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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

१८ राजयोग

१८ राजयोग

को एकत्र करके भीतर की ओर मोड़कर वे जानना चाहते हैं कि भीतर क्या हो रहा है। इसमे केवल विश्वास की कोई बात नही, यह तो दार्शनिको के मनस्तत्त्व-विश्लेषण का फल मात्र है। आधुनिक शरीरतत्त्ववित् पण्डितो का कथन है कि आंखे यथार्थतः दर्शन का करण नही है, वह करण तो मस्तिष्क के अन्तर्गत स्नायु-केन्द्र मे अवस्थित है। समस्त करणो के सम्बन्ध मे ठीक ऐसा ही समझना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि मस्तिष्क जिस पदार्थ से निर्मित है, ये केन्द्र भी ठीक उसी पदार्थ से बने हैं। सांख्य-मतानुयायी भी ऐसा ही कहते हैं। भेद यह है कि सांख्य का सिद्धान्त आध्यात्मिकता की ओर झुका हुआ है और वैज्ञानिको का भौतिकता की ओर। फिर भी दोनो एक ही बात है। हमें इससे अतीत राज्य का अन्वेषण करना होगा।

योगी प्रयत्न करते है कि वे अपने को ऐसा सूक्ष्म अनुभूति-सम्पन्न कर ले, जिससे वे विभिन्न मानसिक अवस्थाओ को प्रत्यक्ष कर सके। समस्त मानसिक प्रक्रियाओ को पृथक्-पृथक् रूप से मानस-प्रत्यक्ष करना आवश्यक है। इन्द्रिय-गोलको पर विषयो का आघात होते ही उससे उत्पन्न हुई संवेदनाएँ उस-उस करण की सहायता से किस तरह स्नायु में से होती हुई जाती है, मन किस प्रकार उनको ग्रहण करता है, किस प्रकार फिर वे निश्चयात्मिका बुद्धि के पास जाती है, तत्पश्चात् किस प्रकार पुरुष के पास उपनीत होती है—इन समस्त व्यापारो को पृथक्-पृथक् रूप से देखना होगा। प्रत्येक विषय की शिक्षा की अपनी एक निर्दिष्ट प्रणाली है। कोई भी विज्ञान क्यो न सीखो, पहले अपने आपको उसके लिए तैयार करना होगा, फिर एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा। इसके अतिरिक्त उस विज्ञान के सिद्धान्तों

अवतरणिका १९

को समझने का और कोई दूसरा उपाय नही है। राजयोग के सम्बन्ध मे भी ठीक ऐसा ही है।

भोजन के सम्बन्ध मे कुछ नियम आवश्यक हैं। जिससे मन खूब पवित्र रहे, ऐसा भोजन करना चाहिए। तुम यदि किसी चिड़ियाघर मे जाओ, तो भोजन के साथ जीव का क्या सम्बन्ध है यह भलीभाँति समझ में आ जायगा। हाथी बड़ा भारी प्राणी है, परन्तु उसकी प्रकृति बड़ी शान्त है। और यदि तुम सिंह या बाघ के पिंजडे की ओर जाओ, तो देखोगे, वे बड़े चंचल है। इससे समझ में आ जाता है कि आहार का तारतम्य कितना भयानक परिवर्तन कर देता है। हमारे शरीर के अन्दर जितनी शक्तियाँ खेल कर रही हैं, वे सारी आहार से पैदा हुई है। और यह हम प्रतिदिन प्रत्यक्ष देखते हैं। यदि तुम उपवास करना आरम्भ कर दो, तो तुम्हारा शरीर दुर्बल हो जायगा, दैहिक शक्तियो का ह्रास हो जायगा और कुछ दिनो बाद मानसिक शक्तियाँ भी क्षीण होने लगेगी। पहले स्मृति-शक्ति जाती रहेगी, फिर ऐसा एक समय आयगा, जब सोचने के लिए भी सामर्थ्य न रह जायगी—किसी विषय पर गम्भीर रूप से विचार करना तो दूर की बात रहे। इसीलिए साधना की पहली अवस्था मे, भोजन के सम्बन्ध मे विशेष ध्यान रखना होगा, फिर बाद में साधना मे विशेष अग्रसर हो जाने पर उतना सावधान न रहने से भी चलेगा। जब तक पौधा छोटा रहता है, तब तक उसे घेर कर रखते हैं, नही तो जानवर उसे चर जायें। उसके बड़े हो जाने पर घेरा आवश्यक नही रह जाता। तब वह सारे आघात झेल सकता है।

योगी को अधिक विलास और कठोरता दोनो का ही

२० राजयोग

त्याग करना चाहिए। उनके लिए उपवास करना या देह को किसी प्रकार कष्ट देना उचित नही। गीताकार कहते हैं, जो अपने को अनर्थक क्लेश देते हैं, वे कभी योगी नही हो सकते। अतिभोजनकारी, उपवासशील, अधिक जागरणशील, अधिक निद्रालु, अत्यन्त कर्मी अथवा बिलकुल आलसी—इनमे से कोई भी योगी नही हो सकता।

"नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
युक्ताहारविहारस्य युवतचेष्टस्य कर्मसु ।
युवतस्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥"*


