भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (९५) दुःखितः सादरमिदमूचे,- "माम ! किमद्य त्वया न आहार- वृत्तिः अनुष्ठीयते ? । केवलमश्रुपूर्णनेत्राभ्यां सनिःश्वासेन स्थीयते"। स आह- "वत्स ! सत्यमुपलक्षितं भवता, मया हि मत्स्यादनं प्रति परमवैराग्यतया साम्प्रतं प्रायोपवेशनं कृतं, तेनाहं समीपगतानपि मत्स्यान् न भक्षयामि" । कुली- रकः तच्छ्रुत्वा प्राह- "माम ! किं तद्वैराग्यकारणम् ?" । स प्राह, - "वत्स ! अहम् अस्मिन् सरसि जातो वृद्धिं गतश्च । तत् मया एनत् श्रुतं यत् द्वादशवार्षिकी अनावृष्टिः सम्पद्यते लग्ना"। कुलीरक आह, - "कस्मात् तच्छ्रुतम् ?" बक आह- "दैवज्ञमुखात् । यतः शनैश्चरो हि रोहिणीशकटं भित्वा भौमं शुक्रञ्च प्रयास्यति । किसी वनमें अनेक जञ्चरोंसे युक्त एक सरोवर है । वहापर रहनेवाला एक बगला वृद्ध भावको प्राप्त हुआ मछलियोंके खानेको असमर्थ था, वहां भूखसे शुष्ककंठ नदी क किनारे बैठा मोतियोंके समूहकी समान आसुओंके प्रवा- हसे पृथिवीको भिजोता हुआ रोताथा । एक केंकडा अनेक जलचरोंके साथ उसके दुःखसे दुःखी हुआ आदरसे यह बोला,- "मामा ! आज तुम अपने आहारकी वृत्ति क्यों नहीं करते हो? केवल अश्रुपूर्ण नेत्रोंको किये स्वास लेरहे हो"। वह बोला,- "वत्स! आपने सत्य देखा, मैने अब मछलियोके खानेमें परम वैराग्यता होनेसे मरने का व्रत लिया है, इस समयमें समीपमे गई हुई मछलियोको भी नहीं खाताहू"कुली- रक यह सुनकर बोला,- "म.मा ! तुम्हारे वैराग्यका कारण क्या है ?" वह बोला,- मैं इस सरोवरमें उत्पन्न हुआ और यहीं वृद्धिको प्राप्त हुआहू। सो मैने यह सुना है बारह वर्षकी अनावृष्टि होगी" । कुलीरक बोला- "किससे सुना ?" उस बकने कहा- "ज्योतीषीके मुखसे सुना है कारण कि, शनैश्चर रोहिणीको भेदकरे मगल शुक्रके निकट प्राप्त होगा । उक्तञ्च वराहमिहिरेण- जैसा कि, वराहमिहिरने कहा है- यदि भिन्ते सूर्य्यपुत्रो रोहिण्याः शकटमिह लोके । द्वादशवर्षाणि तदा न हि वर्षति वासवो भूमौ ॥ २३३ ॥