राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
प्राण ५७
अवस्या तो वह है, जब हमे सत्यस्वरूप ब्रह्म के दर्शन होते है। तब हम उस उपादान को जान लेते है, जिससे इन सब बहुविध जीवों की उत्पत्ति हुई है। जैसे एक मृत्पिण्ड को जान लेने पर समस्त मृत्पिण्ड ज्ञात हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म-दर्शन से सम्पूर्ण जगत् भी जाना जा सकता है।
इस प्रकार हम देखते है कि प्रेततत्त्व-विद्या में जो कुछ सत्य है, वह भी प्राणायाम के ही अन्तर्भूत है। इसी-प्रकार, जब कभी तुम देखो कि कोई दल या सम्प्रदाय किसी रहस्यात्मक या गुप्त तत्त्व के आविष्कार की चेष्टा कर रहा है, तो समझना, वह यथार्थत. किसी परिमाण मे इस राजयोग की ही साधना कर रहा है, प्राण-सयम की ही चेष्टा कर रहा है। जहाँ कही किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का विकास हुआ है, वहाँ प्राण की ही शक्ति का विकास समझना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक विज्ञान भी प्राणायाम के अन्तर्गत किए जा सकते हैं। वाष्पीय यन्त्र को कौन संचालित करता है ? प्राण ही वाष्प के भीतर से उसको चलाता है। ये जो विद्युत् की अद्भुत क्रियाएँ दीख पडती है, ये सब प्राण के छोड भला और क्या हो सकती है ? पदार्थ-विज्ञान है क्या ? वह बाहरी उपायों द्वारा प्राणायाम है। प्राण जब मानसिक शक्ति के रूप से प्रकाशित होता है, तब मानसिक उपायो द्वारा ही उसका सयम किया जा सकता है। जिस प्राणायाम मे प्राण के स्थूल रूपो को बाह्य उपायो द्वारा जीतने की चेष्टा की जाती है, उसे पदार्थ-विज्ञान या भौतिक विज्ञान कहते है, और जिस प्राणायाम मे प्राण के मानसिक विकासो को मानसिक उपायो द्वारा सयत करने की चेष्टा की जाती है, उसी को राजयोग कहते हैं।
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय
प्राण का आध्यात्मिक रूप
योगियों के मतानुसार मेरुदण्ड के भीतर इड़ा और पिंगला नाम के दो स्नायविक शक्तिप्रवाह, और मेरुदण्डस्थ मज्जा के बीच सुषुम्ना नाम की एक शून्य नाली है। इस शून्य नाली के सबसे नीचे कुण्डलिनी का आधारभूत पद्म अवस्थित है। योगियों का कहना है कि वह त्रिकोणाकार है। योगियों की रूपक भाषा में कुण्डलिनी शक्ति उस स्थान पर कुण्डलाकार हो विराज रही है। जब यह कुण्डलिनी शक्ति जगती है, तब वह इस शून्य नाली के भीतर से मार्ग बनाकर ऊपर उठने का प्रयत्न करती है, और ज्यो-ज्यो वह एक-एक सोपान ऊपर उठती जाती है, त्यो-त्यों मन के स्तर-पर-स्तर मानो खुलते जाते हैं और योगी को अनेक प्रकार के अलौकिक दर्शन होने लगते हैं तथा अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होने लगती हैं। जब वह कुण्डलिनी मस्तक पर चढ़ जाती है, तब योगी सम्पूर्ण रूप से शरीर और मन से पृथक हो जाते हैं और उनकी आत्मा अपने मुक्त स्वभाव की उपलब्धि करती है। हमें मालूम है कि मेरुमज्जा एक विशेष प्रकार से गठित है। अँगरेजी के आठ अंक (8) को यदि इस तरह (∞) लम्बा कर लिया जाय, तो देखेंगे कि उसके दो अंश हैं और वे दोनों अंश बीच से जुड़े हुए हैं। इस तरह के अनेक अंकों को एक-पर-एक रखने पर जैसा दीख पड़ता है, मेरुमज्जा बहुत-कुछ वैसी ही है। उसके बाईं ओर इड़ा है और दाहिनी ओर पिंगला, और जो शून्य नाली मेरुमज्जा के ठीक बीच में से गई है, वही सुषुम्ना है। कटिप्रदेशस्थ मेरुदण्ड की कुछ अस्थियों के बाद ही मेरुमज्जा
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समाप्त हो गई है, परन्तु वहाँ से भी तागे के समान एक बहुत ही सूक्ष्म पदार्थ बराबर नीचे उतरता गया है। सुपुम्ना नाली वहाँ भी अवस्थित है, परन्तु वहाँ बहुत सूक्ष्म हो गई है। नीचे की ओर उस नाली का मुँह बन्द रहता है। उसके निकट ही कटिप्रदेशस्थ नाडी-जाल (Sacral Plexus) अवस्थित है। आजकल के शरीरविधानशास्त्र (Physiology) के मत से वह त्रिकोणाकार है। इन विभिन्न नाडी-जालो के केन्द्र मेरुमज्जा के भीतर अवस्थित है, वे नाडी-जाल योगियो के भिन्न-भिन्न पद्मो या चक्रो के तौर पर लिए जा सकते है।
