राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
अध्यात्म प्राण का संयम ७५
जिन-जिन सम्प्रदायो मे बड़े-बड़े धर्मवीर पैदा हुए है, उन सभी सम्प्रदायो ने ब्रह्मचर्य पर विशेष जोर दिया है। इसीलिए विवाह-त्यागी सन्यासी-दल की उत्पत्ति हुई है। इस ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से—तन-मन-वचन से—पालन करना नितान्त आवश्यक है। ब्रह्मचर्य बिना राजयोग की साधना बडे खतरे की है, क्योकि उससे अन्त में मस्तिष्क का विषम विकार पैदा हो सकता है। यदि कोई राजयोग का अभ्यास करे और साथ ही अपवित्र जीवन यापन करे, तो वह भला किस प्रकार योगी होने की आशा कर
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय
प्रत्याहार और धारणा
प्राणायाम के बाद प्रत्याहार की साधना करनी पडती है। प्रत्याहार क्या है ? तुम सबो को ज्ञात है कि विषयानुभूति किस तरह होती है। सबसे पहले, देखो, इन्द्रियो के द्वार-स्वरूप ये बाहर के यन्त्र हैं। फिर हैं इन्द्रियाँ। ये इन्द्रियाँ मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्रो की सहायता से शरीर पर कार्य करती हैं। इसके बाद है मन। जब ये समस्त एकत्र होकर किसी बाहरी वस्तु के साथ सलग्न होते हैं, तभी हम उस वस्तु का अनुभव कर सकते हैं। किन्तु मन को एकाग्र करके केवल किसी एक इन्द्रिय से सयुक्त कर रखना बहुत कठिन है, क्योकि मन (विषयो का) दास है।
हम ससार मे सर्वत्र देखते हैं, कि सभी यह शिक्षा दे रहे हैं, 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ।' ससार मे शायद किसी देश मे ऐसा बालक नही पैदा हुआ, जिसे मिथ्या भाषण न करने, चोरी न करने आदि की शिक्षा नही मिली, परन्तु कोई उसे यह शिक्षा नही देता कि वह इन असत् कर्मों से किस प्रकार बचे। केवल बात करने से काम नही बनता। वह चोर क्यो न बने ? हम तो उसको चोरी से निवृत्त होने की शिक्षा नही देते, उससे बस इतना ही कह देते है, 'चोरी मत करो।' यदि उसे मन सयम का उपाय सिखाया जाय, तभी वह यथार्थ मे शिक्षा प्राप्त कर सकता है, और वही उसकी सच्ची सहायता और उपकार है। जब मन इन्द्रिय नामक भिन्न-भिन्न शक्ति-केन्द्रों में सलग्न रहता है, तभी समस्त बाह्य और आभ्यन्तरिक कर्म
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होते हैं। इच्छापूर्वक अथवा अनिच्छापूर्वक मनुष्य अपने मन को भिन्न-भिन्न (इन्द्रिय नामक) केन्द्रो मे सलग्न करने को वाध्य होता है। इसीलिए मनुष्य अनेक प्रकार के दुष्कर्म करता है और वाद में कष्ट पाता है। मन यदि अपने वश में रहता, तो मनुष्य कभी अनुचित कर्म न करता। मन को सयत करने का फल क्या है? यही कि मन सयत हो जाने पर वह फिर विषयों का अनुभव करनेवाली भिन्न-भिन्न इन्द्रियो के साथ अपने को सयुक्त न करेगा। और ऐसा होने पर सब प्रकार के भाव और इच्छाएँ हमारे वश मे आ जायेंगी। यहाँ तक तो बहुत स्पष्ट है। अब प्रश्न यह है, क्या यह कार्य में परिणत होना सम्भव है? हाँ, यह सम्पूर्ण रूप से सम्भव है। तुम लोग वर्तमान समय मे भी इसका कुछ आभास देख रहे हो, विश्वास के बल से आरोग्यलाभ कराने-वाला सम्प्रदाय दुःख, कष्ट, अशुभ आदि के अस्तित्व को बिलकुल अस्वीकार कर देने की शिक्षा देता है। इसमे सन्देह नही कि इनका दर्शन बहुत-कुछ सिर के पीछे से हाथ ले जाकर नाक पकडने की तरह है, किन्तु वह भी एक प्रकार का योग है, किसी तरह उन लोगो ने उसका अविष्कार कर डाला है। जहाँ वे दुःख-कष्ट के अस्तित्व को अस्वीकार करने