पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
भाषाटीकासमेतम् । (९५) दुःखितः सादरमिदमूचे,- "माम ! किमद्य त्वया न आहार- वृत्तिः अनुष्ठीयते ? । केवलमश्रुपूर्णनेत्राभ्यां सनिःश्वासेन स्थीयते"। स आह- "वत्स ! सत्यमुपलक्षितं भवता, मया हि मत्स्यादनं प्रति परमवैराग्यतया साम्प्रतं प्रायोपवेशनं कृतं, तेनाहं समीपगतानपि मत्स्यान् न भक्षयामि" । कुली- रकः तच्छ्रुत्वा प्राह- "माम ! किं तद्वैराग्यकारणम् ?" । स प्राह, - "वत्स ! अहम् अस्मिन् सरसि जातो वृद्धिं गतश्च । तत् मया एनत् श्रुतं यत् द्वादशवार्षिकी अनावृष्टिः सम्पद्यते लग्ना"। कुलीरक आह, - "कस्मात् तच्छ्रुतम् ?" बक आह- "दैवज्ञमुखात् । यतः शनैश्चरो हि रोहिणीशकटं भित्वा भौमं शुक्रञ्च प्रयास्यति । किसी वनमें अनेक जञ्चरोंसे युक्त एक सरोवर है । वहापर रहनेवाला एक बगला वृद्ध भावको प्राप्त हुआ मछलियोंके खानेको असमर्थ था, वहां भूखसे शुष्ककंठ नदी क किनारे बैठा मोतियोंके समूहकी समान आसुओंके प्रवा- हसे पृथिवीको भिजोता हुआ रोताथा । एक केंकडा अनेक जलचरोंके साथ उसके दुःखसे दुःखी हुआ आदरसे यह बोला,- "मामा ! आज तुम अपने आहारकी वृत्ति क्यों नहीं करते हो? केवल अश्रुपूर्ण नेत्रोंको किये स्वास लेरहे हो"। वह बोला,- "वत्स! आपने सत्य देखा, मैने अब मछलियोके खानेमें परम वैराग्यता होनेसे मरने का व्रत लिया है, इस समयमें समीपमे गई हुई मछलियोको भी नहीं खाताहू"कुली- रक यह सुनकर बोला,- "म.मा ! तुम्हारे वैराग्यका कारण क्या है ?" वह बोला,- मैं इस सरोवरमें उत्पन्न हुआ और यहीं वृद्धिको प्राप्त हुआहू। सो मैने यह सुना है बारह वर्षकी अनावृष्टि होगी" । कुलीरक बोला- "किससे सुना ?" उस बकने कहा- "ज्योतीषीके मुखसे सुना है कारण कि, शनैश्चर रोहिणीको भेदकरे मगल शुक्रके निकट प्राप्त होगा । उक्तञ्च वराहमिहिरेण- जैसा कि, वराहमिहिरने कहा है- यदि भिन्ते सूर्य्यपुत्रो रोहिण्याः शकटमिह लोके । द्वादशवर्षाणि तदा न हि वर्षति वासवो भूमौ ॥ २३३ ॥
( ९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ९६ ) पञ्चतन्त्रम् । जो सूर्यपुत्र (शनि) इस लोकमें रोहिणी शकटको भेदन करे तो बारह वर्षतक इन्द्र पृथ्वीमें वर्षा नहीं करता है ॥ २३३ ॥ तथाच- और भी- प्राजापत्ये शकटे भिन्ने कृत्वैव पातकं वसुधा । भस्मास्थिशकलकीर्णा कापालिकमिव व्रतं धत्ते ॥ २३४॥ रोहिणीका शकट शनिसे भेदित होनेसे पृथ्वीमें पातक होता है । तथा पृथ्वी भस्म अस्थिके खण्डसे व्याप्त होकर कापालिक व्रतको धारण करती है॥२३४॥ तथाच- और देखो-- रोहिणीशकटमर्कनन्दनश्चेद्भिनत्ति रुधिरोऽथवाशशी । किं वदामि तदनिष्टसागरे सर्वलोकमुपयाति संक्षयः २३५ जो रोहिणीके शकटको शनि मंगल अथवा चन्द्रमा भेदनकरे तो इस अनिष्ट सागरको मैं क्या कहूँ सबही लोक क्षय होजांय ॥ २३५ ॥ रोहिणीशकटमध्यसंस्थिते चन्द्रमस्यशरणीकृता जनाः । क्वापि यान्ति शिशुपाचिताशनाः सूर्यतप्तभिदुराम्बुपायिनः॥ चन्द्रमाके रोहिणी शकटमें स्थित होनेसे शरण रहित होके मनुष्य बालक- मारकर खानेवाले तथा सूर्यके तापसे भेदको प्राप्त हुए जलके पीनेवाले कहां जांय ॥ २३६ ॥ तदेतत्सरः स्वल्पतोयं वर्त्तते । शीघ्रं शोषं यास्यति अ- स्मिन् शुष्के यैः सह अहं वृद्धिं गतः सदैव क्रीडितश्च ते सर्वे तोयाभावात् नाशं यास्यन्ति । तत् तेषां वियोगं द्रष्टुमहमस- मर्थः । तेनैतत् प्रायोपवेशनं कृतम् । साम्प्रतं सर्वेषां स्वल्प- जलाशयानां जलचरा गुरुजलाशयेषु स्वस्वजनैर्नीयन्ते, केचिच्च मकरगोधाशिशुमारजलहस्तिप्रभृतयः स्वयमेव गच्छन्ति । अत्र पुनः सरसि ये जलचरास्ते निश्चिन्ताः सन्ति तेनाहं विशेषात् रोदिमि यद्बीजशेषमात्रमप्यत्र न उद्धरि- ष्यति”। ततः स तदाकर्ण्य अन्येषामपि जलचराणां तत् तस्य
भाषाटीकासमेतम् । ( ९७ )
वचनं निवेदयामास । अथ ते सर्वे भयत्रस्तमनसो मत्स्यकच्छ- पप्रभृतयस्तमभ्युपेत्य पप्रच्छुः- "माम ! अस्ति कश्चिदुपायो येनास्माकं रक्षा भवति?” । बक आह-“अस्ति अस्य जला- शयस्य नातिदूरे प्रभूतजलसनाथं सरः पद्मिनीखण्डम- ण्डितं यच्चतुर्विंशत्यापि वर्षाणामवृष्ट्या न शोषमेष्यति। तद्यदि मम पृष्ठं कश्चिदारोहति तदहं तं तत्र नयामि"। अथ ते तत्र विश्वासमापन्नाः तात ! मातुल ! भ्रातः ! इति ब्रुवा- णा अहं पूर्वमहं पूर्वमिति समन्तात् परितस्थुः । सोऽपि दुष्टाशयः क्रमेण तान् पृष्ठे आरोप्य जलाशयस्य नातिदूरे शिलां समासाद्य तस्यामाक्षिप्य स्वेच्छया भक्षयित्वा भूयोऽपि जलाशयं समासाद्य जलचराणां मिथ्यावार्त्तासन्देशैर्मनां- सि रञ्जयन्नित्यामिवाहारवृत्तिमकरोत् । अन्यस्मिन् दिने च कुलीरकेणोक्तः--“माम ! मया सह ते प्रथमः स्नेहसम्भाषः सञ्जातः। तत् किं मां परित्यज्य अन्यान्नयसि । तस्मादद्य मे प्राणत्राणं कुरु”। तदाकर्ण्य सोऽपि दुष्टाशयश्चिन्तितवान् । “निर्विण्णोऽहं मत्स्यमांसादनेन । तदद्य एनं कुलीरकं व्यञ्जन- स्थाने करोमि”। इति विचिन्त्य तं पृष्ठे समारोप्य तां वध्य- शिलामुद्दिश्य प्रस्थितः । कुलीरकोऽपि दूरादेवास्थिपर्वतं शि- लाश्रयमवलोक्य मत्स्यास्थीनि परिज्ञाय तमपृच्छत्--“माम! कियद्दूरे स जलाशयः ? मदीयभारेण अतिश्रान्तस्त्वं तत् कथय” । सोऽपि मन्दधीर्जलचरोऽयमिति मत्वा स्थले न प्रभवतीति सस्मितमिदमाह--“कुलीरक ! कुतोऽन्यो जला- शयः मम प्राणयात्रेयम्, तस्मात् स्मर्य्यतामात्मनोऽभीष्टदे- वता । त्वामपि अस्यां शिलायां निक्षिप्य भक्षयिष्यामि”। इत्युक्तवति तस्मिन् स्ववदनदंशद्वयेन मृणालनालधवलायां मृदुग्रीवायां गृहीतो मृतश्च । अथ स तां बकग्रीवां समादाय शनैः शनैः तज्जलाशयमाससाद । ततः सर्वैरव ७
( ९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ९८ ) पञ्चतन्त्रम् । जलचरैः पृष्टः–“भोः कुलीरक ! किं निवृत्तस्त्वम् ? स मातुलॊऽपि न आयातः ? तत् किं चिरयति ?, वयं सर्वे सोत्सुकाः कृतक्षणास्तिष्ठामः” । एवं तैरभिहिते कुलीरको- ऽपि विहस्योवाच–“मूर्खाः सर्वे जलचरास्तेन मिथ्यावा- दिना वञ्चयित्वा नातिदूरे शिलातले प्रक्षिप्य भक्षिताः । तन्मया आयुःशेषतया तस्य विश्वासघातकस्य अभिप्रायं ज्ञात्वा ग्रीवेयमानीतां । तदलं सम्भ्रमेण । अधुना सर्वजलच- राणां क्षेमं भविष्यति” । अतोऽहं ब्रवीमि–“भक्षयित्वा बहून् मत्स्यान्” इति । सो यह सरोवर स्वल्प जलवाला है शीघ्र सूख जायगा और इसके सूखनेसे जिनके साथ मैं वृद्धिको प्राप्त हुआ हूं, सदैव क्रीडा की है वे सब जलके न होनेसे नाशको प्राप्त होंगे, सो उनका वियोग देखनेको मैं असमर्थ हूं । इसी कारण यह मरनेका व्रत लिया है इस समय सबही स्वल्प सरोवरोंके जलचर बडे २ जलाशयोंमे अपने स्वजनों द्वारा लेजाये जाते हैं; कोई मकर, गोधा, घडियांल, जलहस्ति आदि स्वयमेवही जाते हैं और इस सरोवरके जो जलचर है वे निश्चिन्त हैं; इस क्रारण मैं विशेष कर रोताहूं कि, इसका तो बीजमात्र न बचेगा” । तब वह यह वचन सुनकर और जलचरोंसे उसके वचन निवेदन करता भया, तब वे सब भयसे व्याकुल मन हुए मच्छ कच्छ आदि उसके पास आनकर पूछने लगे–“मामा ! क्या कोई उपाय है ? जिससे हमारी रक्षाहो” बगला बोला–“इस सरोवरसे थोटी ही दूर बहुत जलसे युक्त कमलिनीसे शोभा- यमान सरोवर है, जो चौबीस वर्षकी अनावृष्टिमेभी नहीं सूखेगा सो यदि कोई मेरी पीठपर चढे तो मैं उसे वहां लेजाऊँ” । तब वे वहां विश्वासको प्राप्त हुए तात, मामा, भाई इस प्रकार बोलते हुए प्रथम मैं पहले मैं इस प्रकार उसके चारों ओर स्थित हुए । वहभी दुष्टात्मा उनको पीठपर चढाय जलाशयके थोडी दूर शिलापर आरोपणकर उसमें डाल अपनी इच्छासे भक्षण कर फिरभी जलाशयको प्राप्त होकर जलचरोंकी मिथ्या वार्ताके सन्देशोंसे मन प्रसन्न करता हुआ इस प्रकार अपनी आजीविका करता रहा । एक . दिन कुलीरकने कहा– “मामा ! मेरे संग पहले तेरा स्नेह सम्भाषण हुआथा, सो क्यों मुझे छोडकर
[header] भाषाटीकासमेतम् । (९९) [/header]
अन्योंको लेजाता है ? सो आज मेरे प्राणोंकी रक्षा कर" । यह सुनकर वहभी दुष्टात्मा विचारने लगा । "मछलियोंके मास खानेसे मेरा जीभी उकता गयाहै, सो आज मैं इस कुलीरकको व्यञ्जनके स्थानमे करू" । यह विचार उसको पीठपर चढाकर उस वध्यशिलाके उद्देश्य करके चला । कुलीरक भी दूरसे अस्थिपर्वत शिलाआश्रयको देखकर मत्स्योंकी अस्थि पहचानकर उससे पूछने लगा-“मामा ! वह जलाशय कितनी दूर है ? मेरे भारसे तुम अधिक थकगये हो सो कहो ।" वहभी मन्दबुद्धि यह जलचर है ऐसा मानकर कि, स्थलमें यह बलवान् न होगा हँसता हुआ यह बोला-"कुलीरक ! दूसरा जलाशय नहीं है, यह मेरी प्राणयात्रा है। सो अब अपने इष्टदेवताका स्मरण करो, तुझेभी इस शिलामें डालकर मैं भक्षण करजाऊंगा" । उसके यह कहने- पर कुलीरकने अपने दोनो दांतोंसे कमलनालकी समान उसकी श्वेत मृदुग्रीवा पकडी जिससे वह मरगया, तब वह उस बगलेकी गरदनको ग्रहणकर सहज सहज उस जलाशयको प्राप्त हुआ, तब सम्पूर्ण जलाशयोंके रहनेवालोंने पूछा "भो कुलीरक ! तू किसप्रकारसे लौट आया ? वह मातुलभी न आया, सो क्यों देर करता है, हम सब बडे उत्कंठित क्षण २ मे वाट देखते स्थितहैं ।" उनके ऐसा कहनेपर कुलीरक हँसकर बोला-“मूर्खो ! सम्पूर्ण जलचर उस मिथ्यावादीने ठगकर थोडीही दूर शिलातलपर पटकर खाये । सो मैं आयुशेष होनेसे उस विश्वासघातकका अभिप्राय जानकर यह उसकी गर्दन लेआयाहूं, सो अब उद्वेग मत करो । अब सब जलचरोकी क्षेम होगी" इससे मैं कहता हूं-"बहुतसे मत्स्योंको खाकर" इत्यादि । वायस आह-“भद्र ! तत्कथय कथं स दुष्टसर्पो वधमुपै- ष्यति ?” । शृगाल आह-“गच्छतु भवान् कञ्चिन्नगरं राजा- धिष्ठानम् । तत्र कस्यापि धनिनो राजामात्यादेः प्रमादिनः कनकसूत्रं हारं वा गृहीत्वा तत् कोटरे प्रक्षिप येन । सर्पस्त- द्ग्रहणेन वध्यते" । अथ तत्क्षणात् काकः काकी च तदा- कर्ण्य आत्मેચ્છयोत्पतितौ । ततश्च काकी किञ्चित्सरः प्राप्य यावत्पश्यति तावत् तन्मध्ये कस्यचिद्राज्ञोऽन्तःपुरं जलासन्नं न्यस्तकनकसूत्रं मुक्तमुक्ताहारवस्त्राभरणं जलक्रीडां कुरुते ।
