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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

षष्ठस्तरङ्गः १४३ द्रुतमङ्गेषु सर्पन्ति सहपानं तदुच्यते ॥ १६६॥ प्रसङ्गात् सहपानानुपानलक्षणम्—सर्पन्ति व्याप्नुवन्ति। सहपानं यथा मधु- प्रभृति ॥१६६॥ भा.टी.—औषधि सेवन करते समय औषधि में मिलाये जानेवाले जिस जिस द्रव्य के योग से औषधि परमाणु (सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण) विभक्त होकर शरीर में व्याप्त हो जाते हैं उस औषधि के साथ मिलाकर लिये जानेवाले द्रव्य को "सहपान" कहा जाता है ॥ १६६ ॥ अथ अनुपानस्य लक्षणम् तत्तद्रोगघ्नभैषज्यं भेषजस्यानुपीयते । यच्च साहाय्यकारि स्यादनुपानं तदुच्यते ॥ २०० ॥ सहपानानुपानाभ्यां भेषजं परिबृंहयेत् । येन रोगहरा शक्तिर्भवेद् गुणवती सदा ॥ २०१ ॥ अलाभेऽत्यर्थमेवात्र सहपानानुपानयोः । मधुना वा जलेनैव भेषज्यं वितरेद् भिषक् ॥२०२॥ भेषजस्य अनु पश्चात् , साहाय्यकारि इति भेषजस्यैव । अत्यर्थे यथाशक्ति यत्ने कृतेऽपि चेदलाभः सहपानानुपानयोस्तर्हि मधुना जलेनैव वा भैषज्यं वित- रेत् ॥ २००-२०२ ॥ भा.टी.—सहपान युक्त औषधि सेवन करने पर इसके बाद जो औषधि शक्ति में सहायता पहुँचानेवाली तत्तद् रोगनाशक जो अन्य औषधि अर्थात् दूध, क्वाथ, कल्क, घृत आदि पान ( सेवन ) की जाती है उसे “अनुपान” कहते हैं । चिकित्सक को चाहिये कि वह सदा ऐसे सहपान तथा अनुपान की कल्पना करें जिससे औषधि की रोगनाशक शक्ति अवश्य गुणकारक हो जाय। यदि औषधि के साथ मिला कर दिया जानेवाला सहपान द्रव्य तथा अनुपान द्रव्य किसी तरह मिलना सम्भव न हो तो औषधि को जल अथवा मधु के साथ ही सेवन कराया जा सकता है ॥ २००-२०२ ॥ अथ रससिन्दूरस्य आमयिकः प्रयोगः जातपुष्पतुलसीदलद्रवैः शृंगवेरजरसेन वा सदा । नागिनीस्वरसकेन वा भिषक योजयेद्रसमिमं नवज्वरे॥२०३॥ छिन्नोद्भवापर्पटधान्यकानां क्वाथेन तुर्यांशसमाहितेन । कान्ताललाटाभरणं रसेशं जीर्णज्वरे वैद्यवरः प्रदद्यात् ॥ २०४॥

