्तककी केश-राशिको भी बन्धनसे मुक्त किया है [वे विधवा होनेके कारण कभी केश नहीं बाँधतीं]; करुणानिधे ! अब मेरी भी सुध लीजिये। नाथ ! बड़े-बड़े सम्राट् भी आपके चरणोंका पूजन करते हैं, इस समय आप यज्ञकर्ममें लगे हैं, मुनीश्वरोंके साथ धर्मका विचार कर रहे हैं और यहाँ मैं सुरथके द्वारा गाढ बन्धनमें बाँधा गया हूँ। महापुरुष ! देव ! शीघ्र आकर मुझे छुटकारा दीजिये। प्रभो ! सम्पूर्ण देवेश्वर भी आपके चरण-कमलोंकी अर्चना करते हैं। यदि इतने स्मरणके बाद भी आप हमलोगोंको इस बन्धनसे मुक्त नहीं करेंगे तो संसार खुश हो-होकर आपकी हँसी उड़ायेगा; इसलिये अब आप विलम्ब न कीजिये, हमें शीघ्र छुड़ाइये।'*
जगतके स्वामी कृपानिधान श्रीरघुवीरजीने हनुमान्जीकी प्रार्थना सुनी और अपने भक्तको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये वे तीव्रगामी पुष्पक विमानपर चढ़कर तुरंत चल दिये। हनुमान्जीने देखा, भगवान् आ गये। उनके पीछे लक्ष्मण और भरत हैं तथा साथमें मुनियोंका समुदाय शोभा पा रहा है। अपने स्वामीको आया देख हनुमान्जीने सुरथसे कहा—'राजन् ! देखो, भगवान् दया करके अपने भक्तको छुड़ानेके लिये आ गये। पूर्वकालमें जिस प्रकार इन्होंने स्मरण करनेमात्रसे पहुँचकर अनेक भक्तोंको संकटसे मुक्त किया है, उसी प्रकार आज बन्धनमें पड़े हुए मुझको भी छुड़ानेके लिये मेरे प्रभु आ पहुँचे।'
श्रीरामचन्द्रजी एक ही क्षणमें यहाँ आ पहुँचे, यह देखकर राजा सुरथ प्रेममग्न हो गये और उन्होंने भगवान्को सैकड़ों बार प्रणाम किया। श्रीरामने भी चतुर्भुज रूप धारणकर अपने भक्त सुरथको भुजाओंमें
* इत्युक्तमाकर्ण्य समीरजस्तदा सुबद्धमात्मानमवेक्ष्य वीरान्। संमूर्च्छिताञ्शत्रुशराविघातपीडायुतान् बन्धनमुक्तयेऽस्मरत् ॥
श्रीरामचन्द्रं रघुवंशजातं सीतापत्तिं पङ्कजपत्रनेत्रम्। स्वमुक्तये बन्धनतः कृपालुं सस्मार सर्वैः करणैर्विशोकैः ॥
हनुमानुवाच—
हा नाथ हा नरवरोत्तम हा दयालो सीतापते रुचिरकुण्डलशोभिवक्त्र।
भक्तार्तिदाहक मनोहररूपधारिन् मां बन्धनात् सपदि मोचय मा विलम्बम् ॥
संमोचितास्तु भवता गजपुङ्गवाद्या देवाश्च दानवकुलाग्निसुदह्यमानाः।
तत्सुन्दरीशिरसि संस्थितकेशबन्धसंमोचितासि करुणालय मां स्मरस्व ॥
त्वं यागकर्मनिरतोऽसि मुनीश्वरैर्द्धर्मं विचारयसि भूमिपतीड्यपाद।
अत्राहमद्य सुरथेन विगाढपाशबद्धोऽस्मि मोचय महापुरुषाशु देव ॥
नो मोचयस्यथ यदि स्मरणातिरेकात्त्वं सर्वदेववरपूजितपादपद्म।
लोको भवन्तमित्थमुल्लसितो हसिष्यत्तस्माद् विलम्बमिह मा चर मोचयाशु ॥
(५३। १२—१७)
१२३-वाल्मीकिके आश्रमपर लवद्वारा घोड़ेका बँधना और अश्व-रक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना
पातालखण्ड ] वाल्मीकि-आश्रमपर लवद्वारा घोड़ेका बँधना और अश्वरक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना * ५११
कसकर छातीसे लगा लिया और आनन्दके आँसुओंसे उनका मस्तक भिगोते हुए कहा—'राजन् ! तुम धन्य हो। आज तुमने बड़ा भारी पराक्रम कर दिखाया। कपिराज हनुमान् सबसे बढ़कर बलवान् हैं, किन्तु इनको भी तुमने बाँध लिया।' यह कहकर श्रीरघुनाथजीने वानरश्रेष्ठ हनुमान्को बन्धनसे मुक्त किया तथा जितने योद्धा मूर्च्छित पड़े थे, उन सबपर अपनी दयादृष्टि डालकर उन्हें जीवित कर दिया। असुरोंका विनाश करनेवाले श्रीरामकी दृष्टि पड़ते ही वे सब मूर्च्छा त्याग कर उठ खड़े हुए और मनोहर रूपधारी श्रीरघुनाथजीकी झाँकी करके उनके चरणोंमें पड़ गये। भगवान्ने उनसे कुशल पूछी तो वे सुखी होकर बोले—'भगवन् ! आपकी कृपासे सब कुशल है।' राजा सुरथने सेवकपर कृपा करनेके लिये आये हुए श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करके उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा राज्य समर्पित कर दिया और कहा—'रघुनन्दन ! मैंने आपके साथ अन्याय किया है, उसे क्षमा कीजिये।'
श्रीराम बोले—राजन् ! क्षत्रियोंका यह धर्म ही है। उन्हें स्वामीके साथ भी युद्ध करना पड़ता है। तुमने संग्राममें समस्त वीरोंको सन्तुष्ट करके बड़ा उत्तम कार्य किया।
भगवान्के ऐसा कहनेपर राजा सुरथने अपने पुत्रोंके साथ उनका पूजन किया। तदनन्तर, श्रीरामचन्द्रजी तीन दिनतक वहाँ ठहरे रहे। चौथे दिन राजाकी अनुमति लेकर वे इच्छानुसार चलनेवाले पुष्पक विमानद्वारा वहाँसे चले गये। उनका दर्शन करके सबको बड़ा विस्मय हुआ और सब लोग उनकी मनोहारिणी कथाएँ कहने-सुनने लगे। इसके बाद महाबली राजा सुरथने चम्पकको अपने नगरके राज्यपर स्थापित कर दिया और स्वयं शत्रुघ्नके साथ जानेका विचार किया। शत्रुघ्नने अपना अश्व पाकर भेरी बजवायी। तथा सब ओर नाना प्रकारके शङ्खोंकी ध्वनि करायी। तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको आगे जानेके लिये छोड़ा और स्वयं राजा सुरथके साथ अनेकों देशोंमें भ्रमण करते रहे, किन्तु कहीं किसी भी बलवान्ने घोड़ेको नहीं पकड़ा।
वाल्मीकिके आश्रमपर लवद्वारा घोड़ेका बँधना और अश्वरक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना
शेषजी कहते हैं—एक दिन प्रातःकाल वह अश्व गङ्गाके किनारे महर्षि वाल्मीकिके श्रेष्ठ आश्रमपर जा पहुँचा, जहाँ अनेकों ऋषि-मुनि निवास करते थे और अग्निहोत्रका धुँआ उठ रहा था। जानकीजीके पुत्र लव अन्य मुनिकुमारोंके साथ प्रातःकालीन हवन-कर्म करनेके उद्देश्यसे उसके योग्य समिधाएँ लानेके लिये वनमें गये थे। वहाँ सुवर्णपत्रसे चिह्नित उस यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको उन्होंने देखा, जो कुङ्कुम, अगरु और कस्तूरीकी दिव्य गन्धसे सुवासित था। उसे देखकर उनके मनमें कौतूहल पैदा हुआ और वे मुनिकुमारोंसे बोले—'यह मनके समान शीघ्रगामी अश्व किसका है, जो दैवात् मेरे आश्रमपर आ पहुँचा है? तुम सब लोग
