राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र—४
पातंजल-योगसूत्र—४
२७५
शान्ति, विनय और पूर्ण पवित्रता उनका स्वभाव ही बन गई थी।
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ३० ॥
सूत्रार्थ— उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मों का सर्वथा नाश हो जाता है।
व्याख्या— जब यह धर्ममेध समाधि होती है, तब पतन की आशंका फिर नहीं रह जाती, तब योगी को कुछ भी नीचे नहीं खींच सकता। तब उनके लिए न कोई बुराई रह जाती है, न कोई कष्ट।
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ३१ ॥
सूत्रार्थ— उस समय ज्ञान, सब प्रकार के आवरण और अशुद्धि से रहित होने के कारण, अनन्त हो जाता है, अतः ज्ञेय अल्प हो जाता है।
व्याख्या— ज्ञान तो भीतर में ही है, केवल उसका आवरण चला जाता है। किसी बौद्ध शास्त्र ने 'बुद्ध' (यह एक अवस्था का सूचक है) शब्द की परिभाषा दी है—अनन्त आकाश के समान अनन्त ज्ञान। ईसा इस अवस्था की प्राप्ति कर ख्रीष्ट हो गए थे। तुम सभी उस अवस्था की प्राप्ति करोगे। तब ज्ञान अनन्त हो जायगा, अतः ज्ञेय अल्प हो जायगा। तब यह सारा जगत्, अपनी सब प्रकार की ज्ञेय वस्तुओं के साथ, पुरुष के समक्ष शून्य रूप से प्रतिभासित होगा। साधारण मनुष्य अपने को अत्यन्त क्षुद्र समझता है, क्योंकि उसको ज्ञेय वस्तु अनन्त प्रतीत होती है।
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ३२ ॥
सूत्रार्थ— जब गुणों का काम समाप्त हो जाता है, तब गुणों के जो विभिन्न परिणाम हैं, वे भी समाप्त हो जाते हैं।
२७६ राजयोग
२७६ राजयोग
**व्याख्या—**तब गुणों के ये सब विभिन्न परिणाम (एक जाति से उनकी दूसरी जाति में परिणति) बिलकुल समाप्त हो जाते हैं।
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ३३ ॥
**सूत्रार्थ—**जो सब परिणाम प्रत्येक क्षण से सम्बन्धित हैं, और जो दूसरे छोर में (अर्थात् एक परिणाम-परम्परा के अन्त में) समझ में आते हैं, वे क्रम हैं।
**व्याख्या—**पतंजलि ने यहां 'क्रम' शब्द की परिभाषा दी है। क्रम शब्द से उन सब परिणामो का बोध होता है, जो प्रत्येक क्षण से सम्बन्धित हैं। मैं सोच रहा हूँ, इसमे कितने क्षण चले गए ! इस प्रत्येक क्षण के साथ भाव का परिवर्तन होता है, पर मैं उन सब परिणामो को एक श्रेणी के अन्त मे ही अर्थात् एक परिणाम-परम्परा के बाद ही पकड सकता हूँ। इसे क्रम कहते हैं। किन्तु जो मन सर्वव्यापी हो गया है, उसके लिए फिर क्रम नही रह जाता। उसके लिए सब कुछ वर्तमान हो गया है; उसके लिए केवल वर्तमान ही रहता है, भूत और भविष्य उसके ज्ञान से बिलकुल चले जाते हैं। तब वह मन काल पर विजय प्राप्त कर लेता है और उसके पास समस्त ज्ञान एक क्षण में आकर उपस्थित हो जाता है। उसके पास सब कुछ विद्युत् के समान झट से प्रकाशित हो जाता है।
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥ ३४ ॥
**सूत्रार्थ—**गुणों से जब पुरुष का कोई प्रयोजन नहीं रहता, तब प्रतिलोम-क्रम से गुणों के लय को कैवल्य कहते हैं, अथवा यों कहिए कि द्रष्टा (चित्शक्ति) का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना कैवल्य है।
पातंजल-योगसूत्र—४ २७७