योगियो का कहना है कि सबसे नीचे मूलाधार से लेकर मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार या सहस्रदल पद्म तक कुछ केन्द्र है। यदि हम उन पद्मो को पूर्वोक्त नाडी-जाल (plexus) समझें, तो आजकल के शरीरविधानशास्त्र के द्वारा बहुत सहज ही योगियों की बात का मर्म समझ मे आ जायगा। हमे मालूम है कि हमारे स्नायुओ के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं, उनमे से एक को अन्तर्मुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्मक और दूसरे को गति-आत्मक, एक को केन्द्र की ओर जानेवाला और दूसरे को केन्द्र से दूर जानेवाला कहा जा सकता है। उनमे से एक मस्तिष्क की ओर सवाद ले जाता है, और दूसरा मस्तिष्क से बाहर, समुदाय अगो मे। परन्तु अन्त मे ये प्रवाह मस्तिष्क से सयुक्त हो जाते हैं। आगे आनेवाले विषय को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमे कुछ और बाते ध्यान मे रखनी होगी। यह मेरुमज्जा मस्तिष्क मे जाकर एक प्रकार के 'बल्व' मे—medulla नामक एक अडाकार पदार्थ मे अन्त हो जाती है, जो मस्तिष्क के साथ संयुक्त नहीं है, वरन् मस्तिष्क मे जो एक
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तरल पदार्थ है, उसमे तैरता रहता है। अत यदि सिर पर कोई आघात लगे, तो उस आघात की शक्ति उस तरल पदार्थ मे बिखर जाती है, और इससे उस बल्ब को कोई चोट नही पहुँचती। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है, जो हमे स्मरण रखनी चाहिए। दूसरे, हमे यह भी जान लेना होगा कि इन सब चक्रो मे से सबसे नीचे स्थित मूलाधार, मस्तिष्क मे स्थित सहस्रार और नाभिदेश मे स्थित मणिपूर—इन तीन चक्रो की बात हमे विशेष रूप से ध्यान में रखनी होगी।
अब पदार्थ-विज्ञान का एक तत्त्व हमे समझना है। हम लोगो ने विद्युत् और उससे सयुक्त अन्य बहुविध शक्तियो की बाते सुनी हैं। विद्युत् क्या है, यह किसी को मालूम नही। हम लोग इतना ही जानते है कि विद्युत् एक प्रकार की गति है। जगत् मे और भी अनेक प्रकार की गतियां हैं, विद्युत् से उनका भेद क्या है? मान लो, यह टेबुल चल रहा है और उसके परमाणु विभिन्न दिशाओ मे जा रहे हैं। अब यदि उनको अनवरत एक ही दिशा मे चलाया जाय, तो वही गति विद्युत् की शक्ति मे परिणत हो जायगी। समस्त परमाणु यदि एक ओर गतिशील हो, तो उसी को वैद्युत-गति कहते हैं। इस कमरे मे जो वायु है, उसके सारे परमाणुओं को यदि लगातार एक ओर चलाया जाय, तो यह कमरा एक महान् विद्युदाधार-यन्त्र (battery) के रूप मे परिणत हो जायगा।
शारीरविधानशास्त्र की एक और बात हमें स्मरण करनी होगी। वह यह कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्रो को नियमित करता है, उसका सारे स्नायु-प्रवाहो पर भी कुछ अधिकार है। यह केन्द्र वक्ष के ठीक दूसरी ओर मेरुदण्ड में अवस्थित है। यह
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श्वास-प्रश्वास-यंत्रों को नियमित करता है और दूसरे जो स्नायु-चक्र हैं, उन पर भी कुछ प्रभाव डालता है।
