राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
ओं
ओं तत् सत्.
प्राण का आध्यात्मिक रूप ६५
वस्तुओ पर दीर्घ काल चिन्तन और आलोचना के बाद, शरीर के जिस स्थान पर यह मूलाधार चक्र (सम्भवत Sacral Plexus) अवस्थित है, उसे गरम होते देखते हैं । अब, यदि इस कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर उसे ज्ञातभाव से सुषुम्ना नाली मे से प्रवाहित करते हुए एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को ऊपर लाया जाय, तो वह ज्यो-ज्यो विभिन्न केन्द्रो पर क्रिया करेगी, त्यो-त्यो प्रबल प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होगी। जब शक्ति का बिलकुल सामान्य अग किसी स्नायु-तन्तु के भीतर से प्रवाहित होकर विभिन्न केन्द्रो से प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, तब वही स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से अभिहित होता है। किन्तु जब मूलाधार मे सचित विपुलायतन शक्तिपुज दीर्घकालव्यापी तीव्र ध्यान के बल से उद्बुद्ध होकर सुषुम्ना-मार्ग मे भ्रमण करता है और विभिन्न केन्द्रो पर आघात करता है, तो उस समय जो प्रतिक्रिया होती है, वह बड़ी ही प्रबल है। वह स्वप्न अथवा कल्पनाकालीन प्रतिक्रिया से तो अनन्तगुनी श्रेष्ठ है ही, पर जाग्रत्कालीन विषय-ज्ञान की प्रतिक्रिया से भी अनन्तगुनी प्रबल है। यही अतीन्द्रिय अनुभूति है। फिर जब वह शक्तिपुज समस्त ज्ञान के, समस्त अनुभूतियो के केन्द्रस्वरूप मस्तिष्क मे पहुँचता है, तब सम्पूर्ण मस्तिष्क और उसके अनुभवसम्पन्न प्रत्येक परमाणु से मानो प्रतिक्रिया होने लगती है। इसका फल है ज्ञान का पूर्ण प्रकाश या आत्मानुभूति । कुण्डलिनी शक्ति जैसे-जैसे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को जाती है, वैसे-ही-वैसे मन का मानो एक-एक परदा खुलता जाता है और तब योगी इस जगत् की सूक्ष्म या कारण अवस्था की उपलब्धि करते है। और तभी विषय-स्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना और उसकी प्रतिक्रियारूप जो जगत् के कारण है, उनका यथार्थ स्वरूप हमे ज्ञात हो जाता
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है। अतएव तब हम सारे विषयो का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते है; क्योकि कारण को जान लेने पर कार्य का ज्ञान अवश्य आयगा।
(इस प्रकार हमने देखा कि कुण्डलिनी को जगा देना ही तत्त्वज्ञान, ज्ञानातीत अनुभूति या आत्मानुभूति का एकमात्र उपाय है। कुण्डलिनी को जाग्रत् करने के अनेक उपाय हैं। किसी की कुण्डलिनी भगवान के प्रति प्रेम के बल से ही जाग्रत् हो जाती है, किसी की सिद्ध महापुरुषो की कृपा से और किसी की सूक्ष्म ज्ञान-विचार द्वारा। लोग जिसे अलौकिक शक्ति या ज्ञान कहते हैं, उसका जहाँ कही कुछ प्रकाश दिख पडे, तो समझना होगा कि वहाँ कुछ परिमाण में यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर किसी तरह प्रवेश कर गई है। तो भी इस प्रकार की अलौकिक घटनाओ मे से अधिकतर स्थलो में देखा जायगा कि उस व्यक्ति ने बिना जाने एकाएक ऐसी कोई साधना कर डाली है, जिससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति अज्ञात-भाव से कुछ परिमाण मे स्वतन्त्र होकर सुषुम्ना के भीतर प्रवेश कर गई है। जिस किसी प्रकार की उपासना हो, वह, ज्ञातभाव से अथवा अज्ञातभाव से, उसी एक लक्ष्य पर पहुँचा देती है अर्थात् उससे कुण्डलिनी जाग्रत् हो जाती है। जो सोचते है कि मैंने अपनी प्रार्थना का उत्तर पाया, उन्हे मालूम नही कि प्रार्थना-रूप मनोवृत्ति के द्वारा वे अपनी ही देह मे स्थित अनन्त शक्ति के एक बिन्दु को जगाने मे समर्थ हुए है। अतएव मनुष्य बिना जाने जिसकी विभिन्न नामो से, डरते-डरते और कष्ट उठाकर उपासना करता है, उसके पास किस तरह अग्रसर होना होगा, यह जान लेने पर समझ में आ जायगा कि वह प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर में प्रकृत जीवन्त शक्ति के रूप में विराजमान है और