१४४ रसतरंगिणी मेहे गुडूचीस्वरसेन दद्यात् योषित्प्रियामूलजतोयकैर्वा । असृग्दरेऽशोकबलादिकानां क्वाथेन सिन्दूररसः प्रयोज्यः ॥२०५॥ बालाभयायाः क्वाथेन बुधोऽर्शसि नियोजयेत् । वचारसेन तच्चूर्णं वापस्मारे प्रयुज्यते ॥ २०६ ॥ कूष्माण्डस्वरसेनेह दद्यादुन्मादसंज्ञके । श्वासे विभीतकक्वाथैर्वासायाः स्वरसेन वा ॥२०७॥ कामलायां बुधो दद्यात् दार्वीक्वाथेन संयुक्तम् । पांडुरोगे प्रयुञ्जीत रसज्ञो लोहभस्मना ॥२०८॥ सितोपला च सूक्ष्मैला शिलाजञ्च समं समम् । एतत्त्रितयचूर्णेन मूत्रकृच्छ्रकुलान्तकः ॥२०९॥ अजीर्णे मधुना वापि मुस्तकक्वाथजैर्द्रवैः । शूले वैद्यवरो दद्यात् त्रिफलाक्वाथसंयुक्तम् ॥२१०॥ कणाचूर्णयुतः सूतः प्रदद्यात् रक्तिकोन्मितः । सेवितो नाशयेन्मूर्च्छां पथ्यं तोयावगाहनम् ॥२११॥ वमने बृहदेलायाः क्वाथेन मधुनापि वा । शोथे पुनर्नवायास्तु कषायेण प्रयोजयेत् ॥२१२॥ गुडूचीनिम्बखदिरपुरुहूतफलद्रवैः । क्वाथैर्वा संयुतश्चन्द्रचातुर्जातकमिश्रितः ॥२१३॥ रससिन्दूरसंज्ञोऽयं प्रयुक्तो रक्तिकोन्मितः । विस्फोटं दारुणं हन्याद्यथा सूर्यस्तमस्ततिम् ॥२१४॥ काकोली चूर्णसंयुक्तं नारिकेलोत्थतैलयुग् । सेवितं रससिन्दूरं हरेद्रोगं जरायुजम् ॥२१५॥ मृतवंगसमायुक्तो रसः सिन्दूरसंज्ञकः । क्षौद्रेण भक्षितो हन्ति प्रमेहं त्वतिकालजम् ॥२१६॥ सक्षौद्रैस्त्र्यूषणोपेतैर्धान्यजीरकनागरैः । सेवितो रससिन्दूरो वान्तिं जयति दारुणाम् ॥२१७॥ ब्राह्मीवचाशङ्खपुष्पीकुष्ठैलाक्वाथसंयुक्तम् । रक्तिकाद्वितयं खादेदपस्मारहरं परम् ॥२१८॥ धात्रीवयस्याकलिपादपानां क्वाथेन वा जन्तुरिपोः समेतः । नित्यं तु सिन्दूररसो रसज्ञैः भगन्दरेऽयं विनियोजनीयः॥२१९॥

१० षष्ठस्तरङ्गः १४५

मिशिबालाभयाक्वाथैर्यवानीचूर्णेकेन वा। बिडाख्यलवणेनैव गुल्मे वा विनियोजयेत् ॥२२०॥ क्वाथेन दशमूलस्य शिरःशूले प्रयोजयेत्। व्रणेषु बृहतीनीरगुडूचीविश्वभेषजैः ॥२२१॥ गुडूचिकाशतावरीकणारसाभयान्वितैः। वचाब्दविश्वभेषजैः कषायकं प्रकल्पयेत् ॥२२२॥ रसोऽत्र तेन संयुतो यथाविधि प्रयोजितः। निहन्ति वै चिरोत्थितं प्रकाममामवातकम् ॥२२३॥ शाल्मलीमूलचूर्णेन विदार्यादिगणेन वा। प्रयुक्तो रससिन्दूरो वाजीकरण उत्तमः ॥२२४॥ भस्मना गगनस्येह काञ्चनेन मृतेन वा। उभाभ्यामेव वा युक्तो धातुवृद्धिकरो मतः ॥२२५॥ जातीफलं देवपुष्पं कर्पूरञ्चाहिफेनकम्। एषां चूर्णेन सहितो श्वप्रमेहहरो मतः ॥२२६॥ बलाक्वथिततोयेन सिन्दूररससेवनात्। विनश्यति चिरोद्भूतं शीर्षकम्पनमुद्धतम् ॥२२७॥ जरणत्र्यूषणक्षुद्रापथ्याधानेयकैः समम्। निषेवितोऽयं सिन्दूरो वान्तिशान्तिकरो मतः ॥२२८॥ हिङ्गुदीप्यकशुण्ठीभिश्चव्यधान्याकरुच्यकैः। प्रयुक्तो रससिन्दूरो द्रुतं पानात्ययं जयेत् ॥२२९॥ चव्यटंकणसंयुक्तः शीलितोदिनसप्तकम्। रसः सिन्दूरसंज्ञोऽयं पक्तिशूलं विनाशयेत् ॥२३०॥ वासाकषायसहितो लोध्रक्वाथान्वितोऽथवा। शीलितो रससिन्दूरो रक्तप्रदरमुद्धरेत् ॥२३१॥ वराक्वाथेन वा गेहनीरेण सहसैन्धवम्। शीलितो रससिन्दूरो बस्तिकुण्डलमुद्धरेत् ॥२३२॥ नवज्वरे प्रतिश्याये शिशूनां सुरसारसैः। कासे श्वासे च वितरेत् कण्टकारीरसेन च ॥२३३॥ परिच्छेदो न विज्ञेयः सहपानानुपानयोः। प्रकल्पयेद् यथारोगं सिद्धहस्तो भिषग्वरः ॥२३४॥

