रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १४३ द्रुतमङ्गेषु सर्पन्ति सहपानं तदुच्यते ॥ १६६॥ प्रसङ्गात् सहपानानुपानलक्षणम्—सर्पन्ति व्याप्नुवन्ति। सहपानं यथा मधु- प्रभृति ॥१६६॥ भा.टी.—औषधि सेवन करते समय औषधि में मिलाये जानेवाले जिस जिस द्रव्य के योग से औषधि परमाणु (सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण) विभक्त होकर शरीर में व्याप्त हो जाते हैं उस औषधि के साथ मिलाकर लिये जानेवाले द्रव्य को "सहपान" कहा जाता है ॥ १६६ ॥ अथ अनुपानस्य लक्षणम् तत्तद्रोगघ्नभैषज्यं भेषजस्यानुपीयते । यच्च साहाय्यकारि स्यादनुपानं तदुच्यते ॥ २०० ॥ सहपानानुपानाभ्यां भेषजं परिबृंहयेत् । येन रोगहरा शक्तिर्भवेद् गुणवती सदा ॥ २०१ ॥ अलाभेऽत्यर्थमेवात्र सहपानानुपानयोः । मधुना वा जलेनैव भेषज्यं वितरेद् भिषक् ॥२०२॥ भेषजस्य अनु पश्चात् , साहाय्यकारि इति भेषजस्यैव । अत्यर्थे यथाशक्ति यत्ने कृतेऽपि चेदलाभः सहपानानुपानयोस्तर्हि मधुना जलेनैव वा भैषज्यं वित- रेत् ॥ २००-२०२ ॥ भा.टी.—सहपान युक्त औषधि सेवन करने पर इसके बाद जो औषधि शक्ति में सहायता पहुँचानेवाली तत्तद् रोगनाशक जो अन्य औषधि अर्थात् दूध, क्वाथ, कल्क, घृत आदि पान ( सेवन ) की जाती है उसे “अनुपान” कहते हैं । चिकित्सक को चाहिये कि वह सदा ऐसे सहपान तथा अनुपान की कल्पना करें जिससे औषधि की रोगनाशक शक्ति अवश्य गुणकारक हो जाय। यदि औषधि के साथ मिला कर दिया जानेवाला सहपान द्रव्य तथा अनुपान द्रव्य किसी तरह मिलना सम्भव न हो तो औषधि को जल अथवा मधु के साथ ही सेवन कराया जा सकता है ॥ २००-२०२ ॥ अथ रससिन्दूरस्य आमयिकः प्रयोगः जातपुष्पतुलसीदलद्रवैः शृंगवेरजरसेन वा सदा । नागिनीस्वरसकेन वा भिषक योजयेद्रसमिमं नवज्वरे॥२०३॥ छिन्नोद्भवापर्पटधान्यकानां क्वाथेन तुर्यांशसमाहितेन । कान्ताललाटाभरणं रसेशं जीर्णज्वरे वैद्यवरः प्रदद्यात् ॥ २०४॥