* गीता, ६।१६-१७

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय

साधना के प्राथमिक सोपान

राजयोग आठ अंगों में विभक्त है। पहला है यम—अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। दूसरा है नियम—अर्थात् शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय (अध्यात्म-शास्त्रपाठ) और ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् ईश्वर को आत्म-समर्पण। तीसरा है आसन—अर्थात् बैठने की प्रणाली। चौथा है प्राणायाम। पाँचवाँ है प्रत्याहार—अर्थात् मन की विषयाभिमुखी गति को फेरकर उसे अन्तर्मुखी करना। छठा है धारणा अर्थात् एकाग्रता। सातवाँ है ध्यान। और आठवाँ है समाधि अर्थात् ज्ञानातीत अवस्था। हम देख रहे हैं, यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योग-साधना सिद्ध न होगी। यम और नियम के दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरम्भ कर देते हैं। इनके न रहने पर साधना का कोई फल न होगा। योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण न करे। मनुष्य ही नहीं, वरन् अन्य प्राणियों के विरुद्ध भी हिंसा का भाव न रहे, दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध न रहे, वरन् वह और भी फैलकर मानो सारे संसार का आलिंगन कर ले।

यम और नियम के बाद आसन आता है। जब तक बहुत उच्च अवस्था की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक रोज नियमानुसार कुछ शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। अतएव जिससे दीर्घकाल तक एक भाव से बैठा जा सके, ऐसे

३२ राजयोग

३२ राजयोग

एक आसन का अभ्यास आवश्यक है। जिनको जिस आसन से सुभीता मालूम होता हो, उनको उसी आसन पर बैठना चाहिए। एक व्यक्ति के लिए एक प्रकार से बैठकर सोचना सहज हो सकता है, परन्तु दूसरे के लिए, सम्भव है, वह बहुत कठिन जान पड़े। हम बाद में देखेंगे कि योग-साधना के समय शरीर के भीतर नाना प्रकार के कार्य होते रहते हैं। स्नायविक शक्तिप्रवाह की गति को फेरकर उसे नए रास्ते से दौड़ाना होगा, तब शरीर में नए प्रकार के कम्पन या क्रिया शुरू होगी, सारा शरीर मानो नए रूप से गठित हो जायगा। इस क्रिया का अधिकांश मेरुदण्ड के भीतर होगा, इसलिए आसन के सम्बन्ध में इतना समझ लेना होगा कि मेरुदण्ड को सहज भाव से रखना आवश्यक है—ठीक सीधा बैठना होगा—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक सीधे और समुन्नत रहे, जिससे देह का सारा भार पसलियों पर पड़े। यह तुम सहज ही समझ सकोगे कि वक्ष यदि नीचे की ओर झुका रहे, तो किसी प्रकार का उच्च चिन्तन करना सम्भव नहीं। राजयोग का यह भाग हठयोग से बहुत-कुछ मिलता जुलता है। हठयोग केवल स्थूल देह को लेकर व्यस्त रहता है। इसका उद्देश्य केवल स्थूल देह को सबल बनाना है। हठयोग के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसकी क्रियाएँ बहुत कठिन हैं। एक दिन में उसकी शिक्षा भी सम्भव नहीं। फिर, उससे कोई आध्यात्मिक उन्नति भी नहीं होती। डेलसर्ट और अन्यान्य व्यायाम-आचार्यों के ग्रन्थों में इन क्रियाओं के अनेक अङ्ग देखने को मिलते हैं। उन लोगों ने भी शरीर को भिन्न-भिन्न स्थितियों में रखने की व्यवस्था की है। हठयोग की तरह उनका भी उद्देश्य दैहिक उन्नति है, आध्यात्मिक उन्नति नहीं। शरीर की ऐसी कोई पेशी नहीं, जिसे

साधना के प्राथमिक सोपान २३

हठयोगी अपने वश मे न ला सके। हृदय-यंत्र उसकी इच्छा के अनुसार बंद किया या चलाया जा सकता है —शरीर के सारे अंश वह अपनी इच्छानुसार चला सकता है।

मनुष्य किस प्रकार दीर्घजीवी हो, यही हठयोग का एकमात्र उद्देश्य है। शरीर किस प्रकार पूर्ण स्वस्थ रहे, यही हठयोगियो का एकमात्र लक्ष्य है। हठयोगियो का यही दृढ़ सकल्प है कि मुझे और पीडा न हो। और इस दृढ़ संकल्प के बल से उनको पीडा होती भी नही। वे दीर्घजीवी हो सकते है, सौ वर्ष तक जीवित रहना तो उनके लिए मामूली-सी बात है। उनकी १५० वर्ष की आयु हो जाने पर भी, देखोगे, वे पूर्ण युवा और सतेज है, उनका एक केश भी सफेद नही हुआ किन्तु इसका फल बस यही तक है। वटवृक्ष भी कभी-कभी ५००० वर्ष जीवित रहता है, किन्तु वह वटवृक्ष का वटवृक्ष ही बना रहता है। फिर वे लोग भी यदि उसी तरह दीर्घजीवी हुए, तो उससे क्या ? वे बस एक बडे स्वस्थकाय जीव भर रहते है। हठ-योगियो के दो-एक साधारण उपदेश बडे उपकारी है। सिर की पीडा होने पर, शय्या-त्याग करते ही नाक से शीतल जल पीए, इससे सारा दिन मस्तिष्क अत्यन्त शीतल रहेगा और कभी सर्दी न होगी। नाक से पानी पीना कोई कठिन काम नही, बडा सरल है। नाक को पानी के भीतर डुबाकर गले मे पानी खींचते रहो। पानी अपने-आप ही धीरे-धीरे भीतर जाने लगेगा।

