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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

प्रत्याहार और धारणा ८३

होते जा रहे हैं, दिन-पर-दिन मन कुछ-कुछ स्थिर होता आ रहा है। पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन मे हजारो विचार आएँगे, क्रमश वह संख्या घटकर सैकडो तक रह जायगी। फिर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से अपने वश मे आ जायगा। पर हाँ, हमे प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा। जब तक इंजन के भीतर भाप रहेगी, तब तक वह चलता ही रहेगा। जब तक विषय हमारे सामने हैं, तब तक हम उन्हे देखेंगे ही। (अतएव, मनुष्य को, यह प्रमाणित करने के लिए कि वह इंजन की तरह एक यन्त्र मात्र नहीं है, यह दिखाना आवश्यक है कि वह किसी के अधीन नही। इस प्रकार मन का सयम करना और उसे विभिन्न इन्द्रियों के साथ सयुक्त न होने देना ही प्रत्याहार है। इसके अभ्यास का क्या उपाय है ? यह एक-दो दिन का काम नहीं, बहुत दिनो तक लगातार इसका अभ्यास करना होगा। धीर भाव से लगातार बहुत वर्षो तक अभ्यास करने पर तब कही इस विषय मे सफलता मिल पाती है।

कुछ काल तक प्रत्याहार की साधना करने के बाद, उसके बाद की साधना अर्थात् धारणा का अभ्यास करने का प्रयत्न करना होगा। प्रत्याहार के बाद है धारणा। धारणा का अर्थ है—मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थानविशेष में धारण या स्थापन करना। मन को स्थानविशेष मे धारण करने का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि मन को शरीर के अन्य सब स्थानों से अलग करके किसी एक विशेष अश के अनुभव मे बलपूर्वक लगाए रखना। मान लो, मैंने मन को हाथ मे धारण किया। तब शरीर के अन्यान्य अवयव विचार के विषय के बाहर हो जायेंगे।

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प्रत्याहार और धारणा ८५

हो जायगा। योगाभ्यास करने पर जो चिह्न योगियों में प्रकट होते हैं, देह की स्वस्थता उनमे प्रथम है। स्वर भी मधुर हो जायगा, स्वर मे जो कुछ दोष है, सब निकल जायगा। और भी अनेक प्रकार के चिह्न प्रकट होगे, पर ये ही प्रथम है। जो बहुत अधिक साधना करते हैं, उनमे और भी दूसरे लक्षण प्रकट होते हैं। कभी-कभी घंटा-ध्वनि की तरह का शब्द सुन पडेगा, मानो दूर में बहुत से घंटे बज रहे हैं और वे सारे शब्द एकत्र मिलकर कानो मे लगातार आघात कर रहे है। कभी-कभी देखोगे, आलोक के छोटे-छोटे कण हवा में तैर रहे है और क्रमश कुछ-कुछ बड़े होते जा रहे हैं। जब ये लक्षण प्रकाशित होगे, तब समझना कि तुम द्रुत गति से साधना मे उन्नति कर रहे हो।

जो योगी होने की इच्छा करते है और कठोर अभ्यास करते हैं, उन्हें पहली अवस्था मे आहार के सम्बन्ध मे कुछ विशेष सावधानी रखनी होगी। जो शीघ्र उन्नति करने की इच्छा करते है, वे यदि कुछ महीने केवल दूध और अन्न आदि निरामिष भोजन पर रह सके, तो उन्हे साधना में बडी सहायता मिलेगी। किन्तु जो लोग दूसरे दैनिक कामो के साथ थोडा-बहुत अभ्यास करना चाहते है, उनके लिए अधिक भोजन न करने से ही काम बन जायगा। उन्हे खाद्य के सम्बन्ध में उतना विचार करने की आवश्यकता नही, वे जो इच्छा हो वही खा सकते है।

जो कठोर अभ्यास करके शीघ्र उन्नति करना चाहते हैं, उन्हे आहार के सम्बन्ध में विशेष सावधान रहना चाहिए। देह-यंत्र धीरे-धीरे जितना ही सूक्ष्म होता जाता है, उतना ही तुम देखोगे कि एक सामान्य अनियम से भी तुम्हारे सारे शरीर के भीतर बहुत बड़ा अनमेल उपस्थित हो जायगा। जब तक मन

