भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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११० रसतरङ्गिणी अथ तृतीयः—पुष्पकाशीसचूर्णमतिमन्दानलेन नष्टजलांशं ५ तोलकं, वह्नि- भर्जिता स्फटिका ५ तो०, पारदः सैन्धवञ्च तावदेव । ततः खल्वे यावन्निश्चन्द्रिकं पिष्ट्वा डमरुयन्त्रेण पातयेत् । सुगमोऽयम्प्रकारः । रसतन्त्रमेव महाम्भोधिः तत्र कर्णधारेषु पारोत्तारकेषु धुरन्धरैः अग्रगण्यैः प्रधानैः मित्रवंशे विश्वामित्राख्ये कुले अवतंसैः शिरोभूषणरूपैः गुरुवर्य्यैः सद्गुरुभिः महोदयैः श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैः तादृशसुगृहीतनामभिः आविष्कृतः प्रकाशित इति श्रद्धाधिक्यसूचनम् ॥३२-३८॥ भा. टी.—पहिले पुष्प कसीस को मन्द-मन्द अग्नि में कुछ भूनकर उसके जलीयांश को सुखा लें, इस प्रकार भुनी हुई कासीस पाँच तोले और पाँच तोले फिटकरी की खील, शुद्ध पारा तथा सैन्धानमक पाँच-पाँच तोले लेकर सबको एकत्र खरल में खूब बारीककर निश्चन्द्र चूर्ण बना लें, उसे डमरूयन्त्र में डालकर बन्द करके अत्यन्त मन्द-मन्द अग्नि से छः घण्टे तक पकावें । जब स्वांग शीत हो जाय तो यन्त्र को नीचे उतारकर सावधानी से उसे खोलें और ऊपर के पात्र में लगे हुए शरत्कालीन चन्द्रमा के समान सुन्दर श्वेतवर्ण चमकीले रसपुष्प को निकाल लें । यह रसशास्त्र के धुरन्धर विद्वान् रसयनाचार्य्य सिद्धकर्म्माभ्यास युक्त मान- नीय वैद्य श्री नरेन्द्रनाथ की अनुभूत रसकर्पूर निर्माणविधि है, जिसे आतुर प्राणियों की भलाई के लिए शुद्धरूप से यहाँ प्रकट कर दिया गया है ॥३२-३८॥ रसपुष्पस्य परीक्षणम् महोज्ज्वले लोहपात्रे जलबिन्दुं तु विन्यसेत् । रसपुष्पं समादाय जलबिन्दौ विनिक्षिपेत् ॥३६॥ क्षणादूर्ध्वं जलं क्षिप्त्वा यदि काष्ण्यं न लभ्यते । रसपुष्पं तदा शुद्धं जानीयाद्भिषजां वरः ॥ ४० ॥ अथ परीक्षणस्य—अत्यन्तनिर्मले लोहपात्रे जलबिन्दुं निक्षिप्य तदुपरि किञ्चित् रसपुष्पं प्रक्षिप्य क्षणं धारयेत् । ततः तत्स्थानस्य वस्त्रेण प्रोञ्छनं विधायावलोकयेत् , यदि लोहपात्रे कृष्णता न स्यात्तदा शुद्धमिदमिति व्यव- स्येत् ॥ ३६-४० ॥ भा.टी.—शुद्ध रसकर्पूर की परीक्षा के लिए एक स्वच्छ चमकीला लोह- फलक लें । इसमें एक स्थान पर एक बूँद जल को डालें, अब इस बूँद में बहुत सूक्ष्म रसकर्पूर का टुकड़ा डाल दें । और थोड़ी देर बाद इस जल को फेंक दें । यदि जलबिन्दुवाले स्थान पर कोई काला चिह्न न बने तो समझें कि यह रसकर्पूर शुद्ध अर्थात् लवणांशरहित है ।