रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ रसतरङ्गिणी अथ मुग्धरसः—उदरामयः अतीसारः सहजोत्थः शरीरारम्भकबीजभाग- दुष्टिजन्यः फिरङ्गतदाख्यपापरोग एव कुरङ्गो मृगस्तन्नाशाय हरिः सिंह इव, बलात् तन्नाशक इत्यर्थः ॥१२॥ भा.टी.—मुग्धरस अन्तःप्रयोग में अतीसारनाशक, वमननिवारक, सहज- फिरंगरोगघातक रस है। विशेष रूप से यह बालकों के उदर रोगों में काम आता है ॥ १२ ॥ वक्तव्य—इसका प्रयोग बच्चों के अतिसार अर्थात् हरे-पीले या मृत्तिका वर्णवाले दुर्गन्ध युक्त दस्तों में होता है। यह दही के जैसे फटे दस्त, कामला, मन्दाग्नि और कण्ठशालूक आदि रोगों में भी लाभकारक है। मुग्धरसस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जार्धतः समारभ्य सार्धगुञ्जद्वयोन्मिता । पूर्णमात्रा मता मुग्धरसस्य तरुणोचिता ॥ १३ ॥ गुञ्जाष्टमांशतश्चास्य गुञ्जापादांशसंमिता । पूर्णमात्रा मता विज्ञैर्वार्षिकस्यार्भकस्य तु ॥ १४ ॥ मात्रानिरूपणं व्यवहारार्थम् । ३ गुञ्जातः २॥ गुञ्जा पर्यन्तं युवयोग्या- १/८ गुञ्जातः १/४ गुञ्जापर्यन्तं वार्षिकलकयोग्याऽस्य मात्रा ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—एक तरुण अवस्थावाले मनुष्य के लिए इसकी आधी रत्ती से ढाई रत्ती तक पूर्ण मात्रा होती है। और एक वर्ष के बालक के लिए एक चावल से चौथाई रत्ती तक इसकी पूर्ण मात्रा होती है ॥ १३, १४ ॥ मुग्धरसस्य आमयिकप्रयोगः गुञ्जैकसंमितो मुग्धरसस्तु सलिलान्वितः । मासमेकं द्वयं वापि यत्नतः परिशीलितः ॥ १५ ॥ गर्भिणीनां चिरोद्भूतां नवजातामथापि वा । फिरंगजनितां बाधां नाशयत्यविलम्बितम् ॥ १६ ॥ गुञ्जापादोन्मितो मुग्धरसो नीरेण शीलितः । शिशूनां विनिहन्त्याशु फिरङ्गं सहजोत्थितम् ॥ १७ ॥ रक्तिकांऽघ्रिमितो मुग्धरसो वारा नियोजितः । विनिहन्त्याशु बालानामतीसारं सुनिश्चितम् ॥ १८ ॥ विज्ञाय रोगोपशमं प्राणाचार्यो भिषग्वरः । न योजयेन्मुग्धरसं रससिन्दूरवद् भृशम् ॥ १६ ॥