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पर सम्पूर्ण अधिकार नहीं हो जाता, तब तक आहार मे एक ग्रास की अल्पता या अधिकता सम्पूर्ण शरीर-यंत्र को बिल्कुल अप्रकृतिस्थ कर देगी। मन के पूर्ण रूप से अपने वश मे आने के बाद जो इच्छा हो, खाया जा सकता है। मन को एकाग्र करना आरम्भ करने पर देखोगे कि एक सामान्य पिन गिरने से ही ऐसा मालूम होगा मानो तुम्हारे मस्तिष्क मे से वज्र पार हो गया। इन्द्रिय-यंत्र जितने सूक्ष्म होते जाते हैं, अनुभूति भी उतनी ही सूक्ष्म होती जाती है। इन्ही सब अवस्थाओ मे से होते हुए हमें क्रमशः अग्रसर होना होगा। और जो लोग अध्यवसाय के साथ अन्त तक लगे रह सकते हैं, वे ही कृतकार्य होगे। सब प्रकार के तर्क और चित्त मे विक्षेप उत्पन्न करनेवाली बातो को दूर कर देना होगा। शुष्क और निरर्थक तर्कपूर्ण प्रलाप से क्या होगा? वह केवल मन के साम्यभाव को नष्ट करके उसे चंचल भर कर देता है। इन सब तत्त्वो की उपलब्धि की जानी चाहिए। केवल बातो से क्या होगा? अतएव सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्ही के लिखे ग्रन्थ पढ़ो।

शुक्ति के समान बनो। भारतवर्ष मे एक सुन्दर किम्बदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश मे स्वाति नक्षत्र के तुंगस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूँद किसी सीपी मे चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियो को यह मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूँद की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्योही एक बूँद पानी उनके पेट में जाता है, त्योही उस जलकण को लेकर मुँह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य

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के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं। हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फिर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि बिलकुल हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। "एक भाव को नया कहकर ग्रहण करके, उसकी नवीनता चली जाने पर फिर एक दूसरे नए भाव का आश्रय लेना—इस प्रकार बारम्बार करने से तो हमारी सारी शक्ति ही इधर-उधर बिखर जायगी।" साधना करते समय नए भावों के प्रति इस प्रकार आकर्षण-रूप विपत्ति आया करती है। एक भाव को पकड़ो, उसी को लेकर रहो। उसका अन्त देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव लेकर, उसी में मत्त होकर रह सकते हैं, उन्हीं के हृदय में सत्य-तत्त्व का उन्मेष होता है। और जो यहाँ का कुछ, वहाँ का कुछ, इस तरह खटाइयाँ चखने के समान सब विषयों को मानो थोड़ा-थोड़ा चखते जाते हैं, वे कभी कोई चीज़ नहीं पा सकते। कुछ देर के लिए उनकी इन्द्रियाँ उत्तेजित होकर उन्हें एक प्रकार का आनन्द भले ही मिल जाता हो, किन्तु इससे और कुछ फल नहीं होता। वे चिरकाल प्रकृति के दास होकर रहेंगे, कभी अतीन्द्रिय राज्य में विचरण न कर सकेंगे।

जो सचमुच योगी होने की इच्छा करते हैं, उन्हें इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा हर विषय को पकड़ने का भाव छोड़ देना होगा। एक भाव लेकर सदा उसी में विभोर होकर रहो। सोते-जागते सब समय उसी को लेकर रहो। तुम्हारा मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहें। दूसरे सारे विचार

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छोड दो। यही सिद्ध होने का उपाय है, और इसी उपाय से बडे-बडे धर्मवीरो की उत्पत्ति हुई है। शेष सब तो बाते करनेवाले यन्त्र मात्र है। यदि हम सचमुच स्वय कृतार्थ होना और दूसरो का उद्धार करना चाहे, तो हमें थोथी बकवास छोडकर और भी भीतर प्रवेश करना होगा। इसे कार्य में परिणत करने का पहला सोपान यह है कि मन किसी तरह चंचल न किया जाय। जिनके साथ बातचीत करने पर मन चंचल हो जाता हो, उनका साथ छोड दो। तुम सबको मालूम है कि तुममें से प्रत्येक का किसी स्थानविशेष, व्यक्तिविशेष और खाद्यविशेष के प्रति एक विरक्ति का भाव रहता है। उन सबका परित्याग कर देना। और जो सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें तो सत्-असत् सब प्रकार के संग को त्याग देना होगा। पूरी लगनके साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ—फिर मृत्यु भी आए तो क्या ! "मन्त्र वा साधयामी शरीर वा पातयामि"—काम सधे या प्राण ही जायँ। फल की ओर आँख रखे बिना साधना मे निमग्न हो जाओ। निर्भीक होकर इस प्रकार दिन-रात साधना करने पर छ महीने के भीतर ही तुम एक सिद्ध योगी हो सकते हो। परन्तु दूसरे, जो थोडी-थोडी साधना करते है, सब विषयो को जरा-जरा चखते है, वे कभी कोई बडी उन्नति नही कर सकते। केवल उपदेश सुनने से कोई फल नही होता। जो लोग तमोगुण से पूर्ण है, अज्ञानी और आलसी हैं, जिनका मन कभी किसी वस्तु पर स्थिर नही रहता, जो केवल थोडे से आनन्द के अन्वेषण में है, उनके पास धर्म और दर्शन केवल क्षणिक आनन्द के लिए हैं। जो सिर्फ थोडे से आमोद-प्रमोद के लिए धर्म करने आते है, साधना मे अध्यवसायहीन है। वे धर्म की बाते सुनकर सोचते हैं

