रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 146, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सगन्धक मूर्च्छना अथवा गन्धकरहित मूर्च्छनाभेद से पारद की मूर्च्छना दो प्रकार की मानी जाती है । निर्गन्ध मूर्च्छना में गन्धक का योग नहीं होता है। किन्तु सगन्ध मूर्च्छना में गन्धक का योग (मिश्रण) होता है। रसपुष्प (रसकर्पूर) आदि में निर्गन्ध मूर्च्छना होती है और रस- सिन्दूर रसपर्पटी आदि में विशेष रूप से सगन्ध मूर्च्छना होती है ॥ २-३ ॥ सगन्धाया ( मूर्च्छनायाः) द्वौ भेदौ सगन्धा मूर्च्छना ह्यत्र रसतन्त्रविचक्षणैः । अन्तर्धूमबहिर्धूमभेदेनापि द्विधा मता ॥ ४ ॥ अन्तर्धूममूर्च्छनायाः स्वरूपम् निरुध्यारम्भतः कूपीमुखं यद्गन्धजारणम् । मूर्च्छना सा भिषग्वर्यैरन्तर्धूमाभिधा मता ॥ ५॥ जीर्णेगन्धे तु यत्कूपीवक्त्ररोधनपूर्वकम् । पाचनं मूर्च्छना सा तु बहिर्धूमाभिधा मता ॥६॥ अन्तर्धूमभेदेन सगन्धा द्विविधा—आरम्भादवरुद्धमुखपाकान्तर्धूमा। गंधक जारणोत्तरमल्पशेषे मुखरोधपूर्वकं जाता बहिर्धूमा मूर्च्छना इति भेदः ॥४-६॥ भा.टी.—रसतन्त्रकारों ने अन्तर्धूम और बहिर्धूम भेद से सगन्ध मूर्च्छना के दो भेद माने हैं। अतः इनका स्वरूप यहाँ बताया जाता है ॥ ४ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की कज्जली को एक सात कपड़मिट्टी की हुई मजबूत कांच की शीशी में भरकर पहिले ही उसमें डाट लगाकर वालुकायन्त्र से पकाने को अन्तर्धूम मूर्च्छना कहते हैं। और वालुकायन्त्र में रखकर अग्नि देने पर जब शीशी का गन्धक धुआँ निकलकर धीरे-धीरे जीर्ण हो जाय तब डाट लगा कर बनाये गये रससिन्दूर आदि को बहिर्धूम मूर्च्छना कहते हैं ॥ ५-६ ॥ सगन्धमूर्च्छितः सूतः सुचिरं परिशीलितः । न जातु प्रकरोतीह विकारान् पारदोत्थितान् ॥ ७ ॥ निर्गन्धमूर्च्छितः सूतो गदसंक्षयकालतः । अनन्तरं शीलनेन विकारान् जनयेद् भृशम् ॥८॥ अथ सगन्धनिर्र्गन्धयोः फले विशेषः—सगन्धमूर्च्छितः रससिन्दूरादिरूपः कज्ज लीरूपो वा सूतः सुचिरं सेवितोऽपि कदाचित् पारदोत्थितान् विकारान् मुखशोथ- लालास्रावादीन् न करोति । गन्धप्रभावेण विकारमजनयता मलमूत्रस्वेदादिमा-