( १०० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १०० ) पञ्चतन्त्रम् ।
अथ सा वायसी कनकसूत्रमेकमादाय स्वगृहाभिमुखं प्रत- स्थे । ततश्च कंचुकिनो वर्षधराश्च तं नीयमानमुपलक्ष्य गृही- तलगुडाः सत्वरमनुययुः । काकी अपि सर्पकोटरे तत् कन- कसूत्रं प्रक्षिप्य सुदूरमवस्थिता । अथ यावद्राजपुरुषास्तं वृक्षम Pair? No, वृक्षम"ारुह्य तत् कोटरमवलोकयन्ति तावत्कृष्णसर्पः प्रसा- रितभोगस्तिष्ठति । ततस्तं लगुडप्रहारेण हत्वा कनकसूत्रमा- दाय यथाभिलषितं स्थानं गताः । वायसदम्पती अपि ततः परं सुखेन वसतः। अतोऽहं ब्रवीमि-“उपायेन हि यत् कुर्यात्” इति । तन्न किञ्चिदिह बुद्धिमतामसाध्यमस्ति । उक्तञ्च- कौआ बोला-“भद्र ! सो कहो किसप्रकारसे वह दुष्ट सर्प वधको प्राप्त होगा?” । शृगाल बोला-“तुम किसी राजाके नगरमें जाओ, वहां किसी धनी राज अमात्यादि किसी असावधानका कनक सूत्र वा हार ग्रहण करके उसकी खखोडलमें डालदो जिससे उसके ग्रहणसेभी वह सर्प वध किया जाय” । तब उसीक्षण वे कौए और कौअन उस वचनको सुन अपनी इच्छासे उडे । सो काकी किसी सरोवरको प्राप्त होकर जबतक देखतीहै तबतक उसके मध्यमें कोई राजाके अन्तःपुरकी स्त्री जलके निकट कनक सूत्र मोती हार तथा वस्त्र रखकर जलक्रीडा करती देखी, तब वह काकी कनकसूत्रको लेकर अपने घरकी ओर चली, तब वे कंचुकी और वर्षधर उसको लेजाता देखकर लकडी ले बहुत शीघ्र उसके पीछे गये, काकी भी सर्पके खखोडलमें उस कनकसूत्रको डाल दूर स्थितहुई । सो जबतक राजपुरुष उस वृक्षमें चढकर उसकी खखोडलको देखते है, तबतक काला सांप फणफैलाये बैठा देखा, तब उसको डंडोके प्रहारसे वध- कर कनकसूत्रले अपने अभिलषित स्थानको गये । वायसदम्पतीभी परम सुखसे रहने लगे, इससे मैं कहताहूं “जो उपायसे शक्य है” इत्यादि । सो बुद्धिमानोंको कुछभी असाध्य नहीं है, कहा है- यस्य बुद्धिर्बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् । वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥ २३७ ॥” जिसको बुद्धि है, उसीको बलहै, निर्बुद्धिको बल नहीं । देखो ! वनमें मदोन्मत्त सिंह खरगोशसे मारागया ॥ २३७ ॥”
करटक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-
भाषाटीकासमेतम् । (१०१) करटक आह-“कथमेतत् ?” स आह- करटक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला- कथा ८. कस्मिंश्चिद्वने भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म । अथासौ वीर्य्यातिरेकान्नित्यमेवानेकान् मृगशशकादीन् व्यापादयन्न उपरराम । अथान्येद्युस्तद्वनजाः सर्वे सारङ्ग- वराहमहिषशशकादयो मिलित्वा तमभ्युपेत्य प्रोचुः-“स्वा- मिन् ! किमनेन सकलमृगवधेन नित्यमेव ? यतस्तव एकेनापि मृगेण तृप्तिर्भवति । तत् क्रियतामस्माभिः सह समयधर्मः । अद्य प्रभृति तव अत्रोपविष्टस्य जातिक्रमेण प्रतिदिनमेको मृगो भक्षणार्थं समेष्यति । एवं कृते तव तावत्प्राणयात्रा क्लेशं विना अपि भविष्यति, अस्माकञ्च पुनः सर्वोच्छेदं न स्यात् । तदेष राजधर्मोऽनुष्ठीयताम् । उक्तञ्च- किसीएक वनमें भासुरकनाम सिंह रहताथा वह पराक्रमकी अधिकतासे अनेक मृग शशक आदिको मारताहुआ उपरामको प्राप्त न होता । तब दूसरे किसी दिन उस वनके सब जिव मृग शूकर भैंसे शशकादि मिलकर उसके निकट जाकर बोले,-“स्वामिन् ! इन सब मृगोंके मारनेसे क्या लाभ है, नित्यही तुम्हारी तो एकही मृगसे तृप्ति होजाती है सो हमारे सग प्रतिज्ञा करलो । आजसे लेकर तुम्हारे यहा बैठेहुएके पास जातिक्रमसे भक्षणके निमित्त एक मृग आवेगा ऐसा करनेसे तुम्हारी प्राणयात्रा क्लेशके बिना होगी और हम सबकाभी नाश न होगा सो यह राजधर्मका अनुष्ठानकरो । कहाहै- शनैः शनैश्च यो राज्यमुपभुङ्क्ते यथाबलम् । रसायनमिव प्राज्ञः स पुष्टिं परमां व्रजेत् ॥ २३८ ॥ हे राजन् ! जो शनैः २ बलके अनुसार खाताहै वह प्राज्ञ रसायनकी समान पुष्टिको प्राप्त होताहै ॥ २३८ ॥ विधिना मन्त्रयुक्तेन रूक्षापि मथितापि च । प्रयच्छति फलं भूमिररणीव हुताशनम् ॥ २३९ ॥
(१०२) पञ्चतन्त्रम् ।
