रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १०६ अथ द्वितीयः प्रकारः—शुद्धपारदसैन्धवकाशीसानां प्रत्येकं ५ तोलकम् आनिश्चन्द्रिकं मर्दयित्वा काचकूप्यां निधाय बालुकायन्त्रेण यामद्वयं पाको विधेयः । जलीयबाष्पे निष्क्रान्ते पिधानकेन मुखमाच्छाद्य मृदा सन्धिं विलिप्य कूपिकागलाद् बालुकापसारणीया । तथा सति कण्ठदेशे शैत्यापादनेन रसपुष्प- सङ्ग्रहः सम्यक् सम्भवति ॥ २६-३१ ॥ भा. टी.—शुद्ध पारद पाँच तोला, सैन्धानमक पाँच तोला, साफ कसीस पाँच तोला लेकर इन सबको खरल में एकत्र अच्छी तरह मर्दनकर एक कपड़मिट्टी की हुई काँचकूपी में भर दें। अब इस काँचकूपी को बालुकायन्त्र में रखकर छः घण्टे अग्नि दें तो कांच की शीशी के ऊपरी प्रदेश में बर्फ के सदृश उज्ज्वल श्वेत वर्ण का रसकर्पूर लगा हुआ मिलेगा । अग्नि देते समय जब कि बाष्प निकल जाय तो कूपीमुख में डाट लगाकर इसके (कूपी) कण्ठ- प्रदेश की दो अंगुल बालुका को हटा दें जिससे वहाँ शीतलता प्राप्तकर रस- कर्पूर जमा हो सके । शीशी के कण्ठ में यह औषधि पुष्प के समान लगी हुई पाई जाती है, अतः इसे रसपुष्प नाम से कहा जाता है ॥ २६-३१ ॥ रसपुष्पस्य तृतीयो निर्माणप्रकारः पुष्पकाशीसजं चूर्णं त्वतिमन्दाग्नियोगतः । किञ्चिद् भृष्टं नष्टनीरं पञ्चतोलकसंमितम् ॥३२॥ तन्वितामेव दहने पुष्पितां स्फटिकारिकाम् । रसेश्वरं सैन्धवं च पृथक्तुल्यं समाहरेत् ॥३३॥ खल्वे सम्पेष्य यत्नेन श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत् । निश्चन्द्रिकं वीक्ष्य चूर्णं यन्त्रे डमरुकाह्वये ॥३४॥ अतिमन्दानलेनैव द्वियामं यत्नतः पचेत् । भिषग्वरो विधानज्ञः स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥३५॥ भास्वद्विभुं ततो युक्त्या शरदिन्दुमनोहरम् । पुष्पवल्लम्बमानं तु रसपुष्पं समाहरेत् ॥३६॥ रसतन्त्रमहाम्भोधिकर्णधारधुरन्धरैः । मित्रवंशावतंसैस्तु गुरुवर्यमहोदयैः ॥३७॥ श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैस्स्वयमाविष्कृतो विधिः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥३८॥