की शिक्षा देकर लोगो के दुःख दूर करने में सफल होते हैं, तो वहाँ समझना होगा कि उन्होने वास्तव मे प्रत्याहार की ही कुछ शिक्षा दी है, क्योकि वे उस व्यक्ति के मन को यहाँ तक सबल कर देते हैं कि वह इन्द्रियो की गवाही पर विश्वास ही नही करता। वशीकरणविद्यावाले (Hypnotists), इसी प्रकार, सूचनाशक्ति या आज्ञा (hypnotic suggestion) से कुछ देर के लिए अपने वश्य व्यक्तियो मे एक प्रकार का अस्वा-भाविक प्रत्याहार ले आते हैं। जिसे साधारणत वशीकरण-सूचना-
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कहते हैं, वह केवल रोगग्रस्त देह और कमजोर मन पर ही अपना प्रवाह फैला सकता है। वशीकरणकारी जब तक स्थिर-दृष्टि अथवा अन्य किसी उपाय द्वारा अपने वश्य व्यक्ति के मन को निष्क्रिय, जड़तुल्य अस्वाभाविक अवस्था में नहीं ले जा सकता, तब तक वह चाहे जो कुछ सोचने, सुनने या देखने का आदेश दे, उसका कोई फल न होगा।
वशीकरणकारी या विश्वास-बल से आरोग्य करनेवाले थोड़े समय के लिए जो अपने वश्य व्यक्तियों के शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों (इन्द्रियों) को वशीभूत कर लेते हैं, वह अत्यन्त निन्दार्ह कर्म है, क्योंकि वह उस वश्य व्यक्ति को अन्त में सर्वनाश के रास्ते ले जाता है। यह कोई अपनी इच्छाशक्ति के बल से अपने मस्तिष्कस्थ केन्द्रों का संयम तो है नहीं, यह तो दूसरे की इच्छा-शक्ति के एकाएक प्रबल आघात से वश्य व्यक्ति के मन को कुछ समय के लिए मानो जड़ कर रखना है। वह लगाम और बाहु-बल की सहायता से, गाड़ी खींचनेवाले उच्छृंखल घोड़ों की उन्मत्त गति को संयत करना नहीं है, वरन् वह दूसरों से उन अश्वों पर तीव्र आघात करने को कहकर उनको कुछ समय के लिए चुप कर रखना है। उस व्यक्ति पर यह प्रक्रिया जितनी की जाती है, उतना ही वह अपने मन की शक्ति क्रमशः खोने लगता है, और अन्त में, मन को पूर्ण रूप से जीतना तो दूर रहा, उसका मन बिलकुल शक्तिहीन और विचित्र-सा हो जाता है तथा पागलखाने में ही उसकी चरम गति आ ठहरती है।
अपने मन को स्वयं अपने मन की सहायता से वश में लाने की चेष्टा के बदले इस प्रकार दूसरे की इच्छा से प्रेरित होकर मन का संयम अनिष्टकारक ही नहीं है, वरन् जिस उद्देश्य से वह
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कार्य किया जाता है, वह भी सिद्ध नही होता। प्रत्येक जीवात्मा का चरम लक्ष्य है मुक्ति या स्वाधीनता—जडवस्तु और चित्त-वृत्ति के दासत्व से मुक्तिलाभ करके उन पर प्रभुत्व स्थापित करना, बाह्य और अन्त प्रकृति पर अधिकार जमाना। किन्तु उस दिशा में सहायता करने की बात तो अलग रही, दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त इच्छाशक्ति का प्रवाह हम पर लगी हुई चित्तवृत्तिरूपी बन्धनो और प्राचीन कुसस्कारो की भारी बेडी में एक और कडी जोड देता है—फिर वह इच्छाशक्ति हम पर किसी भी रूप से क्यो न प्रयुक्त हो, और चाहे उससे हमारी इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष वशीभूत हो जायें, चाहे वह एक प्रकार की पीडित या विकृतावस्था में हमें इन्द्रियो को सयत करने के लिए बाध्य करे। इसलिए सावधान! दूसरे को अपने ऊपर इच्छा-शक्ति का सचालन न करने देना। अथवा दूसरे पर ऐसी इच्छाशक्ति का प्रयोग करके अनजाने उसका सत्यानाश न कर देना। यह सत्य है कि कोई-कोई लोग कुछ व्यक्तियो की प्रवृत्ति का मोड फेरकर कुछ दिनों के लिए उनका कुछ कल्याण करने मे कृतकार्य होते हैं, परन्तु