आसन सिद्ध होने पर, किसी-किसी सम्प्रदाय के मतानुसार नाडी-शुद्धि करनी पड़ती है। बहुत से लोग यह सोचकर कि यह राजयोग के अन्तर्गत नहीं है, इसकी आवश्यकता स्वीकार नहीं करते। परन्तु जब शंकराचार्य जैसे भाष्यकार ने इसका विधान

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राजयोग

किया है तब मेरे लिए भी इसका उल्लेख करना उचित जान पड़ता है। मैं श्वेताश्वतर उपनिषद् पर उनके भाष्य* से इस सम्बन्ध मे उनका मत उद्धृत करूँगा—"प्राणायाम के द्वारा जिस मन का मैल घुल गया है, वही मन ब्रह्म में स्थिर होता है। इसलिए शास्त्रो मे प्राणायाम के विषय का उल्लेख है। पहले नाडी-शुद्धि करनी पडती है तभी प्राणायाम करने की शक्ति आती है। अंगूठे से दाहिना नथुना दवाकर वाएँ नथुने से यथाशक्ति वायु अन्दर खींचो, फिर बीच मे तनिक देर भी विश्राम किए बिना वाईं नासिका वन्द करके दाहिनी नासिका से वायु निकालो। फिर दाहिनी नासिका से वायु ग्रहण करके बाईं नासिका से निकालो। दिन भर मे चार बार अर्थात् उषा, मध्याह्न, सायाह्न और निशीथ, इन चार समय पूर्वोक्त क्रिया का तीन बार या पाँच बार अभ्यास करने पर, एक पक्ष या महीने भर मे नाडी-शुद्धि हो जाती है। उसके बाद प्राणायाम पर अधिकार होगा।"

सदा अभ्यास आवश्यक है। तुम रोज देर तक बैठे हुए मेरी बात सुन सकते हो, परन्तु अभ्यास किए बिना तुम एक कदम भी आगे नही बढ़ सकते। सब कुछ साधना पर निर्भर है। प्रत्यक्ष अनुभूति बिना इन तत्त्वो का कुछ भी समझ मे नही आता। स्वय अनुभव करना होगा, केवल व्याख्या और मत


  • प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्त ब्रह्मणि स्थित भवतीति प्राणायामो निर्दिश्यते। प्रथम नाडीशोधन कर्तव्यम्। तत प्राणायामे अधिकार। दक्षिण-नासिकापुटमंगुल्यावष्टभ्य वामेन वायु पूरयेत् यथाशक्ति। ततोऽनन्तर-मुत्सृज्यैव दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत्। सव्यमपि धारयेत्। पुनर्दक्षिणेन पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेत् यथाशक्ति। त्रि पञ्चकृत्वो वा एव अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षान्मासात् विशुद्धिर्भवति।

श्वेताश्वतर उपनिषद्, शांकरभाष्य—द्वितीय अध्याय, अष्टम श्लोक।

साधना के प्राथमिक सोपान २५

सुनने से न होगा। फिर साधना मे बहुत से विघ्न भी हैं। पहला तो व्याधिग्रस्त देह है। शरीर स्वस्थ न रहे, तो साधना मे बाधा पडती है। अत शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। किस प्रकार का खान-पान करना होगा, किस प्रकार जीवन यापन करना होगा, इन सब बातो की ओर हमे विशेष ध्यान देना होगा। मन से सोचना होगा कि शरीर सबल हो—जैसा कि यहाँ के क्रिश्चियन साइन्स* मतावलम्बी करते है। बस, शरीर के लिये फिर और कुछ करने की जरूरत नही। यह हम कभी न भूले कि स्वास्थ्य उद्देश्य के साधन का एक उपाय मात्र है। यदि स्वास्थ्य ही उद्देश्य होता, तो हम तो पशुतुल्य हो गए होते। पशु प्राय अस्वस्थ नही होते।

दूसरा विघ्न है सन्देह। हम जो कुछ नही देख पाते, उसके सम्बन्ध मे सन्दिग्ध हो जाते हैं। मनुष्य कितनी भी चेष्टा क्यो न करे, वह केवल बात के भरोसे नही रह सकता। यही कारण है कि योगशास्त्रोक्त सत्यता के सम्बन्ध मे सन्देह उपस्थित हो जाता है। यह सन्देह बहुत अच्छे आदमियो में भी देखने को मिलता है। परन्तु साधना का श्रीगणेश कर देने पर बहुत थोडे दिनो में ही कुछ-कुछ अलौकिक व्यापार देखने को


*क्रिश्चियन साइन्स (Christian Science)—यह सम्प्रदाय मिसेज एड्डि नामक एक अमेरिकन महिला द्वारा प्रतिष्ठित हुआ है। इनके मतानुसार सचमुच जड नामक कोई पदार्थ नही, वह हमारे मन का केवल भ्रम है। विश्वास करना होगा—‘हमें कोई रोग नहीं,’ तो हम उसी समय रोगमुक्त हो जायँगे। इसका ‘क्रिश्चियन साइन्स’ नाम पडने का कारण यह है कि इसके मतावलम्बी कहते हैं, “हम ईसा का ठीक-ठीक पदानुसरण कर रहे हैं। ईसा ने जो अद्भुत क्रियाएँ की थी, हम भी वैसा करने में समर्थ है, और सब प्रकार से दोषशून्य जीवन यापन करना हमारा उद्देश्य है।”