(१०२) पञ्चतन्त्रम् । विधि और मन्त्रसे युक्त (अर्थात् सुयुक्ति विधिसे) जोतीहुई कठिन भूमि भी बहुत फलको देतीहै, जैसे अरणी अग्निको मथनेसे देतीहै ॥ २३९ ॥ प्रजानां पालनं शस्यं स्वर्गकोशस्य वर्द्धनम् । पीडनं धर्मनाशाय पापायायशसे स्थितम् ॥ २४० ॥ प्रजापालन राजाओंको प्रशंसनीय है। यही स्वर्गके कोषका बढानाहै। प्रजाको पीडा देना धर्मके नाश, पाप और अकीर्तिके लिये होताहै ॥ २४० ॥ गोपालेन प्रजाधेनोर्वित्तदुग्धं शनैः शनैः । पालनात्पोषणाद्ग्राह्यं न्याय्यां वृत्तिं समाचरेत् ॥ २४१ ॥ गोपालको प्रजारूपी गौका दूध शनैः २ ग्रहण करना चाहिये, पालन पोषण और न्यायकी वृत्तिसे ग्रहणकरै ॥ २४१ ॥ अजामिव प्रजां मोहाद्यो हन्यात्पृथिवीपतिः । तस्यैका जायते तृप्तिर्न द्वितीया कथञ्चन ॥ २४२ ॥ और जो राजा मोहसे बकरी समान प्रजाको नष्टकरताहै, उस एककीही तृप्ति होती है, दूसरेकी कदाचित् नहीं ॥ २४२ ॥ फलार्थी नृपतिर्लोकान्पालयेद्यतमास्थितः । दानमानादितोयेन मालाकारोऽङ्कुरानिव ॥ २४३ ॥ फलकी इच्छावाला राजा यत्नसे लोकोको पालनकरै जिसप्रकार दान मानके जलसे माली अंकुरोंको बढाताहै ॥ २४३ ॥ नृपदीपो धनस्नेहं प्रजाभ्यः संहरन्नपि । आन्तरस्थैर्गुणैः शुभ्रैर्लक्ष्यते नैव केनचित् ॥ २४४ ॥ दीपककी समान राजा प्रजासे धनरूपी स्नेहको ग्रहण करता हुआ अपने अन्तरमे स्थित श्रेष्ठ गुणोके कारण किसीको लक्षित नहीं होताहै ॥ २४४ ॥ यथा गौर्दुह्यते काले पाल्यते च तथा प्रजाः । सिच्यते चीयते चैव लता पुष्पफलप्रदा ॥ २४५ ॥ जैसे समयपर गौ दुही जातीहै ऐसेही पालीहुई प्रजा समयपर दुही जातीहै सींचीहुई लताही समयपर पुष्प फलादि प्रदान करतीहै ॥ २४५ ॥ यथा बीजङ्कुरः सूक्ष्मः प्रयत्नेनाभिरक्षितः । फलप्रदो भवेत्काले तद्वल्लोकः सुरक्षितः ॥ २४६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १०३ )
जिस प्रकार सूक्ष्मबीजोंके अंकुर यत्नोसे रक्षितहुए समयपर फल देते हैं इसी प्रकार सुरक्षित लोकभी ॥ २४६ ॥ हिरण्यधान्यरत्नानि यानानि विविधानि च । तथान्यदपि यत्किञ्चित्प्रजाभ्यः स्यान्महीपतेः ॥ २४७ ॥ सुवर्ण, धान्य, रत्न, विविध यान तथा औरभी जो कुछ है वह सब राजाको प्रजासे ही प्राप्त होताहै ॥ २४७ ॥ लोकानुग्रहकर्त्तारः प्रवर्द्धन्ते नरेश्वराः । लोकानां संक्षयाच्चैव क्षयं यान्ति न संशयः ॥ २४८ ॥" लोकोपर अनुग्रह करनेवाले राजा वृद्धिको प्राप्त होतेहैं और लोकके क्षय करनेसे नाश होजातेहैं इसमे सन्देह नही ॥ २४८ ॥" अथ तेषां तद्वचनमाकर्ण्य भासुरक आह-“अहो ! सत्यम- भिहितं भवद्भिः परं यदि ममोपविष्टस्यात्र नित्यमेव नैकः श्वापदः समागमिष्यति तन्नूनं सर्वानपि भक्षयिष्यामि” । अथ ते तथैव प्रतिज्ञाय निर्वृतिभाजः तत्रैव वने निर्भयाः प- र्यटन्ति । एकश्च प्रतिदिनं क्रमेण याति । वृद्धो वा वैराग्ययुक्तो वा, शोकग्रस्तो वा, पुत्रकलत्रनाशभीतो वा, तेषां मध्यात्तस्य भोजनार्थ मध्याह्नसमये उपतिष्ठते । अथ कदा- चित् जातिक्रमाच्छशकस्य अवसरः समायातः । स समस्त- मृगैः प्रेरितोऽनिच्छन्नपि मन्दं मन्दं गत्वा तस्य वधोपायं चिन्तयन् वेलातिक्रमं कृत्वा व्याकुलितहृदयो यावद्गच्छति तावद् मार्गे गच्छता कूपः संदृष्टः । यावत्कूपोपरि याति तावत्कूपमध्ये आत्मनः प्रतिबिम्बं ददर्श । दृष्ट्वा च तेन हृदये चिन्तितं । “यद्भव्य उपायोऽस्ति, अहं भासुरकं प्रकोप्य स्वबुद्ध्या अस्मिन् कूपे पातयिष्यामि” । अथासौ दिन- शेषे भासुरकसमीपं प्राप्तः । सिंहोऽपि वेलातिक्रमेण क्षुत्क्षा- मकण्ठः कोपाविष्टः सृक्किणी परिलेलिहन् व्यचिन्तयत् । “अहो ! प्रातराहाराय निःसत्त्वं वनं मया कर्त्तव्यम्” । एवं चिन्तयतस्तस्य शशको मन्दं मन्दं गत्वा प्रणम्य
( १०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १०४ ) पञ्चतन्त्रम् । तस्य अग्रे स्थितः । अथ तं प्रज्वलितात्मा भासुरको भर्त्सयन्नाह,-"रे शशकाधम ! एकतस्तावत् त्वं लघुः प्राप्तोऽपरतः वेलातिक्रमेण, तदस्मादपराधात् त्वां नि- पात्य प्रातः सकलान्यपि मृगकुलानि उच्छेदयिष्यामि" । अथ शशकः सविनयं प्रोवाच,-"स्वामिन् ! नापराधो मम,न च सत्त्वानाम्, तत् श्रूयतां कारणम्" । सिंह आह- “सत्वरं निवेदय यावत् मम दंष्ट्रान्तर्गतो न भवान् भवि- ष्यति"इति । शशक आह-"स्वामिन्! समस्तमृगैरद्य जाति- क्रमेण मम लघुतरस्य प्रस्तावं विज्ञाय ततोऽहं पञ्चशशकैः समं प्रेषितः । ततश्च अहमागच्छन्नन्तराले महता केनचि- दपरेण सिंहेन विवरान्निर्गत्य अभिहितः-"रे ! क प्रस्थिता यूयम् ? अभीष्टदेवतां स्मरत" । ततो मयाभिहितम्-“वयं स्वामिनो भासुरकसिंहस्य सकाशे आहारार्थं समयधर्मेण गच्छामः" । ततः तेन अभिहितम्-"यद्येवं तर्हि मदीयमेत- द्वनं मया सह समयधर्मेण समस्तैरपि श्वापदैर्वर्तितव्यम् । चौररूपी स भासुरकः । अथ यदि सोऽत्र राजा ततो विश्वा- सस्थाने चतुरः शशकानत्र धृत्वा तमाह्वय द्रुततरमागच्छ, येन यः कश्चिदावयोर्मध्यात् पराक्रमेण राजा भविष्यति स सर्वानितान् भक्षयिष्यति" इति । ततोऽहं तेनादिष्टः स्वा- मिसकाशमभ्यागतः, एतत् वेलाव्यतिक्रमकारणम् । तदत्र स्वामी प्रमाणम्" । तच्छ्रुत्वा भासुरक आह-"भद्र ! यदि एवं तत् सत्वरं दर्शय मे तं चौरसिंहम्, येन अहं मृगकोपं तस्य उपरि क्षिप्त्वा स्वस्थो भवामि । उक्तञ्च- तब उनके यह वचन सुनकर भासुरक बोला--"अहो तुमने सत्य कहा, परन्तु यदि मेरे बैठेहुए नित्य एक जीव न आवेगा तो अवश्यही सबको खा जाऊंगा' । तब वे ऐसाही करेंगे यह प्रतिज्ञा करके निरुद्वेग होकर उस वनमे निर्भय फिरने लगे । प्रति दिन एक क्रमसे उनके पास जाता वृद्ध या वैराग्ययुक्त वा शोकग्रस्त वा पुत्र कलत्रके नाशसे भीतहुआ उनके मध्यसे उनके भोजनके