प्राण का आध्यात्मिक रूप ६७
अनन्त सुख की जननी है—योगीगण ससार के सामने उच्च कण्ठ से यही घोषणा करते हैं। अतएव राजयोग यथार्थ धर्मविज्ञान है। वह सारी उपासना, सारी प्रार्थना, विभिन्न प्रकार की साधना-पद्धति और समुदाय अलौकिक घटनाओ की युक्तिसंगत व्याख्या है।
पंचम अध्याय
अध्यात्म प्राण का संयम
अब हम प्राणायाम की विभिन्न क्रियाओ के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे। हमने पहले ही देखा है कि योगियो के मत मे साधना का पहला अंग फेफडे की गति को अपने अधीन करना है। हमारा उद्देश्य है—शरीर के भीतर जो सूक्ष्म गतियाँ हो रही हैं, उनका अनुभव प्राप्त करना। हमारा मन बिलकुल बाहर आ पडा है, वह भीतर की सूक्ष्म गतियों को बिलकुल नही पकड सकता। हम जब उनका अनुभव प्राप्त करने मे समर्थ होगे, तो उन पर विजय पा लेगे। ये स्नायविक शक्तिप्रवाह शरीर मे सर्वत्र चल रहे हैं, वे प्रत्येक पेशी मे जाकर उसको जीवन-शक्ति दे रहे हैं, किन्तु हम उनका अनुभव नही कर पाते। योगियो का कहना है कि प्रयत्न करने पर हम उनका अनुभव प्राप्त करना सीख जायेंगे। पहले फेफडे की गति पर विजय पाने की चेष्टा करनी होगी। कुछ काल तक यह कर सकने पर हम सूक्ष्मतर गतियो को भी वश मे ला सकेगे।
अब प्राणायाम की क्रियाओ की चर्चा की जाय। पहले तो, सीधे होकर बैठना होगा। देह को ठीक सीधी रखना होगा। यद्यपि मेरुमज्जा मेरुदण्ड से संलग्न नही है, फिर भी वह मेरुदण्ड के भीतर अवस्थित है। टेढा होकर बैठने से वह अस्त-व्यस्त हो जाती है। अतएव देखना होगा कि वह स्वच्छन्द भाव से रहे। टेढे बैठकर ध्यान करने की चेष्टा करने से अपनी ही हानि होती है। शरीर के तीनो भाग—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक—सदा एक रेखा मे ठीक सीधे रखने होगे। देखोगे, बहुत थोडे अभ्यास से वह श्वास-प्रश्वास
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की नाई सहज हो जायगा। इसके बाद स्नायुओ को वशीभूत करने का प्रयत्न करना होगा। हमने पहले ही देखा है कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्र के कार्य को नियमित करता है, वह दूसरे स्नायुओ पर भी कुछ प्रभाव डालता है। इसीलिए सांस लेना और सांस छोडना ताल-बद्ध (नियमित) रूप से करना आवश्यक है। हम साधारणतः जिस प्रकार सांस लेते और छोड़ते है, वह श्वास-प्रश्वास नाम के ही योग्य नही। वह बहुत अनियमित है। फिर स्त्री-पुरुष के श्वास-प्रश्वासो मे कुछ स्वाभाविक भेद भी हैं।
प्राणायाम-साधना की पहली क्रिया यह है, — भीतर निर्दिष्ट परिमाण मे सांस लो और बाहर निर्दिष्ट परिमाण में सांस छोड़ो। इस प्रकार करने पर देह-यन्त्र का असामंजस्य-भाव दूर हो जायगा। कुछ दिन तक यह अभ्यास करने के बाद, सांस खीचने और छोड़ने के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का मन-ही-मन उच्चारण करने से अच्छा होगा। भारत में, प्राणायाम करते समय हम लोग श्वास के ग्रहण और त्याग की संख्या ठहराने के लिए एक, दो, तीन, चार, इस क्रम से न गिनते हुए कुछ सांकेतिक शब्दो का व्यवहार करते हैं। इसीलिए मैं तुम लोगो से प्राणायाम के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का व्यवहार करने के लिए कह रहा हूँ। चिन्तन करना कि वह शब्द श्वास के साथ ताल-बद्ध रूप से बाहर जा रहा है और भीतर आ रहा है। ऐसा करने पर देखोगे कि सारा शरीर क्रमशः मानो साम्यभाव धारण करता जा रहा है। तभी समझोगे, यथार्थ विश्राम क्या है। उसकी तुलना मे निद्रा तो विश्राम ही नही। एक बार यह विश्राम की अवस्था आने पर अतिशय थके