अब हम प्राणायाम-क्रिया के साधन का कारण समझ सकेंगे। पहले तो, यदि श्वास-प्रश्वास की गति नियमित की जाय, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा मे गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे। जब विभिन्न दिशाओ मे दौड़नेवाला मन एकमुखी होकर एक दृढ इच्छाशक्ति के रूप मे परिणत होता है, तब सारे स्नायु-प्रवाह भी परिवर्तित होकर एक प्रकार की विद्युद्वत् गति प्राप्त करते हैं, क्योकि स्नायुओ पर विद्युत्-क्रिया करने पर देखा गया है कि उनके दोनो प्रान्तो मे धनात्मक और ऋणात्मक इन विपरीत शक्तिद्वय का उद्भव होता है। इसी से यह स्पष्ट है कि जब इच्छाशक्ति स्नायु-प्रवाह के रूप मे परिणत होती है, तब वह एक प्रकार के विद्युत् का आकार धारण कर लेती है। जब शरीर की सारी गतियां सम्पूर्ण रूप से एकाभिमुखी होती है, तब वह शरीर मानो इच्छाशक्ति का एक प्रबल विद्युदाधार बन जाता है। यह प्रबल इच्छाशक्ति प्राप्त करना ही योगी का उद्देश है। इस तरह, शरीरविधानशास्त्र की सहायता से प्राणायाम-क्रिया की व्याख्या की जा सकती है। वह शरीर के भीतर एक प्रकार की एकमुखी गति पैदा कर देती है और श्वास-प्रश्वास-केन्द्र पर आधिपत्य करके शरीर के अन्यान्य केन्द्रों को भी वश में लाने मे सहायता पहुँचाती हैं। यहाँ पर प्राणायाम का लक्ष्य मूलाधार में कुण्डलाकार मे अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति को उद्बुद्ध-करना है।
हम जो कुछ देखते हैं, कल्पना करते है या जो कोई स्वप्न देखते हैं, सारे अनुभव हमे आकाश मे करने पडते हैं। हम
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साधारणत जिस परिदृश्यमान आकाश को देखते हैं, उसका नाम है महाकाश । योगी जब दूसरो का मनोभाव समझने लगते है या अलौकिक वस्तुएँ देखने लगते हे, तब वे सब दर्शन चित्ताकाश में होते है । और जब अनुभूति विषयशून्य हो जाती है, जब आत्मा अपने स्वरूप मे प्रकाशित होती है, तब उसका नाम है चिदाकाश । जब कुण्डलिनी शक्ति जागकर सुषम्ना नाडी मे प्रवेश करती है, तब जो सब विषय अनुभूत होते हैं, वे चित्ताकाश मे ही होते है । जब वह उस नाडी की अन्तिम सीमा मस्तक मे पहुँचती है, तब चिदाकाश मे एक विषयशून्य ज्ञान अनुभूत होता है ।
अब विद्युत् की उपमा फिर से ली जाय । हम देखते हैं कि मनुष्य केवल तार के योग से एक जगह से दूसरी जगह विद्युत्-प्रवाह चला सकता है, परन्तु प्रकृति अपने महान् शक्ति-प्रवाहो को भेजने के लिए किसी तार का सहारा नही लेती । इसी से अच्छी तरह समझ मे आ जाता है कि किसी प्रवाह को चलाने के लिए वास्तव में तार की कोई आवश्यकता नही । हम तार के बिना काम नही कर सकते, इसीलिए हमे उसकी आवश्यकता पडती है । जैसे विद्युत्-प्रवाह तार की सहायता से विभिन्न दिशाओ मे प्रवाहित होता है, ठीक उसी तरह बाहर के विषय से जो ज्ञान-प्रवाह मस्तिष्क में अथवा मस्तिष्क से जो कर्मप्रवाह बहिर्देश मे प्रवाहित होता है, वह स्नायू-तन्तुरूप तार की ही सहायता से होता है । मेरुमज्जा-मध्यस्थ ज्ञानात्मक और कर्मात्मक-स्नायुगच्छ-स्तम्भ ही योगियो की इडा और पिंगला नाडियाँ हैं। प्रधानत उन दोनो नाडियो के भीतर से ही पूर्वोक्त अन्तर्मुखी
* पाठक यह ध्यान रखें कि यह बात बेतार-का-तार के आविष्कार के पूर्व ही कही गई । थी
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और वहिर्मुखी शक्तिप्रवाहद्वय आना-जाना कर रहे है। परन्तु बात अब यह है कि इस प्रकार के तार के समान किसी पदार्थ की सहायता बिना मस्तिष्क से चारो ओर विभिन्न संवाद भेजना और भिन्न-भिन्न स्थानो से मस्तिष्क का विभिन्न संवाद ग्रहण करना सम्भव क्यो न होगा? प्रकृति में तो ऐसे व्यापार घटते देखे जाते हैं। योगियो का कहना है कि इसमें कृतकार्य होने पर ही भौतिक बन्धनों को लांघा जा सकता है। तो अब इसमे कृतकार्य होने का उपाय क्या है? यदि मेरुदण्डमध्यस्थ सुषुम्ना के भीतर से स्नायु-प्रवाह चलाया जा सके, तो यह समस्या मिट जायगी। मन ने ही यह स्नायु-जाल तैयार किया है, और उसी को यह जाल तोडकर किसी प्रकार की सहायता की राह न देखते हुए, अपना काम करना होगा। तभी सारा ज्ञान हमारे अधिकार मे आयगा, देह का बन्धन फिर न रह जायगा। इसीलिए सुषुम्ना नाडी पर विजय पाना हमारे लिए इतना आवश्यक है। यदि तुम इस शून्य नाली के भीतर से, स्नायु-जाल की सहायता के बिना भी मानसिक प्रवाह चला सको, तो बस इस समस्या की मीमांसा हो गई। योगी कहते हैं कि वह सम्भव है।