२६ राजयोग

मिलेंगे, और तब साधना के लिए तुम्हारा उत्साह बड़ जायगा। योगशास्त्र के एक टीकाकार ने कहा भी है, "योगशास्त्र की सत्यता के सम्बन्ध मे यदि एक बिलकुल सामान्य प्रमाण भी मिल जाय, तो उतने से ही सम्पूर्ण योगशास्त्र पर विश्वास हो जायगा।" उदाहरणस्वरूप तुम देखोगे कि कुछ महीनो की साधना के वाद तुम दूसरो का मनोभाव समझ सक रहे हो, वे तुम्हारे पास तस्वीर के रूप में आयेंगे, यदि बहुत दूर पर कोई शब्द या बातचीत हो रही हो, तो मन एकाग्र करके सुनने की चेष्टा करने से ही तुम उसे सुन लोगे। पहले पहल अवश्य ये व्यापार बहुत थोडा-थोडा करके दिखेंगे। परन्तु उसी से तुम्हारा विश्वास, बल और आशा बढती रहेगी। मान लो, नासिका के अग्रभाग मे तुम चित्त का सयम करने लगे, तब तो थोडे ही दिनो मे तुम्हे दिव्य सुगन्ध मिलने लगेगी, इसी से तुम समझ जाओगे कि हमारा मन कभी-कभी वस्तु के प्रत्यक्ष सस्पर्श मे न आकर भी उसका अनुभव कर लेता है। पर यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि इन सिद्धियो का और कोई स्वतन्त्र मूल्य नही, वे हमारे प्रकृत उद्देश्य के साधन में कुछ सहायता मात्र करती हैं। हमे याद रखना होगा कि इन सब साधनो का एकमात्र लक्ष्य, एकमात्र उद्देश्य 'आत्मा की मुक्ति' है। प्रकृति को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लेना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है। इसके सिवा और कुछ भी हमारा प्रकृत लक्ष्य नही हो सकता। मामूली सिद्धियों से सन्तुष्ट हो गए, तो पूरा न पडेगा। हम ही प्रकृति पर प्रभुत्व करेंगे, प्रकृति को अपने ऊपर प्रभुत्व न करने देगे। शरीर या मन कुछ भी हम पर प्रभुत्व न कर सके। हम यह कभी न भूले कि 'शरीर हमारा है'—'हम शरीर के नही'।

साधना के प्राथमिक सोपान

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एक देवता और एक असुर किसी महापुरुष के पास आत्म-जिज्ञासु होकर गए । उन्होने उन महापुरुष के पास एक अरसे तक रहकर शिक्षा प्राप्त की । कुछ दिन बाद उन महापुरुष ने उनसे कहा, “तुम लोग जिसको खोज रहे हो, वह तो तुम ही हो ।” उन लोगो ने सोचा, “तो देह ही आत्मा है ।” फिर उन लोगों ने यह सोचकर कि जो कुछ मिलना था मिल गया, सन्तुष्ट-चित्त से अपनी-अपनी जगह को प्रस्थान किया । उन लोगो ने जाकर अपने-अपने आत्मीय जनो से कहा, “जो कुछ सीखना था, सब सीख आए । अब आओ, भोजन, पान और आनन्द मे दिन बिताएँ—हम ही वह आत्मा है, इसके सिवा और कोई पदार्थ नही ।” उस असुर का स्वभाव अज्ञान से ढका हुआ था, इसलिए इस विषय मे उसने अधिक अन्वेषण नही किया । अपने को ईश्वर समझकर वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो गया, उसने ‘आत्मा’ शब्द से देह समझी । परन्तु देवता का स्वभाव अपेक्षाकृत पवित्र था । वे भी पहले इस भ्रम मे पडे थे कि “ ‘मैं’ का अर्थ यह शरीर ही है, यह देह ही ब्रह्म है, इसलिए इसे स्वस्थ और सबल रखना, सुन्दर स्वच्छ वस्त्रादि पहनना और सब प्रकार के दैहिक सुखो का सम्भोग करना ही कर्तव्य है ।” परन्तु कुछ दिन जाने पर उन्हे यह बोध होने लगा कि गुरु के उपदेश का अर्थ यह नही हो सकता कि देह ही आत्मा है, वरन् देह से भी श्रेष्ठ कुछ अवश्य है । तब उन्होने गुरु के निकट आकर पूछा, “गुरो, आपके वाक्य का क्या यह तात्पर्य है कि देह ही आत्मा है? परन्तु यह कैसे हो सकता है ? सभी शरीर तो नष्ट होते है, पर आत्मा का तो नाश नही । ” आचार्य ने कहा, “तुम स्वय इसका निर्णय करो, तुम वही हो—तत्त्वमसि ।” तब शिष्य ने सोचा, शरीर के-