५१२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मेरे साथ चलकर इसे देखो, डरना नहीं।' यह कहकर लव तुरंत ही घोड़ेके समीप गये। रघुकुलमें उत्पन्न कुमार लव कंधेपर धनुष-बाण धारण किये उस घोड़ेके समीप ऐसे सुशोभित हुए मानो दुर्जय वीर जयन्त दिखायी दे रहा हो। घोड़ेके ललाटमें जो पत्र बँधा था, उसमें सुस्पष्ट वर्णमालाओंद्वारा कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं; जिनसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। लवने पहुँचकर मुनि-पुत्रोंके साथ वह पत्र पढ़ा। पढ़ते ही उन्हें क्रोध आ गया और वे हाथमें धनुष लेकर ऋषिकुमारोंसे बोले, उस समय रोषके कारण उनकी वाणी स्पष्ट नहीं निकल पाती थी। उन्होंने कहा—'अरे ! इस क्षत्रियकी धृष्टता तो देखो, जो इस घोड़ेके भाल-पत्रपर इसने अपने प्रताप और बलका उल्लेख किया है। राम क्या हैं, शत्रुघ्नकी क्या हस्ती है ? क्या ये ही लोग क्षत्रियके कुलमें उत्पन्न हुए हैं ? हमलोग श्रेष्ठ क्षत्रिय नहीं हैं?' इस प्रकारकी बहुत-सी बातें कहकर लवने उस घोड़ेको पकड़ लिया और समस्त राजाओंको तिनकेके समान समझकर हाथमें धनुष-बाण ले वे युद्धके लिये तैयार हो गये। मुनिपुत्रोंने देखा कि लव घोड़ेका अपहरण करना चाहते हैं, तो वे उनसे बोले—'कुमार ! हम तुम्हें हितकी बात बता रहे हैं, सुनो, अयोध्याके राजा श्रीराम बड़े बलवान् और पराक्रमी हैं। अपने बलका घमंड रखनेवाले इन्द्र भी उनका घोड़ा नहीं छू सकते [फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है ?]; अतः तुम इस अश्वको न पकड़ो।'
यह सुनकर लवने कहा—'तुमलोग ब्राह्मण-बालक हो; क्षत्रियोंका बल क्या जानो। क्षत्रिय अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध होते हैं, किन्तु ब्राह्मणलोग केवल भोजनमें ही पटु हुआ करते हैं। इसलिये तुमलोग घर जाकर माताका परोसा हुआ पक्वान्न उड़ाओ!' लवके ऐसा कहनेपर मुनिकुमार चुप हो रहे और उनका पराक्रम देखनेके लिये दूर जाकर खड़े हो गये। तदनन्तर, राजा शत्रुघ्नके सेवक वहाँ आये और घोड़ेको बँधा देखकर लवसे बोले—'अहो ! किसने इस घोड़ेको यहाँ बाँध रखा है ? किसके ऊपर आज यमराज कुपित हुए हैं ? लवने तुरंत उत्तर दिया—'मैंने इस उत्तम अश्वको बाँध रखा है, जो इसे छुड़ाने आयेगा, उसके ऊपर मेरे बड़े भाई कुश शीघ्र ही क्रोध करेंगे। यमराज भी आ जायँ तो क्या कर लेंगे ? हमारे बाणोंकी बौछारसे सन्तुष्ट होकर स्वयं ही माथा टेक देंगे और तुरंत अपनी राह लेंगे।'
लवकी बात सुनकर सेवकोंने आपसमें कहा—'यह बेचारा बालक है ! [इसकी बातपर ध्यान नहीं देना चाहिये]।' तत्पश्चात् वे बँधे हुए घोड़ेको खोलनेके लिये आगे बढ़े। यह देख लवने दोनों हाथोंमें धनुष धारणकर शत्रुघ्नके सेवकोंपर क्षुरप्रोंका प्रहार आरम्भ किया। इससे उनकी भुजाएँ कट गयीं और वे शोकसे व्याकुल होकर शत्रुघ्नके पास गये। पूछनेपर सबने लवके द्वारा अपनी बाँहें काटी जानेका समाचार कह सुनाया।
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१२४-गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर श्रीरामका भरतके प्रति सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश और भरतकी मूर्च्छा
पातालखण्ड ] * गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश * ५१३
गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर श्रीरामका भरतके प्रति सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश और भरतकी मूर्छा
**वात्स्यायनजी बोले—**भगवन् ! पहले आप बता चुके हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने एक धोबीके निन्दा करनेपर सीताको अकेली वनमें छोड़ दिया; फिर कहाँ उनके पुत्र हुए, कहाँ उन्हें धनुष-धारणकी क्षमता प्राप्त हुई तथा कहाँ उन्होंने अस्त्रविद्याकी शिक्षा पायी, जिससे वे श्रीरामचन्द्रजीके अश्वका अपहरण कर सके ?
**शेषजीने कहा—**मुने ! श्रीरामचन्द्रजी धर्मपूर्वक सारी पृथ्वीका पालन करते हुए अपनी धर्मपत्नी महारानी सीता और भाइयोंके साथ अयोध्याका राज्य करने लगे। इसी बीचमें सीताजीने गर्भ धारण किया। धीरे-धीरे पाँच महीने बीत गये। एक दिन श्रीरामने सीताजीसे पूछा—'देवि ! इस समय तुम्हारे मनमें किस बातकी अभिलाषा है, बताओ; मैं उसे पूर्ण करूँगा।'
**सीताजीने कहा—**प्राणनाथ ! आपकी कृपासे मैंने सभी उत्तम भोग भोगे हैं और भविष्यमें भी भोगती रहूँगी। इस समय मेरे मनमें किसी विषयकी इच्छा शेष नहीं है। जिस स्त्रीको आप-जैसे स्वामी मिलें, जिनके चरणोंकी देवता भी स्तुति करते हैं; उसको सभी कुछ प्राप्त है, कुछ भी बाकी नहीं है। फिर भी यदि आप आग्रहपूर्वक मुझसे मेरे मनकी अभिलाषा पूछ रहे हैं तो मैं आपके सामने सच्ची बात कहती हूँ, नाथ ! बहुत दिन हुए, मैंने लोपामुद्रा आदि पतिव्रताओंके दर्शन नहीं किये। मेरा मन इस समय उन्हींको देखनेके लिये उत्कण्ठित है। वे सब तपस्याकी भंडार हैं, मैं वहाँ जाकर वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करूँगी और उन्हें चमकीले रत्न तथा आभूषण भेंट दूँगी; यही मेरा मनोरथ है। प्रियतम ! इसे पूर्ण कीजिये।
इस प्रकार सीताजीके मनोहर वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे अपनी प्रियतमासे बोले—'जनककिशोरी ! तुम धन्य हो ! कल प्रातःकाल जाना और उन तपस्विनी स्त्रियोंका दर्शन करके कृतार्थ होना।' श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर सीताजीको बड़ा हर्ष हुआ। वे सोचने लगीं, कल प्रातःकाल मुझे तपस्विनी देवियोंके दर्शन होंगे। तदनन्तर, उस रातमें श्रीरामचन्द्रजीके भेजे हुए गुप्तचर नगरमें गये, उन्हें भेजनेका उद्देश्य यह था कि वे लोग घर-घर जाकर महाराजकी कीर्ति सुनें और देखें [जिससे उनके प्रति लोगोंके मनमें क्या भाव हैं, इसका पता लग सके]। वे दूत आधी रातके समय चुपकेसे गये। उन्हें प्रतिदिन श्रीरामचन्द्रजीकी मनोहर कथाएँ सुननेको मिलती थीं। उस दिन वे एक धनाढ्यके विशाल भवनमें प्रविष्ट हुए और थोड़ी देरतक वहाँ रुककर श्रीरामचन्द्रजीके सुयशका श्रवण करने लगे। वहाँ सुन्दर नेत्रोंवाली कोई युवती बड़े हर्षमें भरकर अपने नन्हे-से शिशुको दूध पिला रही थी। उसने बालकको लक्ष्य करके बड़ी मनोहर बात कही—'बेटा ! तू जी भरकर मेरा मीठा दूध पी ले, पीछे यह तेरे लिये दुर्लभ हो जायगा। नील कमल-दलके समान श्याम वर्णवाले
५९४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