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हुए स्नायु भी शान्त हो जायेंगे और तब जानोगे कि पहले तुमनों कभी यथार्थ विश्राम का सुख नही पाया ।
इस साधना का पहला फल यह देखोगे कि तुम्हारे मुख की कान्ति बदलती जा रही है । मुख की शुष्कता या कठोरता का भाव प्रदर्शित करनेवाली रेखाएँ दूर हो जायँगी । मन की शान्ति मुख से फूटकर बाहर निकलेगी । दूसरे, तुम्हारा स्वर बहुत मधुर हो जायगा । मैने ऐसा एक भी योगी नही देखा, जिनके गले का स्वर कर्कश हो । कुछ महिने के अभ्यास के बाद ही ये चिह्न प्रकट होने लगेगे । इस पहले प्राणायाम का कुछ दिन अभ्यास करने के बाद प्राणायाम की एक दूसरी ऊँची साधना ग्रहण करनी होगी । वह यह है—इडा अर्थात् वाई नासिका द्वारा फेफड़े को धीरे-धीरे वायु से पूरा करो । उसके साथ स्नायु-प्रवाह मे मन का सयम करो, सोचो कि तुम मानो स्नायु-प्रवाह को मेरुमज्जा के नीचे भेजकर कुण्डलिनी-शक्ति के आधारभूत, मूलाधारस्थित त्रिकोणाकृति पद्म पर बडे जोर से आघात कर रहे हो । इसके बाद इस स्नायु-प्रवाह को कुछ क्षण के लिए उसी जगह धारण किए रहो । तत्पश्चात् कल्पना करो कि उस स्नायिक प्रवाह को श्वास के साथ दूसरी ओर से अर्थात् पिंगला द्वारा ऊपर खीच रहे हो । फिर दाहिनी नासिका से वायु धीरे-धीरे बाहर फेको । इसका अभ्यास तुम्हारे लिए कुछ कठिन ज्ञात होगा । सहज उपाय है—अँगूठे से दाहिनी नाक बन्द करके बाईं नाक से धीरे-धीरे वायु भरो । फिर अँगूठे और तर्जनी से दोनो नथुने बन्द कर लो और सोचो, मानो तुम स्नायु-प्रवाह को नीचे भेज रहे हो और सुषुम्ना के मूल देश मे आघात कर रहे हो । इसके बाद अँगूठा हटाकर दाहिनी नाक द्वारा वायु बाहर निकालो । फिर
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बाई नासिका तर्जनी से बन्द करके दाहिनी नाक से धीरे-धीरे वायु-पूरण करो और फिर पहले की तरह दोनो नासिका-छिद्रो को बन्द कर लो। हिन्दुओं के समान प्राणायाम का अभ्यास करना इस देश (अमेरिका) के लिए कठिन होगा, क्योकि हिन्दू बाल्यकाल से ही इसका अभ्यास करते हैं, उनके फेफडे इसके अभ्यस्त हैं। यहाँ चार सेकन्ड से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढाने पर अच्छा होगा। चार सेकन्ड तक वायु-पूरण करो, सोलह सेकन्ड बन्द करो और फिर आठ सेकन्ड में वायु का रेचन करो। इससे एक प्राणायाम होगा। पर उस समय मूलाधारस्थ त्रिकोणाकार पद्म पर मन स्थिर करना भूल न जाना। इस प्रकार की कल्पना से तुमको साधना मे बडी सहायता मिलेगी। एक तीसरे प्रकार का प्राणायाम यह है — धीरे-धीरे भीतर श्वास खींचो, फिर तनिक भी देर किए बिना धीरे-धीरे वायु रेचन करके बाहर ही श्वास कुछ देर के लिए रुद्ध कर रखो, संख्या पहले की प्राणायाम की तरह है। पूर्वोक्त प्राणायाम और इसमें भेद इतना ही है कि पहले के प्राणायाम में सांस भीतर रोकनी पडती है और यहाँ बाहर। यह प्राणायाम पहले से सीधा है। जिस प्राणायाम मे साँस भीतर रोकनी पड़ती है, उसका अधिक अभ्यास अच्छा नही। उसका सबेरे चार बार और शाम को चार बार अभ्यास करो। बाद में धीरे-धीरे समय और संख्या बढा सकते हो। तुम क्रमश देखोगे कि तुम बहुत सहज ही यह कर सक रहे हो और इससे तुम्हे बहुत आनन्द भी मिल रहा है। अतएव जब देखो कि तुम यह बहुत सहज ही कर सक रहे हो, तब बडी सावधानी और सतर्कता के साथ सख्या चार से छ बढा सकते हो। अनियमित रूप से साधना करने पर तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है।