-२८ राजयोग

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भीतर जो प्राण है, शायद उनको लक्ष्य कर गुरु ने पूर्वोक्त उपदेश दिया था। वे वापस चले गए। परन्तु फिर शीघ्र ही देखा कि भोजन करने पर प्राण तेजस्वी रहते है और न करने पर मुरझाने लगते हैं। तब वे पुन गुरु के पास आए और कहा, "गुरो, आपने क्या प्राणों को आत्मा कहा है?" गुरु ने कहा, "स्वय तुम इसका निर्णय करो, तुम वही हो।" उस अध्यवसायशील शिष्य ने गुरु के यहाँ से लौटकर सोचा, "तो शायद मन ही आत्मा होगा।" परन्तु वे शीघ्र ही समझ गए कि मनोवृत्तियाँ बहुत तरह की हैं, मन में कभी साधु-वृत्ति, तो कभी असत्-वृत्ति उठती है, अत मन इतना परिवर्तनशील है कि वह कभी आत्मा नही हो सकता। तब फिर से गुरु के पास आकर उन्होने कहा, "मन आत्मा है, ऐसा तो मुझे नही जान पडता। आपने क्या ऐसा ही उपदेश दिया है?" गुरु ने कहा, "नही, तुम ही वह हो, तुम स्वय इसका निर्णय करो।" वे देवपुगव फिर लौट गए, तब उनको यह ज्ञान हुआ, "मैं समस्त मनोवृत्तियो के अतीत एकमेवाद्वितीय आत्मा हूँ। मेरा जन्म नही, मृत्यु नही, मुझे तलवार नही काट सकती, आग नही जला सकती, हवा नही सुखा सकती, जल नही गला सकता, मै अनादि हूँ, जन्मरहित, अचल, अस्पर्श, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान पुरुष हूँ। आत्मा शरीर या मन नही, वह तो इन सबके अतीत है।" इस प्रकार देवता मे ज्ञान का उदय हुआ और वे तत्प्रसूत आनन्द से तृप्त हो गए। पर उस असुर विचारे को सत्यलाभ न हुआ, क्योकि देह मे उसकी अत्यन्त आसक्ति थी।

इस जगत् मे ऐसी असुर-प्रकृति के अनेक लोग है, फिर भी देवता-प्रकृतिवाले बिलकुल ही न हो, ऐसा नही। यदि कोई कहे, - "आओ, तुम लोगो को मैं एक ऐसी विद्या सिखाऊँगा, जिससे

साधना के प्राथमिक सोपान २९

तुम्हारा इन्द्रिय-सुख अनन्तगुना बढ जायगा,” तो अगणित लोग उसके पास दौड पडेगे। परन्तु यदि कोई कहे, “आओ, मै तुम लोगो को तुम्हारे जीवन का चरम लक्ष्य परमात्मा का विषय सिखलाऊँ,” तो शायद उनकी बात की कोई परवाह भी न करेगा। ऊँचे तत्त्व की धारणा करने की शक्ति वहुत कम लोगो मे देखने को मिलती है, सत्य को प्राप्त करने के लिए अध्यवसाय-शील लोगो की सख्या तो और भी विरली है। पर ससार मे ऐसे महापुरुष भी है, जिनकी यह निश्चित धारणा है कि शरीर चाहे हजार वर्ष रहे या लाख वर्ष, अन्त मे गति एक ही होगी। जिन शक्तियो के बल से देह कायम है, उनके चले जाने पर देह न रहेगी। कोई भी व्यक्ति पल भर के लिए भी शरीर का परिवर्तन रोकने मे समर्थ नही हो सकता। शरीर और है क्या? वह कुछ सतत-परिवर्तनशील परमाणुओ की समष्टि मात्र है। नदी के दृष्टान्त से यह तत्त्व सहज बोधगम्य हो सकता है। तुम अपने सामने नदी मे जलराशि देख रहे हो, वह देखो, पल भर मे वह चली गई और उसकी जगह एक नयी जलराशि आ गई। जो जलराशि आई, वह सम्पूर्ण नयी है, परन्तु देखने मे पहली ही जलराशि की तरह है। शरीर भी ठीक इसी तरह सतत परिवर्तन-शील है। उसके इस प्रकार परिवर्तनशील होने पर भी उसे स्वस्थ और वलिष्ठ रखना आवश्यक है, क्योकि शरीर की सहायता से ही हमे ज्ञान की प्राप्ति करनी होगी। इसके सिवा और कोई उपाय नही।

सब प्रकार के शरीरो मे मानव-देह ही श्रेष्ठतम है, मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है। मनुष्य सब प्रकार के निकृष्ट प्राणियो से—यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है। मनुष्य से

-३० राजयोग

-३० राजयोग

श्रेष्ठतर जीव और नही। देवताओ को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्य-देह धारण करनी पडती है। एकमात्र मनुष्य ही ज्ञान-लाभ का अधिकारी है, देवता भी इसमे वञ्चित है। यहूदी और मुसलमानों के मत मे, ईश्वर ने, देवता और अन्यान्य समुदाय सृष्टियो के बाद मनुष्य की सृष्टि करके, देवताओं से मनुष्य को प्रणाम और अभिनन्दन कर आने के लिए कहा। इब्लिस को छोडकर बाकी सबने ऐसा किया। अतएव ईश्वर ने इब्लिस को अभिशाप दे दिया। इससे वह शैतान बन गया। उक्त रूपक के अन्दर यह महान् सत्य निहित है कि ससार मे मनुष्य-जन्म ही अन्य सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। पशु आदि तिर्यक्-सृष्टि तम प्रधान है। पशु किसी ऊँचे तत्त्व की धारणा नहीं कर सकते। देवता भी मनुष्य-जन्म लिए बिना मुक्तिलाभ नहीं कर सकते। देखो, मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए अधिक धन अनुकूल नही। फिर बिलकुल निर्धन होने पर भी उन्नति दूर रहती है। ससार मे जितने महात्मा पैदा हुए है, सभी मध्यम श्रेणी के लोगो से हुए थे। मध्यम श्रेणीवालो में सब विरोधी शक्तियो का समन्वय रहता है।