श्रीरामचन्द्रजी इस अयोध्यापुरीके स्वामी हैं; उनके नगरमें निवास करनेवाले लोगोंका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होगा। जन्म न होनेपर यहाँ दूध पीनेका अवसर कैसे मिलेगा। इसलिये मेरे लाल ! तू इस दुर्लभ दूधका बारम्बार पान कर ले। जो लोग श्रीरामका भजन, ध्यान और कीर्तन करेंगे, उन्हें भी कभी माताका दूध सुलभ न होगा।' इस तरह श्रीरामचन्द्रजीके यशरूपी अमृतसे भरे हुए वचन सुनकर वे गुप्तचर बहुत प्रसन्न हुए और दूसरे किसी भाग्यशाली पुरुषके घरमें गये। वे पृथक्-पृथक् विभिन्न घरोंमें जाकर श्रीरामके यशका श्रवण करते थे। एक घरकी बात है, एक गुप्तचर श्रीरघुनाथजीका यश सुननेकी इच्छासे वहाँ आया और क्षणभर रुका रहा। उस घरकी एक सुन्दरी नारी, जिसके नेत्र बड़े मनोहर थे, पलँगपर बैठे हुए कामदेवके समान सुन्दर अपने पतिकी ओर देखकर बोली—'नाथ ! आप मुझे ऐसे लगते हैं, मानो साक्षात् श्रीरघुनाथजी हों।' प्रियतमाके ये मनोहर वचन सुनकर उसके पतिने कहा—'प्रिये ! मेरी बात सुनो, तुम साध्वी हो; अतः तुमने जो कुछ कहा है, वह मनको बहुत ही प्रिय लगनेवाला है। पतिव्रताओंके योग्य ही यह बात है। सती नारीके लिये उसका पति श्रीरघुनाथजीका ही स्वरूप है; परन्तु कहाँ मेरे-जैसा मन्दभाग्य और कहाँ महाभाग्यशाली श्रीराम। कहाँ कीड़ेकी-सी हस्ती रखनेवाला मैं एक तुच्छ जीव और कहाँ ब्रह्मादि देवताओंसे भी पूजित परमात्मा श्रीराम। कहाँ जुगनू और कहाँ सूर्य ? कहाँ पामर पतिंगा और कहाँ गरुड़। कहाँ बुरे रास्तेसे बहनेवाला गलियोंका गँदला पानी और कहाँ भगवती भागीरथीका पावन जल। इसी प्रकार कहाँ मैं और कहाँ भगवान् श्रीराम, जिनके चरणोंकी धूलि पड़नेसे शिलामयी अहल्या क्षणभरमें भुवन-मोहन सौन्दर्यसे युक्त युवती बन गयी !'
इसी समय दूसरा गुप्तचर दूसरेके घरमें कुछ और ही बातें सुन रहा था। वहाँ कोई कामिनी पलँग-पर बैठकर वीणा बजाती हुई अपने पतिके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्तिका गान कर रही थी—'स्वामिन् ! हमलोग धन्य हैं, जिनके नगरके स्वामी साक्षात् भगवान् श्रीराम हैं, जो अपनी प्रजाको पुत्रोंकी भाँति पालते और उसके योगक्षेमकी व्यवस्था करते हैं। उन्होंने बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं, जो दूसरोंके लिये
पाताळखण्ड ] * गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश * ५१५
असाध्य हैं। उदाहरणके लिये—'उन्होंने समुद्रको वशमें किया और उसपर पुल बाँधा। फिर वानरोंसे लङ्कापुरीका विध्वंस कराया और अपने शत्रु रावणको मारकर वे जानकीजीको यहाँ ले आये। इस प्रकार श्रीरामने महापुरुषोंके आचारका पालन किया है।' पत्नीके ये मधुर वचन सुनकर पति मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले—'मुग्धे रावणको मारना और समुद्रका दमन आदि जितने कार्य हैं, वे श्रीरामचन्द्रजीके लिये कोई महान् कर्म नहीं हैं। महान् परमेश्वर ही ब्रह्मा आदिकी प्रार्थनासे लीलापूर्वक इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं और बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाले उत्तम चरित्रका विस्तार करते हैं। कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीरामको तुम मनुष्य न समझो। वे ही इस जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। केवल लीला करनेके लिये ही उन्होंने मनुष्य-विग्रह धारण किया है। हमलोग धन्य हैं, जो प्रतिदिन श्रीरामके मुख-कमलका दर्शन करते हैं, जो ब्रह्मादि देवोंके लिये भी दुर्लभ है। हमें यह सौभाग्य प्राप्त है, इसलिये हम बड़े पुण्यात्मा हैं।' गुप्तचरने दरवाजेपर खड़े होकर इस प्रकारकी बहुत-सी बातें सुनीं।
इसके सिवा, एक अन्य गुप्तचर अपने सामने धोबीका घर देखकर वहीं महाराज श्रीरामका यश सुननेकी इच्छासे गया। किन्तु उस घरका स्वामी धोबी क्रोधमें भरा था। उसकी पत्नी दूसरेके घरमें दिनका अधिक समय व्यतीत करके आयी थी। उसने आँखें लाल-लाल करके पत्नीको धिक्कारा और उसे लात मारकर कहा—'निकल जा मेरे घरसे; जिसके यहाँ सारा दिन बिताया है, उसीके घर चली जा। तू दुष्टा है, पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाली है; इसलिये मैं तुझे नहीं रखूँगा।' उस समय उसकी माताने कहा—'बेटा ! बहू घरमें आ गयी है, इस बेचारीका त्याग मत करो। यह सर्वथा निरपराध है; इसने कोई कुकर्म नहीं किया है।' धोबी क्रोधमें तो था ही, उसने माताको जवाब दिया—'मैं राम-जैसा नहीं हूँ, जो दूसरेके घरमें रही हुई प्यारी पत्नीको फिरसे ग्रहण कर लूँ। वे राजा हैं; जो कुछ भी करेंगे, सब न्याययुक्त ही माना जायगा। मैं तो दूसरेके घरमें निवास करनेवाली भार्याको कदापि नहीं ग्रहण कर सकता।' धोबीकी बात सुनकर गुप्तचरको बड़ा क्रोध हुआ और उसने तलवार हाथमें लेकर उसे मार डालनेका विचार किया। परन्तु सहसा उसे श्रीरामचन्द्रजीके आदेशका स्मरण हो आया। उन्होंने आज्ञा दी थी, 'मेरी किसी भी प्रजाको प्राणदण्ड न देना।' इस बातको समझकर उसने अपना क्रोध शान्त कर लिया। उस समय रजककी बातें सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था, वह कुपित हो बारम्बार उच्छ्वास खींचता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ उसके साथी अन्य गुप्तचर मौजूद थे। वे सब आपसमें मिले और सबने एक-दूसरेको अपना सुना हुआ श्रीरामचन्द्रजीका विश्ववन्दित चरित्र सुनाया। अन्तमें उस धोबीकी बात सुनकर उन्होंने आपसमें सलाह की और यह निश्चय किया कि दुष्टोंकी कही हुई बातें श्रीरघुनाथजीसे नहीं कहनी चाहिये। ऐसा विचार करके वे घरपर जाकर सो रहे। उन्होंने अपनी बुद्धिसे यह स्थिर किया था कि कल प्रातःकाल महाराजसे यह समाचार कहा जायगा।
शेषजी कहते हैं— श्रीरघुनाथजीने प्रातःकाल
५१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
नित्यकर्मसे निवृत्त होकर वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सुवर्णदानसे संतुष्ट किया। उसके बाद वे राजसभामें गये। श्रीरामचन्द्रजी सारी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे। अतः सब लोग उनको प्रणाम करनेके लिये वहाँ गये। लक्ष्मणने राजाके मस्तकपर छत्र लगाया और भरत-शत्रुघ्नने दो चँवर धारण किये। वसिष्ठ आदि महर्षि तथा सुमन्त्र आदि न्यायकर्ता मन्त्री भी वहाँ उपस्थित हो भगवान्की उपासना करने लगे।
इसी समय वे गुप्तचर अच्छी तरह सज-धजकर सभामें बैठे हुए महाराजको नमस्कार करनेके लिये आये। उत्तम बुद्धिवाले महाराज श्रीरामने [सभा-विसर्जनके पश्चात्] उन सभी गुप्तचरोंको एकान्तमें बुलाकर पूछा—'तुमलोग सच-सच बताओ। नगरके लोग मेरे विषयमें क्या कहते हैं? मेरी धर्मपत्नीके विषयमें उनकी कैसी धारणा है? तथा मेरे मन्त्रियोंका बर्ताव वे लोग कैसा बतलाते हैं?'
