रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ रसतरङ्गिणी अस्य गुणाः प्रलिप्तोऽयं मलहरः प्रत्यहं स्वल्पमात्रया । नाशयत्यचिरादेव फिरङ्गव्रणमुल्वणम् ॥ ५६ ॥ तथा पायुप्रदेशोत्थां त्वथवोपस्थदेशजाम् । विचर्चिकां चिरोद्भूतां नाशयत्येष निश्चितम् ॥ ५७ ॥ सिंहादिकानां हन्त्याशु तथा तत्कालसंभवम् । षाण्मासिकं वार्षिकं वा नखदन्तोद्भवं क्षतम् ॥ ५८ ॥ अस्य गुणाः—सिंहादिकानां नखदन्तोद्भवं क्षतं तात्कालिकं षाण्मासिकं वार्षिकं वा नाशयेदाशु ॥ ५६–५८ ॥ भा.टी.—इस रसपुष्पाद्य मलहर को प्रतिदिन थोड़ी मात्रा में फिरंग व्रणों पर लेप करने से वे शीघ्र ही अच्छे हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त यह मरहम गुदा प्रदेश में उत्पन्न अथवा मूत्रेन्द्रिय में उत्पन्न चिरकालीन विचर्चिका (खाज) को भी शीघ्र ही नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त शेर रीछ कुत्ता आदि जन्तुओं के तात्कालिक या पुराने छः महीने या एक वर्ष के नाखून और दाँतों से किये गये घावों के विषों को भी शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ ५६–५८ ॥ प्रसङ्गात्सिक्थतैलस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः भागैकं विमलं सिक्थं तैलन्तु रसभागिकम् । आदाय वङ्गलिप्तायां स्थालिकायां निधापयेत् ॥ ५६ ॥ पचेत्तावन्मन्दवह्नौ यावत्सिक्थं द्रवीभवेत् । स्थालिकामथ यत्नेन धरण्यामवतारयेत् ॥ ६० ॥ तावत्प्रचालयेद्दर्य्या यावदेति प्रगाढताम् । सिक्थतैलसमांयोगात्सिक्थतैलमिदं स्मृतम् ॥ ६१ ॥ प्रसङ्गात् सिक्थतैलनिर्माणप्रकारः प्रथमः । सिक्थं मधूच्छिष्टमेकभागम् , तिलतैलस्य षड् भागाः ॥ ५६--६१ ॥ भा.टी.—एक भाग मोम और छः भाग तिलतैल लेकर इनको एक कलई की हुई कड़ाही में डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें। जब मोम गल- कर तैल में मिल जाय तब इस कड़ाही को नीचे उतार लें और चम्मच से गाढ़ा होने तक इसे चलाते जायें । इसमें सिक्थ (मोम) और तैल दोनों का मिश्रण होने से इसको सिक्थतैल कहा जाता है ॥ ५६–६१ ॥