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“वाह ! ये तो अच्छी बातें हैं,' पर इसके बाद घर पहुँचते ही सारी बातें भूल जाते हैं। सिद्ध होना हो, तो प्रबल अध्यवसाय चाहिए, मन का अपरिमित बल चाहिए। अध्यवसायशील साधक कहता है, “मै चुल्लू से समुद्र पी जाऊँगा। मेरी इच्छा मात्र से पर्वत चूर-चूर हो जायेंगे।” इस प्रकार का तेज, इस प्रकार का दृढ़ सकल्प लेकर कठोर साधना करो। उस परम पद की प्राप्ति अवश्य होगी।

सप्तम अध्याय

सप्तम अध्याय

ध्यान और समाधि

अब तक हम राजयोग के अन्तरग साधनो को छोड़ शेष सभी अगो के सक्षिप्त विवरण समाप्त कर चुके है। इन अन्तरग साधनो का लक्ष्य एकाग्रता की प्राप्ति है। इस एकाग्रता-शक्ति को प्राप्त करना ही राजयोग का चरम लक्ष्य है। हम, मानव के नाते, देखते है कि हमारा समस्त ज्ञान, जिसे विचारजात ज्ञान कहते हैं, अह-बोध के अधीन है। मुझे इस टेबुल का बोध हो रहा है, तुम्हारे अस्तित्व का बोध हो रहा है, इसी प्रकार मुझे अन्यान्य वस्तुओ का भी बोध हो रहा है, और इस अह-बोध के कारण ही मैं जान पा रहा हूँ कि तुम यहाँ हो, टेबुल यहाँ है, तथा और भी जो वस्तुएँ देख रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ या सुन रहा हूँ, वे सब भी यही है। यह तो हुई एक ओर की बात ॥ फिर एक दूसरी ओर यह भी देख रहा हूँ कि मेरी सत्ता कहने से जो कुछ बोध होता है, उसका अधिकांश मै अनुभव नही कर सकता। शरीर के भीतर के सारे यन्त्र, मस्तिष्क के विभिन्न अश—इन सबका ज्ञान किसी को भी नही।

जब हम भोजन करते हैं, तब वह ज्ञानपूर्वक करते है, परन्तु जब हम उसका सार भाग भीतर ग्रहण करते हैं, तब हम वह अज्ञातभाव से करते हैं। जब वह खून के रूप मे परिणत होता है, तब भी वह हमारे बिना जाने ही होता है। और जब इस खून से शरीर के भिन्न-भिन्न अग गठित होते है, तो वह भी हमारी जानकारी के बिना ही होता है। किन्तु यह मारा काम हमारे द्वारा ही होता है। इस शरीर के भीतर कोई अन्य

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दस-बीस लोग तो बैठे नही है, जो यह काम कर देते हो। पर यह किस तरह हमे मालूम हुआ कि हमी इनको कर रहे है, दूसरा कोई नही? इस सम्बन्ध में अनायास ही यह कहा जा सकता है कि आहार करने के साथ ही हमारा सम्पर्क है, खाना पचाना और उससे देह तैयार करना तो हमारे लिए एक दूसरा कोई कर दे रहा है। पर यह हो नही सकता, क्योकि यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अभी जो काम हमारे बिना जाने हो रहे हैं, वे लगभग सभी साधना के बल से हमारे जाने साधित हो सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि हमारा हृदय-यन्त्र अपने-आप ही चल रहा है, हममे से कोई उसको अपनी इच्छानुसार नही चला सकता, वह अपने ख्याल से आप ही चल रहा है। परन्तु इस हृदय के कार्य भी अभ्यास के बल से इस प्रकार इच्छाधीन किए जा सकते हैं कि वे इच्छा मात्र से शीघ्र या धीरे चलने लगेगे, या लगभग बन्द हो जायँगे। हमारे शरीर के प्राय सभी अंग वश में लाए जा सकते है। इससे क्या ज्ञात होता है? यही कि इस समय जो काम हमारे विना जाने हो रहे है, उन्हे भी हम ही कर रहे हैं, पर हाँ, हम उन्हे अज्ञातभाव से कर रहे है, बस इतना ही। अतएव हम देखते है कि मानव-मन दो अवस्थाओ मे रहकर कार्य करता है। पहली अवस्था को ज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जिन कामों को करते समय साथ-साथ, 'मै कर रहा हूँ,' यह ज्ञान सदा विद्यमान रहता है, वे कार्य ज्ञान-भूमि से साधित हो रहे हैं, ऐसा कहा जा सकता है। दूसरी भूमि को अज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जो सब कार्य ज्ञान की निम्न भूमि से साधित होते है, जिसमे 'मै'-ज्ञान नही रहता, उसे अज्ञान-भूमि कह सकते है।