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उपर्युक्त तीन प्रक्रियाओं में से पहली और अन्तिम क्रियाएँ कठिन भी नही और उनमे किसी प्रकार की विपत्ति की आशंका भी नही। पहली क्रिया का जितना अभ्यास करोगे, उतना ही तुम शान्त होते जाओगे। उसके साथ ओंकार जोड़कर अभ्यास करो, देखोगे, जब तुम दूसरे कार्य मे लगे हो, तब भी तुम उसका अभ्यास कर सक रहे हो। उस क्रिया के फल से, देखोगे, तुम अपने को सभी बातो मे अच्छा ही महसूस कर रहे हो। इस तरह कठोर साधना करते-करते एक दिन तुम्हारी कुण्डलिनी जग जायगी। जो दिन मे केवल एक या दो बार अभ्यास करेंगे, उनके शरीर और मन कुछ स्थिर भर हो जायेंगे और उनका स्वर मधुर हो जायगा। परन्तु जो कमर बाँधकर साधना के लिए आगे बढ़ेंगे, उनकी कुण्डलिनी जागृत् हो जायगी, उनके लिए सारी प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेगी, उनके लिए ज्ञान का द्वार खुल जायगा। तब फिर ग्रन्थो मे तुम्हे ज्ञान की खोज न करनी होगी। तुम्हारा मन ही तुम्हारे निकट अनन्त-ज्ञान-विशिष्ट पुस्तक का काम करेगा। मैने मेरुदण्ड के दोनो ओर से प्रवाहित इडा और पिंगला नामक दो शक्तिप्रवाहो का पहले ही उल्लेख किया है, और मेरुमज्जा के बीच से जानेवाली सुषुम्ना की बात भी कही है। यह इडा, पिंगला और सुषुम्ना प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। जिनके मेरुदण्ड है, उन सभी के भीतर ये तीन प्रकार की भिन्न-भिन्न क्रिया-प्रणालियाँ मौजूद है। परन्तु योगी कहते है, साधारण जीव में यह सुषुम्ना बन्द रहती है, उसके भीतर किसी तरह की क्रिया का अनुभव नही किया जा सकता, किन्तु इडा और पिंगला नाडियो का कार्य, अर्थात् शरीर के विभिन्न भागो में शक्तिवहन करना, सभी प्राणियो में होता रहता है।
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केवल योगी में यह सुषुम्ना खुली रहती है। यह सुषुम्ना-द्वार खुलने पर उसके भीतर से स्नायविक शक्तिप्रवाह जब ऊपर चढता है, तब चित्त उच्च से उच्चतर भूमि पर उठता जाता है, और अन्त में हम अतीन्द्रिय राज्य में चले जाते हैं। हमारा मन तब अतीन्द्रिय, ज्ञानातीत, पूर्णचैतन्य इत्यादि नामोंवाली अवस्था प्राप्त कर लेता है। तब हम बुद्धि के अतीत प्रदेश में चले जाते हैं, वहाँ तर्क नहीं पहुँच सकता। इस सुषुम्ना को खोलना ही योगी का एकमात्र उद्देश्य है। ऊपर में जिन शक्तिवहन-केन्द्रों का उल्लेख किया गया है, योगियों के मत में वे सुषुम्ना में ही अवस्थित हैं। रूपक की भाषा में उन्ही को पद्म कहते हैं। सबसे नीचेवाला पद्म सुषुम्ना के सबसे नीचे भाग में अवस्थित है। उसका नाम है मूलाधार। इसके बाद दूसरा है स्वाधिष्ठान। तीसरा मणिपूर। फिर चौथा अनाहत, पाँचवाँ विशुद्ध, छठा आज्ञा, और सातवाँ है सहस्रार या सहस्रदल पद्म। यह सहस्रार सबसे ऊपर, मस्तिष्क में स्थित है। अभी इनमें से केवल दो केन्द्रों (चक्रों) की बात हम लेंगे—सबसे नीचेवाले मूलाधार की और सबसे ऊपरवाले सहस्रार की। सबसे नीचेवाले चक्र में ही समस्त शक्तियाँ अवस्थित हैं, और उस शक्ति को उस जगह से लेकर मस्तिष्कस्थ सर्वोच्च चक्र पर ले जाना होगा। योगी कहते हैं, मनुष्य-देह में जितनी शक्तियाँ हैं, उनमें ओज सबसे उत्कृष्ट कोटि की शक्ति है। यह ओज मस्तिष्क में संचित रहता है। जिसके मस्तक में ओज जितने अधिक परिमाण में रहता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान् और आध्यात्मिक बल से बली होता है। एक व्यक्ति बड़ी सुन्दर भाषा में सुन्दर भाव व्यक्त करता है, परन्तु लोग आकृष्ट नहीं होते। और दूसरा
