रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—साधारणतः रसकर्पूर की अन्तःप्रयोग के निमित्त ३/२ रत्ती से लेकर २॥ ढाई तक मात्रा मानी जाती है। यदि रसकर्पूर को विरेचन होने के लिए देना हो तो पूरी ढाई रत्ती मात्रा देनी चाहिए। हिचकी के लिए इसकी एक चावलभर मात्रा देनी चाहिए। फिरंगरोग को दूर करने के लिए इसकी १/८ रत्ती मात्रा देनी चाहिए। यदि छोटे-छोटे बच्चों को विरेचनार्थ इसको देना हो तो भी ३/४ रत्ती मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ॥ ४४-४६ ॥ रसपुष्पस्य आमयिकः प्रयोगः रसपुष्पं सार्द्धगुञ्जद्वितयं स्वर्जिकान्वितम्। शीलितं रेचयत्येव कामं यामद्वयोत्तरम् ॥४७॥ शीलितं रसपुष्पन्तु वारिणा गुञ्जपादिकम्। विसूच्यास्तु समारम्भे विसूचीकृमिसंघनुत् ॥४८॥ रसागमपरिज्ञानविहीनो भिषगल्पधीः। निरन्तरं विशेषेण रसपुष्पं न योजयेत् ॥४९॥ अथास्य रोगप्रयोगः--रसपुष्पं २॥ गुञ्जामितं, स्वर्जिकाक्षारो माषार्द्धमितः, मिलितयोः सेवनाद् यामद्वयोत्तरं रेचनं स्यात्। अनुपानं जलम्। उपलक्षणञ्चै- तत् लवङ्गचूर्णादिना सहापि रेचनं करोत्येव। गुञ्जाचतुर्थांशो विषूचिकायाः प्रारम्भे। अनुपानं शृतशीतमुदकम्। रसपुष्पस्य च निरन्तरं प्रयोगो निषिद्धः। अत्रोपपत्तिः पूर्वमुक्तैवेति ॥ ४७-४९ ॥ भा.टी.—ढाई रत्ती रसकर्पूर को पाँच या सात रत्ती सज्जीखार (सोडा बाइ कार्ब) में मिलाकर जल या दूध के साथ सेवन करने से ६ घण्टे के बाद विरेचन होने लगता है। यदि विसूचिका रोग के आरम्भ में ही १/४ रत्ती रस- कर्पूर धो जल के साथ सेवन कराया जाय तो विसूचिका के कृमि मर जाने से रोग बढ़ जाने का डर नहीं रहता है। रसशास्त्र को पूर्ण रूप से न समझनेवाले अल्पबुद्धि वैद्यों को रसकर्पूर का बिना सोचे समझे सेवन नहीं करना चाहिए॥४७-४९ चन्दनादिवटिका रक्तचन्दनमथोषणां सिता कुङ्कुमं रससुमं लवङ्गकम्। तोलकैकमित मेव वै पृथक् त्वाददीत रसतन्त्रकोविदः ॥५०॥ रक्तिकैकमित वटी कृता प्रत्यहं तु नवनीतयोजिता। चन्दनादिवटिकेषमुत्तमा हन्ति दुर्जयफिरङ्गजां व्यथाम् ॥५१॥