साथ ही वे दूसरो पर इस वशीकरण-शक्ति का प्रयोग करके, बिना जाने, लाखो नर-नारियों को एक प्रकार से विकृत जडावस्थापन्न कर डालते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन वश्य व्यक्तियो की आत्मा का अस्तित्व तक मानो लुप्त हो जाता है। इसलिए जो कोई व्यक्ति तुमसे अन्धविश्वास करने को कहता है, अथवा अपनी श्रेष्ठतर इच्छा-शक्ति के बल से लोगो को वशीभूत करके अपना अनुसरण करने के लिए बाध्य करता है, वह मनुष्य-जाति का भारी अनिष्ट करता है—भले ही वह इसे इच्छापूर्वक न करता हो।
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राजयोग
अतएव अपने मन का सयम करने के लिए सदा अपने ही मन की सहायता लो, और यह सदा याद रखो कि तुम यदि रोगग्रस्त नही हो, तो कोई भी बाहरी इच्छाशक्ति तुम पर कार्य न कर सकेगी। जो व्यक्ति तुमसे अन्धे के समान विश्वास कर लेने को कहता हो, उससे दूर ही रहो, वह चाहे कितना भी बडा आदमी या साधु क्यो न हो। ससार के सभी भागो मे ऐसे बहुत से सम्प्रदाय हैं, जिनके धर्म के प्रधान अग नाच-गान, उछल-कूद, चिल्लाना आदि है। वे जब सगीत, नृत्य और प्रचार करना आरम्भ करते है, तब उनके भाव मानो सक्रामक रोग की तरह लोगो के अन्दर फैल जाते है। वे भी एक प्रकार के वशीकरण-कारी हैं। वे थोडे समय के लिए भावुक व्यक्तियो पर गजब का प्रभाव डाल देते है। पर हाय ! परिणाम यह होता है कि सारी जाति अध पतित हो जाती है। इस प्रकार की अस्वाभाविक बाहरी शक्ति के बल से किसी व्यक्ति या जाति के लिए ऊपर-ऊपर अच्छी होने की अपेक्षा अच्छी न रहना ही वेहतर है, और वह स्वास्थ्य का लक्षण है। इन धर्मोन्मत्त व्यक्तियो का उद्देश अच्छा भले ही हो, परन्तु इनको किसी उत्तरदायित्व का ज्ञान नही। इन लोगो द्वारा मनुष्य का जितना अनिष्ट होता है, उसका विचार करते ही हृदय स्तब्ध हो जाता है। वे नही जानते कि जो व्यक्ति सगीत, स्तव आदि की सहायता से—उनकी शक्ति के प्रभाव से, इस तरह एकाएक भगवद्भाव मे मत्त हो जाते है, वे अपने को केवल जड, विकृतभाववाले और शक्तिशून्य बना लेते है और सहज ही किसी भी भाव के वश में हो जाते हैं—फिर वह भाव कितना भी बुरा क्यो न हो। उसका प्रतिरोध करने की उनमें तनिक भी शक्ति नही रह जाती। इन अज्ञ, आत्मवचित व्यक्तियों
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के मन मे यह स्वप्न मे भी नही आता कि वे एक ओर जहाँ यह कहकर हर्षोत्फुल्ल हो रहे है कि उनमे मनुष्य के हृदय को परिवर्तित कर देने की अद्भुत शक्ति है—जिस शक्ति के सम्बन्ध मे वे सोचते हैं कि वह बादल के ऊपर अवस्थित किसी पुरुष से उन्हे मिली है—वहाँ साथ ही वे भावी मानसिक अवनति, पाप, उन्मत्तता और मृत्यु के बीज भी बो रहे है । 'अतएव, जिससे तुम्हारी स्वाधीनता नष्ट होती हो, ऐसे सब प्रकार के प्रभावों से सतर्क रहो। ऐसे प्रभावो को भयानक विपत्ति से भरा जानकर प्राणपण से उनसे दूर रहने की चेष्टा करो।'
जो इच्छामात्र से अपने मन को केन्द्रो मे सलग्न करने अथवा उनसे हटा लेने मे सफल हो गया है, उसी का प्रत्याहार सिद्ध हुआ है । प्रत्याहार का अर्थ है, एक ओर आहरण करना अर्थात् खींचना—मन की बहिर्गति को रोककर, इन्द्रियों की अधीनता से मन को मुक्त करके उसे भीतर की ओर खींचना । इसमें कृतकार्य होने पर हम यथार्थ में चरित्रवान होगे; और तभी समझेगे कि हम मुक्ति के मार्ग मे बहुत दूर बढ गए हैं । यह यदि न किया जा सका, तो हममे तथा एक यन्त्र में फिर अन्तर ही क्या !