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व्यक्ति न सुन्दर भाषा बोल सकता है, न सुन्दर ढंग से भाव व्यक्त कर सकता है, परन्तु फिर भी लोग उसकी बात से मुग्ध हो जाते है। ऐसा क्यो ? यह ओज-शक्ति ही शरीर से निकलकर ऐसा अद्भुत कार्य करती है। इस ओज-शक्ति से युक्त पुरुष जो कुछ कार्य करते है, उसी मे महाशक्ति का विकास देखा जाता है। ऐसी है ओज की शक्ति ।
यह ओज, थोडी-बहुत मात्रा मे, सभी मनुष्यो मे विद्यमान है। शरीर मे जितनी शक्तियाँ खेल कर रही है, उनका उच्चतम विकास यह ओज है। यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि सवाल केवल परिवर्तन का है—एक ही शक्ति दूसरी शक्ति में परिणत हो जाती है। बाहरी संसार मे जो शक्ति विद्युत् अथवा चुम्बकीय शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रही है, वही क्रमश आभ्यन्तरिक शक्ति मे परिणत हो जायगी। आज जो शक्तियाँ पेशियो मे कार्य कर रही है, वे ही कल ओज के रूप मे परिणत हो जायँगी। योगी कहते हैं कि मनुष्य मे जो शक्ति काम-क्रिया-काम-चिन्तन आदि रूपो मे प्रकाशित हो रही है, उसका दमन करने पर वह सहज ही ओजधातु मे परिणत हो जाती है। और हमारे शरीर का सबसे नीचेवाला केन्द्र ही इस शक्ति का नियामक होने के कारण योगी इसकी ओर विशेष रूप से ध्यान देते हैं। वे सारी काम-शक्ति को लेकर ओजधातु में परिणत करने का प्रयत्न करते हैं। कामजयी स्त्री-पुरुष ही इस ओजधातु को मस्तिष्क में संचित कर सकते हैं। इसीलिए सब देशो मे ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। मनुष्य सहज ही अनुभव करता है कि काम को प्रश्रय देने पर सारा धर्मभाव, चरित्र-बल और मानसिक तेज जाता रहता है। इसी कारण, देखोगे, संसार में
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जिन-जिन सम्प्रदायो मे बड़े-बड़े धर्मवीर पैदा हुए है, उन सभी सम्प्रदायो ने ब्रह्मचर्य पर विशेष जोर दिया है। इसीलिए विवाह-त्यागी सन्यासी-दल की उत्पत्ति हुई है। इस ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से—तन-मन-वचन से—पालन करना नितान्त आवश्यक है। ब्रह्मचर्य बिना राजयोग की साधना बडे खतरे की है, क्योकि उससे अन्त में मस्तिष्क का विषम विकार पैदा हो सकता है। यदि कोई राजयोग का अभ्यास करे और साथ ही अपवित्र जीवन यापन करे, तो वह भला किस प्रकार योगी होने की आशा कर
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय
प्रत्याहार और धारणा
प्राणायाम के बाद प्रत्याहार की साधना करनी पडती है। प्रत्याहार क्या है ? तुम सबो को ज्ञात है कि विषयानुभूति किस तरह होती है। सबसे पहले, देखो, इन्द्रियो के द्वार-स्वरूप ये बाहर के यन्त्र हैं। फिर हैं इन्द्रियाँ। ये इन्द्रियाँ मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्रो की सहायता से शरीर पर कार्य करती हैं। इसके बाद है मन। जब ये समस्त एकत्र होकर किसी बाहरी वस्तु के साथ सलग्न होते हैं, तभी हम उस वस्तु का अनुभव कर सकते हैं। किन्तु मन को एकाग्र करके केवल किसी एक इन्द्रिय से सयुक्त कर रखना बहुत कठिन है, क्योकि मन (विषयो का) दास है।