गुप्तचर बोले—नाथ! आपकी कीर्ति इस भूमण्डलके सब लोगोंको पवित्र कर रही है। हमलोगोंने घर-घरमें प्रत्येक पुरुष और स्त्रीके मुखसे आपके यशका बखान सुना है। राजा सगर आदि आपके अनेकानेक पूर्वज अपने मनोरथको सिद्ध करके कृतार्थ हो चुके हैं; किन्तु उनकी भी ऐसी कीर्ति नहीं छायी थी, जैसी इस समय आपकी है। आप-जैसे स्वामीको पाकर सारी प्रजा कृतार्थ हो रही है। उन्हें न तो अकाल-मृत्युका कष्ट है और न रोग आदिका भय। आपकी विस्तृत कीर्ति सुनकर ब्रह्मादि देवताओंको बड़ी लज्जा होती है [क्योंकि आपके सुयशसे उनका यश फीका पड़ गया है]। इस प्रकार आपकी कीर्ति सर्वत्र फैलकर इस समय जगत्के सब लोगोंको पावन बना रही है। महाराज! हम सभी गुप्तचर धन्य हैं कि क्षण-क्षणमें आपकी मनोहर मुखका अवलोकन करते हैं।
उन गुप्तचरोंके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर श्रीरघुनाथजीने अन्तमें एक दूसरे दूतपर दृष्टि डाली; उसके मुखकी आभा कुछ और ढंगकी हो रही थी। उन्होंने पूछा—'महामते! तुम सच-सच बताओ। लोगोंके मुखसे जो कुछ जैसा भी सुना हो, वह ज्यों-का-त्यों सुना दो; अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा।'
गुप्तचरने कहा—स्वामिन्! राक्षसोंके वध आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली आपकी सभी कथाओंका सर्वत्र गान हो रहा है—केवल एक बातको छोड़कर। आपकी धर्मपत्नीने जो राक्षसके घरमें कुछ कालतक निवास किया था, उसके सम्बन्धमें लोगोंका अच्छा भाव नहीं है। गत आधी रातकी बात है—एक धोबीने अपनी पत्नीको, जो दिनमें कुछ देरतक दूसरेके घरमें रहकर आयी थी, धिक्कारा और मारा। यह देखकर उसकी माता बोली—'बेटा! यह बेचारी निरपराध है, इसे क्यों मारते हो? तुम्हारी स्त्री है, रख लो; निन्दा न करो, मेरी बात मानो।' तब धोबी कहने लगा—'मैं राजा राम नहीं हूँ कि इसे रख लूँ। उन्होंने राक्षसके घरमें रही हुई सीताको फिरसे ग्रहण कर लिया, मैं ऐसा नहीं कर सकता। राजा समर्थ होता है, उसका किया हुआ सारा काम न्याययुक्त ही माना जाता है। दूसरे लोग पुण्यात्मा हों, तो भी उनका कार्य अन्याययुक्त ही समझ लिया जाता है।' उसने बारंबार इस बातको दोहराया कि 'मैं राजा राम नहीं हूँ।'
पातालखण्ड ] * गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश * ५१७
उस समय मुझे बड़ा क्रोध हुआ, किन्तु सहसा आपका आदेश स्मरण हो आया [इसलिये मैं उसे दण्ड न दे सका]; अब यदि आप आज्ञा दें तो मैं उसे मार गिराऊँ। यह बात न कहनेयोग्य और न्यायके विपरीत थी, तो भी मैंने आपके आग्रहसे कह डाली है। अब इस विषयमें महाराज ही निर्णायक हैं; जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करें।
गुप्तचरका यह वाक्य, जिसका एक-एक अक्षर महाभयानक वज्रके समान मर्मपर आघात करनेवाला था, सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बारम्बार उच्छ्वास खींचते हुए उन सब दूतोंसे बोले—'अब तुमलोग जाओ और भरतको मेरे पास भेज दो।' वे दूत दुःखी होकर तुरंत ही भरतजीके भवनमें गये और वहाँ उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीका संदेश कह सुनाया। श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनकर बुद्धिमान् भरतजी बड़ी उतावलीके साथ राजसभामें गये और वहाँ द्वारपालसे बोले—'मेरे भ्राता कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी कहाँ हैं?' द्वारपालने एक रत्ननिर्मित मनोहर गृहकी ओर संकेत किया। भरतजी वहाँ जा पहुँचे। श्रीरामचन्द्रजीको विकल देखकर उनके मनमें बड़ा भय हुआ। उन्होंने महाराजसे कहा—'स्वामिन्! सुखसे आराधनाके योग्य आपका यह सुन्दर मुख इस समय नीचेकी ओर क्यों झुका हुआ है? यह आँसुओंसे भींगा कैसे दिखायी दे रहा है? मुझे इसका पूरा-पूरा यथार्थ कारण बताइये और आज्ञा दीजिये, मैं क्या करूँ?' भाई भरतने जब गद्गद वाणीसे इस प्रकार कहा, तब धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी बोले—'प्रिय बन्धु! इस पृथ्वीपर उन्हीं मनुष्योंका जीवन उत्तम है, जिनके सुयशका विस्तार हो रहा हो। अपकीर्तिके मारे हुए मनुष्योंका जीवन तो मरे हुएके ही समान है। आज सम्पूर्ण संसारमें विस्तृत मेरी कीर्तिमयी गङ्गा कलुषित हो गयी। इस नगरमें रहनेवाले एक धोबीने आज जानकीजीके सम्बन्धको लेकर कुछ निन्दाकी बात कह डाली है; इसलिये भाई! बताओ, अब मैं क्या करूँ? क्या आज अपने शरीरको त्याग दूँ या अपनी धर्मपत्नी जानकीका ही परित्याग कर दूँ? दोनोंके लिये मुझे क्या करना चाहिये, इस बातको ठीक-ठीक बताओ।'
भरतजीने पूछा— आर्य! कौन है यह धोबी तथा इसने कौन-सी निन्दाकी बात कही है?