मन को सयंत करना कितना कठिन है ! इसकी उपमा एक उन्मत्त वानर से दी गई है, और वह कोई असंगत बात नही । कही एक बन्दर था । उसकी मर्कट-स्वभाववाली चंचलता तो थी ही, लेकिन उतने से सन्तुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफी शराब पिला दी । इससे वह और भी चंचल हो गया । इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डक मार दिया । तुम जानते हो, किसी को बिच्छू डंक मार दे, तो वह दिन भर इधर-उधर कितना
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तड़पता रहता है। सो उस प्रमत्त अवस्था के ऊपर बिच्छू का डंक ! इससे वह बन्दर बहुत अस्थिर हो गया। तत्पश्चात् मानो उसके दुःख की मात्रा को पूरी करने के लिए एक भूत उस पर सवार हो गया। यह सब मिलाकर, सोचो, बन्दर कितना चंचल हो गया होगा। यह भाषा द्वारा व्यक्त करना असम्भव है। बस, मनुष्य का मन उस वानर के सदृश्य है। मन तो स्वभावत ही सतत चंचल है, फिर वह वासनारूप मदिरा से मत्त है, इससे उसकी अस्थिरता बढ़ गई है। जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर ईर्ष्यारूप बिच्छू उसे डंक मारता रहता है। उसके भी ऊपर जब अहंकाररूप पिशाच उसके भीतर प्रवेश करता है, तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता। ऐसी तो हमारे मन की अवस्था है ! सोचो तो, इसका संयम करना कितना कठिन है !
अतएव मन के संयम का पहला सोपान यह है कि कुछ समय के लिये चुप्पी साधकर बैठे रहो और मन को अपने अनुसार चलने दो। मन सतत चंचल है। वह बन्दर की तरह सदा कूद-फांद रहा है। यह मन-मर्कट जितनी इच्छा हो उछल-कूद मचाये, कोई हानि नहीं, धीर भाव से प्रतीक्षा करो और मन की गति देखते जाओ। लोग जो कहते हैं कि ज्ञान ही यथार्थ शक्ति है, यह बिलकुल सत्य है। जब तक मन की क्रियाओं पर नज़र न रखोगे, उसका संयम न कर सकोगे। मन को इच्छानुसार घूमने दो। सम्भव है, बहुत बुरी-बुरी भावनाएँ तुम्हारे मन में आएँ। तुम्हारे मन में इतनी असत् भावनाएँ आ सकती हैं कि तुम सोचकर आश्चर्यचकित हो जाओगे। परन्तु देखोगे, मन के ये सब खेल दिन-पर-दिन कम
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होते जा रहे हैं, दिन-पर-दिन मन कुछ-कुछ स्थिर होता आ रहा है। पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन मे हजारो विचार आएँगे, क्रमश वह संख्या घटकर सैकडो तक रह जायगी। फिर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से अपने वश मे आ जायगा। पर हाँ, हमे प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा। जब तक इंजन के भीतर भाप रहेगी, तब तक वह चलता ही रहेगा। जब तक विषय हमारे सामने हैं, तब तक हम उन्हे देखेंगे ही। (अतएव, मनुष्य को, यह प्रमाणित करने के लिए कि वह इंजन की तरह एक यन्त्र मात्र नहीं है, यह दिखाना आवश्यक है कि वह किसी के अधीन नही। इस प्रकार मन का सयम करना और उसे विभिन्न इन्द्रियों के साथ सयुक्त न होने देना ही प्रत्याहार है। इसके अभ्यास का क्या उपाय है ? यह एक-दो दिन का काम नहीं, बहुत दिनो तक लगातार इसका अभ्यास करना होगा। धीर भाव से लगातार बहुत वर्षो तक अभ्यास करने पर तब कही इस विषय मे सफलता मिल पाती है।
कुछ काल तक प्रत्याहार की साधना करने के बाद, उसके बाद की साधना अर्थात् धारणा का अभ्यास करने का प्रयत्न करना होगा। प्रत्याहार के बाद है धारणा। धारणा का अर्थ है—मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थानविशेष में धारण या स्थापन करना। मन को स्थानविशेष मे धारण करने का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि मन को शरीर के अन्य सब स्थानों से अलग करके किसी एक विशेष अश के अनुभव मे बलपूर्वक लगाए रखना। मान लो, मैंने मन को हाथ मे धारण किया। तब शरीर के अन्यान्य अवयव विचार के विषय के बाहर हो जायेंगे।
प्रत्याहार और धारणा ८५