हम ससार मे सर्वत्र देखते हैं, कि सभी यह शिक्षा दे रहे हैं, 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ।' ससार मे शायद किसी देश मे ऐसा बालक नही पैदा हुआ, जिसे मिथ्या भाषण न करने, चोरी न करने आदि की शिक्षा नही मिली, परन्तु कोई उसे यह शिक्षा नही देता कि वह इन असत् कर्मों से किस प्रकार बचे। केवल बात करने से काम नही बनता। वह चोर क्यो न बने ? हम तो उसको चोरी से निवृत्त होने की शिक्षा नही देते, उससे बस इतना ही कह देते है, 'चोरी मत करो।' यदि उसे मन सयम का उपाय सिखाया जाय, तभी वह यथार्थ मे शिक्षा प्राप्त कर सकता है, और वही उसकी सच्ची सहायता और उपकार है। जब मन इन्द्रिय नामक भिन्न-भिन्न शक्ति-केन्द्रों में सलग्न रहता है, तभी समस्त बाह्य और आभ्यन्तरिक कर्म
प्रत्याहार और धारणा
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होते हैं। इच्छापूर्वक अथवा अनिच्छापूर्वक मनुष्य अपने मन को भिन्न-भिन्न (इन्द्रिय नामक) केन्द्रो मे सलग्न करने को वाध्य होता है। इसीलिए मनुष्य अनेक प्रकार के दुष्कर्म करता है और वाद में कष्ट पाता है। मन यदि अपने वश में रहता, तो मनुष्य कभी अनुचित कर्म न करता। मन को सयत करने का फल क्या है? यही कि मन सयत हो जाने पर वह फिर विषयों का अनुभव करनेवाली भिन्न-भिन्न इन्द्रियो के साथ अपने को सयुक्त न करेगा। और ऐसा होने पर सब प्रकार के भाव और इच्छाएँ हमारे वश मे आ जायेंगी। यहाँ तक तो बहुत स्पष्ट है। अब प्रश्न यह है, क्या यह कार्य में परिणत होना सम्भव है? हाँ, यह सम्पूर्ण रूप से सम्भव है। तुम लोग वर्तमान समय मे भी इसका कुछ आभास देख रहे हो, विश्वास के बल से आरोग्यलाभ कराने-वाला सम्प्रदाय दुःख, कष्ट, अशुभ आदि के अस्तित्व को बिलकुल अस्वीकार कर देने की शिक्षा देता है। इसमे सन्देह नही कि इनका दर्शन बहुत-कुछ सिर के पीछे से हाथ ले जाकर नाक पकडने की तरह है, किन्तु वह भी एक प्रकार का योग है, किसी तरह उन लोगो ने उसका अविष्कार कर डाला है। जहाँ वे दुःख-कष्ट के अस्तित्व को अस्वीकार करने की शिक्षा देकर लोगो के दुःख दूर करने में सफल होते हैं, तो वहाँ समझना होगा कि उन्होने वास्तव मे प्रत्याहार की ही कुछ शिक्षा दी है, क्योकि वे उस व्यक्ति के मन को यहाँ तक सबल कर देते हैं कि वह इन्द्रियो की गवाही पर विश्वास ही नही करता। वशीकरणविद्यावाले (Hypnotists), इसी प्रकार, सूचनाशक्ति या आज्ञा (hypnotic suggestion) से कुछ देर के लिए अपने वश्य व्यक्तियो मे एक प्रकार का अस्वा-भाविक प्रत्याहार ले आते हैं। जिसे साधारणत वशीकरण-सूचना-
७८ राजयोग
७८ राजयोग
कहते हैं, वह केवल रोगग्रस्त देह और कमजोर मन पर ही अपना प्रवाह फैला सकता है। वशीकरणकारी जब तक स्थिर-दृष्टि अथवा अन्य किसी उपाय द्वारा अपने वश्य व्यक्ति के मन को निष्क्रिय, जड़तुल्य अस्वाभाविक अवस्था में नहीं ले जा सकता, तब तक वह चाहे जो कुछ सोचने, सुनने या देखने का आदेश दे, उसका कोई फल न होगा।
वशीकरणकारी या विश्वास-बल से आरोग्य करनेवाले थोड़े समय के लिए जो अपने वश्य व्यक्तियों के शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों (इन्द्रियों) को वशीभूत कर लेते हैं, वह अत्यन्त निन्दार्ह कर्म है, क्योंकि वह उस वश्य व्यक्ति को अन्त में सर्वनाश के रास्ते ले जाता है। यह कोई अपनी इच्छाशक्ति के बल से अपने मस्तिष्कस्थ केन्द्रों का संयम तो है नहीं, यह तो दूसरे की इच्छा-शक्ति के एकाएक प्रबल आघात से वश्य व्यक्ति के मन को कुछ समय के लिए मानो जड़ कर रखना है। वह लगाम और बाहु-बल की सहायता से, गाड़ी खींचनेवाले उच्छृंखल घोड़ों की उन्मत्त गति को संयत करना नहीं है, वरन् वह दूसरों से उन अश्वों पर तीव्र आघात करने को कहकर उनको कुछ समय के लिए चुप कर रखना है। उस व्यक्ति पर यह प्रक्रिया जितनी की जाती है, उतना ही वह अपने मन की शक्ति क्रमशः खोने लगता है, और अन्त में, मन को पूर्ण रूप से जीतना तो दूर रहा, उसका मन बिलकुल शक्तिहीन और विचित्र-सा हो जाता है तथा पागलखाने में ही उसकी चरम गति आ ठहरती है।
