रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः ११५ लोहफलक में से जल को फेंककर उस स्थान को वस्त्र से पोंछकर काला दाग मिलता हो तो उसे अशुद्ध रसकर्पूर समझना चाहिए ॥ ३६-४० ॥ रसपुष्पस्य गुणाः रसपुष्पं पित्तहरं मूत्रलं व्रणदोषहृत् । परं विरेचनकरं तथा भूतविषापहम् ॥४१॥ स्वस्थ्यीकरणमत्यन्तं जलीयांशविशोषणम् । पित्ताशयं तु विक्षोभ्य मलपित्तापसारकम् ॥४२॥ कृमीन् विषूचिकोद्भूतान् हिक्काञ्चैव फिरङ्गकम् । जलोदरादिकान् रोगान् नाशयत्यविलम्बितम् ॥४३॥ अथ गुणाः—पित्तहरं विरेकद्वारा पित्तहरम् , व्रणदोषाः कृम्यादयः, तीव्र- रेचकम् , भूतानि संङ्क्रामकस्रोगबीजानि । पित्ताशयो यकृदधोवर्ति पाचकपित्त- स्थानम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ४१-४३ ॥ भा.टो.—शुद्ध रसकर्पूर अन्तःप्रयोग करने में यकृत् सञ्चित मूलभूत पित्त को बाहर निकालता है, मूत्र अधिक लाता है । व्रण के कृमि पूय आदि विकृतियों को दूर करता है और तीव्र पित्तविरेचक है । यह संक्रामक जन्तु- विषनाशक है जिससे शरीर में संक्रामक रोगों का प्रभाव नहीं रहने पाता है । इसके प्रयोग से शरीर में बढ़ा हुआ जलीय भाग सूख जाता है । यह पित्ता- शय को क्षुब्ध करके मूलभूत पित्त को बाहर निकाल देता है । विसूचिका, कृमि, हिक्का, फिरंग रोग और जलोदर आदि अनेक रोगों को यह शीघ्र ही नष्ट करता है ॥ ४१-४३ ॥ रसपुष्पस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जाद्वैतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जद्वयोन्मता ॥४४॥ रसपुष्पस्य मात्रा हि सार्द्धगुञ्जद्वयोन्मिता । गुञ्जाष्टमांशप्रमिता मात्रा हिक्कामये हिता ॥४५॥ फिरङ्गरोगाय मता गुञ्जा पादांशसंमिता । इयमैव मता मात्रा शिशूनां तु विरेचने ॥४६॥ अथ रसपुष्पमात्रानिरूपणम्—१ गुञ्जातः २॥ गुञ्जां यावन्मात्रास्य । अत्र विशेषः—सार्द्धद्विगुञ्जामात्रास्य रेचनाय दातव्या । गुञ्जाष्टमांशो हिकारोगे । गुञ्जाचतुर्थांशः फिरङ्गरोगे च । युवयोग्या चेयं मात्रा । बालकानान्तुगुञ्जा- चतुर्थांशं यावत् रेचनाय मात्रा । अन्यत्र कर्मण्यतोऽपि लघीयसी गुञ्जा- विंशांशा त्रिंशांशा वा यथायोग्यम् ॥ ४४-४६ ॥