हो जायगा। योगाभ्यास करने पर जो चिह्न योगियों में प्रकट होते हैं, देह की स्वस्थता उनमे प्रथम है। स्वर भी मधुर हो जायगा, स्वर मे जो कुछ दोष है, सब निकल जायगा। और भी अनेक प्रकार के चिह्न प्रकट होगे, पर ये ही प्रथम है। जो बहुत अधिक साधना करते हैं, उनमे और भी दूसरे लक्षण प्रकट होते हैं। कभी-कभी घंटा-ध्वनि की तरह का शब्द सुन पडेगा, मानो दूर में बहुत से घंटे बज रहे हैं और वे सारे शब्द एकत्र मिलकर कानो मे लगातार आघात कर रहे है। कभी-कभी देखोगे, आलोक के छोटे-छोटे कण हवा में तैर रहे है और क्रमश कुछ-कुछ बड़े होते जा रहे हैं। जब ये लक्षण प्रकाशित होगे, तब समझना कि तुम द्रुत गति से साधना मे उन्नति कर रहे हो।
जो योगी होने की इच्छा करते है और कठोर अभ्यास करते हैं, उन्हें पहली अवस्था मे आहार के सम्बन्ध मे कुछ विशेष सावधानी रखनी होगी। जो शीघ्र उन्नति करने की इच्छा करते है, वे यदि कुछ महीने केवल दूध और अन्न आदि निरामिष भोजन पर रह सके, तो उन्हे साधना में बडी सहायता मिलेगी। किन्तु जो लोग दूसरे दैनिक कामो के साथ थोडा-बहुत अभ्यास करना चाहते है, उनके लिए अधिक भोजन न करने से ही काम बन जायगा। उन्हे खाद्य के सम्बन्ध में उतना विचार करने की आवश्यकता नही, वे जो इच्छा हो वही खा सकते है।
जो कठोर अभ्यास करके शीघ्र उन्नति करना चाहते हैं, उन्हे आहार के सम्बन्ध में विशेष सावधान रहना चाहिए। देह-यंत्र धीरे-धीरे जितना ही सूक्ष्म होता जाता है, उतना ही तुम देखोगे कि एक सामान्य अनियम से भी तुम्हारे सारे शरीर के भीतर बहुत बड़ा अनमेल उपस्थित हो जायगा। जब तक मन
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पर सम्पूर्ण अधिकार नहीं हो जाता, तब तक आहार मे एक ग्रास की अल्पता या अधिकता सम्पूर्ण शरीर-यंत्र को बिल्कुल अप्रकृतिस्थ कर देगी। मन के पूर्ण रूप से अपने वश मे आने के बाद जो इच्छा हो, खाया जा सकता है। मन को एकाग्र करना आरम्भ करने पर देखोगे कि एक सामान्य पिन गिरने से ही ऐसा मालूम होगा मानो तुम्हारे मस्तिष्क मे से वज्र पार हो गया। इन्द्रिय-यंत्र जितने सूक्ष्म होते जाते हैं, अनुभूति भी उतनी ही सूक्ष्म होती जाती है। इन्ही सब अवस्थाओ मे से होते हुए हमें क्रमशः अग्रसर होना होगा। और जो लोग अध्यवसाय के साथ अन्त तक लगे रह सकते हैं, वे ही कृतकार्य होगे। सब प्रकार के तर्क और चित्त मे विक्षेप उत्पन्न करनेवाली बातो को दूर कर देना होगा। शुष्क और निरर्थक तर्कपूर्ण प्रलाप से क्या होगा? वह केवल मन के साम्यभाव को नष्ट करके उसे चंचल भर कर देता है। इन सब तत्त्वो की उपलब्धि की जानी चाहिए। केवल बातो से क्या होगा? अतएव सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्ही के लिखे ग्रन्थ पढ़ो।
शुक्ति के समान बनो। भारतवर्ष मे एक सुन्दर किम्बदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश मे स्वाति नक्षत्र के तुंगस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूँद किसी सीपी मे चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियो को यह मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूँद की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्योही एक बूँद पानी उनके पेट में जाता है, त्योही उस जलकण को लेकर मुँह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य
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के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं। हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फिर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि बिलकुल हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। "एक भाव को नया कहकर ग्रहण करके, उसकी नवीनता चली जाने पर फिर एक दूसरे नए भाव का आश्रय लेना—इस प्रकार बारम्बार करने से तो हमारी सारी शक्ति ही इधर-उधर बिखर जायगी।" साधना करते समय नए भावों के प्रति इस प्रकार