रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ रसतरङ्गिणी अतिमन्दानलेनैव यामद्वितयमादितः । विपाचयेत्प्रयत्नेन स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥२७॥ न्युब्जं कृत्वा समुत्तार्य सन्धिदेशं विलिख्य च । शशिप्रभं लम्बमानं रसपुष्पं समाहरेत् ॥२८॥ अथ रसपुष्पस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः—विशुद्धं संस्कारशुद्धं हिंगुलोत्थं वा पारदं ५ तोलकं, लवणं सैन्धवं ५ तो०, शुद्धं काशीसं ५ तो०, आनिश्चन्द्रिकं खल्वे पेषयेत्, न्युब्जीकृत्य हण्डिकां रसपुष्पोद्धरणं तस्याधःपातनिवृत्तये । शशिप्रभमतिश्वेतम् ॥ २१-२८ ॥ भा.टी.—विशुद्ध पारद पाँच तोला, लवण पाँच तोला, स्वच्छ कसीस पाँच तोला लेकर इन तीनों को एकत्र खरल में पीसकर बहुत सूक्ष्म चूर्ण बना लें। अब इस चूर्ण को एक दृढ़ हाँडी में डालकर उस (हाँडी) के मुख पर एक चौड़े मुखवाली बीच पेंदे में छिद्रवाली, कांचलित दूसरी हाँडी टिकाकर सन्धिस्थान पर कपड़मिट्टी करके धूप में सुखा लें। अब इस हांडी को चूल्हे पर रख मन्द-मन्द अग्नि से पकायें। पाक के समय ऊपरी हाँडी के छिद्र में से बड़ी तेजी के साथ वाष्प निकलने लगेगी। जब वाष्प निकलना बन्द हो जाय तो ऊपरी हाँडी के छिद्र को खड़ियामिट्टी के डाट से बन्दकर लेप कर दें और मन्द-मन्द अग्नि दें। उक्त परिमाण में ली हुई औषधियों को पकाने के लिए प्रारंभ से अन्त तक छः घण्टे की अग्नि देनी चाहिए। स्वांग शीत होने पर इस यन्त्र को नीचे उतार लें और ऊपर की हाँडी की सन्धि को खोलकर हाँडी को उलटाकर उसके तलप्रदेश में लगे हुए चन्द्रमा के सदृश लगे हुए रसकपूर को सावधानी से निकाल लें ॥ २१-२८ ॥ रसपुष्पस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः शुद्धं तोलकपञ्चकं रसवरं काशीसकं सैन्धवं दत्वा चैव समं समं सुमस्तृणे खल्वे ततः पेषयेत् । कूपीमध्यगतं पचेत्तु सिकतायन्त्रेऽथ यामद्वयम् नीहारप्रभमूर्ध्वभागनिचितं पुष्पं रसाद्यं हरेत् ॥२९॥ जलीयबाष्पे निष्क्रान्ते पिधानेन पिधाय वै । कूपिकाकण्ठदेशस्थां वालुकामपसारयेत् ॥३०॥ पुष्पवच्छोभते यस्मात्कूपीकण्ठप्रलम्बितम् । रसपुष्पमिदं तस्मात्प्राणाचार्यैर्निगद्यते ॥३१॥