**व्याख्या—**प्रकृति का काम समाप्त हो गया। हमारी परम कल्याणमयी धात्री प्रकृति ने इच्छापूर्वक जिस नि स्वार्थ कार्य का भार अपने कन्धो पर लिया था, वह समाप्त हो गया। उसने मानो आत्मविस्मृत जीवात्मा का हाथ पकडकर उसे धीरे-धीरे ससार के समस्त भोगो का अनुभव कराया, अपनी समस्त अभिव्यक्ति दिखाई, सारे विकार दिखाए, और इस प्रकार वह उसे विभिन्न शरीरो मे से ले जाते हुए क्रमश उच्च से उच्चतर अवस्था मे उठाती गई। अन्त मे आत्मा ने अपनी खोई हुई महिमा फिर से प्राप्त कर ली, अपना स्वरूप फिर से उसके मानस मे उदित हो गया। तब वह करुणामयी जननी जिस रास्ते से आई थी, उसी रास्ते से वापस चली गई और उन लोगो को रास्ता दिखाने मे प्रवृत्त हो गई, जो इस जीवन के पथचिह्नविहीन मरुभूमि में अपना पथ खो बैठे है। वह अनादि, अनन्त काल से इस प्रकार काम करती चली आ रही है। बस इसी प्रकार सुख और दुख, भले और बुरे के बीच मे से होते हुए अनन्त नदीस्वरूप जीवात्मागण सिद्धि और आत्मसाक्षात्काररूप समुद्र की ओर चले जा रहे है।
जिन्होंने अपने स्वरूप का अनुभव कर लिया है, उनकी जय हो। वे हम सबको आशीर्वाद दें।
परिशिष्ट
योग के बारे मे अन्यान्य शास्त्रों के मत
श्वेताश्वतर उपनिषद्
द्वितीय अध्याय
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥६॥
अर्थ—जहाँ अग्नि का मथन किया जाता है, जहाँ वायु को रुद्ध किया जाता है और जहाँ सोमरस की अधिकता होती है, वही (सिद्ध) मन की उत्पत्ति होती है।
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥
अर्थ—वक्ष, ग्रीवा और शिर को उन्नत रखते हुए शरीर को सीधा रख, मन के द्वारा इन्द्रियो को हृदय मे संनिविष्ट कर ज्ञानी व्यक्ति ब्रह्मरूप नौका के द्वारा सारे भयावह जल-प्रवाहो के पार हो जाते हैं।
प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥९॥
अर्थ—संयुक्तचेष्ट मनुष्य प्राण को सयत करते हैं। जब वह शान्त हो जाता है, तब नाक के द्वारा प्रश्वास का परित्याग करते हैं। जिस प्रकार सारथि चंचल अश्वों को धारण करता है, उसी प्रकार अध्यवसायशील योगी भी मन को धारण करे।
समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥
अर्थ—जो समतल और शुचि हो, पत्थर, आग और वालू
२८० राजयोग
२८० राजयोग
से रहित हो, मनुष्य द्वारा किए गए या किसी जलप्रपात से उत्पन्न मन को चंचल कर देने वाले शब्दो से वर्जित हो, तथा मन के अनुकूल और आँखो को सुखकर हो, ऐसे पर्वतगुहा आदि निर्जन स्थान में बैठकर योग का अभ्यास करना चाहिए।
नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुर सराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥
अर्थ— नीहार, धूम, सूरज, वायु, आग, जुगनू, विद्युत्, स्फटिक, चन्द्रमा—ये सब रूप सामने आकर क्रमश योग में ब्रह्म को अभिव्यक्त करते हैं।
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पंचात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥
अर्थ— जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पंचभूतो से योग की अनुभूतियां होने लगती हैं, तब समझना चाहिए कि योग आरम्भ हो गया है। जिन्हें इस प्रकार का योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है, उनके लिए फिर बीमारी, जरा या मृत्यु नहीं रहती।
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसाद स्वरसौष्ठवं च ।
गन्ध शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्ति प्रथमां वदन्ति ॥१३॥
अर्थ— शरीर की लघुता, स्वास्थ्य, लोभशून्यता, सुन्दर रंग, स्वर-सौन्दर्य, मल-मूत्र की अल्पता तथा शरीर की एक सुन्दर सुगन्ध—इन सबको योग की पहली सिद्धि कहते हैं।