आकर्षण-रूप विपत्ति आया करती है। एक भाव को पकड़ो, उसी को लेकर रहो। उसका अन्त देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव लेकर, उसी में मत्त होकर रह सकते हैं, उन्हीं के हृदय में सत्य-तत्त्व का उन्मेष होता है। और जो यहाँ का कुछ, वहाँ का कुछ, इस तरह खटाइयाँ चखने के समान सब विषयों को मानो थोड़ा-थोड़ा चखते जाते हैं, वे कभी कोई चीज़ नहीं पा सकते। कुछ देर के लिए उनकी इन्द्रियाँ उत्तेजित होकर उन्हें एक प्रकार का आनन्द भले ही मिल जाता हो, किन्तु इससे और कुछ फल नहीं होता। वे चिरकाल प्रकृति के दास होकर रहेंगे, कभी अतीन्द्रिय राज्य में विचरण न कर सकेंगे।
जो सचमुच योगी होने की इच्छा करते हैं, उन्हें इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा हर विषय को पकड़ने का भाव छोड़ देना होगा। एक भाव लेकर सदा उसी में विभोर होकर रहो। सोते-जागते सब समय उसी को लेकर रहो। तुम्हारा मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहें। दूसरे सारे विचार
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राजयोग
छोड दो। यही सिद्ध होने का उपाय है, और इसी उपाय से बडे-बडे धर्मवीरो की उत्पत्ति हुई है। शेष सब तो बाते करनेवाले यन्त्र मात्र है। यदि हम सचमुच स्वय कृतार्थ होना और दूसरो का उद्धार करना चाहे, तो हमें थोथी बकवास छोडकर और भी भीतर प्रवेश करना होगा। इसे कार्य में परिणत करने का पहला सोपान यह है कि मन किसी तरह चंचल न किया जाय। जिनके साथ बातचीत करने पर मन चंचल हो जाता हो, उनका साथ छोड दो। तुम सबको मालूम है कि तुममें से प्रत्येक का किसी स्थानविशेष, व्यक्तिविशेष और खाद्यविशेष के प्रति एक विरक्ति का भाव रहता है। उन सबका परित्याग कर देना। और जो सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें तो सत्-असत् सब प्रकार के संग को त्याग देना होगा। पूरी लगनके साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ—फिर मृत्यु भी आए तो क्या ! "मन्त्र वा साधयामी शरीर वा पातयामि"—काम सधे या प्राण ही जायँ। फल की ओर आँख रखे बिना साधना मे निमग्न हो जाओ। निर्भीक होकर इस प्रकार दिन-रात साधना करने पर छ महीने के भीतर ही तुम एक सिद्ध योगी हो सकते हो। परन्तु दूसरे, जो थोडी-थोडी साधना करते है, सब विषयो को जरा-जरा चखते है, वे कभी कोई बडी उन्नति नही कर सकते। केवल उपदेश सुनने से कोई फल नही होता। जो लोग तमोगुण से पूर्ण है, अज्ञानी और आलसी हैं, जिनका मन कभी किसी वस्तु पर स्थिर नही रहता, जो केवल थोडे से आनन्द के अन्वेषण में है, उनके पास धर्म और दर्शन केवल क्षणिक आनन्द के लिए हैं। जो सिर्फ थोडे से आमोद-प्रमोद के लिए धर्म करने आते है, साधना मे अध्यवसायहीन है। वे धर्म की बाते सुनकर सोचते हैं
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“वाह ! ये तो अच्छी बातें हैं,' पर इसके बाद घर पहुँचते ही सारी बातें भूल जाते हैं। सिद्ध होना हो, तो प्रबल अध्यवसाय चाहिए, मन का अपरिमित बल चाहिए। अध्यवसायशील साधक कहता है, “मै चुल्लू से समुद्र पी जाऊँगा। मेरी इच्छा मात्र से पर्वत चूर-चूर हो जायेंगे।” इस प्रकार का तेज, इस प्रकार का दृढ़ सकल्प लेकर कठोर साधना करो। उस परम पद की प्राप्ति अवश्य होगी।
सप्तम अध्याय
सप्तम अध्याय
ध्यान और समाधि
अब तक हम राजयोग के अन्तरग साधनो को छोड़ शेष सभी अगो के सक्षिप्त विवरण समाप्त कर चुके है। इन अन्तरग साधनो का लक्ष्य एकाग्रता की प्राप्ति है। इस एकाग्रता-शक्ति को प्राप्त करना ही राजयोग का चरम लक्ष्य है। हम, मानव के नाते, देखते है कि हमारा समस्त ज्ञान, जिसे विचारजात ज्ञान कहते हैं, अह-बोध के अधीन है। मुझे इस टेबुल का बोध हो रहा है, तुम्हारे अस्तित्व का बोध हो रहा है, इसी प्रकार मुझे अन्यान्य वस्तुओ का भी बोध हो रहा है, और इस अह-बोध के कारण ही मैं जान पा रहा हूँ कि तुम यहाँ हो, टेबुल यहाँ है, तथा और भी जो वस्तुएँ देख रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ या सुन रहा हूँ, वे सब भी यही है। यह तो हुई एक ओर की बात ॥ फिर एक दूसरी ओर यह भी देख रहा हूँ कि मेरी सत्ता कहने से जो कुछ बोध होता है, उसका अधिकांश मै अनुभव नही कर सकता। शरीर के भीतर के सारे यन्त्र, मस्तिष्क के विभिन्न अश—इन सबका ज्ञान किसी को भी नही।