१४६ रसतरङ्गिणी अथ प्रसङ्गात् रोगयोग्यः प्रयोगोऽस्य वर्ण्यते जातपुष्पेति—पुष्पितवृक्षस्य पत्राणामपूर्णवीर्यत्वात् जातपुष्पायाः तुलस्याः पत्ररसो ग्राह्यः, नागिनी ताम्बू- लवल्ली। छिन्नोद्भवा गुडूची, कान्ताललाटाभरणां रससिन्दूरम्। योषित्प्रिया हरिद्रा। बालाभया क्षुद्रहरीतकी । दार्वी दारुहरिद्रा । शिलाजं शिलाजतु । पुरूहूतफल इन्द्रयवः । चन्द्रः कर्पूरम्, चातुर्जातकं त्वगेलापत्रकेसरम् । तमस्ततिमन्धकारपट- लानि । वयस्या हरीतकी, कालिपादपः विभीतकः, जन्तुरिपुः विडङ्गः । मिशिः शतपुष्पा । नीरं बालकम् । रसा रास्ना। अब्दं मुस्ता। गुडूच्यादीनां मिश्रितानां मानं २ तो०, जलं ३२ तो०, शेषः क्वाथः ८ तो० इति परिभाषा। विदार्या- दिगणः सुश्रुतनिर्दिष्टः । गगनं अभ्रकम् । देवपुष्पं लवङ्गम् । जरणां जीरकम्, धान्येकं धान्याकम् । दीप्यकं यवानी, रुच्यकं सौवर्चलम् । पानात्ययं मदात्य- यम् । यव्यः यवक्षारः, पक्तिशूलं परिणामशूलम् । गेहनीरं काञ्जिकम् । वस्ति- कुण्डलं तदाख्यं मूत्राशयरोगम् । सुरसा तुलसी । उपलक्षणमात्रञ्चैतत्, वस्तु- तस्तु सहानुपानयोर्नास्ति नियमः, किन्तु यथारोगं देशकालव्यवस्थानुसारं सिद्ध- हस्तः क्रियाकुशलो वैद्यः कल्पयेदनुपानसहपाने ॥ २०३-२३४ ॥ भा.टी.—नव ज्वर में रससिन्दूर को योग्य मात्रा में लेकर फूलवाली तुलसी के पत्ररस के साथ अथवा अदरखरस के साथ अथवा पान के स्वरस के साथ प्रयोग करना चाहिये । जीर्ण ज्वर में रससिन्दूर का प्रयोग करना हो तो गिलोय, पितपापड़ा तथा धनिया इसके चतुर्थांश अवशेष क्वाथ के साथ देना चाहिये। प्रमेह में रससिन्दूर को गिलोय के स्वरस अथवा कच्ची ताजी हल्दी के स्वरस के साथ देना चाहिये । प्रदर रोग में इसको अशोक, खरेंटी, लोध्र आदि ग्राही और शोथहर द्रव्यों के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । अर्श रोग में इसको छोटी हरड़ के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । अपस्मार में रससिन्दूर को वचचूर्ण के साथ सेवन करना चाहिये । उन्माद रोग में इसे पेठे के स्वरस ( जल ) के साथ प्रयोग करना चाहिये । श्वास रोग में बहेड़ाक्वाथ अथवा वासा ( अडूसा ) स्वरस के साथ रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । कामला रोग में रससिन्दूर को दारुहल्दी क्वाथ के साथ और पाण्डुरोग में इसे लौहभस्म के साथ सेवन करना चाहिये । विविध प्रकार के मूत्रकृच्छ्र रोगों में रससिन्दूर को मिश्री, छोटी इलायची-बीजचूर्ण, तथा शिलाजीत, प्रत्येक समभाग के साथ शीत दुग्धानुपान से सेवन करना चाहिये । अजीर्ण में इसको मधु के साथ और मुस्ताक्वाथ के साथ देना चाहिये । उदरशूल में इसको