साधारण मनुष्यो के भीतर सुषुम्ना नीचे की ओर बन्द रहती है; उससे कोई कार्य नही होता। योगियो का कहना है कि इस सुषुम्ना का द्वार खोलकर उससे स्नायु-प्रवाह चलाने की एक निर्दिष्ट प्रणाली है। उस साधना मे सफल होने पर स्नायु-प्रवाह उसके भीतर से चलाया जा सकता है। बाह्य विषय के स्पर्श से उत्पन्न प्रवाह जब किसी केन्द्र पर पहुँचता है, तब उस केन्द्र से एक प्रतिक्रिया होती है। स्वैर केन्द्रो (automatic centres) में उन प्रतिक्रियाओ का फल केवल गति होता है, पर
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चेतनयुक्त केन्द्रो (conscious centres) में पहले अनुभव, और फिर बाद मे गति होती है। सारी अनुभूतियाँ बाहर से आई हुई क्रियाओ की प्रतिक्रिया मात्र है। तो फिर स्वप्न मे अनुभूति किस तरह होती है? उस समय तो बाहर की कोई क्रिया नही रहती। अतएव स्पष्ट है कि विषय के अभिघात से पैदा हुई स्नायविक गतिया शरीर के किसी-न-किसी स्थान पर अवश्य अव्यक्त भाव से रहती है। मान लो, मैने एक नगर देखा। "नगर" नामक बाहरी वस्तु-समूह के आघात की जो प्रतिक्रिया है, उसी से उस नगर की अनुभूति होती है। अर्थात् उस नगर के बाहरी वस्तु-समूह द्वारा हमारे अन्तर्वाही स्नायुओ मे जो गतिविशेष उत्पन्न हुई है, उससे मस्तिष्क के भीतर के परमाणुओ में एक गति पैदा हो गई है। आज बहुत दिन बाद भी वह नगर मेरी स्मृति मे आता है। इस स्मृति में भी ठीक वही व्यापार होता है, पर अपेक्षाकृत हल्के रूप मे। किन्तु जो क्रिया मस्तिष्क के भीतर उस प्रकार का मृदुतर कम्पन ला देती है, वह भला कहा से आती है? यह तो कभी नही कहा जा सकता कि वह उसी पहले के विषय-अभिघात से पैदा हुई है। अत स्पष्ट है कि विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाह या सवेदनाएँ शरीर के किसी स्थान पर कुण्डलीकृत होकर विद्यमान हैं और उनके अभिघात के फल से ही स्वप्न-अनुभूति रूप मृदु प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती हैं। जिस केन्द्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाहों के बचे हुए अग या सस्कार-समष्टि मानो सचित-सी रहती है, उसे मूलाधार कहते हैं, और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। सम्भवत. गतिगतियो का अवशिष्ट अश भी इसी जगह कुण्डलीकृत होकर संचित है, क्योकि वाह्य
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ओं तत् सत्.
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वस्तुओ पर दीर्घ काल चिन्तन और आलोचना के बाद, शरीर के जिस स्थान पर यह मूलाधार चक्र (सम्भवत Sacral Plexus) अवस्थित है, उसे गरम होते देखते हैं । अब, यदि इस कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर उसे ज्ञातभाव से सुषुम्ना नाली मे से प्रवाहित करते हुए एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को ऊपर लाया जाय, तो वह ज्यो-ज्यो विभिन्न केन्द्रो पर क्रिया करेगी, त्यो-त्यो प्रबल प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होगी। जब शक्ति का बिलकुल सामान्य अग किसी स्नायु-तन्तु के भीतर से प्रवाहित होकर विभिन्न केन्द्रो से प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, तब वही स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से अभिहित होता है। किन्तु जब मूलाधार मे सचित विपुलायतन शक्तिपुज दीर्घकालव्यापी तीव्र ध्यान के बल से उद्बुद्ध होकर सुषुम्ना-मार्ग मे भ्रमण करता है और विभिन्न केन्द्रो पर