जब हम भोजन करते हैं, तब वह ज्ञानपूर्वक करते है, परन्तु जब हम उसका सार भाग भीतर ग्रहण करते हैं, तब हम वह अज्ञातभाव से करते हैं। जब वह खून के रूप मे परिणत होता है, तब भी वह हमारे बिना जाने ही होता है। और जब इस खून से शरीर के भिन्न-भिन्न अग गठित होते है, तो वह भी हमारी जानकारी के बिना ही होता है। किन्तु यह मारा काम हमारे द्वारा ही होता है। इस शरीर के भीतर कोई अन्य
ध्यान और समाधि ९१
दस-बीस लोग तो बैठे नही है, जो यह काम कर देते हो। पर यह किस तरह हमे मालूम हुआ कि हमी इनको कर रहे है, दूसरा कोई नही? इस सम्बन्ध में अनायास ही यह कहा जा सकता है कि आहार करने के साथ ही हमारा सम्पर्क है, खाना पचाना और उससे देह तैयार करना तो हमारे लिए एक दूसरा कोई कर दे रहा है। पर यह हो नही सकता, क्योकि यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अभी जो काम हमारे बिना जाने हो रहे हैं, वे लगभग सभी साधना के बल से हमारे जाने साधित हो सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि हमारा हृदय-यन्त्र अपने-आप ही चल रहा है, हममे से कोई उसको अपनी इच्छानुसार नही चला सकता, वह अपने ख्याल से आप ही चल रहा है। परन्तु इस हृदय के कार्य भी अभ्यास के बल से इस प्रकार इच्छाधीन किए जा सकते हैं कि वे इच्छा मात्र से शीघ्र या धीरे चलने लगेगे, या लगभग बन्द हो जायँगे। हमारे शरीर के प्राय सभी अंग वश में लाए जा सकते है। इससे क्या ज्ञात होता है? यही कि इस समय जो काम हमारे विना जाने हो रहे है, उन्हे भी हम ही कर रहे हैं, पर हाँ, हम उन्हे अज्ञातभाव से कर रहे है, बस इतना ही। अतएव हम देखते है कि मानव-मन दो अवस्थाओ मे रहकर कार्य करता है। पहली अवस्था को ज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जिन कामों को करते समय साथ-साथ, 'मै कर रहा हूँ,' यह ज्ञान सदा विद्यमान रहता है, वे कार्य ज्ञान-भूमि से साधित हो रहे हैं, ऐसा कहा जा सकता है। दूसरी भूमि को अज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जो सब कार्य ज्ञान की निम्न भूमि से साधित होते है, जिसमे 'मै'-ज्ञान नही रहता, उसे अज्ञान-भूमि कह सकते है।
हमारे कार्यकलापो मे से जिनमें 'अहं' मिला रहता है.-
-९२ राजयोग
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उन्हे ज्ञानयुक्त क्रिया और जिनमे 'अहं' का लगाव नही, उन्हें ज्ञानरहित या अज्ञानपूर्वक क्रिया कहते है। निम्न जाति के प्राणियों मे यह ज्ञानरहित क्रिया सहज ज्ञान (instinct) कहलाती है। उनकी अपेक्षा उच्चतर जीवो मे और सबसे उच्च जीव मनुष्य में यह दूसरे प्रकार की क्रिया, जिसमें 'अहं'-भाव रहता है, अधिक दीख पडती है—इसी को ज्ञानयुक्त क्रिया कहते है।
परन्तु इतने से ही सारी भूमियो का उल्लेख नही हो गया। मन इन दोनो से भी ऊँची भूमि पर विचरण कर सकता है। मन ज्ञान की भी अतीत अवस्था में जा सकता है। जिस प्रकार अज्ञान-भूमि से जो कार्य होता है, वह ज्ञान की निम्न भूमि का कार्य है, वैसे ही ज्ञान की उच्च भूमि से भी—ज्ञानातीत भूमि से भी कार्य होता है। उसमें भी किसी प्रकार का 'अहं'-भाव नही रहता। यह 'अहं'-भाव केवल बीच की अवस्था मे रहता है। जब मन इस रेखा के ऊपर या नीचे विचरण करता है, तब किसी प्रकार का 'अहं'-ज्ञान नही रहता, किन्तु तब भी मन की क्रिया चलती रहती है। जब मन इस रेखा के ऊपर अर्थात् ज्ञान-भूमि के अतीत प्रदेश मे गमन करता है, तब उसे समाधि, पूर्णचेतन-भूमि या ज्ञानातीत भूमि कहते है। यह समाधि-अवस्था ज्ञान के भी उस पार अवस्थित है। अब हम यह किस तरह समझें कि जो मनुष्य समाधि-अवस्था मे जाता है, वह ज्ञान-भूमि के निम्न स्तर मे नही चला जाता, बिलकुल हीन दशापन्न नही हो जाता, वरन् ज्ञानातीत भूमि मे चला जाता है? इन दोनो ही अवस्थाओ में तो अहं-भाव नही रहता। (इसका उत्तर यह है कि कौन ज्ञान-भूमि के निम्न देश मे और कौन ऊर्ध्व देश मे गया, इसका निर्णय फल देखने पर ही हो सकता है। जब कोई गहरी