हमारे कार्यकलापो मे से जिनमें 'अहं' मिला रहता है.-

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उन्हे ज्ञानयुक्त क्रिया और जिनमे 'अहं' का लगाव नही, उन्हें ज्ञानरहित या अज्ञानपूर्वक क्रिया कहते है। निम्न जाति के प्राणियों मे यह ज्ञानरहित क्रिया सहज ज्ञान (instinct) कहलाती है। उनकी अपेक्षा उच्चतर जीवो मे और सबसे उच्च जीव मनुष्य में यह दूसरे प्रकार की क्रिया, जिसमें 'अहं'-भाव रहता है, अधिक दीख पडती है—इसी को ज्ञानयुक्त क्रिया कहते है।

परन्तु इतने से ही सारी भूमियो का उल्लेख नही हो गया। मन इन दोनो से भी ऊँची भूमि पर विचरण कर सकता है। मन ज्ञान की भी अतीत अवस्था में जा सकता है। जिस प्रकार अज्ञान-भूमि से जो कार्य होता है, वह ज्ञान की निम्न भूमि का कार्य है, वैसे ही ज्ञान की उच्च भूमि से भी—ज्ञानातीत भूमि से भी कार्य होता है। उसमें भी किसी प्रकार का 'अहं'-भाव नही रहता। यह 'अहं'-भाव केवल बीच की अवस्था मे रहता है। जब मन इस रेखा के ऊपर या नीचे विचरण करता है, तब किसी प्रकार का 'अहं'-ज्ञान नही रहता, किन्तु तब भी मन की क्रिया चलती रहती है। जब मन इस रेखा के ऊपर अर्थात् ज्ञान-भूमि के अतीत प्रदेश मे गमन करता है, तब उसे समाधि, पूर्णचेतन-भूमि या ज्ञानातीत भूमि कहते है। यह समाधि-अवस्था ज्ञान के भी उस पार अवस्थित है। अब हम यह किस तरह समझें कि जो मनुष्य समाधि-अवस्था मे जाता है, वह ज्ञान-भूमि के निम्न स्तर मे नही चला जाता, बिलकुल हीन दशापन्न नही हो जाता, वरन् ज्ञानातीत भूमि मे चला जाता है? इन दोनो ही अवस्थाओ में तो अहं-भाव नही रहता। (इसका उत्तर यह है कि कौन ज्ञान-भूमि के निम्न देश मे और कौन ऊर्ध्व देश मे गया, इसका निर्णय फल देखने पर ही हो सकता है। जब कोई गहरी

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नीद मे सोया रहता है, तब वह ज्ञान की निम्न भूमि मे चला जाता है। तब वह अज्ञातभाव से ही शरीर की सारी क्रियाएँ, श्वास-प्रश्वास, यहाँ तक कि शरीर-संचालन-क्रिया भी करता रहता है, उसके इन सब कामो मे 'अहं'-भाव का कोई लगाव नही रहता, तब वह अज्ञान से ढका रहता है। वह जब नीद से उठता है, तब वह सोने के पहले जैसा था, वैसा ही रहता है, उसमे कुछ भी परिवर्तन नही होता। उसके सोने से पहले उसकी जो ज्ञानसमष्टि थी, नीद टूटने के बाद भी ठीक वही रहती है, उसमे कुछ भी वृद्धि नही होती। उसके हृदय मे कोई नया तत्त्व प्रकाशित नही होता। किन्तु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है, तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो, तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर नीचे आता है।

अब सोच कर देखो, इस विभिन्नता का कारण क्या है। एक अवस्था से, मनुष्य जैसा गया था वैसा ही लौट आया, और दूसरी अवस्था से लौटकर मनुष्य ने ज्ञानालोक प्राप्त किया—वह एक महान् साधु, एक सिद्ध पुरुष के रूप में परिणत हो गया, उसका स्वभाव बिलकुल बदल गया, उसके जीवन ने बिलकुल दूसरा रूप धारण कर लिया। दोनो अवस्थाओ के ये दो विभिन्न फल हैं। अब बात यह है कि फल अलग-अलग होने पर कारण भी अवश्य अलग-अलग होगा। और चूँकि समाधि-अवस्था से लब्ध यह ज्ञानालोक, अज्ञानावस्था से लौटने के बाद की अवस्था में जो ज्ञान प्राप्त होता है अथवा साधारण ज्ञानावस्था में युक्ति-विचार द्वारा जो ज्ञान उपलब्ध होता है, उन दोनो से अत्यन्त उच्चतर है, इसलिए अवश्य वह ज्ञानातीत भूमि से आता है। इसीलिए समाधि को मैने ज्ञानातीत भूमि के नाम से अभिहित किया है।