तब श्रीरामचन्द्रजीने धोबीके मुँहसे निकली हुई सारी बातें, जो दूतके द्वारा सुनी थीं, महात्मा भरतसे कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भरतने दुःख और शोकमें पड़े हुए भाई श्रीरामसे कहा—'वीरोंद्वारा सुपूजित जानकीदेवी लङ्कामें अग्नि-परीक्षाद्वारा शुद्ध प्रमाणित हो चुकी हैं। ब्रह्माजीने भी इन्हें शुद्ध बतलाया है तथा पूज्य पिता स्वर्गीय महाराज दशरथजीने भी इस बातका समर्थन किया है। यह सब होते हुए भी केवल एक धोबीके कहनेसे विश्ववन्दित सीताका परित्याग कैसे किया जा सकता है? ब्रह्मादि देवताओंने भी आपकी कीर्तिका गान किया है, वह इस समय सारे जगत्को पवित्र कर रही है। ऐसी पावन कीर्ति आज केवल एक धोबीके कहनेसे कलुषित या कलङ्कित कैसे हो जायगी? भला, आप अपने इस कल्याणमय विग्रहका परित्याग क्यों करना चाहते हैं। आप ही हमारे दुःखोंको दूर करनेवाले हैं। आपके बिना तो हम सब लोग आज ही मर जायेंगे।
१२५-सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
५१८ । * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * । [ संक्षिप्त पद्मपुराण
महान् अभ्युदयसे शोभा पानेवाली सीताजी तो आपके बिना क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकतीं। इसलिये मेरा अनुरोध तो यही है कि आप पतिव्रता श्रीसीताके साथ रहकर इस विशाल राज्य-लक्ष्मीकी रक्षा कीजिये।'
भरतके ये वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ, परम धार्मिक श्रीरघुनाथजी इस प्रकार बोले—'भाई ! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह धर्मसम्मत और युक्तियुक्त है। परन्तु इस समय मैं जो बात कह रहा हूँ, उसीको मेरी आज्ञा मानकर करो। मैं जानता हूँ मेरी सीता अग्निद्वारा शुद्ध, पवित्र और लोकपूजित है, तथापि मैं लोकापवादके कारण आज उसका त्याग करता हूँ। इसलिये तुम जनककिशोरीको वनमें ले जाकर छोड़ आओ।' श्रीरामका यह आदेश सुनते ही भरतजी मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
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सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
</div>**वात्स्यायनजीने पूछा—**स्वामिन् ! जिनकी उत्तम कीर्ति सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेवाली है, उन्हीं जानकीदेवीके प्रति उस धोबीने निन्दायुक्त वचन क्यों कहे? इसका रहस्य बतलाइये।
**शेषजीने कहा—**मिथिला नामकी महापुरीमें महाराज जनक राज्य करते थे। उनका नाम था सीरध्वज। एक बार वे यज्ञके लिये पृथ्वी जोत रहे थे। उस समय चौड़े मुँहवाली सीता (फालके धँसनेसे बनी हुई गहरी रेखा) के द्वारा एक कुमारी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ, जो रतिसे भी बढ़कर सुन्दर थी। इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भुवनमोहिनी शोभासे सम्पन्न उस कन्याका नाम सीता रख दिया। परम सुन्दरी सीता एक दिन सखियोंके साथ उद्यानमें खेल रही थीं। वहाँ उन्हें शुक पक्षीका एक जोड़ा दिखायी दिया, जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक पर्वतकी चोटीपर बैठकर इस प्रकार बोल रहे थे—'पृथ्वीपर श्रीराम नामसे प्रसिद्ध एक बड़े सुन्दर राजा होंगे। उनकी महारानी सीताके नामसे विख्यात होंगी। श्रीरामचन्द्रजी
पातालखण्ड ] * सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * ५१९
बड़े बुद्धिमान् और बलवान् होंगे तथा समस्त राजाओंको अपने वशमें रखते हुए सीताके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकीदेवी और धन्य हैं श्रीराम, जो एक-दूसरेको प्राप्त होकर इस पृथ्वीपर आनन्दपूर्वक विहार करेंगे।'
तोतेके उस जोड़ेको ऐसी बातें करते देख सीताने सोचा कि 'ये दोनों मेरे ही जीवनकी मनोहर कथा कह रहे हैं इन्हें पकड़कर सभी बातें पूछूँ।' ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियोंसे कहा, 'यह पक्षियोंका जोड़ा बहुत सुन्दर है, तुमलोग चुपकेसे जाकर इसे पकड़ लाओ।' सखियाँ उस पर्वतपर गयीं और दोनों सुन्दर पक्षियोंको पकड़ लायीं। लाकर उन्होंने सीताको अर्पण कर दिया। सीता उन पक्षियोंसे बोलीं— 'तुम दोनों बड़े सुन्दर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? राम कौन हैं ? और सीता कौन हैं ? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई ? इस सारी बातोंको जल्दी-जल्दी बताओ। मेरी ओरसे तुम्हें भय नहीं होना चाहिये।' सीताके इस प्रकार पूछनेपर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे— 'देवि ! वाल्मीकि नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़े महर्षि हैं, जो धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। हम दोनों उन्हींके आश्रममें रहते हैं। महर्षिने रामायण नामका एक ग्रन्थ बनाया है, जो सदा ही मनको प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्योंको उस रामायणका अध्ययन कराया है। तथा प्रतिदिन वे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहकर उस रामायणके पद्योंका चिन्तन किया करते हैं। रामायणका कलेवर बहुत बड़ा है। हमलोगोंने उसे पूरा-पूरा सुना है। बारम्बार उसका गान और पाठ सुननेसे हमें भी उसका अभ्यास हो गया है। राम और जानकी कौन हैं, इस बातको हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि श्रीरामके साथ क्रीडा करनेवाली जानकीके विषयमें क्या-क्या बातें होनेवाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो। 'महर्षि ऋष्यशृङ्गके द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञके प्रभावसे भगवान् विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवाङ्गनाएँ भी उनकी उत्तम कथाका गान करेंगी। श्रीमान् राम महर्षि विश्वामित्रके साथ भाई लक्ष्मणसहित हाथमें धनुष लिये मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ एक ऐसे धनुषको, जिसका धारण करना दूसरोंके लिये कठिन है, देखकर वे उसे तोड़ डालेंगे और अत्यन्त मनोहर रूपवाली जनककिशोरी सीताको अपनी धर्म-पत्नीके रूपमें ग्रहण करेंगे। फिर उन्हींके साथ श्रीरामचन्द्रजी अपने विशाल साम्राज्यका पालन करेंगे।' ये तथा और भी बहुत-सी बातें वहाँ रहते समय हमारे सुननेमें आयी हैं। सुन्दरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।'