ध्यान और समाधि ९३
नीद मे सोया रहता है, तब वह ज्ञान की निम्न भूमि मे चला जाता है। तब वह अज्ञातभाव से ही शरीर की सारी क्रियाएँ, श्वास-प्रश्वास, यहाँ तक कि शरीर-संचालन-क्रिया भी करता रहता है, उसके इन सब कामो मे 'अहं'-भाव का कोई लगाव नही रहता, तब वह अज्ञान से ढका रहता है। वह जब नीद से उठता है, तब वह सोने के पहले जैसा था, वैसा ही रहता है, उसमे कुछ भी परिवर्तन नही होता। उसके सोने से पहले उसकी जो ज्ञानसमष्टि थी, नीद टूटने के बाद भी ठीक वही रहती है, उसमे कुछ भी वृद्धि नही होती। उसके हृदय मे कोई नया तत्त्व प्रकाशित नही होता। किन्तु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है, तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो, तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर नीचे आता है।
अब सोच कर देखो, इस विभिन्नता का कारण क्या है। एक अवस्था से, मनुष्य जैसा गया था वैसा ही लौट आया, और दूसरी अवस्था से लौटकर मनुष्य ने ज्ञानालोक प्राप्त किया—वह एक महान् साधु, एक सिद्ध पुरुष के रूप में परिणत हो गया, उसका स्वभाव बिलकुल बदल गया, उसके जीवन ने बिलकुल दूसरा रूप धारण कर लिया। दोनो अवस्थाओ के ये दो विभिन्न फल हैं। अब बात यह है कि फल अलग-अलग होने पर कारण भी अवश्य अलग-अलग होगा। और चूँकि समाधि-अवस्था से लब्ध यह ज्ञानालोक, अज्ञानावस्था से लौटने के बाद की अवस्था में जो ज्ञान प्राप्त होता है अथवा साधारण ज्ञानावस्था में युक्ति-विचार द्वारा जो ज्ञान उपलब्ध होता है, उन दोनो से अत्यन्त उच्चतर है, इसलिए अवश्य वह ज्ञानातीत भूमि से आता है। इसीलिए समाधि को मैने ज्ञानातीत भूमि के नाम से अभिहित किया है।
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राजयोग
संक्षेप मे समाधि का तात्पर्य यही है। हमारे जीवन मे इस समाधि की उपयोगिता कहाँ है? समाधि की विशेष उपयोगिता है। हम जान-बूझकर जो काम करते है, जिसे हम विचार का क्षेत्र कहते है, वह सकीर्ण और सीमित है। मनुष्य की युक्ति एक छोटेसे वृत्त मे ही भ्रमण कर सकती है, वह कभी उसके बाहर नही जा सकती। हम जितना ही उसके बाहर जाने का प्रयत्न करते है, उतना ही वह असम्भव-सा जान पड़ता है। ऐसा होते हुए भी, मनुष्य जिसे अत्यन्त कीमती और सबसे प्रिय समझता है, वह तो उस युक्तिराज्य के बाहर ही अवस्थित है। अविनाशी आत्मा है या नही, ईश्वर है या नही, इस जगत् के नियन्ता—परमज्ञान-स्वरूप कोई है या नही—इन सब तत्त्वो का निर्णय करने में युक्ति असमर्थ है। इन सब प्रश्नो का उत्तर युक्ति कभी नही दे सकती। युक्ति क्या कहती है? वह कहती है, "मै अज्ञेयवादी हूँ। मै किसी विषय मे 'हाँ' भी नही कह सकती और 'ना' भी नही।" फिर भी इन सब प्रश्नो की मीमांसा तो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन प्रश्नो के ठीक-ठीक उत्तर बिना मानव-जीवन उद्देश्यविहीन हो जायगा। इस युक्तिरूप वृत्त के बाहर से प्राप्त हुए समाधान ही हमारे सारे नैतिक मत, सारे नैतिक भाव, यही नही, बल्कि मानव-स्वभाव मे जो कुछ सुन्दर तथा महान् है, उस सबकी नीव हैं। अतएव यह सबसे आवश्यक है कि हम इन प्रश्नो के यथार्थ उत्तर पा ले। यदि मनुष्य-जीवन केवल पाँच मिनट की चीज हो, और यदि जगत् कुछ परमाणुओ का आकस्मिक मिलन मात्र हो, तो फिर दूसरे का उपकार मै क्यो करूँ? दया, न्यायपरता या सहानुभूति दुनिया में फिर क्यो रहे? तब तो हम लोगो का यही