आघात करता है, तो उस समय जो प्रतिक्रिया होती है, वह बड़ी ही प्रबल है। वह स्वप्न अथवा कल्पनाकालीन प्रतिक्रिया से तो अनन्तगुनी श्रेष्ठ है ही, पर जाग्रत्कालीन विषय-ज्ञान की प्रतिक्रिया से भी अनन्तगुनी प्रबल है। यही अतीन्द्रिय अनुभूति है। फिर जब वह शक्तिपुज समस्त ज्ञान के, समस्त अनुभूतियो के केन्द्रस्वरूप मस्तिष्क मे पहुँचता है, तब सम्पूर्ण मस्तिष्क और उसके अनुभवसम्पन्न प्रत्येक परमाणु से मानो प्रतिक्रिया होने लगती है। इसका फल है ज्ञान का पूर्ण प्रकाश या आत्मानुभूति । कुण्डलिनी शक्ति जैसे-जैसे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र को जाती है, वैसे-ही-वैसे मन का मानो एक-एक परदा खुलता जाता है और तब योगी इस जगत् की सूक्ष्म या कारण अवस्था की उपलब्धि करते है। और तभी विषय-स्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना और उसकी प्रतिक्रियारूप जो जगत् के कारण है, उनका यथार्थ स्वरूप हमे ज्ञात हो जाता
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है। अतएव तब हम सारे विषयो का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते है; क्योकि कारण को जान लेने पर कार्य का ज्ञान अवश्य आयगा।
(इस प्रकार हमने देखा कि कुण्डलिनी को जगा देना ही तत्त्वज्ञान, ज्ञानातीत अनुभूति या आत्मानुभूति का एकमात्र उपाय है। कुण्डलिनी को जाग्रत् करने के अनेक उपाय हैं। किसी की कुण्डलिनी भगवान के प्रति प्रेम के बल से ही जाग्रत् हो जाती है, किसी की सिद्ध महापुरुषो की कृपा से और किसी की सूक्ष्म ज्ञान-विचार द्वारा। लोग जिसे अलौकिक शक्ति या ज्ञान कहते हैं, उसका जहाँ कही कुछ प्रकाश दिख पडे, तो समझना होगा कि वहाँ कुछ परिमाण में यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर किसी तरह प्रवेश कर गई है। तो भी इस प्रकार की अलौकिक घटनाओ मे से अधिकतर स्थलो में देखा जायगा कि उस व्यक्ति ने बिना जाने एकाएक ऐसी कोई साधना कर डाली है, जिससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति अज्ञात-भाव से कुछ परिमाण मे स्वतन्त्र होकर सुषुम्ना के भीतर प्रवेश कर गई है। जिस किसी प्रकार की उपासना हो, वह, ज्ञातभाव से अथवा अज्ञातभाव से, उसी एक लक्ष्य पर पहुँचा देती है अर्थात् उससे कुण्डलिनी जाग्रत् हो जाती है। जो सोचते है कि मैंने अपनी प्रार्थना का उत्तर पाया, उन्हे मालूम नही कि प्रार्थना-रूप मनोवृत्ति के द्वारा वे अपनी ही देह मे स्थित अनन्त शक्ति के एक बिन्दु को जगाने मे समर्थ हुए है। अतएव मनुष्य बिना जाने जिसकी विभिन्न नामो से, डरते-डरते और कष्ट उठाकर उपासना करता है, उसके पास किस तरह अग्रसर होना होगा, यह जान लेने पर समझ में आ जायगा कि वह प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर में प्रकृत जीवन्त शक्ति के रूप में विराजमान है और
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अनन्त सुख की जननी है—योगीगण ससार के सामने उच्च कण्ठ से यही घोषणा करते हैं। अतएव राजयोग यथार्थ धर्मविज्ञान है। वह सारी उपासना, सारी प्रार्थना, विभिन्न प्रकार की साधना-पद्धति और समुदाय अलौकिक घटनाओ की युक्तिसंगत व्याख्या है।
पंचम अध्याय
अध्यात्म प्राण का संयम
अब हम प्राणायाम की विभिन्न क्रियाओ के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे। हमने पहले ही देखा है कि योगियो के मत मे साधना का पहला अंग फेफडे की गति को अपने अधीन करना है। हमारा उद्देश्य है—शरीर के भीतर जो सूक्ष्म गतियाँ हो रही हैं, उनका अनुभव प्राप्त करना। हमारा मन बिलकुल बाहर आ पडा है, वह भीतर की सूक्ष्म गतियों को बिलकुल नही पकड सकता। हम जब उनका अनुभव प्राप्त करने मे समर्थ होगे, तो उन पर विजय पा लेगे। ये स्नायविक शक्तिप्रवाह शरीर मे सर्वत्र चल रहे हैं, वे प्रत्येक पेशी मे जाकर उसको जीवन-शक्ति दे रहे हैं, किन्तु हम उनका अनुभव नही कर पाते। योगियो का कहना है कि प्रयत्न करने पर हम उनका अनुभव प्राप्त करना सीख जायेंगे। पहले फेफडे की गति पर विजय पाने की चेष्टा करनी होगी। कुछ काल तक यह कर सकने पर हम सूक्ष्मतर गतियो को भी वश मे ला सकेगे।