कानोंको अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाली पक्षियोंकी ये बातें सुनकर सीताने उन्हें मनमें धारण किया और पुनः उन दोनोंसे इस प्रकार पूछा— 'राम कहाँ होंगे ? किसके पुत्र हैं और कैसे वे दूल्ह-वेषमें आकर जानकीको ग्रहण करेंगे ? तथा मनुष्यावतारमें उनका श्रीविग्रह कैसा होगा ?' उनके प्रश्न सुनकर शुकी मन-ही-मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचानकर वह सामने आ उनके चरणोंपर गिर पड़ी और बोली— 'श्रीरामचन्द्रजीका मुख कमलकी कलीके समान सुन्दर होगा। नेत्र बड़े-बड़े तथा खिले हुए पङ्कजकी शोभाको धारण करनेवाले होंगे। नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। दोनों भौंहें सुन्दर ढंगसे परस्पर मिली होनेके कारण मनोहर प्रतीत होंगी। भुजाएँ घुटनोंतक लटकी हुई एवं मनको लुभानेवाली होंगी। गला शङ्खके समान सुशोभित और छोटा होगा। वक्षःस्थल उत्तम, चौड़ा एवं शोभासम्पन्न होगा। उसमें श्रीवत्सका चिह्न होगा। सुन्दर जाँघों और कटिभागकी शोभासे युक्त उनके दोनों घुटने अत्यन्त निर्मल होंगे, जिनकी भक्तजन आराधना करेंगे। श्रीरघुनाथजीके चरणारविन्द भी परम शोभायुक्त होंगे; और समस्त भक्तजन उनकी सेवामें सदा संलग्न रहेंगे। श्रीरामचन्द्रजी ऐसा ही मनोहर रूप धारण करनेवाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणोंका बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे-जैसे पक्षीकी क्या बिसात है। परम सुन्दर रूप धारण करनेवाली लावण्यमयी लक्ष्मी भी जिनकी झाँकी
५२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
करके मोहित हो गयी, उन्हें देखकर पृथ्वीपर दूसरी कौन स्त्री है, जो मोहित न हो। उनका बल और पराक्रम महान् है। वे अत्यन्त मोहक रूप धारण करनेवाले हैं। मैं श्रीरामका कहाँतक वर्णन करूँ। वे सब प्रकारके ऐश्वर्यमय गुणोंसे युक्त हैं। परम मनोहर रूप धारण करनेवाली वे जानकीदेवी धन्य हैं, जो श्रीरघुनाथजीके साथ हजारों वर्षोंतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परन्तु सुन्दरी ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है, जो इतनी चतुरता और आदरके साथ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका कीर्तन सुननेके लिये प्रश्न कर रही हो।'
पक्षियोंकी ये बातें सुनकर जनककुमारी सीता अपने जन्मकी ललित एवं मनोहर चर्चा करती हुई बोलीं—'जिसे तुमलोग जानकी कह रहे हो, वह जनककी पुत्री मैं ही हूँ। मेरे मनको लुभानेवाले श्रीराम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनोंको छोड़ूँगी, अन्यथा नहीं; क्योंकि तुमने अपने वचनोंसे मेरे मनमें लोभ उत्पन्न कर दिया है। अब तुम इच्छानुसार खेल करते हुए मेरे घरमें सुखसे रहो और मीठे-मीठे पदार्थ भोजन करो।' यह सुनकर सुग्गीने जानकीसे कहा—'साध्वी ! हम वनके पक्षी हैं, पेड़ोंपर रहते हैं और सर्वत्र विचरा करते हैं। हमें तुम्हारे घरमें सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थानपर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर तुम्हारे यहाँ आ जाऊँगी।' उसके ऐसा कहनेपर भी सीताने उसे न छोड़ा। तब उसके पतिने विनीत वाणीमें उत्कण्ठित होकर कहा—'सीता ! मेरी सुन्दरी भार्याको छोड़ दो। इसे क्यों रख रही हो। शोभने ! यह गर्भिणी है, सदा मेरे मनमें बसी रहती है। जब यह बच्चोंको जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा।' तोतेके ऐसा कहनेपर जानकीने कहा—'महामते ! तुम आरामसे जा सकते हो, मगर तुम्हारी यह भार्या मेरा प्रिय करनेवाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुखसे रखूँगी।'
यह सुनकर पक्षी दुःखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणीमें कहा—'योगीलोग जो बात कहते हैं, वह सत्य ही है—किसीसे कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है। यदि हम इस पर्वतके ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिये यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिये मौन ही रहना चाहिये।' इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—'सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्याके बिना जीवित नहीं रह सकता, इसलिये इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बड़ी अच्छी हो [मेरी प्रार्थना मान लो]।' इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर उसने समझाया, किन्तु सीताने उसकी पत्नीको नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्याने क्रोध और दुःखसे आकुल होकर जानकीको शाप दिया— 'अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पतिसे विलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणीकी अवस्थामें श्रीरामसे अलग होना पड़ेगा।' यों कहकर पति-वियोगके शोकसे उसके प्राण निकल गये। उसने श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण तथा पुनः-पुनः राम-नामका उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे ले जानेके लिये एक सुन्दर विमान आया और वह पक्षिणी उसपर बैठकर भगवान्के धामको चली गयी।
भार्याकी मृत्यु हो जानेपर पक्षी शोकसे आतुर होकर बोला—'मैं मनुष्योंसे भरी हुई श्रीरामकी नगरी अयोध्यामें जन्म लूँगा तथा मेरे ही वाक्यसे उद्वेगमें पड़कर इसे पतिके वियोगका भारी दुःख उठाना पड़ेगा।' यह कहकर वह चला गया। क्रोध और सीताजीका अपमान करनेके कारण उसका धोबीकी योनिमें जन्म हुआ। जो बड़े लोगोंकी बुराई करते हुए क्रोधपूर्वक अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह द्विजोंमें श्रेष्ठ ही क्यों न हो, मरनेके बाद नीच-योनिमें उत्पन्न होता है। यही बात उस तोतेके लिये भी हुई। उस धोबीके कथनसे ही सीताजी निन्दित हुईं और उन्हें पतिसे वियुक्त होना पड़ा। धोबीके रूपमें उत्पन्न हुए उस तोतेका शाप ही सीताका पतिसे विछोह करानेमें कारण हुआ और इसीसे वे वनमें गयीं। विप्रवर ! विदेहनन्दिनी सीताके सम्बन्धमें तुमने जो बात पूछी थी वह कह दी। अब फिर आगेका वृत्तान्त कहता हूँ, सुनो।
१२६-सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी भी मूर्च्छा, लक्ष्मणका दुःखित चित्तसे सीताको जंगलमें छोड़ना और वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म एवं अध्ययन
पातालखण्ड ] * सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी मूर्च्छा; वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म * ५२१ ***********************************************************************************************************
सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी भी मूर्च्छा, लक्ष्मणका दुःखित चित्तसे सीताको जंगलमें छोड़ना और वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म एवं अध्ययन
शेषजी कहते हैं—मुने ! भरतको मूर्च्छित देख श्रीरघुनाथजीको बड़ा दुःख हुआ, उन्होंने द्वारपालसे कहा—'शत्रुघ्नको शीघ्र मेरे पास बुला लाओ।' आज्ञा पाकर वह क्षणभरमें शत्रुघ्नको बुला लाया। आते ही उन्होंने भरतको अचेत और श्रीरघुनाथजीको दुःखी देखा; इससे उन्हें भी बड़ा दुःख हुआ और वे श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके बोले—'आर्य ! यह कैसा दारुण दृश्य है?' तब श्रीरामने धोबीके मुखसे निकला हुआ वह लोकनिन्दित वचन कह सुनाया तथा जानकीको त्यागनेका विचार भी प्रकट किया।
तब शत्रुघ्नने कहा—स्वामिन् ! आप जानकीजीके प्रति यह कैसी कठोर बात कह रहे हैं ! भगवान् सूर्यका उदय सारे संसारको प्रकाश पहुँचानेके लिये होता है; किन्तु उल्लुओंको वे पसंद नहीं आते, इससे जगत्की क्या हानि होती है ? इसलिये आप भी सीताको स्वीकार करें, उनका त्याग न करें; क्योंकि वे सती-साध्वी स्त्री हैं। आप कृपा करके मेरी यह बात मान लीजिये।
महात्मा शत्रुघ्नकी यह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बारम्बार वही (सीताके त्यागकी) बात दुहराने लगे, जो एक बार भरतसे कह चुके थे। भाईकी वह कठोर बात सुनते ही शत्रुघ्न दुःखके अगाध जलमें डूब गये और जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भाई शत्रुघ्नको भी अचेत होकर गिरा देख श्रीरामचन्द्रजीको बहुत दुःख हुआ और वे द्वारपालसे बोले—'जाओ, लक्ष्मणको मेरे पास बुला लाओ।' द्वारपालने लक्ष्मणजीके महलमें जाकर उनसे इस प्रकार निवेदन किया—'स्वामिन् ! श्रीरघुनाथजी आपको याद कर रहे हैं।' श्रीरामका आदेश सुनकर वे शीघ्र उनके पास गये। वहाँ भरत और शत्रुघ्नको मूर्च्छित तथा श्रीरामचन्द्रजीको दुःखसे व्याकुल देखकर लक्ष्मण भी दुःखी हो गये। वे श्रीरघुनाथजीसे बोले—'राजन् ! यह मूर्च्छा आदिका दारुण दृश्य कैसे दिखायी दे रहा है ? इसका सब कारण मुझे शीघ्र बताइये।'
उनके ऐसा कहनेपर महाराज श्रीरामने लक्ष्मणको वह सारा दुःखमय वृत्तान्त आरम्भसे ही कह सुनाया। सीताके परित्यागसे सम्बन्ध रखनेवाली बात सुनकर वे बारम्बार उच्छ्वास खींचते हुए सन्न हो गये। उन्हें कुछ भी उत्तर देते न देख श्रीरामचन्द्रजी शोकसे पीड़ित होकर बोले—'मैं अपयशसे कलङ्कित हो इस पृथ्वीपर रहकर क्या करूँगा। मेरे बुद्धिमान् भ्राता सदा मेरी आज्ञाका पालन करते थे, किन्तु इस समय दुर्भाग्यवश वे भी मेरे प्रतिकूल बातें करते हैं। कहाँ जाऊँ ? कैसे करूँ ? पृथ्वीके सभी राजा मेरी हँसी उड़ायेंगे।' श्रीरामको ऐसी बातें करते देख लक्ष्मणने आँसू रोककर व्यथित स्वरमें कहा—'स्वामिन् ! विषाद न कीजिये। मैं अभी उस धोबीको बुलाकर पूछता हूँ, संसारकी सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ जानकीजीकी निन्दा उसने कैसे की है ? आपके राज्यमें किसी छोटे-से-छोटे मनुष्यको भी बलपूर्वक कष्ट नहीं पहुँचाया जाता। अतः उसके मनमें जिस तरह प्रतीति हो, जैसे वह संतुष्ट रहे, वैसा ही उसके साथ बर्ताव कीजिये [परंतु एक बार उससे पूछना आवश्यक है]। जनककुमारी सीता मनसे अथवा वाणीसे भी आपके सिवा दूसरेको नहीं जानतीं; अतः उन्हें तो आप स्वीकार ही करें, उनका त्याग न करें। मेरे ऊपर कृपा करके मेरी बात मानें।'
ऐसा कहते हुए लक्ष्मणसे श्रीरामने शोकातुर होकर कहा—'भाई ! मैं जानता हूँ सीता निष्पाप है; तो भी लोकापवादके कारण उसका त्याग करूँगा। लोकापवादसे निन्दित हो जानेपर मैं अपने शरीरको भी त्याग सकता हूँ; फिर घर, पुत्र, मित्र तथा उत्तम वैभव आदि दूसरी-दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या है। इस समय धोबीको बुलाकर पूछनेकी आवश्यकता नहीं है। समय आनेपर सब कुछ अपने-आप हो जायगा; लोगोंके चित्तमें
५२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
सीताके प्रति स्वयं ही प्रतीति हो जायगी। जैसे कच्चा घाव चिकित्साके योग्य नहीं होता, समयानुसार जब वह पक जाता है तभी दवासे नष्ट होता है, उसी प्रकार समयसे ही इस कलङ्कका मार्जन होगा। इस समय मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन न करो। पतिव्रता सीताको जंगलमें छोड़ आओ।' यह आदेश सुनकर लक्ष्मण एक क्षणतक शोकाकुल हो दुःखमें डूबे रहे, फिर मन-ही-मन विचार किया—'परशुरामजीने पिताकी आज्ञासे अपनी माताका भी वध कर डाला था; इससे जान पड़ता है, गुरुजनोंकी आज्ञा उचित हो या अनुचित, उसका कभी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अतः श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये मुझे सीताका त्याग करना ही पड़ेगा।'
यह सोचकर लक्ष्मण अपने भाई श्रीरघुनाथजीसे बोले—'सुव्रत! गुरुजनोंके कहनेसे नहीं करनेयोग्य कार्य भी कर लेना चाहिये, किन्तु उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन कदापि उचित नहीं है। इसलिये आप जो कुछ कहते हैं, उस आदेशका मैं पालन करूँगा।' लक्ष्मणके मुखसे ऐसी बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा—'बहुत अच्छा; बहुत अच्छा; महामते ! तुमने मेरे चित्तको संतुष्ट कर दिया। अभी-अभी रातमें जानकीने तापसी स्त्रियोंके दर्शनकी इच्छा प्रकट की थी, इसीलिये रथपर बिठाकर जंगलमें छोड़ आओ।' फिर सुमन्त्रको बुलाकर उन्होंने कहा—'मेरा रथ अच्छे-अच्छे घोड़ों और वस्त्रोंसे सजाकर तैयार करो।' श्रीरघुनाथजीका आदेश सुनकर वे उनका उत्तम रथ तैयार करके ले आये। रथको आया देख भ्रातृ-भक्त लक्ष्मण उसपर सवार हुए और जानकीजीके महलकी ओर चले। अन्तःपुरमें पहुँचकर वे मिथिलेशकुमारी सीतासे बोले—'माता जानकी ! श्रीरघुनाथजीने मुझे आपके महलमें भेजा है। आप तापसी स्त्रियोंके दर्शनके लिये वनमें चलिये।'
जानकी बोलीं—श्रीरघुनाथजीके चरणोंका चिन्तन करनेवाली यह महारानी मैथिली आज धन्य हो गयी, जिसका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये स्वामीने लक्ष्मणको भेजा है! आज मैं वनमें रहनेवाली सुन्दरी तपस्विनियोंको, जो पतिको ही देवता मानती हैं, मस्तक झुकाऊँगी और वस्त्र आदि अर्पण करके उनकी पूजा करूँगी।