अब हम यथार्थ विषय पर आएँ। हमें अब प्राणायाम के सम्बन्ध मे आलोचना करनी चाहिए। देखें, चित्तवृत्तियो के निरोध से प्राणायाम का क्या सम्बन्ध है। श्वास-प्रश्वास मानो देह-यन्त्र का गतिनियामक मूल यन्त्र (fly-wheel) है। एक बृहत् इजिन पर निगाह डालने पर देखोगे कि एक बडा चक्र घूम रहा है और उस चक्र की गति क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर यन्त्रो में सञ्चारित होती है। इस प्रकार उस इजिन के अत्यन्त सूक्ष्मतम यन्त्र तक गतिशील हो जाते हैं। श्वास-प्रश्वास ठीक वैसा ही एक गतिनियामक चक्र है। वही इस शरीर के सब अगो मे जहाँ

साधना के प्राथमिक सोपान ३१

जिस प्रकार की शक्ति की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति कर रहा है और उस शक्ति को नियमित कर रहा है।

एक राजा के एक मन्त्री था। किसी कारण से राजा उस पर नाराज हो गया। राजा ने उसे एक बडी ऊँची मीनार की चोटी मे कैद कर रखने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा का पालन किया गया। मन्त्री भी वहाँ कैद होकर मौत की राह देखने लगा। मन्त्री के एक पतिव्रता पत्नी थी। रात को उस मीनार के नीचे आकर उसने चोटी पर कैद हुए पति को पुकारकर पूछा, "मे किस प्रकार तुम्हारी रक्षा करूँ?" मन्त्री ने कहा, "अगली रात को एक लम्बा मोटा रस्सा, मजबूत डोरी, एक बडल सूत, रेशम का पतला सूत, एक गुबरैला और थोडा सा शहद लेती आना।" उसकी सहधर्मिणी पति की यह बात सुनकर बहुत आश्चर्यचकित हो गई। जो हो, वह पति की आज्ञानुसार दूसरे दिन सब वस्तुएँ ले गई। मन्त्री ने उससे कहा, "रेशम का सूत मजबूती से गुबरैले के पैर मे बाँध दो, उसकी मूँछो में एक बूंद शहद लगा दो और उसका सिर ऊपर की ओर करके उसे मीनार की दीवार पर छोड़ दो।" पतिव्रता ने सब आज्ञाओ का पालन किया। तब उस कीडे ने अपना लम्बा रास्ता पार करना शुरू किया। सामने शहद की महक पाकर मधु के लोभ से वह धीरे-धीरे ऊपर चढने लगा, और अन्त मे मीनार की चोटी पर जा पहुँचा। मन्त्री ने झट उसे पकड लिया और उसके साथ रेशम के सूत को भी। इसके बाद अपनी स्त्री से कहा, "बडल मे जो सूत है, उसे रेशम के सूत के छोर से बाँध दो।" इस तरह वह भी उसके हाथ मे आ गया। इसी उपाय से उसने डोरा और मोटा रस्सा भी पकड लिया। अब कोई कठिन काम न रह

३२ राजयोग

गया। रस्सा ऊपर बाँधकर वह नीचे उतरा और भाग खडा हुआ। हमारी इस देह में श्वास-प्रश्वास की गति मानो रेशमी सूत है। इसका धारण या संयम कर सकने पर पहले स्नायविक शक्तिप्रवाहरूप (nervous currents) सूत का बडल, फिर मनोवृत्तिरूप डोरी और अन्त मे प्राणरूप रस्से को पकड सकते हैं। प्राणो को जीत लेने पर मुक्ति प्राप्त होती है।

हम अपने शरीर के सम्बन्ध मे बडे अज्ञ हैं, कुछ जानकारी रखना भी हमे सम्भव नही मालूम पडता। बहुत हुआ तो हम मृत-देह को चीर-फाडकर देख सकते है कि उसके भीतर क्या है और क्या नही, और कोई-कोई इसके लिए किसी जीवित पशु की देह ले सकते हैं। पर उससे हमारे अपने शरीर का कोई सम्बन्ध नही। हम अपने शरीर के सम्बन्ध मे बहुत कम जानते हैं। इसका कारण क्या है ? यह कि हम मन को उतनी दूर तक एकाग्र नही कर सकते, जिससे हम शरीर के भीतर की अति सूक्ष्म गतियो तक को समझ सके। मन जब बाह्य विषयो का परित्याग कर देह के भीतर प्रविष्ट होता है और अत्यन्त सूक्ष्मावस्था प्राप्त करता है, तभी हम उन गतियो को जान सकते हैं। इस प्रकार सूक्ष्म अनुभूतिसम्पन्न होने के लिए हमे पहले स्थूल से आरम्भ करना होगा। देखना होगा, सारे शरीर-यन्त्र को चलाता कौन है, और उसे अपने वश मे लाना होगा। वह प्राण है, इसमे कोई सन्देह नही। श्वास-प्रश्वास ही उस प्राण-शक्ति का प्रत्यक्ष परिदृश्यमान रूप है। अब, श्वास-प्रश्वास के साथ धीरे-धीरे शरीर के भीतर प्रवेश करना होगा। इसी से हम देह के भीतर की सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियो के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त कर सकेगे और समझ सकेगे कि स्नायविक शक्तिप्रवाह किस तरह