अब प्राणायाम की क्रियाओ की चर्चा की जाय। पहले तो, सीधे होकर बैठना होगा। देह को ठीक सीधी रखना होगा। यद्यपि मेरुमज्जा मेरुदण्ड से संलग्न नही है, फिर भी वह मेरुदण्ड के भीतर अवस्थित है। टेढा होकर बैठने से वह अस्त-व्यस्त हो जाती है। अतएव देखना होगा कि वह स्वच्छन्द भाव से रहे। टेढे बैठकर ध्यान करने की चेष्टा करने से अपनी ही हानि होती है। शरीर के तीनो भाग—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक—सदा एक रेखा मे ठीक सीधे रखने होगे। देखोगे, बहुत थोडे अभ्यास से वह श्वास-प्रश्वास
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की नाई सहज हो जायगा। इसके बाद स्नायुओ को वशीभूत करने का प्रयत्न करना होगा। हमने पहले ही देखा है कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्र के कार्य को नियमित करता है, वह दूसरे स्नायुओ पर भी कुछ प्रभाव डालता है। इसीलिए सांस लेना और सांस छोडना ताल-बद्ध (नियमित) रूप से करना आवश्यक है। हम साधारणतः जिस प्रकार सांस लेते और छोड़ते है, वह श्वास-प्रश्वास नाम के ही योग्य नही। वह बहुत अनियमित है। फिर स्त्री-पुरुष के श्वास-प्रश्वासो मे कुछ स्वाभाविक भेद भी हैं।
प्राणायाम-साधना की पहली क्रिया यह है, — भीतर निर्दिष्ट परिमाण मे सांस लो और बाहर निर्दिष्ट परिमाण में सांस छोड़ो। इस प्रकार करने पर देह-यन्त्र का असामंजस्य-भाव दूर हो जायगा। कुछ दिन तक यह अभ्यास करने के बाद, सांस खीचने और छोड़ने के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का मन-ही-मन उच्चारण करने से अच्छा होगा। भारत में, प्राणायाम करते समय हम लोग श्वास के ग्रहण और त्याग की संख्या ठहराने के लिए एक, दो, तीन, चार, इस क्रम से न गिनते हुए कुछ सांकेतिक शब्दो का व्यवहार करते हैं। इसीलिए मैं तुम लोगो से प्राणायाम के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का व्यवहार करने के लिए कह रहा हूँ। चिन्तन करना कि वह शब्द श्वास के साथ ताल-बद्ध रूप से बाहर जा रहा है और भीतर आ रहा है। ऐसा करने पर देखोगे कि सारा शरीर क्रमशः मानो साम्यभाव धारण करता जा रहा है। तभी समझोगे, यथार्थ विश्राम क्या है। उसकी तुलना मे निद्रा तो विश्राम ही नही। एक बार यह विश्राम की अवस्था आने पर अतिशय थके
७० राजयोग
७० राजयोग
हुए स्नायु भी शान्त हो जायेंगे और तब जानोगे कि पहले तुमनों कभी यथार्थ विश्राम का सुख नही पाया ।
इस साधना का पहला फल यह देखोगे कि तुम्हारे मुख की कान्ति बदलती जा रही है । मुख की शुष्कता या कठोरता का भाव प्रदर्शित करनेवाली रेखाएँ दूर हो जायँगी । मन की शान्ति मुख से फूटकर बाहर निकलेगी । दूसरे, तुम्हारा स्वर बहुत मधुर हो जायगा । मैने ऐसा एक भी योगी नही देखा, जिनके गले का स्वर कर्कश हो । कुछ महिने के अभ्यास के बाद ही ये चिह्न प्रकट होने लगेगे । इस पहले प्राणायाम का कुछ दिन अभ्यास करने के बाद प्राणायाम की एक दूसरी ऊँची साधना ग्रहण करनी होगी । वह यह है—इडा अर्थात् वाई नासिका द्वारा फेफड़े को धीरे-धीरे वायु से पूरा करो । उसके साथ स्नायु-प्रवाह मे मन का सयम करो, सोचो कि तुम मानो स्नायु-प्रवाह को मेरुमज्जा के नीचे भेजकर कुण्डलिनी-शक्ति के आधारभूत, मूलाधारस्थित त्रिकोणाकृति पद्म पर बडे जोर से आघात कर रहे हो । इसके बाद इस स्नायु-प्रवाह को कुछ क्षण के लिए उसी जगह