भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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८ षष्ठस्तरङ्गः ११३ अथ चन्दनादिवटिका - ऊषणं कृष्णमरिचम्, सिता खण्डम्, कुङ्कुमं काश्मीरम्, रससुमं रसपुष्पम् ॥ ५०-५१ ॥ भा.टी.-लालचन्दन, कालीमिर्च, खांड, रसकर्पूर, लौंग; इन सबको पृथक्-पृथक् एक तोला लेकर एकत्र खरल में जल के साथ घोटकर एक-एक रत्ती की गोली बना ल । इनमें से प्रतिदिन एक या दो गोली मक्खन के साथ सेवन करावें । यह चन्दनादि-वटी कही जाती है। इसके प्रयोग से भयंकर नवीन फिरंग रोग शान्त हो जाता है। यह फिरंग रोग की निर्विकार और उत्तम औषधि है ॥ ५०-५१ ॥ अथ रसपुष्पमलहरः रसपुष्पं चतुर्गुञ्जं मेलयेत्तोलकोन्मिते । क्षालिते नवनीते तु शतधा विमलाम्भसा ॥५२॥ मतो मलहरोऽयन्तु रसपुष्पसमाह्वयः । लिप्तोऽयं नाशयेत्याशु फिरङ्गव्रणजां रुजम् ॥५३॥ अथ बाह्यप्रयोगार्थमस्य मलहरः - चतुर्गुञ्जामितं रसपुष्पं तोलकमित निर्मलोदके शतधा धौते नवनीते मेलयेत् । सोऽयं फिरङ्गव्रणपीडाहरः रोप- णश्च ॥ ५२, ५३ ॥ भा. टी.-चार रत्ती रसकपूर सौ बार जल से धोये हुए १ तोला मक्खन में घोटकर अच्छी तरह मिला लें । इसको रसपुष्प मलहर (मरहम) कहते हैं । इस मरहम को फिरंग व्रणों पर लगाने से वे शीघ्र ही दूर हो जाते हैं ॥ ५२-५३ ॥ रसपुष्पाद्यमलहरः रसपुष्पं चतुर्गुञ्जं सिक्थतैलञ्च तोलकम् । खल्वेऽतिमसृणे क्षुद्रे दत्त्वा यत्नेन मर्दयेत् ॥ ५४ ॥ ततो विशालवक्त्रायां काचकुप्यां तु विन्यसेत् । गदितोऽयं मलहरो रसपुष्पाद्यसंज्ञकः ॥ ५५ ॥ रसपुष्पाद्यो मलहरो व्याख्यायते ॥ ५४, ५५ ॥ भा.टी.-रसकपूर चार रत्ती और सिक्थतैल एक तोला लेकर इन दोनों को एक छोटे चिकने खरल में अच्छी तरह घोटकर मरहम तैयार कर लें । तैयार करने के बाद प्रयोग करने में सुविधा के लिए एक चौड़े मुख की शीशी में रख लें । इस मरहम को रसपुष्पाद्यमलहर कहते हैं ॥ ५४-५५ ॥