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संक्षेप मे समाधि का तात्पर्य यही है। हमारे जीवन मे इस समाधि की उपयोगिता कहाँ है? समाधि की विशेष उपयोगिता है। हम जान-बूझकर जो काम करते है, जिसे हम विचार का क्षेत्र कहते है, वह सकीर्ण और सीमित है। मनुष्य की युक्ति एक छोटेसे वृत्त मे ही भ्रमण कर सकती है, वह कभी उसके बाहर नही जा सकती। हम जितना ही उसके बाहर जाने का प्रयत्न करते है, उतना ही वह असम्भव-सा जान पड़ता है। ऐसा होते हुए भी, मनुष्य जिसे अत्यन्त कीमती और सबसे प्रिय समझता है, वह तो उस युक्तिराज्य के बाहर ही अवस्थित है। अविनाशी आत्मा है या नही, ईश्वर है या नही, इस जगत् के नियन्ता—परमज्ञान-स्वरूप कोई है या नही—इन सब तत्त्वो का निर्णय करने में युक्ति असमर्थ है। इन सब प्रश्नो का उत्तर युक्ति कभी नही दे सकती। युक्ति क्या कहती है? वह कहती है, "मै अज्ञेयवादी हूँ। मै किसी विषय मे 'हाँ' भी नही कह सकती और 'ना' भी नही।" फिर भी इन सब प्रश्नो की मीमांसा तो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन प्रश्नो के ठीक-ठीक उत्तर बिना मानव-जीवन उद्देश्यविहीन हो जायगा। इस युक्तिरूप वृत्त के बाहर से प्राप्त हुए समाधान ही हमारे सारे नैतिक मत, सारे नैतिक भाव, यही नही, बल्कि मानव-स्वभाव मे जो कुछ सुन्दर तथा महान् है, उस सबकी नीव हैं। अतएव यह सबसे आवश्यक है कि हम इन प्रश्नो के यथार्थ उत्तर पा ले। यदि मनुष्य-जीवन केवल पाँच मिनट की चीज हो, और यदि जगत् कुछ परमाणुओ का आकस्मिक मिलन मात्र हो, तो फिर दूसरे का उपकार मै क्यो करूँ? दया, न्यायपरता या सहानुभूति दुनिया में फिर क्यो रहे? तब तो हम लोगो का यही

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एकमात्र कर्तव्य हो जाता है कि जिसकी जो इच्छा हो वही करे, सब अपना-अपना देखे। तब तो यही कहावत चरितार्थ होने लगती है—'यावन् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्...।' यदि हम लोगों के भविष्य अस्तित्व की आशा ही न रहे, तो मै अपने भाई को क्यो प्यार करूँ, मै उसका गला क्यों न काटूँ? यदि जगत् के अतीत कोई सत्ता न रहे, यदि मुक्ति नामक कोई चीज न हो, यदि कुछ कठोर, अमेद्य, जड़ नियम ही सर्वस्व हो, तब तो हमे इहलोक मे ही सुखी होने की प्राणपण से चेष्टा करनी चाहिए। आजकल बहुत से लोगो के मतानुसार उपयोगितावाद (utility) ही नीति की नींव है, अर्थात् जिससे अधिक लोगो को अधिक परिमाण में सुख-स्वाच्छन्द्य मिले, वही नीति की नींव है। इन लोगो से मै पूछता हूँ, हम इस नींव पर खड़े होकर नीति का पालन क्यो करे? क्यो? यदि अधिक मनुष्यो का अधिक मात्रा में अनिष्ट करने से मेरा मतलब सधता हो, तो मैं वैसा क्यो न करूँ ? उपयोगितावादी इस प्रश्न का क्या जवाब देंगे? कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह तुम कैसे जानो? मैं अपनी सुख की वासना से परिचालित होकर उसकी तृप्ति करता हूँ, ऐसा करना मेरा स्वभाव है, मै उससे अधिक कुछ नही जानता। मेरी ये वासनाएँ हैं, और मै उनकी तृप्ति करूँगा ही; तुम्हे उसमें आपत्ति करने का क्या अधिकार है? मानव-जीवन के ये सब महान् सत्य, जैसे—नीति, आत्मा का अमरत्व, ईश्वर, प्रेम, सहानुभूति, साधुत्व और सर्वोपरि, सबसे महान् सत्य निःस्वार्थपरता—ये सब भाव हमे कहाँ से मिले है?