धारण किए रहो । तत्पश्चात् कल्पना करो कि उस स्नायिक प्रवाह को श्वास के साथ दूसरी ओर से अर्थात् पिंगला द्वारा ऊपर खीच रहे हो । फिर दाहिनी नासिका से वायु धीरे-धीरे बाहर फेको । इसका अभ्यास तुम्हारे लिए कुछ कठिन ज्ञात होगा । सहज उपाय है—अँगूठे से दाहिनी नाक बन्द करके बाईं नाक से धीरे-धीरे वायु भरो । फिर अँगूठे और तर्जनी से दोनो नथुने बन्द कर लो और सोचो, मानो तुम स्नायु-प्रवाह को नीचे भेज रहे हो और सुषुम्ना के मूल देश मे आघात कर रहे हो । इसके बाद अँगूठा हटाकर दाहिनी नाक द्वारा वायु बाहर निकालो । फिर
अध्यात्म प्राण का संयम ७१
बाई नासिका तर्जनी से बन्द करके दाहिनी नाक से धीरे-धीरे वायु-पूरण करो और फिर पहले की तरह दोनो नासिका-छिद्रो को बन्द कर लो। हिन्दुओं के समान प्राणायाम का अभ्यास करना इस देश (अमेरिका) के लिए कठिन होगा, क्योकि हिन्दू बाल्यकाल से ही इसका अभ्यास करते हैं, उनके फेफडे इसके अभ्यस्त हैं। यहाँ चार सेकन्ड से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढाने पर अच्छा होगा। चार सेकन्ड तक वायु-पूरण करो, सोलह सेकन्ड बन्द करो और फिर आठ सेकन्ड में वायु का रेचन करो। इससे एक प्राणायाम होगा। पर उस समय मूलाधारस्थ त्रिकोणाकार पद्म पर मन स्थिर करना भूल न जाना। इस प्रकार की कल्पना से तुमको साधना मे बडी सहायता मिलेगी। एक तीसरे प्रकार का प्राणायाम यह है — धीरे-धीरे भीतर श्वास खींचो, फिर तनिक भी देर किए बिना धीरे-धीरे वायु रेचन करके बाहर ही श्वास कुछ देर के लिए रुद्ध कर रखो, संख्या पहले की प्राणायाम की तरह है। पूर्वोक्त प्राणायाम और इसमें भेद इतना ही है कि पहले के प्राणायाम में सांस भीतर रोकनी पडती है और यहाँ बाहर। यह प्राणायाम पहले से सीधा है। जिस प्राणायाम मे साँस भीतर रोकनी पड़ती है, उसका अधिक अभ्यास अच्छा नही। उसका सबेरे चार बार और शाम को चार बार अभ्यास करो। बाद में धीरे-धीरे समय और संख्या बढा सकते हो। तुम क्रमश देखोगे कि तुम बहुत सहज ही यह कर सक रहे हो और इससे तुम्हे बहुत आनन्द भी मिल रहा है। अतएव जब देखो कि तुम यह बहुत सहज ही कर सक रहे हो, तब बडी सावधानी और सतर्कता के साथ सख्या चार से छ बढा सकते हो। अनियमित रूप से साधना करने पर तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है।
७२ राजयोग
७२ राजयोग
उपर्युक्त तीन प्रक्रियाओं में से पहली और अन्तिम क्रियाएँ कठिन भी नही और उनमे किसी प्रकार की विपत्ति की आशंका भी नही। पहली क्रिया का जितना अभ्यास करोगे, उतना ही तुम शान्त होते जाओगे। उसके साथ ओंकार जोड़कर अभ्यास करो, देखोगे, जब तुम दूसरे कार्य मे लगे हो, तब भी तुम उसका अभ्यास कर सक रहे हो। उस क्रिया के फल से, देखोगे, तुम अपने को सभी बातो मे अच्छा ही महसूस कर रहे हो। इस तरह कठोर साधना करते-करते एक दिन तुम्हारी कुण्डलिनी जग जायगी। जो दिन मे केवल एक या दो बार अभ्यास करेंगे, उनके शरीर और मन कुछ स्थिर भर हो जायेंगे और उनका स्वर मधुर हो जायगा। परन्तु जो कमर बाँधकर साधना के लिए आगे बढ़ेंगे, उनकी कुण्डलिनी जागृत् हो जायगी, उनके लिए सारी प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेगी, उनके लिए ज्ञान का द्वार खुल जायगा। तब फिर ग्रन्थो मे तुम्हे ज्ञान की खोज न करनी होगी। तुम्हारा मन ही तुम्हारे निकट अनन्त-ज्ञान-विशिष्ट पुस्तक का काम करेगा। मैने मेरुदण्ड के दोनो ओर से प्रवाहित इडा और पिंगला नामक दो शक्तिप्रवाहो का पहले ही उल्लेख किया है, और मेरुमज्जा के बीच से जानेवाली सुषुम्ना की बात भी कही है। यह इडा, पिंगला और सुषुम्ना प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। जिनके मेरुदण्ड है, उन सभी के भीतर ये तीन प्रकार की भिन्न-भिन्न क्रिया-प्रणालियाँ मौजूद है। परन्तु योगी कहते है, साधारण जीव में यह सुषुम्ना बन्द रहती है, उसके भीतर किसी तरह की क्रिया का अनुभव नही किया जा सकता, किन्तु इडा और पिंगला नाडियो का कार्य, अर्थात् शरीर के विभिन्न भागो में शक्तिवहन करना, सभी प्राणियो में होता रहता है।