भाषाटीकासमेतम् । ( १०५ )
निमित्त मध्यान्ह समय प्राप्त होता था । तब कभी जातिके क्रमसे खरगोशकी वारी आई वह सब मृगोंसे प्रेरित हुआ इच्छा न करनेपरभी शनै २ जाता उसके मारनेके उपायको चिन्ता करता हुआ समयको बिताकर व्याकुल हृदयसे जबतक जाताहै, तबतक मार्गमें जाते हुए उसने कूपदेखा । जब कूपपर गया तब उसमे अपनी परछाही देखकर उसने मनमे विचार किया कि, “यह एक उत्तम उपाय है मैं भासुरकको क्रोधित कराकर इस कूपमें गिराऊंगा” तब यह कुछ दिनशेषरहे भासुरकके समीप प्राप्तहुआ। सिहभी समयके बीतनेसे भूखसे शुष्ककंठ क्रोधमें भरा जीभको चाटता हुआ विचारता था, “अहो प्रभात ही भोजनके निमित्त यह वन निर्जीव कर दूंगा” इसप्रकार उसके विचारते वह खरगोश शनै २ जाय प्रणा- मकर उसके आगे स्थित भया । तब प्रज्वलित आत्मा भासुरक उसे घुड़कता- हुआ बोला-“रे नीच खरगोश ! एक तो तू लघु दूसरे समयको बिताकर आया हे इस अपराधसे तुझको मारकर सबेरे सभी मृगोका नाश करूंगा” । तब खरगोश विनयपूर्वक बोला-“स्वामिन् ! इसमें न मेरा अपराध न अन्यजीवोंका है सो कारण सुनिये । सिह बोला,-“शीघ्र निवेदन कर जबतक तू मेरी डाढोंके अन्तर्गत न होता है”। खरगोश बोला,-“स्वामिन् ! संपूर्ण मृगोंने आज जाति- क्रमसे मेरा अति लघु कलेवर जानकर पाच खरगोशोंसहित मुझे आपके पास भेजा । सो मैं आता हुआ मार्गमें एक अन्य सिंहने विवरसे निकल कर कहा,- “रे तुम कहा जातेहो ? अपने इष्टदेवताका स्मरण करो” । तब मैने कहा-“हम स्वामी भासुरकके पास उसके भोजनको प्रतिज्ञार्थमैसे जाते हैं” उसने कहा-“जो ऐसा है तो यह वन मेरा है, मेरे साथ प्रतिज्ञासे सब जीवोको वर्तना चाहिये, चोर है वह भासुरक । और जो वह यहाका राजा है तो विश्वासके निमित्त चार खरगोशोंको यहा रखकर उसे बुलाकर बहुतशीघ्र आधा इससे हम दोनोंके बीचमें जो कोई पराक्रमसे राजा होगा वही इन सबको खायगा” सो मैं उसकी आज्ञासे स्वामीके पास आया हू यह समयके उल्लंघनका कारण है सो इसमे स्वामीही प्रमाण हैं”। यह सुनकर भासुरक बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो शीघ्र मुझे उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मैं इन मृगोके कोपको उसके ऊपर छोडकर स्वस्थ होऊ । कहा है-
( १०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १०६ ) पञ्चतन्त्रम् । भूमिर्मित्रं हिरण्यञ्च विग्रहस्य फलत्रयम् । नास्त्यैकमपि यद्येषां न तं कुर्यात्कथञ्चन ॥ २४९ ॥ भूमि, मित्र, सुवर्ण यह तीन विग्रहके फल हैं और जो इनमेंसे एकभी न हो तो वहां विग्रह न करे ॥ २४९ ॥ यत्र न स्यात्फलं भूरि यत्र च स्यात्पराभवः । न तत्र मतिमान्युद्धं समुत्पाद्य समाचरेत् ॥ २५० ॥” जहां विशेष फल न मिले और पराभव हो, मतिमान्को चाहिये कि, वहां युद्ध न करे ॥ २५० ॥” शशक आह-“स्वामिन् ! सत्यमिदम्, स्वभूमिहेतोः परिभवाच्च युध्यन्ते क्षत्रियाः, परं स दुर्गाश्रयः, दुर्गान्निष्क्रम्य वयं तेन विष्कम्भिताः । ततो दुर्गस्थो दुःसाध्यो भवति रिपुः । उक्तञ्च- खरगोश बोला,-“स्वामिन् ! यह सत्य है, अपनी भूमिके हेतु परिभवसे क्षत्रिय युद्ध करते हैं, परन्तु वह दुर्गमें रहता है, दुर्गमेंसे निकलकर उसने हमको रोक- लिया, इससे दुर्गमें स्थित शत्रु दुःसाध्य होता है । कहाहे कि- न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् । यत्कृत्यं साध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन सिध्यति ॥ २५१ ॥ जो कार्य सहस्र हाथी, लक्ष घोडोंसे सिद्ध नहीं होता है, वह एक दुर्गसे राजाओंका कार्य सिद्ध होताहै ॥ २५१ ॥ शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः । तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविचक्षणाः ॥ २५२ ॥ किलेमें स्थित एक धनुषधारी सौसे युद्ध करसकता है, इस कारण नीति- शास्त्रके जाननेवाले दुर्गकी प्रसंशा करते है ॥ २५२ ॥ पुरा गुरोः समादेशाद्धिरण्यकशिपोर्भयात् । शक्रेण विहितं दुर्गं प्रभावाद्विश्वकर्मणः ॥ २५३ ॥ प्रथम गुरुकी आज्ञासे हिरण्यकशिपुके भयसे इन्द्रने विश्वकर्माकी सहायतासे दुर्ग निर्माण कियाथा ॥ २५३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (१०७) तेनापि च वरो दत्तो यस्य दुर्गं स भूपतिः । विजयी स्यात्ततो भूमौ दुर्गाणि स्युः सहस्रशः ॥ २५४ ॥ और उसनेभी यह वर दिया था कि, जिसके दुर्ग होगा वही राजा विजयी होगा इस कारण पृथ्वीमें सैकडों दुर्ग होगये ॥ २५४ ॥ दंष्ट्राविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः । सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ २५५ ॥" जैसे डाढोंसे रहित सर्प, मदसे हीन हाथी इसी प्रकार दुर्गहीन राजा शीघ्र अन्योंके वशमें होजाता है ॥ २५५ ॥" तच्छ्रुत्वा भासुरक आह-"भद्र ! दुर्गस्थमपि दर्शय तं चौरसिंहं येन व्यापादयामि । उक्तञ्च- यह सुनकर भासुरक बोला,-"भद्र ! किलेमे स्थितभी उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मै उसे मारडालू । कहा है- जातमात्रं न यः शत्रुं रोगञ्च प्रशमं नयेत् । महाबलोऽपि तेनैव वृद्धिं प्राप्य स हन्यते ॥ २५६ ॥ जो उत्पन्न होतेही शत्रु और रोगको अपने वशमे नहीं करता है, वह महाबली हो तथापि उसके साथ वृद्धिको प्राप्तहोकर हनन करता है ॥ २५६ ॥ तथाच- औरभी कहा है- उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता । समौ हि शिष्टैराम्नातौ वर्त्स्यन्तावामयः स च ॥ २५७ ॥ हितकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उठे हुए शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, श्रेष्ठ पुरुषोंने वृद्धिको प्राप्त होते हुए शत्रु और रोग समान कहे हैं ॥ २५७ ॥ अपिच- और देखो- उपेक्षितः क्षीणबलोऽपि शत्रुः प्रमाददोषात्पुरुषैर्मदान्धैः । साध्योऽपि भूत्वा प्रथमं ततोऽसौ असाध्यतां व्याधिरिव प्रयाति ॥ २५८ ॥
( १०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १०८ ) पञ्चतन्त्रम् । उपेक्षा करनेसे क्षीणबलवालाभी शत्रु मदान्ध पुरुषोंके प्रमाददोषोंसे प्रथम साध्य होकर भी पीछे व्याधिकी समान असाध्य होजाताहै॥ २९८ ॥ तथाच- तैसेही- आत्मनः शक्तिमुद्वीक्ष्य मानोत्साहश्च यो व्रजेत् । बहून् हन्ति स एकोऽपि क्षत्रियान्भार्गवो यथा ॥२५९॥" जो अपनी शक्तिको देखकर मान और उत्साहको प्राप्त होता है, वह एकभी बहुतोंको मार सकता है, जैसे क्षत्रियोंको परशुराम ॥ २९९ ॥" शशक आह-“अस्त्येतत्तथापि बलवान् स मया दृष्टः तत् न युज्यते स्वामिनस्तस्य सामर्थ्यमविदित्वा गन्तुम् । उक्तञ्च- शशक बोला-“यह तो है, परन्तु तौभी वह मैंने बलवान् जाना है, बिना उसकी सामर्थ्य देखे स्वामीको वहां जाना उचित नहीं है । कहाहै- अविदित्वात्मनः शक्तिं परस्य च समुत्सुकः । गच्छन्नभिमुखो नाशं याति वह्नौ पतङ्गवत् ॥ २६० ॥ जो अपनी और दूसरेकी शक्तिके बिना जाने समुत्सुक होकर सन्मुख जाता है वह अग्निमें पतंगकी समान जाकर नष्ट होता है ॥ २६० ॥ यो बलात्प्रोन्नतं याति निहन्तुं सबलोऽप्यरिम् । विमदः स निवर्त्तेत शीर्णदन्तो गजो यथा ॥ २६१ ॥” जो सबलभी बलसे प्रबल शत्रुके मारनेको जाता है वह विमद होकर दांत टूटे हाथीकी समान निवृत्त होता है ॥ २६१ ॥” भासुरक आह-“भोः ! किं तव अनेन व्यापारेण, दर्शय मे तं दुर्गस्थमपि” । अथ शशक आह-“यद्येवं तर्हि आग- च्छतु स्वामी” । एवमुक्त्वा अग्रे व्यवस्थितः । ततश्च तेन आग- च्छता यः कूपो दृष्टोऽभूत् तमेव कूपमासाद्य भासुरकमाह- “स्वामिन् ! कस्ते प्रतापं सोढुं समर्थः । त्वां दृष्ट्वा दूरतोऽपि चौरसिंहः प्रविष्टः स्वं दुर्गम्, तदागच्छ येन दर्शयामि” इति। भासुरक आह-“दर्शय मे दुर्गम्” । तदनु दर्शितस्तेन कूपः । ततः सोऽपि मूर्खः सिंहः कूपमध्ये आत्मप्रतिबिम्बं जलम-
ध्यगतं दृष्ट्वा सिंहनादं मुमोच । ततः प्रतिशब्देन कूपमध्या- द्विगुणतरो नादः समुत्थितः। अथ तेन तं शत्रुं मत्वा आत्मानं तस्य उपरि प्रक्षिप्य प्राणाः परित्यक्ताः । शशकोऽपि हृष्ट- मनाः सर्वमृगान् आनन्द्य तैः सह प्रशस्यमानो यथासुखं तत्र वने निवसति स्म । अतोऽहं ब्रवीमि--"यस्य बुद्धिर्बलं तस्य" इति । भासुरक बोला,-"भो ! तुझे इस बातसे क्या उस किलेमे स्थितभी उसे मुझे दिखा" । तब शशक बोला,-"जो ऐसा है तो आओ स्वामी " यह कहकर आगे चला । तब उसने आतेमें जो कूप देखा था उसी कूपको प्राप्त होकर वह भासुरकसे बोला,-"स्वामिन् ! आपका प्रताप कौन सह सक्ताहै । तुमको देखकर दूरसेही वह चोर सिंह अपने दुर्गमें प्रविष्ट हुआ है सो आओ मैं दिखाऊ" भासुरक बोला,-"मुझे वह दुर्ग दिखाओ" तब इसने वह कूप दिख- लाया। तब वहभी मूर्ख सिंह अपने प्रतिबिम्बको कूपमें स्थित देख सिंहनाद करता भया उसकी प्रतिध्वनिसे कूपसे दूना नाद उठा । उससे वह उसको शत्रु मानकर अपनेको उसके ऊपर डालकर प्राण छोडता भया । खरगोशभी प्रसन्न मनहो सब मृगोको आनंदित कर उनके साथ प्रशंसितहो यथासुखसे उस वनमे रहने लगा। इससे मैं कहताहू "जिसको बुद्धि है उसको बल है, " तद्यदि भवान् कथयति, तत्तत्रैव गत्वा तयोः स्वबुद्धि- प्रभावेण मैत्रीभेदं करोमि"। करटक आह--"भद्र ! यदि एवं तर्हि गच्छ, शिवास्ते पन्थानः सन्तु, यथाभिप्रेतमनु- ष्ठीयताम्" । अथ दमनकः सञ्जीवकवियुक्तं पिंगलकमव- लोक्य तत्रान्तरे प्रणम्याग्रे समुपविष्टः । पिंगलकोऽपि तमाह--"भद्र ! किं चिरात् दृष्टः?" दमनक आह--" न किञ्चिद्देवपादानाम्स्माभिः प्रयोजनम्, तेन अहं नाग- च्छामि । तथापि राजप्रयोजनविनाशमवलोक्य सन्दह्यमान- हृद्यो व्याकुलतया स्वयमेव अभ्यागतो वक्तुम् । उक्तञ्च- सो यदि आप कहें तो वहा जाकर उनका अपनी बुद्धिके प्रभावसे मैत्री- भेद करू" । करटक बोला,-"भद्र ! जो ऐसा है तो जाओ, तुम्हारे मार्ग