सारा नीतिशास्त्र, मनुष्य के सारे काम, मनुष्य के सारे विचार इस निःस्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव (भित्ति) पर स्थापित

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हैं। मानव-जीवन के सारे भाव इस नि स्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव के अन्दर ढाले जा सकते हैं। मैं क्यों स्वार्थशून्य होऊँ? नि स्वार्थ होने की आवश्यकता क्या? और किस शक्ति के बल से मैं नि स्वार्थ होऊँ? तुम कहते हो, "मैं युक्तिवादी हूँ, मैं उपयोगितावादी हूँ," लेकिन यदि तुम मुझे इसकी युक्ति न दिखला सको कि तुम जगत् का कल्याण-साधन क्यों करोगे, तो मैं तुम्हे अयुक्तिक कहूँगा। मैं क्यों नि स्वार्थ होऊँ, कारण बताओ, क्यों न मैं बुद्धिहीन पशु के समान आचरण करूँ? नि स्वार्थपरता कवित्व के हिसाब से अवश्य बहुत सुन्दर हो सकती है, किन्तु कवित्व तो युक्ति नहीं है। मुझे युक्ति दिखलाओ, मैं क्यों नि स्वार्थपर होऊँ? क्यों मैं भला बनूँ? यदि कहो, 'अमुक यह बात कहते हैं, इसलिए ऐसा करो'—तो यह कोई जवाब नहीं है, मैं ऐसे किसी व्यक्तिविशेष की बात नहीं मानता। मेरे नि स्वार्थ होने से मेरा कल्याण कहाँ? यदि 'कल्याण' से अधिक परिमाण में सुख समझा जाय, तब तो स्वार्थपर होने में ही मेरा कल्याण है। मैं तो दूसरो को धोखा देकर और दूसरे का सर्वस्व चुराकर सबसे अधिक सुख पा सकता हूँ। उपयोगितावादी इसका क्या उत्तर देंगे? वे इसका कुछ भी उत्तर नहीं दे सकते। इसका यथार्थ उत्तर यह है कि यह परिदृश्यमान जगत् अनन्त समुद्र में एक छोटासा बुलबुला है—अनन्त जंजीर की एक छोटीसी कड़ी है। जिन्होंने जगत् में नि स्वार्थपरता का प्रचार किया था और मानव-जाति को उसकी शिक्षा दी थी, उन्होंने यह तत्त्व कहाँ से पाया? हम जानते हैं कि यह सहज ज्ञान द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता। सहज ज्ञान से युक्त पशु तो इसे नहीं जानते। विचार-बुद्धि से भी यह नहीं मिल सकता—

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उससे इन सब तत्त्वों का कुछ भी नही जाना जाता। तो फिर वे सब तत्त्व उन्होने कहाँ से पाए ?

इतिहास के अध्ययन से मालूम होता है, ससार के सभी धर्म-शिक्षक तथा धर्म-प्रचारक कह गए है कि हमने ये सब सत्य जगत् के अतीत प्रदेश से पाए है। उनमे से बहुतेरे इस सम्बन्ध में अनभिज्ञ थे कि उन्होने यह सत्य ठीक कहाँ से पाया। किसी ने कहा, "एक स्वर्गीय दूत ने पक्षयुक्त मनुष्य के रूप मे मेरे पास आकर मुझसे कहा, 'हे मानव, सुनो, मै स्वर्ग से यह शुभ समाचार लाया हूँ, ग्रहण करो'।" एक दूसरे ने कहा, "तेजपुंजकाय एक देवता ने मेरे सामने आविर्भूत होकर मुझे उपदेश दिया है।" एक तीसरे ने कहा, "मैने स्वप्न मे अपने एक पूर्वज को देखा, उन्होंने मुझे इन तत्त्वो का उपदेश दिया।" इसके आगे वे और कुछ न कह सके। इस तरह विभिन्न उपायो से तत्त्वलाभ की बात कहने पर भी उन सबो का इस विषय में यही मत है कि उन्होने यह ज्ञान युक्ति-तर्क से नही पाया, वरन् उसके अतीत प्रदेश से ही उसे पाया है। इसके बारे मे योगशास्त्र का मत क्या है? उसका मत यह है कि वे जो कहते है कि युक्ति-विचार के अतीत प्रदेश से उन्होने उस ज्ञान को पाया है, यह सही है; किन्तु उनके अपने अन्दर से ही वह ज्ञान उनके पास आया है।

योगीगण कहते है, इस मन की ही ऐसी एक उच्च अवस्था है, जो युक्ति-विचार के अधिकार के अतीत है, जो ज्ञानातीत भूमि है। उस उच्चावस्था में पहुँचने पर मनुष्य तर्क के अगम्य ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, और ऐसे मनुष्य को ही समस्त विषय-ज्ञान के अतीत परमार्थज्ञान या अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधारण मानवी स्वभाव के परे, समस्त तर्क-युक्ति के

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परे की यह अतीन्द्रिय अवस्था कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को अचानक प्राप्त हो जाती है, जो उसका विज्ञान नही जानता। वह मानो उस ज्ञानातीत राज्य मे ढकेल दिया जाता है। और जब उसे इस प्रकार अचानक अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति होती है, तो वह साधारणत सोचता है कि वह ज्ञान कही बाहर से आया है। इसी से यह स्पष्ट है कि यह पारमार्थिक ज्ञान सारे देशो मे वस्तुत एक होने पर भी, किसी देश में वह देवदूत से, किसी देश में देवविशेष से, अथवा फिर कही साक्षात् भगवान् से प्राप्त हुआ क्यो सुना जाता है। इसका तात्पर्य क्या है? यही कि मन ने अपनी प्रकृति के अनुसार ही अपने भीतर से उस ज्ञान को प्राप्त किया है, किन्तु जिन्होने उसे पाया है, उन्होने अपनी-अपनी शिक्षा और विश्वास के अनुसार इस बात का वर्णन किया है कि उन्हे वह ज्ञान कैसे मिला। असल बात तो यह है कि ये सभी उस ज्ञानातीत अवस्था मे अचानक जा पडे थे।