अध्यात्म प्राण का संयम ७३
केवल योगी में यह सुषुम्ना खुली रहती है। यह सुषुम्ना-द्वार खुलने पर उसके भीतर से स्नायविक शक्तिप्रवाह जब ऊपर चढता है, तब चित्त उच्च से उच्चतर भूमि पर उठता जाता है, और अन्त में हम अतीन्द्रिय राज्य में चले जाते हैं। हमारा मन तब अतीन्द्रिय, ज्ञानातीत, पूर्णचैतन्य इत्यादि नामोंवाली अवस्था प्राप्त कर लेता है। तब हम बुद्धि के अतीत प्रदेश में चले जाते हैं, वहाँ तर्क नहीं पहुँच सकता। इस सुषुम्ना को खोलना ही योगी का एकमात्र उद्देश्य है। ऊपर में जिन शक्तिवहन-केन्द्रों का उल्लेख किया गया है, योगियों के मत में वे सुषुम्ना में ही अवस्थित हैं। रूपक की भाषा में उन्ही को पद्म कहते हैं। सबसे नीचेवाला पद्म सुषुम्ना के सबसे नीचे भाग में अवस्थित है। उसका नाम है मूलाधार। इसके बाद दूसरा है स्वाधिष्ठान। तीसरा मणिपूर। फिर चौथा अनाहत, पाँचवाँ विशुद्ध, छठा आज्ञा, और सातवाँ है सहस्रार या सहस्रदल पद्म। यह सहस्रार सबसे ऊपर, मस्तिष्क में स्थित है। अभी इनमें से केवल दो केन्द्रों (चक्रों) की बात हम लेंगे—सबसे नीचेवाले मूलाधार की और सबसे ऊपरवाले सहस्रार की। सबसे नीचेवाले चक्र में ही समस्त शक्तियाँ अवस्थित हैं, और उस शक्ति को उस जगह से लेकर मस्तिष्कस्थ सर्वोच्च चक्र पर ले जाना होगा। योगी कहते हैं, मनुष्य-देह में जितनी शक्तियाँ हैं, उनमें ओज सबसे उत्कृष्ट कोटि की शक्ति है। यह ओज मस्तिष्क में संचित रहता है। जिसके मस्तक में ओज जितने अधिक परिमाण में रहता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान् और आध्यात्मिक बल से बली होता है। एक व्यक्ति बड़ी सुन्दर भाषा में सुन्दर भाव व्यक्त करता है, परन्तु लोग आकृष्ट नहीं होते। और दूसरा
७४ राजयोग
७४ राजयोग
व्यक्ति न सुन्दर भाषा बोल सकता है, न सुन्दर ढंग से भाव व्यक्त कर सकता है, परन्तु फिर भी लोग उसकी बात से मुग्ध हो जाते है। ऐसा क्यो ? यह ओज-शक्ति ही शरीर से निकलकर ऐसा अद्भुत कार्य करती है। इस ओज-शक्ति से युक्त पुरुष जो कुछ कार्य करते है, उसी मे महाशक्ति का विकास देखा जाता है। ऐसी है ओज की शक्ति ।
यह ओज, थोडी-बहुत मात्रा मे, सभी मनुष्यो मे विद्यमान है। शरीर मे जितनी शक्तियाँ खेल कर रही है, उनका उच्चतम विकास यह ओज है। यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि सवाल केवल परिवर्तन का है—एक ही शक्ति दूसरी शक्ति में परिणत हो जाती है। बाहरी संसार मे जो शक्ति विद्युत् अथवा चुम्बकीय शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रही है, वही क्रमश आभ्यन्तरिक शक्ति मे परिणत हो जायगी। आज जो शक्तियाँ पेशियो मे कार्य कर रही है, वे ही कल ओज के रूप मे परिणत हो जायँगी। योगी कहते हैं कि मनुष्य मे जो शक्ति काम-क्रिया-काम-चिन्तन आदि रूपो मे प्रकाशित हो रही है, उसका दमन करने पर वह सहज ही ओजधातु मे परिणत हो जाती है। और हमारे शरीर का सबसे नीचेवाला केन्द्र ही इस शक्ति का नियामक होने के कारण योगी इसकी ओर विशेष रूप से ध्यान देते हैं। वे सारी काम-शक्ति को लेकर ओजधातु में परिणत करने का प्रयत्न करते हैं। कामजयी स्त्री-पुरुष ही इस ओजधातु को मस्तिष्क में संचित कर सकते हैं। इसीलिए सब देशो मे ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। मनुष्य सहज ही अनुभव करता है कि काम को प्रश्रय देने पर सारा धर्मभाव, चरित्र-बल और मानसिक तेज जाता रहता है। इसी कारण, देखोगे, संसार में