( ११० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ११० ) पञ्चतन्त्रम् । मंगलकारीहों,अभिलषित अनुष्ठान करो" । तब दमनक संजीवकसे अलग पिंग- लकको देखकर उसी समय प्रणामकर आगे बैठा, पिंगलक उससे बोला,- “भद्र ! बहुत दिनोंमें क्यों दिखे ?” दमनक बोला,-“श्रीमान्के चरणोंका हमसे कुछभी प्रयोजन नहीं है, इससे मैं नहीं आताहूं । तथापि राजप्रयोजनका नाश देखकर संदिग्ध हृदय हो व्याकुलतासे स्वयं ही कहनेको आयाहूं। कहा है- प्रियं वा यदि वा द्वेष्यं शुभं वा यदि वाशुभम् । अपृष्टोऽपि हितं वक्ष्येद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥ २६२ ॥ ” प्यारा वा द्वेषी शुभ या अशुभ विना पूछे हितू उससेकहै जिसके पराभवकी इच्छा नहो ॥ २६२ ॥” अथ तस्य साभिप्रायं वचनमाकर्ण्य पिंगलक आह-“किं वक्तुमना भवान् ? तत्कथ्यतां यत्कथनीयमस्ति” स प्राह- “देव ! सञ्जीवको युष्मत्पादानामुपरि द्रोहबुद्धिरिति विश्वा- सगतस्य मम विजने इदमाह-“भो दमनक ! दृष्टा मया अस्य पिंगलकस्य सारासारता तदहमेनं हत्वा सकलमृगा- धिपत्यं त्वत्साचिव्यपदवीसन्वितं करिष्यामि” इति। पिंगल- कोऽपि तद्वज्रसारप्रहारसदृशं दारुणं वचः समाकर्ण्य मोह- मुपगतो न किञ्चिदपि उक्तवान् दमनकोऽपि तस्य तमाकार- मालोक्य चिन्तितवान् । “अयं तावत्सञ्जीवकनिबद्धरागः तन्नूनमनेन मन्त्रिणा राजा विनाशमवाप्स्यतीति । उक्तञ्च- तब उसके अभिप्राय सहित वचनोंको सुनकर पिंगलक बोला,-“तुम क्या कहना चाहते हो?,सो जो कथनीय हो सो कहो”। वह बोला,-“देव ! संजीवक आपके चरणोंमें द्रोहबुद्धि रखता है, यह उसने मेरेकू विश्वाससे एकान्तमें कहा है- “भो दमनक ! मैने इस पिंगलक राजाकी सारासारता देखी सो मै इसको मारकर सब मृगोंका आधिपत्य तुझे मंत्रीपद देकर करूंगा” । पिंगलकभी वह वज्रसा- रके प्रहारकी समान दारुण वचनको सुनकर मोहको प्राप्त होकर कुछभी न कहता भया, दमनक उसके आकारको देख विचारने लगा । “यह तो संजीवकमें अनुरागी है, सो अवश्य इस मंत्रीसे राजा नाशको प्राप्त होगा । कहाभी है-
निर्विण्णस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा
भाषाटीकासमेतम्। (१११) एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदादास्येन निर्विद्यते । निर्विण्णस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणेष्वपि द्रुह्यते ॥२६३॥ जिस समय राजा एकही मन्त्रीको राज्यमे प्रमाण करता है, तब उसको मोहसे मद प्राप्त होता है, वह मदसे दास्यतासे निर्वेदताको प्राप्त होता है, निर्वेदताको प्राप्त हुए मनुष्योके हृदयमें स्वतन्त्रताकी इच्छा प्रवेश करती है और उस इच्छासे मन्त्री राजाको प्राणोंसेभी अलग कर देता ॥ २६३ ॥ तत् किमत्र युक्तम्” इति। पिंगलकोऽपि चेतनां समासाद्य कथमपि तमाह-“दमनक ! सञ्जीवकस्तावत् प्राणसमो भृत्यः स कथं ममोपरि द्रोहबुद्धिं करोति?”। दमनक आह-- “देव ! भृत्यो भृत्य इति अनैकान्तिकमेतत् । उक्तञ्च-- सो यहा क्या युक्त है”! पिंगलकभी चेतनाको प्राप्त होकर उससे बोला - “दमनक ! सजीवक तो मेरा प्राणोकी समान प्रिय भृत्य है वह किस प्रकार मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होगा?”। दमनक बोला-“देव भृत्य सदा भृत्य नहीं हो सकता । कहा है- न सोऽस्ति पुरुषो राज्ञां यो न कामयते श्रियम् । अशक्ता एव सर्वत्र नरेन्द्रं पर्युपासते ॥ २६४ ॥ " राजाके यहा वह पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीकी इच्छा न करे सर्वत्र अशक्त होकर पुरुष राजाकी उपासना करते हैं ॥ २६४ ॥” पिंगलक आह--“भद्र ! तथापि मम तस्योपरि चित्तवृत्तिर्न विकृतिं याति । अथवा साधु चेदमुच्यते- पिंगलक बोला,-“भद्र ! तोभी मेरी उसके ऊपर चित्तवृत्ति विकारको नहीं प्राप्त होती । अथवा ठीक कहा है-- अनेकदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः । कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः ॥ २६५ ॥” अनेक दोषोंसे दूषित होकरभी अपना शरीर किसको प्यारा नहीं है जो अपने संग अनुचित बर्ताव करके प्रिय हो वही प्रिय है-॥ २६५ ॥ ”