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत् सुधान्तम् ।
तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एक. कृतार्थो भवते वीतशोक ॥१४॥
अर्थ— जिस प्रकार मिट्टी से सना हुआ सोने या चाँदी
परिशिष्ट २८१
का टुकड़ा शोधन किए जाने पर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देही आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है।
शंकर-उद्धृत याज्ञवल्क्य
आसनानि समभ्यस्य वाञ्छितानि यथाविधि ।
प्राणायामं ततो गार्गि जितासनगतोऽभ्यसेत् ॥
मृद्वासने कुशान् सम्यगास्तीर्याजिनमेव च ।
लम्बोदरं च संपूज्य फलमोदकभञ्जनैः ॥
तदासने सुखासीनः सव्ये न्यस्येतरं करम् ।
समग्रीवशिरः सम्यक् संवृतास्यः सुनिश्चितः ॥
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि नासाग्रन्यस्तलोचनः ।
अतिभुक्तमभुक्तं च वर्जयित्वा प्रयत्नतः ॥
नाडीसंशोधनं कुर्यादुक्तमार्गेण यत्नतः ।
वृथा क्लेशो भवेत्तस्य तच्छोधनमकुर्वतः ॥
नासाग्रे शशभृद्बीजं चन्द्रातपवितानितम् ।
सप्तमस्य तु वर्गस्य चतुर्थं बिंदुसंयुक्तम् ॥
विश्वमध्यस्थमालोक्य नासाग्रे चक्षुषी उभे ।
इडया पूरयेद्वायुं बाह्यं द्वादशमात्रकैः ॥
ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्यायेत् स्फुरज्जज्वालावलीयुतम् ।
रेफं च बिन्दुसंयुक्तं शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥
ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं मन्दं पिंगलया पुनः ।
पुनः पिंगलयापूर्य घ्राणं दक्षिणतः सुधीः ॥
तद्वद्विरेचयेद्वायुमिडया तु शनैः शनैः ।
त्रिचतुर्वत्सरं चापि त्रिचतुर्मासमेव वा ॥
२८२ राजयोग
२८२ राजयोग
गुरुणोक्तप्रकारेण रहस्येवं समभ्यसेत् । प्रातर्मध्यंदिने सायं स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत् ॥ सन्ध्यादिकर्म कृत्वैव मध्यरात्रेऽपि नित्यशः । नाडीशुद्धिमवाप्नोति तच्चिह्नं दृश्यते पृथक् ॥ शरीरलघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् ॥ नादाभिव्यक्तिरित्येतल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ॥
* * *
प्राणायामं ततः कुर्याद्रेचपूरककुम्भकैः ॥ प्राणापानसमायोगः प्राणायामः प्रकीर्तितः ॥
* * *
पूरयेत् षोडशैर्मात्रैरापादतलमस्तकम् । मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चाद्रेचयेत् सुसमाहितः ॥ सम्पूर्णकुम्भवद्वायोर्निश्चल मूर्ध्नदेशतः । कुम्भक धारणं गार्गि चतु.षष्ट्या तु मात्रया ॥ ऋपयस्तु वदन्त्यन्ये प्राणायामपरायणाः । पवित्रभूताः पूतान्त्रा. प्रभञ्जनजये रता ॥ तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा चतु.षष्ट्या तु मात्रया । रेचयेत् षोडशर्मात्रैर्नासिनेकेन सुन्दरि ॥ तयोश्च पूरयेद्वायुं शनै. पोडशमात्रया ।
* * *
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्विषान् । प्रत्याहाराच्च संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥
व्याख्या—यथाविधि वांछित आसनों का अभ्यास करके, तदनन्तर, हे गार्गि, आसन पर जय प्राप्त कर प्राणायाम का।
परिशिष्ट २८३-