साधना के प्राथमिक सोपान ३३

शरीर में सर्वत्र भ्रमण कर रहे हैं। और जब हम मन में उनका अनुभव कर सकेगे, तब वे, और उनके साथ देह भी हमारे अधिकार मे आ जायगी। मन भी इन सब स्नायविक शक्ति-प्रवाहों द्वारा संचालित हो रहा है। इसीलिए उन पर विजय पाने से मन और शरीर दोनो ही हमारे अधीन हो जाते हैं, हमारे दास बन जाते हैं। ज्ञान ही शक्ति है, और यह शक्ति प्राप्त करना ही हमारा उद्देश्य है। अतएव स्नायुओ के भीतर जो शक्तिप्रवाह सतत चल रहे है, उनके और शरीर के सम्बन्ध मे ज्ञान प्राप्त कर लेना विशेष आवश्यक है। इसलिए हमे प्राणायाम से प्रारम्भ करना होगा। इस प्राणायाम-तत्त्व की विशेष आलोचना के लिए दीर्घ समय की आवश्यकता है—इसको अच्छी तरह समझाते बहुत दिन लगेगे। हम क्रमश उसका एक-एक अश लेकर आलोचना करेगे।

हम क्रमश समझ सकेगे कि प्राणायाम के साधन मे जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनका हेतु क्या है और प्रत्येक क्रिया से देह के भीतर किस प्रकार की शक्ति प्रवाहित होती है। क्रमश यह सब हमे बोधगम्य हो जायगा। परन्तु इसके लिए निरन्तर साधना आवश्यक है। साधना के द्वारा ही मेरी बात की सत्यता का प्रमाण मिलेगा। मै इस विषय मे कितनी भी युक्तियो का प्रयोग क्यो न करूँ, पर तुम्हे उस समय तक कोई भी उपादेय न जान पड़ेगी, जब तक तुम स्वय प्रत्यक्ष न कर लोगे। जब देह के भीतर इन शक्तियो के प्रवाह की गति स्पष्ट अनुभव करने लगोगे, तभी सारे सशय दूर होगे। परन्तु इसके अनुभव के लिए प्रत्यह कठोर अभ्यास आवश्यक है। प्रतिदिन कम-से-कम दो बार अभ्यास करना चाहिए, और उस अभ्यास का उपयुक्त समय है प्रात और साय। जब रात बीतती है और पौ फटती है तथा जब

३४ राजयोग

दिन बीतता है और रात आती है, इन दो समयो मे प्रकृति अपेक्षाकृत शान्त भाव धारण करती है। ब्राह्ममुहूर्त और गोधूलि ये दो समय मन की स्थिरता के लिए अनुकूल हैं। इन दो समय शरीर बहुत-कुछ शान्तभावापन्न रहता है। इस समय साधना करने से प्रकृति हमारी काफी सहायता करेगी, इसलिए इन्ही दो समयो में साधना करना आवश्यक है। यह नियम बना लो कि साधना समाप्त किए बिना भोजन न करोगे। ऐसा नियम बना लेने पर भूख का प्रबल वेग ही तुम्हारा आलस्य नष्ट कर देगा। भारत-वर्ष मे बालक यही शिक्षा पाते है कि स्नान-पूजा और साधना किए बिना भोजन नही करना चाहिए। कालान्तर मे यह उनके लिए स्वाभाविक हो जाता है, उनकी जब तक स्नान-पूजा और साधना समाप्त नही हो जाती, तब तक उन्हे भूख नही लगती।

तुममे से जिनको सुभीता हो, वे साधना के लिए यदि एक स्वतंत्र कमरा रख सके, तो अच्छा हो। इस कमरे को सोने के काम मे न लाओ। इसे पवित्र रखो। बिना स्नान किए और शरीर-मन को बिना शुद्ध किए इस कमरे मे प्रवेश न करो। इस कमरे मे सदा पुष्प और हृदय को आनन्द देनेवाले चित्र रखो। योगी के लिए ऐसे वातावरण मे रहना बहुत उत्तम है। सुबह और शाम वहाँ धूप और चन्दन-चूर्ण आदि जलाओ। उस कमरे में किसी प्रकार का क्रोध, कलह और अपवित्र चिन्तन न किया जाय। तुम्हारे साथ जिनके भाव मिलते है, केवल उन्ही को उस कमरे मे प्रवेश करने दो। ऐसा करने पर शीघ्र वह कमरा सत्त्वगुण से पूर्ण हो जायगा, यहाँ तक कि, जब किसी प्रकार का दुख या सशय आए अथवा मन चचल हो, तो उस समय उस कमरे मे प्रवेश करते ही तुम्हारा मन शान्त हो जायगा। मन्दिर, गिरजाघर

