रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ रसतरङ्गिणी लेकर बनायी हुई कजली को कपूर, सुगन्धवाला, मरिच और छारछबीला तथा खाँड़ के चूर्ण के साथ मिलाकर जलानुपान से सेवन करने पर भयंकर तृषा तथा वमन बन्द हो जाती है । वरुणादिगण के कषाय के साथ यदि कुछ दिन तक कजली का सेवन कराया जाय तो बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार की विद्रधि शान्त हो जाती है । द्विगुण गन्धक की कजली को करेले के पत्ररस के साथ सेवन करने से भयंकर वीसर्प रोग शांत हो जाता है । द्विगुण गन्धक की कजली को सहंजने के स्वरस तथा मधु के साथ कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से बाह्य-आभ्यन्तर दोनों प्रकार की विद्रधि शांत हो जाती है । द्विगुण गन्धक की कजली को बनतुलसी के स्वरस की भावना देकर, मुलैठी, अडूसा, पिप्पली, हरड़ तथा बहेड़े के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से श्वास, कास तथा तमक श्वास रोग शांत होते हैं। सम गंधक कजली को, नीम्बूकारस सोंठ तथा पिप्पली चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण रोग नष्ट हो जाता है । इलायची बीज, अहिफेन, कपूर, जायफल और लौंग तथा कज्जली प्रत्येक समभाग में लेकर ४ रत्ती मात्रा में सेवन करने से स्वप्नमेह में आराम आता है । सीसम की लकड़ी के तैल अथवा मक्खन में मिलाकर कजली को कुछ दिन तक निरन्तर लेप करने पर पुराना चर्मदल रोग नष्ट हो जाता है । एक भाग कज्जली दो भाग धतूरे के पत्ते लेकर दोनों को खरल में चित्रकस्वरस से पीसकर मक्खन मिला लेप करने से कण्डू पामा आदि रोग नष्ट होते हैं । कज्जली में समभाग सैन्धानमक मिला आक के दूध में पीसकर लेप करने से गण्डमाला में आराम आता है । त्रिफलाचूर्ण, शुद्ध गुग्गुल को कज्जली में मिलाकर एरण्ड तैल के साथ खूब मर्दन कर पतला कल्क-सा बनाकर गरम जल या दूध से सेवन करने पर सब रोग विशेषतः वात-रोग नष्ट होते हैं । द्विगुण गन्धक की कज्जली को गाय के मक्खन के साथ मिलाकर सेवन करने से उपदंश रोग नष्ट हो जाता है; परंतु इसके सेवनकाल में लवण का त्याग कर देना चाहिए । समभाग कज्जली को मक्खन में मिलाकर लेप करने से गजचर्म (चम्बल) रोग नष्ट हो जाता है । कज्जली में समभाग खाँड मिला आँवलों के स्वरस के साथ कुछ दिन सेवन करने से सब प्रकार के मदात्यय रोग नष्ट हो जाते हैं । कज्जली को धतूरे के बीजों के रस में अच्छी तरह घोंटकर इसमें त्रिकटुचूर्ण मिला नस्य लेने से सन्निपात में लाभ होता है ॥ ११३-११८ ॥