अभ्यास करना चाहिए। कोमल आसन पर सम्यक् प्रकार से कुश बिछा, उस पर मृगचर्म बिछाकर, फल और मोदक आदि के द्वारा गणेश की पूजा करके, उस आसन पर सुखासीन होकर, बाएँ हाथ पर दाहिना हाथ रखकर, समग्रीवशिर हो, मुँह बन्द करके, निश्चल होकर, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठकर, नासाग्र मे दृष्टि को स्थापित करके, यत्नपूर्वक अतिभोजन या एकदम अनाहार का त्याग कर पूर्वोक्त प्रकार से यत्नपूर्वक नाडी का शोधन करे, यह नाड़ी शोधन न करने पर उसके साधन के सारे क्लेश निष्फल होते हैं। पिंगला और इड़ा के संयोगस्थल मे (दाहिनी और बाईं नाक के सयोग-स्थल मे) 'हु' बीज का चिन्तन करके इडा के द्वारा द्वादश-मात्रा-क्रम से बाह्य वायु को भीतर खींचे, उसके बाद उस स्थान मे अग्नि का चिन्तन तथा 'र' बीज का ध्यान करे, इस तरह ध्यान करने के समय धीरे-धीरे पिंगला (दाहिनी नाक) के द्वारा वायु का रेचन करे। पुनः पिंगला के द्वारा पूरक करके पूर्वोक्त प्रकार से धीरे-धीरे इडा के द्वारा रेचन करे। श्रीगुरु के उपदेशानुसार इसका तीन-चार वर्ष या तीन-चार मास अभ्यास करे। प्रात काल, मध्याह्न, सायकाल तथा मध्यरात्रि में, जब तक नाड़ीशुद्धि नही हो जाती, तब तक एकान्त में अभ्यास करना होगा। तब उनमें ये सब लक्षण प्रकाशित होते हैं, जैसे, शरीर का हल्कापन, सुन्दर वर्ण, क्षुधा तथा नादश्रवण। तत्पश्चात् रेचक, कुम्भक और पूरकात्मक प्राणायाम करना होगा। अपान के साथ प्राण का योग करने का नाम है प्राणायाम। १६ मात्राओ में मस्तक से लेकर पद तक पूरक, ३२ मात्राओ मे रेचक और ६४ मात्राओ में कुम्भक करे।
-२८४ राजयोग
-२८४ राजयोग
और एक प्रकार का प्राणायाम है, उसमे पहले ६४ मात्राओ मे कुम्भक, फिर ३२ मात्राओ मे रेचक और तत्पश्चात् १६ मात्राओ मे पूरक करना पडता है, प्राणायाम के द्वारा शरीर के सारे दोष दग्ध हो जाते है। धारणा से मन की अपवित्रता दूर हो जाती है, प्रत्याहार से सग-दोष नष्ट हो जाता है तथा ध्यान से आत्मा के ईश्वरभाव को आवृत कर रखनेवाला सारा आवरण नष्ट हो जाता है।
सांख्य-प्रवचन-सूत्र
तृतीय अध्याय
भावनोपचयात् शुद्धस्य सर्वं प्रकृतिवत् ॥२९॥
अर्थ—गंभीर ध्यान के बल से, शुद्धस्वरूप पुरुष के पास प्रकृति की सारी शक्तियाँ आ जाती हैं।
रागोपहतिर्ध्यानम् ॥३०॥
अर्थ—आसक्ति के नाश को ध्यान कहते हैं।
वृत्तिनिरोधात् तत्सिद्धिः ॥३१॥
अर्थ—ध्यान की सिद्धि समस्त वृत्तियों के निरोध से होती है।
धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धि ॥३२॥
अर्थ—धारणा, आसन और अपने कर्तव्य-कर्मों के पालन से ध्यान सिद्ध होता है।
निरोधश्छर्द्दिविधारणाभ्याम् ॥३३॥
अर्थ—श्वास की छर्दि (त्याग) और विधारण (धारण) के द्वारा प्राणवायु का निरोध होता है।
स्थिरसुखमासनम् ॥३४॥
अर्थ—जिससे स्थिर और सुखकर रूप से बैठा जा सके, उसका नाम आसन है।
> श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥५॥
परिशिष्ट २८५
वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥
अर्थ—वैराग्य और अभ्यास से भी (ध्यान सिद्ध होता है)।
तात्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद्विवेकसिद्धिः ॥७४॥
अर्थ—प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व को 'यह नहीं', 'यह नहीं', ऐसा कहकर त्याग सकने से विवेक सिद्ध होता है।
चतुर्थ अध्याय
आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥३॥
अर्थ—वेद मे एक से अधिक बार श्रवण का उपदेश है, अतएव पुनः-पुन श्रवण आवश्यक है।
श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥५॥
अर्थ—जैसे वाज पक्षी, मास छीन लिए जाने पर, दुःखी और स्वय इच्छापूर्वक उसको त्याग देने से सुखी होता है, (वैसे ही साधु पुरुष इच्छापूर्वक सबका त्याग करके सुखी होते हैं)।