योगीगण कहते है कि उस ज्ञानातीत अवस्था मे अचानक जा पडने से एक भारी धोखे की आशका रहती है। अनेक स्थलो मे तो मस्तिष्क के बिलकुल नष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। और भी देखोगे, जिन सब मनुष्यो ने अचानक इस अतीन्द्रिय ज्ञान को पाया है, पर उसके वैज्ञानिक तत्त्व को नहीं समझा, वे कितने भी बडे क्यो न हो, सच पूछा जाय तो उन्होने अँधेरे में टटोला है, और उनके उस ज्ञान के साथ कुछ-न-कुछ विचित्र कुसस्कार मिला हुआ है ही। उन्होने अपने आपको भ्रामक दर्शनो के लिए खोल रखा था।

जो हो, हम कई महापुरुषो के जीवन-चरित का अध्ययन करने पर देखते है कि अचानक इन्द्रियातीत राज्य में जा पड़ने

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से उपर्युक्त प्रकार के खतरे की आशंका रहती है। किन्तु इसमें कोई सन्देह नही कि उन सबने उस अवस्था की प्राप्ति की थी। जब कभी कोई महापुरुष केवल भावुकता के बल से इस अतीन्द्रिय अवस्था मे जा पड़े है, तो वे उस अवस्था से कुछ सत्य ही नही लाए, पर साथ ही कुसस्कार, कट्टरपन, ये सब भी लेते आए। उनकी शिक्षा मे जो उत्कृष्ट अश है, उससे जगत् का जैसा उपकार हुआ है, उन सब कट्टरता और अन्धविश्वासों से वैसे ही क्षति भी हुई है। मानव-जीवन नाना प्रकार के विपरीत भावो से ग्रस्त होने के कारण असामंजस्यपूर्ण है। इस असामंजस्य मे कुछ सामंजस्य और सत्य प्राप्त करने के लिए हमें तर्क-युक्ति के अतीत जाना पड़ेगा। पर वह धीरे-धीरे करना होगा, नियमित साधना के द्वारा ठीक वैज्ञानिक उपाय से उसमें पहुँचना होगा, और सारे कुसस्कारो को भी हमे छोड़ देना होगा। अन्य कोई विज्ञान सीखने के समय जैसा हम लोग करते है, इसमे भी ठीक उसी धारा का अनुसरण करना होगा। युक्ति-विचार को ही अपनी नीव बनानी होगी। तर्क-युक्ति हमें जितनी दूर ले जा सकती है, उतनी दूर जायेंगे और जब तर्क-युक्ति नही चलेगी, तब वही हमे उस सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति का रास्ता दिखला देगी। अत यदि कोई अपने को अनुप्राणित कहकर दावा करे, फिर साथ ही युक्ति के विरुद्ध भी अटपट बोलता रहे, तो उसकी बात मत सुनना। क्यो ? इसलिए कि जिन तीन अवस्थाओ की बात कही गई है, जैसे--सहज ज्ञान, विचारजात ज्ञान और ज्ञानातीत अवस्था--ये तीनो एक ही मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। एक मनुष्य के तीन मन नही है, वरन् उस एक ही मन की एक अवस्था दूसरी अवस्थाओ मे परिवर्तित हो

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जाती है। सहज ज्ञान विचारजात ज्ञान मे और विचारजात ज्ञान ज्ञानातीत अवस्था मे परिणत होता है। अत इन अवस्थाओ मे से कोई भी अवस्था दूसरी अवस्थाओ की विरोधी नही है। अतएव जब कभी तुम किसी को असम्बद्ध प्रलाप करते सुनो या युक्ति और सहज ज्ञान के विरुद्ध बाते कहते सुनो, तो निडर होकर उसका विरोध करना, क्योकि यथार्थ अन्त प्रेरणा विचारजनित ज्ञान की अपूर्णता की पूर्णता मात्र करती है। पूर्वकालीन महापुरुषो ने जैसा कहा है, 'हम विनाश करने नही आए, वरन् पूर्ण करने आए है,' इसी प्रकार अन्त प्रेरणा भी विचारजनित ज्ञान की पूर्णता की साधक है। विचारजनित ज्ञान के साथ उसका पूर्ण समन्वय है, और जब कभी वह युक्ति की विरोधी हो, तो समझना कि वह यथार्थ अन्त प्रेरणा नही है।

