भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

८६ रसतरङ्गिणी

दोलिकायन्त्रके स्थापयेत्पोट्टली नातितीक्ष्णानलं ज्वालयेत्सन्ततम् । नूतनं काञ्जिकं प्रक्षिपेत्प्रत्यहं स्वेदयेत्पारदं वासराणां त्रयम् ॥५३॥ अथ तृतीयः—शृङ्गवेर आर्द्रकम्, पुनरप्यार्द्रकपाठस्तस्य द्वैगुण्यार्थः मेघनादः तण्डुलीयकम्, महाबला सहदेवी, चुल्लिका लवणं नवसादरः, गवेधुकः अरण्यगोधूमः, वरा त्रिफला, भूर्जपत्रमध्ये पारदनिक्षेपः पारदरक्षार्थः॥५०-५३॥ भा. टी.—पीपल, मिर्च, सोंठ, अदरक, लहसुन, अदरक, चित्रक, चौलाई की जड़, नमक, महाबला, नौसादर, काकड़ासिंगी, राई, गवेधुक ( जंगली गेहूँ ) त्रिफला; इन प्रत्येक औषधियों को पारद से १६ वाँ भाग लेकर, सबको एक साथ या अलग-अलग काञ्जी से पीसकर गाढ़ा कल्क बना लें । अब इस कल्क का एक स्वच्छ वस्त्र पर एक अंगुल मोटा लेप करके उसमें पारद को रखकर फीते से इसकी एक दृढ़पोटली बना लें । अब दोलायन्त्र में काञ्जी डालकर उसमें पोटली लटका कर तीन दिन साधारण अग्निपात से स्वेदन करें । परन्तु प्रतिदिन नूतन काञ्जी दोलायन्त्र में डालकर स्वेदन करना चाहिए ॥ ५०–५३ ॥ मर्दनस्वरूपम् क्षाराद्यैरोषधैर्वा यत् खल्वे सूतस्य पेषणम् । तन्मर्दनं बुधैः प्रोक्तं बहिर्मलनिवृत्तये ॥ ५४ ॥ अथ क्रमप्राप्तं मर्दनस्वरूपमाह बहिर्मलनिवृत्तस्य इति । बहिर्मलाः कञ्चुकाः आवरकत्वात्, तन्निवृत्तिरस्य फलम् । “उदितैरोषधैः सार्धं सर्वाम्लैः काञ्जिकैरपि । पेषणं मर्दनाख्यं स्याद् बहिर्मलविनाशनम् ॥” इत्याहुः प्राञ्चः ॥ ५४ ॥ भा. टी.—क्षार आदि औषधिद्रव्यों के साथ पारद को खरल में डाल कर पीसने को मर्दन कहा जाता है । इस कर्म द्वारा पारद का बाह्य मल नष्ट किया जाता है ॥ ५४ ॥ मर्दनस्य प्रथमः प्रकारः सैन्धवं सदनधूम आसुरी यामिनी लशुनमार्द्रकं वरा । षोडशांशमिह निक्षिपेद्रसान्मर्दयेद्रसवरं दिनत्रयम् ॥ ५५ ॥ मर्दनस्य प्रथमः प्रकारः—सदनधूमो गृहधूमः, यामिनी हरिद्रा, वरा त्रिफला, प्रतिद्रव्यं षोडशांशं निक्षिप्य मर्दनम् ॥ ५५ ॥ भा.टी.—सैन्धव, घर का धुआँ, राई, हल्दी, लहसुन, अदरक तथा त्रिफला को पारद से षोडशांश लेकर खरल में पारद के साथ तीन दिन तक मर्दन करके पारे को पृथक् कर लेना चाहिए ॥ ५५ ॥