भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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[Header] पञ्चमस्तरङ्गः १०१

स्वर्णादिच्छेपणञ्च यत्। वेधाधिक्यकरं लोहे सारणा सा प्रकीर्त्तिता॥” तत्प्रकारश्च—"छिद्रान्वितान्धमूषा गम्भीरी स्यात् सारणोचिता। तस्यां सारणतैलं निधाय तप्तं सबीजसूतञ्च तत्तैलाक्तपटेनाच्छाद्य मुखं सारणं कुर्यात् ॥” इत्यादिनाऽऽकरेभ्योऽनुसन्धेया। विस्तरस्तु सारणातैलनिर्म्माणादेः रसरत्नाकरादिभ्योऽवधेयः। अपि च नैकधासारणाजारणापरम्परया वेधसम्भव- इत्यपि प्राचां मतम्। "सारितो जारितश्चैव क्रमात् सारितजारितः। सप्तशृङ्ग- लिकावेधात् कोटिवेधी भवेद्रसः॥” इति प्राचीनसंवादात्। अतोऽनन्तरं केचि- न्मुखबन्धनामानं संस्कारान्तरमप्यातन्यते, तत्प्रकारो रसपद्धत्यामवलोकनीयः, नेह प्रतन्यते माभूद् ग्रन्थविस्तर इति। अथ क्रामणम्—"स्वर्णतारादिधर्म्मान् यत् कामयेदन्यधातुषु। सारणोत्थेन सूतेन क्रामणन्तदुदाहृतम् ॥” तच्च— “शिलया निहतो नागो वङ्गं वा तालकेन शुद्धेन। क्रमशः पीते शुक्ले क्रामण- मेतत् समुद्दिष्टम् ॥” श्रीगोविन्दभगवत्पादान्तु—"क्रामति तीक्ष्णेन रसः" इत्याहुः। केचित्तु—"सौराष्ट्रीं भावयेद्धर्मे गवां पित्तैस्त्रिधा पुनः। तत्सत्त्वं व्योमवद् ग्राह्यं क्रामकं योजयेद्रसे ॥” इत्याहुः। अथः वेधः—"व्यवायिभेषजां- पेतो द्रव्ये क्षिप्तो रसः खलु। वेध इत्युच्यते ॥” स चानेकविधः—"लेपः क्षेपश्च कुन्तश्च धूमाख्यः शब्दसंज्ञकः ॥” तेषां लक्षणान्याकरेभ्योऽनुसन्धेयानि। विस्त- रभयादुपरम्यते। भक्षणसंस्कारस्तु क्षेत्रीकरणादौ वक्ष्यते। इति प्राचीनरसतन्त्र- प्रसिद्धा अवशिष्टाः सूतसंस्काराः साकल्येन भवन्त्युक्ताः॥ १०६-१०८॥ भा. टी.—पारद में यदि समभाग गन्धक जीर्ण किया जाय तो उसमें सामान्य रोगों का नाश करने की शक्ति आती है। द्विगुण गन्धक जीर्ण करने पर वह (पारद) महारोगों को दूर करनेवाला हो जाता है। त्रिगुण गन्धक जीर्ण करने पर शरीर में अत्यधिक पुंस्त्व शक्ति पैदा करता है। चतुर्गुण गन्धक जीर्ण होने पर वह शरीर में उत्साह, धारणा शक्ति तथा स्मृति शक्ति को बढ़ाता है। पञ्चगुण गन्धक जीर्ण होने पर सम्पूर्ण रोग तथा दुःखों को नष्ट करनेवाला हो जाता है। षड्गुण गन्धक जीर्ण होने पर तो उसमें अनेक अद्भुत कार्य करने की शक्ति आ जाती है॥ १०६-१०८॥ वक्तव्य—अष्टसंस्कार युक्त पारद तय्यार न होने पर सिंगरफ से निकाले हुए पारद को आक का दूध, थूहर का दूध, धत्तूरे का पत्रस्वरस, कलिहारी- मूलस्वरस या क्वाथ, कनेर के फूलों का स्वरस, श्वेत गुञ्जाफलों का क्वाथ, अहि- फेन का रस (अफीम से १६ गुना जल मिलाकर बना हुआ जल), इन सात