रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंगैभ्यः सूतस्य स्वत एव निर्गमात् । अतस्तस्य मात्रया सुचिरं सेवनेऽपि न हानिसंभावना । निर्गन्धमूर्च्छितः रसपुष्पकर्पूरादिरूपः सूतः रोगक्षयकालानन्तरं सेवनेन अवश्यं विकारान् जनयेत् । अतश्च फिरङ्गादिरोगक्षयोत्तरं रसपुष्पादेः सेवनन्न कार्यम् । अपितु निर्गन्धमूर्च्छितसूतसेवनोत्तर रोगशान्तौ सत्यां काकमा- चीकूष्माण्डशारिवादिपारददोषसारकौषधिरससेवनेन शरीरात् पारदनिःसारणं कार्यम् । “रसत्यागविधौ पुनः भक्षयेद् बृहतीं बिल्वम्” इति रसवाग्भट्टोक्तेः ॥७,८॥ भा.टी.—गन्धकयुक्त मूर्छित पारद को यदि बहुत देर तक भी सेवन किया जाय तो उसके द्वारा शरीर में कोई भी पारदविकार नहीं होने पाते हैं । किन्तु गन्धकरहित मूर्च्छित पारद को उपदंश आदि रोगों के अच्छी तरह शान्त होने के बाद कुछ देर भी और सेवन किया जाय तो भयंकर पारद- विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ७, ८ ॥ अथ मुग्धरसस्य निर्माणप्रकारः [ गीतिका ] युगतालकप्रमाणं विमलीकृतं रसेशम् । द्विगुणां खटीञ्च शुद्धां निदधोत खल्वमध्ये ॥६॥ परिपेषयेत्तु तावत् विधिनेतदीयचूर्णम् । अवलोक्यते न यावत्खलु चन्द्रिकाविहीनम् ॥१०॥ हतचन्द्रिकं तु चूर्णं ह्यवबुध्यैः योजयेद्वै । विबुधैः स्मृतो रसोऽयं खलु मुग्धनामधेयः ॥ ११ ॥ अथ मुग्धरसनिर्माणप्रकारः—पारदं विमलीकृतं पूर्वोक्तसंस्कारशुद्धं चतुस्तो- लकमितमादायाष्टतोलकमितां शुद्धां पाषाणांशरहितां वस्त्रगालितां खटीं कठिनौं खल्वे मर्दयेत् । विनष्टपारदकणं हतचन्द्रिकमेतच्चूर्णं मुग्धरसन्नाम ॥६-११॥ भा. टी.—दो तोला शुद्ध पारद चार तोले विशुद्ध खरिया मिट्टी लेकर दोनों को एक खरल में अच्छी तरह खूब घोटें, जब इसमें बिलकुल चन्द्रिका न रहे तो इसका प्रयोग करें । इसे “मुग्धरस” कहा जाता है ॥ ६-११ ॥ वक्तव्य—यह हलका सा भूरे रंग का चूर्ण होता है जो बाजार में बना बनाया मिलता है और इसे अंगरेजी में Grey Powder कहते हैं। मुग्धरसस्य गुणाः उदरामयनुत् वमिहृन्नियतं सहजोत्थफिरंगकुरंगहरिः । शिशुरोगहरस्तु विशेषतया विबुधैरूदितः खलु मुग्धरसः॥१२॥