( ११२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ११२ ) पञ्चतन्त्रम् । दमनक आह-“अत एव अयं दोषः । उक्तञ्च- दमनक बोला,-“इसीसे तो यह दोष है । कहाभी है- यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोपयति पार्थिवः । अकुलीनः कुलीनो वा स श्रियो भाजनं नरः ॥ २६६ ॥ राजा जिसके ऊपर अधिक कृपादृष्टि करता है अकुलीन हो वा कुलीन वह मनुष्य लक्ष्मीका भागी होता है ॥ २६६ ॥ अपरं केन गुणविशेषेण स्वामी सञ्जीवकं निर्गुणकमपि निकटे धारयति?! अथ देव ! यदि एवं चिन्तयसि महाकायो यमनेन रिपून् व्यापादयिष्यामि, तदस्मात् न सिध्यति, यत्तोऽयं शष्पभोजी, देवपादानां पुनः शत्रवो मांसाशिनः । तत् रिपुसाधनमस्य साहाय्येन न भवति । तस्मादेनं दूष- यित्वा हन्यताम्” इति । पिंगलक आह-- इस कारण कौनसे गुणसे स्वामी निर्गुण संजीवकको अपने निकट धारण करते हो? सो देव ! यदि ऐसा विचारते हो कि,यह महाकायवान् है इसके द्वारा शत्रुओंको मारूंगा सोभी इससे सिद्ध नहीं होता कारण कि, यह घासभक्षी और श्रीमान्के चरणशत्रु मांसभक्षी हैं सो इसकी सहायतासे शत्रु साधन नहीं हो सकता है सो इसको दूषित कर मारिये” । पिंगलक बोला- “उक्तो भवति यः पूर्वं गुणवानिति संसदि । तस्य दोषो न वक्तव्यः प्रतिज्ञाभंगभीरुणा ॥ २६७ ॥ “यह गुणवान् है सभामे जिसके लिये ऐसा कहा है प्रतिज्ञाके भंगसे डरने- वालेको उसके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ २६७ ॥ अन्यच्च- और भी- मया अस्य तव वचनेन अभयप्रदानं दत्तम् । तत्कथं स्वयमेव व्यापादयामि। सर्वथा सञ्जीवकोऽयं सुहृदस्माकं न तं प्रति कश्चित् मन्युरिति । उक्तञ्च- मैंने तो तेरे वचनसे इसको अभय दिया है फिर कैसे स्वयं इसको मारूं। सब प्रकार यह सञ्जीवक सुहृत् है हमारा कुछभी उस पर क्रोध नहीं है। कहा है कि-
भाषाटीकासमेतम् । ( ११३ ) इतः स दैत्यः प्राप्तश्रीनैत एवार्हति क्षयम् । विषवृक्षोऽपि संवर्द्धर्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥ ( तारकासुरसे पीडित उसके वधार्थी देवताओं प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि, वह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं है कारण कि, स्वयं बढ़ाया हुआ विषवृक्षभी ( आप ) नहीं काटाजाता ॥ २६८ ॥ आदौ न वा प्रणयिनां प्रणयो विधेयो दत्तोऽथवा प्रतिदिनं परिपोषणीयः । उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्प्रकरोति लज्जां भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥ प्रथम तो प्रणयिजनोंको प्रणय ( प्रेम ) नहीं करना चाहिये और करे तो फिर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोड़ा जाता है वह लज्जा करताहै कारण कि, पृथ्वीमे स्थितको गिरनेका भय नहीं है ॥ २६९ ॥ उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ २७० ॥ जो उपकारियोंका भला करता है उसके उपकारीपनमें क्या गुणहै जो अप- कारियोंमें साधु है सत्पुरुषोंने उसीको साधु कहा है ॥ २७० ॥ तद्द्रोहबुद्धेरपि मया अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्” । दमनक आह-“स्वामिन् ! नैष राजधर्मो यद्द्रोहबुद्धेरपि क्षम्यते । उक्तञ्च- सो इस द्रोहबुद्धिपरभी मैं विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा” । दमनक बोला,- “स्वामिन् ! यह राजधर्म नहीं है कि, द्रोहबुद्धिको क्षमा किया जाय। कहाभी है- तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् । अर्द्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ २७१ ॥ तुल्यधन, तुल्य सामर्थ्य, मर्म जाननेवाले उद्योगी अर्धराज हरनेवाले भृत्यको जो 'नहीं मारताहै वह मारा जाता है ॥ २७१ ॥ अपरं त्वया अस्य सखित्वात् सर्वोऽपि राजधर्मः परि- त्यक्तो राजधर्माभावात सर्वोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यः ८
( ११४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ११४ ) पञ्चतन्त्रम् । संजीवकः शष्पभोजी, भवान् मांसादः तव प्रकृतयश्च । यत्तव अवध्यव्यवसायबाह्यं कुतस्तासां मांसाशनम् । यद्र- हितास्ताः त्वां त्यक्त्वा यास्यन्ति । ततोऽपि त्वं विनष्ट एव अस्य सङ्गत्या पुनस्ते न कदाचित् आखेटके मतिर्भवि- ष्यति । उक्तञ्च- और आपने तो इसकी मित्रतासे सम्पूर्ण ही राजधर्म त्याग न करदियाहे। राज- धर्मके अभावसे सम्पूर्ण परिजन विरक्त होकर गये, जो यह संजीवक तृणभोजी आप मांसभक्षी और आपके प्रकृति (कुटुम्ब) भी, जो कि अब मांस भक्षण तुम्हारे पराक्रमसे बाह्य होगयाँ (तुम उद्योग नहीं करतेहो) तो फिर वह मांस कहासे खायेंगे इसकारण वे तुमको त्यागन कर चले जायेंगे । इसीसे तुम विनष्ट होंगे । इसकी संगतिसं तुम्हारी आखेटमें कभी बुद्धि नहीं होगी । कहाहै- यादृशः सेव्यते भृत्यैर्यादृशांश्चोपसेवते । कदाचिन्नात्र सन्देहस्तादृग्भवति पूरुषः ॥ २७२ ॥ जब जो जैसे भृत्योंसे सेवन किया जाता है वा जो जैसोंको सेवन करता है इसमें सन्देह नहीं वह पुरुष वैसाही होजाताहै ॥ २७२ ॥ तथाच- तैसेही- सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते । स्वातौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकं प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते ॥ २७३ ॥ तपेहुए लोहेपर पडेहुएँ जलका नाममात्रभी नहीं :विदित होता है और वही कमलपत्रके ऊपर मोतीके आकारमें स्थितहुआ शोभा पाता है, स्वा- तिनक्षत्रमें सागरमें सीपीमें प्रवेशकर वही मोती होजाता है, प्रायः संगतिसे अधम, मध्यम, उत्तम गुण होजाते हैं ॥ २७३ ॥ तथाच- और देखो--