रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १०७ रक्तिकाङ्घ्रिमितः गुञ्जाचतुर्थांशः । वारा जलेन । शिष्टं सुगमम् ॥१५-१६॥ भा.टी.-एक रत्ती मुग्धरस को जल के साथ एक मास या दो मास तक निरन्तर अच्छी तरह सेवन कराने से गर्भिणी स्त्री का नवीन तथा पुरातन फिरंग रोग नष्ट हो जाता है । १/४ रत्ती मात्रा में जल के साथ इस रस को बालकों को देने से उनका सहज फिरंग रोग नष्ट हो जाता है । १/४ रत्ती मात्रा में जल के साथ बच्चों को सेवन कराने से उनके दस्तों में निश्चित आराम आता है। परन्तु इसके प्रयोग से उक्त रोगों की शांति होने पर फिर इसे रससिन्दूर आदि गन्धक युक्त पारद की तरह सेवन नहीं कराना चाहिए । क्योंकि फिर सेवन कराने से इसके द्वारा पारदविकार उत्पन्न होने का भय रहता है ॥ १५-१६ ॥ अथ रसपुष्पस्य नामानि रसपुष्पं रससुमं कुसुमं रसपूर्वकम् । मतं, निरुच्यते कैश्चित्सुधानिधिरसाह्वया ॥ २० ॥ रसपुष्पनामानि शास्त्रे व्यवहाराय । केचिदिमं सुधानिधिनाम्ना ख्याप- यन्ति ॥ २० ॥ भा.टी.-रसकपूर के रसपुष्प, रससुम, रसकुसुम, इतने नाम कहे गये हैं । कोई-कोई वैद्य इसे सुधानिधिरस के नाम से भी कहा करते हैं ॥ २० ॥ अथ रसपुष्पस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः विशुद्धं रसराजन्तु पञ्चतालकसंमितम् । तत्समं लवणाञ्चैव काशीसं विमलं तथा ॥२१॥ खल्वे सम्पेव्य यत्नेन श्लक्ष्णचूर्णं च कारयेत् । अथ चूर्णं समादाय हण्डिकायां विनिक्षिपेत् ॥२२॥ मध्ये सच्छिद्रया काचलिप्तयाऽऽयतवक्त्रया । आच्छादयेद्धण्डिकया रसकर्मविशारदः ॥२३॥ सन्धिन्तु वाससाऽऽच्छाद्य लेपयेत्स्वल्पया मृदा । न लेपयेदूर्ध्वपात्रं भानुतापेऽथ शोषयेत् ॥२४॥ चुल्ल्यां निधाय विपचेदत्यल्पानलयोगतः । ऊर्ध्वपात्रस्थच्छिद्रेण बाष्पमुद्याति वेगतः ॥२५॥ निर्याते जलबाष्पे तु विधिना परिपाकतः । खटीपिधानपिहितं छिद्रं खट्या प्रलेपयेत् ॥२६॥