ठीक वैज्ञानिक उपाय से उपर्युक्त अतीन्द्रिय या समाधि-अवस्था प्राप्त करने के लिए ही पूर्वकथित सारे योगाग उपदिष्ट हुए हैं। यह भी समझ लेना विशेष आवश्यक है कि इस अतीन्द्रिय ज्ञान को प्राप्त करने की शक्ति प्राचीन महापुरुषो के समान प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव में है। वे महापुरुषगण हम लोगो से कोई सर्वथा भिन्न स्वभाव के जीवविशेष नही थे, वे हमारे-तुम्हारे समान ही मनुष्य थे। वे अत्यन्त उच्च कोटि के योगी थे। उन्होने पूर्वोक्त ज्ञानातीत अवस्था प्राप्त कर ली थी, और प्रयत्न करने पर तुम और मैं भी उसकी प्राप्ति कर ले सकते है। वे कोई विशेष प्रकार के अद्भुत मनुष्य रहे हो, सो नही। यदि एक मनुष्य ने उस अवस्था की प्राप्ति की है, तो इसी से प्रमाणित होता है कि प्रत्येक मनुष्य के लिए ही इस अवस्था को प्राप्त करना सम्भव है। यह केवल सम्भव ही नही, वरन् समय आने पर

ध्यान और समाधि १०१

सभी इस अवस्था की प्राप्ति कर लेगे। इस अवस्था को प्राप्त करना ही धर्म है। केवल प्रत्यक्ष अनुभूति के द्वारा यथार्थ शिक्षा-लाभ होता है। हम लोग भले ही सारे जीवनभर तर्क-विचार करते रहे, पर स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना हम सत्य का कण मात्र भी न समझ सकेंगे। कुछ पुस्तके पढ़ाकर तुम किसी मनुष्य से अस्त्र-चिकित्सक बनने की आशा नहीं कर सकते। तुम केवल एक नक्शा दिखाकर देश देखने का मेरा कौतूहल पूरा नहीं कर सकते। स्वयं वहाँ जाकर उस देश को प्रत्यक्ष देखने पर ही मेरा कौतूहल पूरा होगा। नक्शा केवल इतना कर सकता है कि वह देश के बारे में और भी अधिक अच्छी तरह से जानने की इच्छा उत्पन्न कर देगा। बस इसके अतिरिक्त उसका और कोई मूल्य नहीं। सिर्फ पुस्तको पर निर्भर रहने से मानव-मन केवल अवनति की ओर जाता है। यह कहने से और घोर नास्तिकता क्या हो सकती है कि ईश्वरीय ज्ञान केवल इस पुस्तक में या उस शास्त्र में आबद्ध है ? मनुष्य इधर तो भगवान को अनन्त कहता है, और उधर एक छोटेसे ग्रन्थ में उन्हें आबद्ध कर रखना चाहता है !" क्या गर्व ! पोथी पर विश्वास नहीं किया इसलिए लाखो आदमी मार डाले गए ! एक ही ग्रन्थ में सारा ईश्वरीय ज्ञान निबद्ध है, इस पर विश्वास न करने से सहस्रो लोग मौत के घाट उतार दिए गए ! भले ही आज उस हत्या आदि का समय नहीं रहा, पर फिर भी अभी तक जगत् इस ग्रन्थ-विश्वास मे ही आबद्ध है।

ठीक वैज्ञानिक उपाय से ज्ञानातीत अवस्था को प्राप्त करने के लिए, मैं तुम्हें राजयोग के बारे में जो उपदेश दे रहा हूँ, उनमे से प्रत्येक की साधना मे से तुम्हे जाना पड़ेगा। पहले के

१०२ राजयोग

१०२ राजयोग

भाषण में प्रत्याहार और धारणा के सम्बन्ध में बताया गया है। अब ध्यान के बारे में चर्चा करूँगा।

देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थान में मन को कुछ समय तक स्थिर रखने की पुन-पुन चेष्टा करते रहने से, उसको उस दिशा में अविच्छिन्न गति से प्रवाहित होने की शक्ति प्राप्त होगी। इस अवस्था का नाम है ध्यान। जब ध्यानशक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि मन अनुभूति के बाहरी भाग को छोड़कर केवल उसके अन्तर्भाग या अर्थ की ही ओर सम्पूर्ण रूप से जाता है, तब उस अवस्था का नाम है समाधि। धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों को एक साथ लेने से संयम कहते हैं। अर्थात् यदि किसी का मन पहले किसी वस्तु में एकाग्र हो सकता है, फिर उस एकाग्रता की अवस्था में कुछ समय तक रह सकता है और उसके बाद ऐसी दीर्घ एकाग्रता की अवस्था में वह अनुभूति के केवल आभ्यन्तरिक भाग पर, जिसका कि वह वस्तु बाह्य प्रकाश है, अपने आपको लगाए रख सकता है, तो सभी कुछ ऐसे शक्तिसम्पन्न मन के वशीभूत हो जाता है।