साधना के प्राथमिक सोपान ३५

आदि के निर्माण का सच्चा उद्देश्य यही था। अब भी बहुत से मन्दिरो और गिरजाघरो मे यह भाव देखने को मिलता है; परन्तु अधिकतर स्थलो मे लोग इनका उद्देश्य तक भूल गए हैं। चारो ओर पवित्र चिन्तन के परमाणु सदा स्पन्दित होते रहने के कारण वह स्थान पवित्र ज्योति से भरा रहता है। जो इस प्रकार के स्वतन्त्र कमरे की व्यवस्था नही कर सकते, वे जहाँ इच्छा हो वही बैठकर साधना कर सकते है। शरीर को सीधा रखकर बैठो। ससार मे पवित्र चिन्तन का एक स्रोत बहा दो। मन-ही-मन कहो—ससार मे सभी सुखी हो, सभी शान्ति लाभ करे, सभी आनन्द पावे। इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चहुँ ओर पवित्र चिन्तन की धारा बहा दो। ऐसा जितना करोगे, उतना ही तुम अपने को अच्छा अनुभव करने लगोगे। बाद मे देखोगे, 'दूसरे सब लोग स्वस्थ हो,' यह चिन्तन ही स्वास्थ्य-लाभ का सहज उपाय है। 'दूसरे लोग सुखी हो,' ऐसी भावना ही अपने को सुखी करने का सहज उपाय है। इसके बाद जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे ईश्वर के निकट प्रार्थना करे—अर्थ, स्वास्थ्य अथवा स्वर्ग के लिए नही, वरन् हृदय मे ज्ञान और सत्य-तत्त्व के उन्मेष के लिए। इसके छोड बाकी सब प्रार्थनाएँ स्वार्थ से भरी हैं। इसके बाद भावना करनी होगी 'मेरा शरीर वज्रवत् दृढ़, सबल और स्वस्थ है। यह देह ही मेरी मुक्ति मे एकमात्र सहायक है। इसी की सहायता से मै यह जीवन-समुद्र पार कर लूँगा।' जो दुर्बल है वह कभी मुक्ति नही पा सकता। समस्त दुर्बलताओ का त्याग करो। देह से कहो, 'तुम खूब बलिष्ठ हो।' मन से कहो, 'तुम अनन्त शक्तिधर हो।' और स्वयं पर प्रबल विश्वास और भरोसा रखो।

तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय

प्राण

बहुतों का विचार है, प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की कोई क्रिया है। पर असल में ऐसा नहीं है। वास्तव में तो श्वास-प्रश्वास की क्रिया के साथ इसका बहुत थोड़ा सम्बन्ध है। यथार्थ प्राणायाम की साधना में अधिकारी होने के लिए बहुत से अलग-अलग उपाय हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें से एक उपाय मात्र है। प्राणायाम का अर्थ है प्राणों का संयम। भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों में निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है, जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है, यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है यह आकाश ही सूर्य, पृथ्वी, तारा, धूमकेतु

प्राण ३७

वाष्पीय पदार्थ पुन आकाश मे लय हो जाते है। बाद की सृष्टि फिर से इसी तरह आकाश से उत्पन्न होती है।

किस शक्ति के प्रभाव से आकाश का जगत् के रूप में परिणाम होता है? इस प्राण की शक्ति से। जिस तरह आकाश इस जगत का कारणस्वरूप, अनन्त, सर्वव्यापी मूल पदार्थ है, प्राण भी उसी तरह जगत् की उत्पत्ति की कारणस्वरूपा, अनन्त सर्वव्यापी विक्षेपकरी शक्ति है। कल्प के आदि मे और अन्त में सम्पूर्ण सृष्टि आकाशरूप मे परिणत होती है, और जगत् की सारी शक्तियाँ प्राण में लीन हो जाती है, दूसरे कल्प मे फिर इसी प्राण से समुदय शक्तियों का विकास होता है। यह प्राण ही गति-रूप मे प्रकाशित हुआ है—यही गुरुत्वाकर्षण या चुम्बक-शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रहा है। यह प्राण ही स्नायविक शक्तिप्रवाह (nerve current) के रूप मे, विचार-शक्ति के रूप में और समुदय दैहिक क्रिया के रूप मे प्रकाशित हुआ है। विचार-शक्ति से लेकर अति सामान्य दैहिक शक्ति तक सब कुछ प्राण का ही विकास है। वाह्य और अन्तर्जगत् की समस्त शक्तियाँ जब अपनी मूल अवस्था मे पहुँचती है, तब उसी को प्राण कहते हैं। "जब अस्ति और नास्ति कुछ भी न था, जब तम से तम आवृत था, तब था क्या? * यह आकाश ही गतिशून्य होकर अवस्थित था।" यह ठीक है कि प्राण का किसी प्रकार का प्रकाश न था, परन्तु तब भी प्राण का अस्तित्व था। हम आधुनिक विज्ञान द्वारा भी समझ सकते हैं कि संसार में जितने


* नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्—इत्यादि,
तम आसीत् तमसागूढमग्रेऽप्रकेतम्—इत्यादि।
—ऋग्वेद संहिता, दशम मण्डल।