अहिनिर्व्वयनीवत् ॥६॥
अर्थ—जैसे सर्प शरीरस्थ जीर्ण केचुली को हेय समझकर अनायास त्याग देता है।
असाधनानुचिन्तनं बन्धाय भरतवत् ॥८॥
अर्थ—जो विवेकज्ञान का साधन नही है, उसका चिन्तन न करे, क्योकि वह बन्धन का हेतु है; दृष्टान्त—राजा भरत।
बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिः कुमारीशंखवत् ॥९॥
अर्थ—बहुत से लोगो का सग, रागादि का कारण होने से, ध्यान में विघ्नस्वरूप है, दृष्टान्त—कुमारी के हाथ में शंख के कंगन।
२८६ राजयोग
द्वाभ्यामपि तथैव ॥१०॥
अर्थ—दो मनुष्यो के एक साथ रहने पर भी ऐसा ही है।
निराश सुखी पिंगलावत् ॥११॥
अर्थ—आशा को त्याग देनेवाला सुखी होता है; दृष्टान्त—पिंगला नाम की वेश्या।
बहुशास्त्रगुरूपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥१३॥
अर्थ—जिस प्रकार मधुकर बहुत से फूलो से मधु सग्रह करता है, उसी प्रकार यद्यपि बहुत से शास्त्रो और गुरुओ की उपासना की जाती है, तो भी उनमें से केवल सार को लेना चाहिए।
इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधिहानिः ॥१४॥
अर्थ—बाण बनानेवाले के समान एकाग्रचित्त रहने पर समाधि भग नही होती।
कृतनियमलंघनादानर्थक्यं लोकवत् ॥१५॥
अर्थ—जैसे लौकिक विषय में कृतनियमो का उल्लंघन करने पर महा अनर्थ होता है, वैसे ही इसमे भी।
प्रणतितद्ब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहुकालात्तद्वत् ॥१९॥
अर्थ—प्रणति, ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा के द्वारा, इन्द्र के समान, बहुत समय के बाद सिद्धि प्राप्त होती है।
न कालनियमो वामदेववत् ॥२०॥
अर्थ—ज्ञानोत्पत्ति का कोई कालनियम नही है। जैसे, वामदेव मुनि को (गर्भावस्था मे ज्ञान का उदय) हुआ था।
लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥२४॥
अर्थ—जिस मनुष्य ने अतिशय यानी ज्ञान की पराकाष्ठा
चतुर्थ अध्याय—प्रथम पाद
परिशिष्ट २८७
को प्राप्त कर लिया है, उसके संग के द्वारा भी विवेक प्राप्त होता है ।
न भोगात् रागशान्तिर्मुनिवत् ॥२७॥
अर्थ—जिस प्रकार भोग से सौभरि मुनि की आसक्ति दूर नही हुई थी, उसी प्रकार दूसरो की भी भोग के द्वारा आसक्ति नष्ट नही होती ।
पंचम अध्याय
योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ॥१२८॥
अर्थ—ओषधि आदि के द्वारा आरोग्यसिद्धि होने के कारण जिस प्रकार मनुष्य ओषधि आदि की शक्ति को अस्वीकार नहीं करते, उसी प्रकार योगज सिद्धि को भी अस्वीकार नही किया जा सकता ।
षष्ठ अध्याय
स्थिरसुखमासनमिति न नियम. ॥२४॥
अर्थ—स्वस्तिक आदि आसन का अभ्यास करना ही पड़ेगा, ऐसा कोई नियम नही है । जिस प्रकार बैठना सुखकर हो और जिससे शरीर और मन विचलित न हो, वही आसन है ।
व्याससूत्र
चतुर्थ अध्याय—प्रथम पाद
आसीनः सम्भवात् ॥७॥
अर्थ—उपासना बैठकर ही सम्भव है, अतः बैठकर उपासना करनी चाहिए ।
ध्यानाच्च ॥८॥
अर्थ—ध्यान के कारण भी (बैठे हुए, अग-संचालन-क्रिया से रहित इत्यादि लक्षणयुक्त पुरुष को देखकर लोग कहते हैं,
| २८८ | राजयोग |
|---|
'ये ध्यान कर रहे हैं', अतएव ध्यान बैठे हुए पुरुष में ही सम्भव है)।
अचलत्वं चापेक्ष्य ॥९॥
अर्थ—क्योंकि ध्यानी पुरुष की तुलना निश्चल पृथ्वी के साथ की गई है।
स्मरन्ति च ॥१०॥
अर्थ—क्योंकि स्मृति में भी यही बात कही गई है।
यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥११॥
अर्थ—जहाँ एकाग्रता होती हो, उसी स्थान में बैठकर ध्यान करना चाहिए, कारण, किस स्थान में बैठकर ध्यान करना होगा इसका कोई विशेष विधान नहीं है।
इन कुछ उद्धृत अंशों को देखने से यह ज्ञात हो जायगा कि अन्यान्य भारतीय दर्शन योग के बारे में क्या कहते हैं।
१३. भारत में विवेकानन्द—भारतीय व्याख्यान (द्वि स) ५.००
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८ विवेकानन्दजी के सग में (वार्तालाप)—शरच्चन्द्र चक्रवर्तीकृत— आकर्षक जैकेट सहित,—तृतीय सस्करण—मूल्य रु ५.२५
९-१० धर्म-प्रसग में स्वामी शिवानन्द—स्वामी अपूर्वानन्द द्वारा सकलित, दो भागो मे, प्रत्येक भाग का मूल्य रु २.७५
११. परमार्थ-प्रसग—स्वामी विरजानन्द, (आर्ट पेपर पर छपी हुई) सजिल्द, मूल्य रु ३.२५
स्वामी विवेकानन्दकृत पुस्तके
१२. देववाणी (अमरीकी शिष्यो को दिए गये उपदेश) (द्वि स.) २.७५ १३. भारत में विवेकानन्द—भारतीय व्याख्यान (द्वि स) ५.००
| १४ पत्रावली (प्रथम भाग)<br>द्वितीय सस्करण, ५.२५ | २१ धर्मविज्ञान (द्वि स) १.६२ |
| १५. पत्रावली (द्वितीय भाग)<br>द्वितीय सस्करण, ४.२५ | २२ हिन्दू धर्म (तृ स) १.५० |
| १६. ज्ञानयोग (द्वि स) ३.०० | २३ स्वामी विवेकानन्दजी से<br>वार्तालाप (द्वि स.) १.३७ |
| १७. कर्मयोग (च स.) १.४० | २४ आत्मानुभूति तथा उसके मार्ग<br>(च. स) १.२५ |
| १८. प्रेमयोग (च स) १.३७ | २५ परिव्राजक (च स) १.२५ |
| १९. भक्तियोग (च स.) १.३७ | २६ प्राच्य और पाश्चात्य<br>(पचम म) १.२५ |
| २०. सरल राजयोग<br>(तृ. स) ०.५० | २७. महापुरुषो की जीवनगाथायें<br>(अष्टम स) १.२५ |
(२)
| २८ व्यावहारिक जीवन में वेदान्त (द्वि. म) १.१५ | ४६. भारतीय नारी (च स) ०.७५. |
| २९ विविध प्रसङ्ग १.१२ | ४७ पवहारी बाबा (द्वि स) ० ५० |
| ३० धर्मरहस्य (तृ स) १ २५ | ४८. ईशदूत ईसा (द्वि स.) ०.४० |
| ३१ जाति, संस्कृति और समाजवाद (द्वि म) १ २५ | ४९. विवेकानन्दजी के सान्निध्य में,- ० ९० |
| ३२ स्वाधीन भारत! जय हो! (तृ स) १ ५० | पॉकेट साइज पुस्तकें |
| ३३ विवेकानन्दजी की कथाएं (तृ स) १ ६० | ५० शक्तिदायी विचार (तृ. म.) ० ६२ |
| ३४ चिन्तनीय बातें १.०० | ५१ मेरी समरनीति (द्वि स) ० ६५. |
| ३५ भगवान् रामकृष्ण, उनका सङ्घ (द्वि स) ०.६२ | ५२ विवेकानन्दजी के उद्गार (द्वि स.) ० ६५. |
| ३६ शिक्षा (तृ स) ०.६२ | ५३ श्रीरामकृष्ण-उपदेश-स्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा संकलित,- (च. स) ० ७५. |
| ३७ कवितावली (द्वि स) ०.६२ | ५४. रामकृष्ण संघ— आदर्श और इतिहास— (द्वि. स.) स्वामी तेजसानन्द, ० ७५ |
| ३८ हमारा भारत (द्वि स) ० ६५ | ५५ साधु नागमहाशय (भगवान् श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग गृही शिष्य का जीवन-चरित) १ ५० |
| ३९ मेरे गुरुदेव (प स) ० ६२ | ५६ गीतातत्त्व-स्वामी सारदानन्द,- २ ३७ |
| ४०. वर्तमान भारत (प स) ० ५० | ५७ भारत में शक्ति-पूजा— स्वामी सारदानन्द, १ २५. |
| ४१ शिकागो वक्तृता (सप्तम स) ०.६२ | ५८ वेदान्त—सिद्धान्त और व्यवहार, (द्वि स) स्वामी सारदानन्द ० ५० |
| ४२ हिन्दू धर्म के पक्ष में (तृ स) ० ७५ | |
| ४३ मरणोत्तर जीवन (तृ स) ० ५० | |
| ४४. मेरा जीवन तथा ध्येय (तृ स) ०.५० | |
| ४५ मन की शक्तियाँ तथा जीवन-गठन की साधनायें (तृ. स.) ० ४० |
श्रीरामकृष्ण आश्रम, धन्तोली, नागपुर-१