अपने मन को स्वयं अपने मन की सहायता से वश में लाने की चेष्टा के बदले इस प्रकार दूसरे की इच्छा से प्रेरित होकर मन का संयम अनिष्टकारक ही नहीं है, वरन् जिस उद्देश्य से वह
प्रत्याहार और धारणा ७९
कार्य किया जाता है, वह भी सिद्ध नही होता। प्रत्येक जीवात्मा का चरम लक्ष्य है मुक्ति या स्वाधीनता—जडवस्तु और चित्त-वृत्ति के दासत्व से मुक्तिलाभ करके उन पर प्रभुत्व स्थापित करना, बाह्य और अन्त प्रकृति पर अधिकार जमाना। किन्तु उस दिशा में सहायता करने की बात तो अलग रही, दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त इच्छाशक्ति का प्रवाह हम पर लगी हुई चित्तवृत्तिरूपी बन्धनो और प्राचीन कुसस्कारो की भारी बेडी में एक और कडी जोड देता है—फिर वह इच्छाशक्ति हम पर किसी भी रूप से क्यो न प्रयुक्त हो, और चाहे उससे हमारी इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष वशीभूत हो जायें, चाहे वह एक प्रकार की पीडित या विकृतावस्था में हमें इन्द्रियो को सयत करने के लिए बाध्य करे। इसलिए सावधान! दूसरे को अपने ऊपर इच्छा-शक्ति का सचालन न करने देना। अथवा दूसरे पर ऐसी इच्छाशक्ति का प्रयोग करके अनजाने उसका सत्यानाश न कर देना। यह सत्य है कि कोई-कोई लोग कुछ व्यक्तियो की प्रवृत्ति का मोड फेरकर कुछ दिनों के लिए उनका कुछ कल्याण करने मे कृतकार्य होते हैं, परन्तु साथ ही वे दूसरो पर इस वशीकरण-शक्ति का प्रयोग करके, बिना जाने, लाखो नर-नारियों को एक प्रकार से विकृत जडावस्थापन्न कर डालते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन वश्य व्यक्तियो की आत्मा का अस्तित्व तक मानो लुप्त हो जाता है। इसलिए जो कोई व्यक्ति तुमसे अन्धविश्वास करने को कहता है, अथवा अपनी श्रेष्ठतर इच्छा-शक्ति के बल से लोगो को वशीभूत करके अपना अनुसरण करने के लिए बाध्य करता है, वह मनुष्य-जाति का भारी अनिष्ट करता है—भले ही वह इसे इच्छापूर्वक न करता हो।
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राजयोग
अतएव अपने मन का सयम करने के लिए सदा अपने ही मन की सहायता लो, और यह सदा याद रखो कि तुम यदि रोगग्रस्त नही हो, तो कोई भी बाहरी इच्छाशक्ति तुम पर कार्य न कर सकेगी। जो व्यक्ति तुमसे अन्धे के समान विश्वास कर लेने को कहता हो, उससे दूर ही रहो, वह चाहे कितना भी बडा आदमी या साधु क्यो न हो। ससार के सभी भागो मे ऐसे बहुत से सम्प्रदाय हैं, जिनके धर्म के प्रधान अग नाच-गान, उछल-कूद, चिल्लाना आदि है। वे जब सगीत, नृत्य और प्रचार करना आरम्भ करते है, तब उनके भाव मानो सक्रामक रोग की तरह लोगो के अन्दर फैल जाते है। वे भी एक प्रकार के वशीकरण-कारी हैं। वे थोडे समय के लिए भावुक व्यक्तियो पर गजब का प्रभाव डाल देते है। पर हाय ! परिणाम यह होता है कि सारी जाति अध पतित हो जाती है। इस प्रकार की अस्वाभाविक बाहरी शक्ति के बल से किसी व्यक्ति या जाति के लिए ऊपर-ऊपर अच्छी होने की अपेक्षा अच्छी न रहना ही वेहतर है, और वह स्वास्थ्य का लक्षण है। इन धर्मोन्मत्त व्यक्तियो का उद्देश अच्छा भले ही हो, परन्तु इनको किसी उत्तरदायित्व का ज्ञान नही। इन लोगो द्वारा मनुष्य का जितना अनिष्ट होता है, उसका विचार करते ही हृदय स्तब्ध हो जाता है। वे नही जानते कि जो व्यक्ति सगीत, स्तव आदि की सहायता से—उनकी शक्ति के प्रभाव से, इस तरह एकाएक भगवद्भाव मे मत्त हो जाते है, वे अपने को केवल जड, विकृतभाववाले और शक्तिशून्य बना लेते है और सहज ही किसी भी भाव के वश में हो जाते हैं—फिर वह भाव कितना भी बुरा क्यो न हो। उसका प्रतिरोध करने की उनमें तनिक भी शक्ति नही रह जाती। इन अज्ञ, आत्मवचित व्यक्तियों