ऐसा कहकर उन्होंने सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, बहुमूल्य आभूषण, नाना प्रकारके रत्न, उज्ज्वल मोती, कपूर आदि सुगन्धित पदार्थ तथा चन्दन आदि सहस्रों प्रकारकी विचित्र वस्तुएँ साथ ले लीं। ये सारी चीजें दासियोंके हाथों उठवाकर वे लक्ष्मणकी ओर चलीं। अभी घरका चौखट भी नहीं लाँघने पायी थीं कि लड़खड़ाकर गिर पड़ीं। यह एक अपशकुन था; परन्तु वनमें जानेकी उत्कण्ठाके कारण सीताजीने इसपर विचार नहीं किया। वे अपना प्रिय कार्य करनेवाले देवरसे बोलीं—'वत्स ! कहाँ वह रथ है, जिसपर मुझे ले चलोगे?' लक्ष्मणने सुवर्णमय रथकी ओर संकेत किया और जानकीजीके साथ उसपर बैठकर सुमन्त्रसे बोले—'चलाओ घोड़ोंको।' इसी समय सीताका दाहिना नेत्र फड़क उठा, जो भावी दुःखकी सूचना देनेवाला था। साथ ही पुण्यमय पक्षी विपरीत दिशासे होकर जाने लगे। यह सब देखकर जानकीने देवरसे कहा—'वत्स! मैं तो
पातालखण्ड ] * सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी मूर्च्छा; वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म * ५२३
तपस्विनियोंके दर्शनकी इच्छासे यात्रा करना चाहती हूँ, फिर ये दुःख देनेवाले अपशकुन कैसे हो रहे हैं ! श्रीरामका, भरतका तथा तुम्हारे छोटे भाई शत्रुघ्नका कल्याण हो, उनकी प्रजामें सर्वत्र शान्ति रहे, कहीं कोई विप्लव या उपद्रव न हो।'
जानकीजीको ऐसी बातें करते देख लक्ष्मण कुछ बोल न सके, आँसुओंसे उनका गला भर आया। इसी प्रकार आगे जाकर सीताजीने फिर देखा, बहुत-से मृग बायीं ओरसे घूमकर निकले जा रहे हैं। वे भारी दुःखकी सूचना देनेवाले थे। उन्हें देखकर जानकीजी कहने लगीं— 'आज ये मृग जो मेरी बायीं ओरसे निकल रहे हैं, सो ठीक ही है; श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको छोड़कर अन्यत्र जानेवाली सीताके लिये ऐसा होना उचित ही है। नारियोंका सबसे बड़ा धर्म है— अपने स्वामीके चरणोंका पूजन, उसीको छोड़कर मैं अन्यत्र जा रही हूँ; अतः मेरे लिये जो दण्ड मिले, उचित ही है।' इस प्रकार मार्गमें पारमार्थिक विचार करती हुई देवी जानकीने गङ्गाजीको देखा, जिनके तटपर मुनियोंका समुदाय निवास करता है। जिनके जलकणोंका स्पर्श होते ही राशि-राशि महापातक पलायन कर जाते हैं— उन्हें वहाँ चारों ओर अपने रहने योग्य कोई स्थान नहीं दिखायी देता। गङ्गाके किनारे पहुँचकर लक्ष्मणजीने रथपर बैठी हुई सीताजीसे आँसू बहाते हुए कहा— 'भाभी ! चलो, लहरोंसे भरी हुई गङ्गाको पार करो।' सीताजी देवरकी बात सुनकर तुरंत रथसे उतर गयीं।
तदनन्तर, नावसे गङ्गाके पार होकर लक्ष्मणजी जानकीजीको साथ लिये वनमें चले। वे श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करनेमें कुशल थे; अतः सीताको अत्यन्त भयंकर एवं दुःखदायी जंगलमें ले गये— जहाँ बबूल, खैरा और धव आदिके महाभयानक वृक्ष थे, जो दावानलसे दग्ध होनेके कारण सूख गये थे। ऐसा जंगल देखकर सीता भयके कारण बहुत चिन्तित हुईं। काँटोंसे उनके कोमल चरणोंमें घाव हो गये। वे लक्ष्मणसे बोलीं— 'वीरवर ! यहाँ अच्छे-अच्छे ऋषि-मुनियोंके रहने योग्य आश्रम मुझे नहीं दिखायी देते, जो नेत्रोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं तथा महर्षियोंकी तपस्विनी स्त्रियोंके भी दर्शन नहीं होते। यहाँ तो केवल भयंकर पक्षी, सूखे वृक्ष और दावानलसे सब ओर जलता हुआ
५२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
यह वन ही दृष्टिगोचर हो रहा है। इसके सिवा, मैं तुमको भी किसी भारी दुःखसे आतुर देखती हूँ। तुम्हारी आँखें आँसुओंसे भरी हैं, इनसे व्याकुलताके भाव प्रकट होते हैं; और मुझे भी पग-पगपर हजारों अपशकुन दिखायी देते हैं। सच बताओ, क्या बात है ?'
सीताजीके इतना कहनेपर भी लक्ष्मणजीके मुखसे कोई भी बात नहीं निकली, वे चुपचाप उनकी ओर देखते हुए खड़े रहे। तब जानकीजीने बारम्बार प्रश्न करके उनसे उत्तर देनेके लिये बड़ा आग्रह किया। उनके आग्रहपूर्वक पूछनेपर लक्ष्मणजीका गला भर आया। उन्होंने शोक प्रकट करते हुए सीताजीको उनके परित्यागकी बात बतायी। मुनिवर ! वह वज्रके तुल्य कठोर वचन सुनकर सीताजी जड़से कटी हुई लताकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ीं। विदेहकुमारीको पृथ्वीपर पड़ी देख लक्ष्मणजीने पल्लवोंसे हवा करके उन्हें सचेत किया। होशमें आनेपर जानकीजीने कहा—'देवर ! मुझसे परिहास न करो। मैंने कोई पाप नहीं किया है, फिर श्रीरघुनाथजी मुझे कैसे छोड़ देंगे। वे परम बुद्धिमान् और महापुरुष हैं, मेरा त्याग कैसे कर सकते हैं। वे जानते हैं मैं निष्पाप हूँ; फिर भी एक धोबीके कहनेसे मुझे छोड़ देंगे ? [ऐसी आशा नहीं है।]'” इतना कहते-कहते वे फिर बेहोश हो गयीं। इस बार उन्हें मूर्च्छित देख लक्ष्मणजी फूट-फूटकर रोने लगे। जब पुनः उनको चेत हुआ, तब लक्ष्मणजीको दुःखसे आतुर और रुद्धकण्ठ देखकर वे बहुत दुःखी हुईं और बोलीं—'‘सुमित्रानन्दन ! जाओ, तुम धर्मके स्वरूप और यशके सागर श्रीरामचन्द्रजीसे तपोनिधि वसिष्ठ मुनिके सामने ही मेरी एक बात पूछना—'नाथ ! यह जानते हुए भी कि सीता निष्पाप है, जो आपने मुझे त्याग दिया है, यह बर्ताव आपके कुलके अनुरूप हुआ है या शास्त्र-ज्ञानका फल है ? मैं सदा आपके चरणोंमें ही अनुराग रखती हूँ; तो भी जो आपके द्वारा मेरा त्याग हुआ है, इसमें आपका कोई दोष नहीं है। यह सब मेरे भाग्य-दोषसे हुआ है, इसमें मेरा प्रारब्ध ही कारण है। वीरवर ! आपका सदा और सर्वत्र कल्याण हो। मैं इस वनमें आपका ही स्मरण करती हुई प्राण धारण करूँगी। मन, वाणी और क्रियाके द्वारा एकमात्र आप ही मेरे सर्वोत्तम आराध्यदेव हैं। रघुनन्दन ! आपके सिवा और सब कुछ मैंने अपने मनसे तुच्छ समझा है। महेश्वर ! प्रत्येक जन्ममें आप ही मेरे पति हों और मैं आपके ही चरणोंके चिन्तनसे अपने अनेकों पापोंका नाश कर आपकी सती-साध्वी पत्नी बनी रहूँ—यही मेरी प्रार्थना है।'
'‘लक्ष्मण ! मेरी सासुओंसे भी यह संदेश कहना— 'माताओ ! अनेकों जन्तुओंसे भरे हुए इस घोर जंगलमें मैं आप सब लोगोंके चरणोंका स्मरण करती हूँ। मैं गर्भवती हूँ, तो भी महात्मा रामने मुझे इस वनमें त्याग दिया है।' 'सौमित्रे ! अब तुम मेरी बात सुनो— श्रीरघुनाथजीका कल्याण हो। मैं अभी प्राण त्याग देती, किन्तु विवश हूँ; अपने गर्भमें श्रीरामचन्द्रजीके तेजकी रक्षा कर रही हूँ। तुम जो उनके वचनोंको पूर्ण करते हो, सो ठीक ही है; इससे तुम्हारा कल्याण होगा। तुम श्रीरामके चरणकमलोंके सेवक और उनके अधीन हो, अतः तुम्हें ऐसा ही करना उचित है। अच्छा, अब श्रीरामचन्द्रजीके समीप जाओ; तुम्हारे मार्ग मङ्गलमय हों। मुझपर कृपा करके कभी-कभी मेरी याद करते रहना।'’
इतना कहकर सीताजी लक्ष्मणजीके सामने ही अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। उन्हें मूर्च्छित