प्रत्याहार और धारणा
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के मन मे यह स्वप्न मे भी नही आता कि वे एक ओर जहाँ यह कहकर हर्षोत्फुल्ल हो रहे है कि उनमे मनुष्य के हृदय को परिवर्तित कर देने की अद्भुत शक्ति है—जिस शक्ति के सम्बन्ध मे वे सोचते हैं कि वह बादल के ऊपर अवस्थित किसी पुरुष से उन्हे मिली है—वहाँ साथ ही वे भावी मानसिक अवनति, पाप, उन्मत्तता और मृत्यु के बीज भी बो रहे है । 'अतएव, जिससे तुम्हारी स्वाधीनता नष्ट होती हो, ऐसे सब प्रकार के प्रभावों से सतर्क रहो। ऐसे प्रभावो को भयानक विपत्ति से भरा जानकर प्राणपण से उनसे दूर रहने की चेष्टा करो।'
जो इच्छामात्र से अपने मन को केन्द्रो मे सलग्न करने अथवा उनसे हटा लेने मे सफल हो गया है, उसी का प्रत्याहार सिद्ध हुआ है । प्रत्याहार का अर्थ है, एक ओर आहरण करना अर्थात् खींचना—मन की बहिर्गति को रोककर, इन्द्रियों की अधीनता से मन को मुक्त करके उसे भीतर की ओर खींचना । इसमें कृतकार्य होने पर हम यथार्थ में चरित्रवान होगे; और तभी समझेगे कि हम मुक्ति के मार्ग मे बहुत दूर बढ गए हैं । यह यदि न किया जा सका, तो हममे तथा एक यन्त्र में फिर अन्तर ही क्या !
मन को सयंत करना कितना कठिन है ! इसकी उपमा एक उन्मत्त वानर से दी गई है, और वह कोई असंगत बात नही । कही एक बन्दर था । उसकी मर्कट-स्वभाववाली चंचलता तो थी ही, लेकिन उतने से सन्तुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफी शराब पिला दी । इससे वह और भी चंचल हो गया । इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डक मार दिया । तुम जानते हो, किसी को बिच्छू डंक मार दे, तो वह दिन भर इधर-उधर कितना
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८२ | राजयोग
तड़पता रहता है। सो उस प्रमत्त अवस्था के ऊपर बिच्छू का डंक ! इससे वह बन्दर बहुत अस्थिर हो गया। तत्पश्चात् मानो उसके दुःख की मात्रा को पूरी करने के लिए एक भूत उस पर सवार हो गया। यह सब मिलाकर, सोचो, बन्दर कितना चंचल हो गया होगा। यह भाषा द्वारा व्यक्त करना असम्भव है। बस, मनुष्य का मन उस वानर के सदृश्य है। मन तो स्वभावत ही सतत चंचल है, फिर वह वासनारूप मदिरा से मत्त है, इससे उसकी अस्थिरता बढ़ गई है। जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर ईर्ष्यारूप बिच्छू उसे डंक मारता रहता है। उसके भी ऊपर जब अहंकाररूप पिशाच उसके भीतर प्रवेश करता है, तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता। ऐसी तो हमारे मन की अवस्था है ! सोचो तो, इसका संयम करना कितना कठिन है !
अतएव मन के संयम का पहला सोपान यह है कि कुछ समय के लिये चुप्पी साधकर बैठे रहो और मन को अपने अनुसार चलने दो। मन सतत चंचल है। वह बन्दर की तरह सदा कूद-फांद रहा है। यह मन-मर्कट जितनी इच्छा हो उछल-कूद मचाये, कोई हानि नहीं, धीर भाव से प्रतीक्षा करो और मन की गति देखते जाओ। लोग जो कहते हैं कि ज्ञान ही यथार्थ शक्ति है, यह बिलकुल सत्य है। जब तक मन की क्रियाओं पर नज़र न रखोगे, उसका संयम न कर सकोगे। मन को इच्छानुसार घूमने दो। सम्भव है, बहुत बुरी-बुरी भावनाएँ तुम्हारे मन में आएँ। तुम्हारे मन में इतनी असत् भावनाएँ आ सकती हैं कि तुम सोचकर आश्चर्यचकित हो जाओगे। परन्तु देखोगे, मन के ये सब खेल दिन-पर-दिन कम