षष्ठस्तरङ्गः १४७ त्रिफलाक्वाथ के साथ प्रयोग करना चाहिये । मूर्च्छा रोग में रससिन्दूर को एक रत्ती मात्रा में लेकर दो रत्ती पिप्पलीचूर्ण मिला शहद के साथ सेवन करावें और रोगी को शीत जल के टब में सर्वांग स्नान करावें । वमन अधिक होने पर इसको बड़ी इलायचीक्वाथ से अथवा मधु के साथ देना चाहिये । सर्वांग- शोथ होने पर रससिन्दूर को पुनर्नवाकषाय के साथ देना चाहिये । भयंकर विस्फोट रोग में एक रत्ती रससिन्दूर को चार रत्ती चातुर्जातकचूर्ण ( छोटी इलायचीबीज, दालचीनी, तेजपत्र तथा नागकेशर ) के साथ मिलाकर गिलोय, नीम, खैर की छाल, इन्द्रजौ के क्वाथ के अनुपान से देना चाहिये । गर्भाशय रोग में रससिन्दूर में एक माशा काकोलीचूर्ण मिला इसको नारियल के तेल के साथ सेवन कराना चाहिये । पुराने प्रमेह में इसको वंग- भस्म मिलाकर शहद के साथ कुछ काल तक सेवन करना चाहिये । भयंकर वमन को रोकने के लिए रससिन्दूर में त्रिकटुचूर्ण तथा धनिया, जीरा का चूर्ण मिला शहद के साथ थोड़ा-थोड़ा करके कई बार चटाना चाहिये । अपस्मार रोग में इसको ब्राह्मी, वच, शंखपुष्पी, कूठ, इलायचीकषाय के साथ दो रत्ती की मात्रा में सेवन करना चाहिये । भगंदर रोग के लिए इसको आँवला, हरड़ तथा बहेड़ा और वायविडंगक्वाथ के साथ कुछ काल तक निरन्तर सेवन करना चाहिये । गुल्म में इसका सौंफ और छोटी हरड़ के क्वाथ के साथ अथवा अज- वाइन चूर्ण या विडलवण के साथ प्रयोग करना चाहिये । वात कफात्मक पुरातन शिरःशूल रोग में इसको दशमूलकषाय के साथ देना चाहिये । पुरा- तन व्रणों में इसका कण्टकारी, सुगन्धबाला, गिलोय तथा सोंठ के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । पुरातन आमवात ( गठिया ) में रससिन्दूर को गुडूची, मोथा, शतावर, पिप्पली, हरड़, वच तथा सोंठ के कषाय के साथ दिन में दो बार प्रयोग करना चाहिये । कामशक्ति ( वाजीकरण ) को बढ़ाने के लिए सेमल की कोंपल, मूसलीचूर्ण अथवा सुश्रुतोक्त विदार्यादिगण के औष- धिचूर्ण के साथ दुग्धानुपान से सेवन करना चाहिये । धातुवृद्धि के लिए इसका अभ्रकभस्म अथवा स्वर्णभस्म दोनों के साथ प्रयोग करना चाहिये । स्वप्न-मेह ( स्वप्नदोष Night Discharge ) को दूर करने के लिए इसमें जायफल, लौंग, कपूर तथा अफीम का चूर्ण मिलाकर जल अथवा शीतल- चीनी के कषाय अनुपान से सेवन करना चाहिये । चिरकालीन शिरःकम्प ( सिर काँपना ) रोग में रससिन्दूर को बलाकषाय के साथ कुछ दिन सेवन कराने से लाभ होता है । वमन को रोकने के लिए जीरा, त्रिकटु ( सोंठ,

१४८ रस्तरङ्गिणी मिर्च, पीपल ), छोटी कटैली, हरड़ और धनिया इसके समभाग चूर्ण के साथ रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । मदात्यय रोग में हींग, अजवाइन, सौंठ, चव्य, धनिया और सौंचलनमक चूर्ण के साथ रससिन्दूर का सेवन करना चाहिये । परिणाम शूल रोग में रससिन्दूर को जवाखार और सुहागा मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । रक्तप्रदर में इसको प्रतिदिन दो बार वासाक्वाथ अथवा लोध्रकषाय के साथ प्रयोग करने से आराम आता है । मूत्राशय के बस्ति-कुण्डल रोग में रससिन्दूर को त्रिफलाक्वाथ अथवा काञ्जी के साथ सेवन कराना चाहिये और क्वाथ और काञ्जी में सैन्धानमक मिलाकर पिलाना चाहिये । बालकों के नव ज्वर और प्रतिश्याय ( जुकाम ) में इसको तुलसीपत्र स्वरस के साथ प्रयोग करना चाहिये । बच्चों के श्वास-कास में इसे छोटी कटैली के स्वरस के साथ देना चाहिये । यहाँ पर भिन्न रोगों पर रससिन्दूर का प्रयोग करने के लिए यद्यपि अनेक प्रकार के अनुपान तथा सहपानों का उल्लेख किया गया है । किन्तु सहपान तथा अनुपान का कोई नियम न होने से उसी सह- पान अनुपान को देश काल की अवस्थानुसार दूसरे रोग में दे सकते हैं । यह सहपान तथा अनुपान की कल्पना चिकित्साकुशल वैद्य के ऊपर निर्भर होती है अर्थात् वैद्य अपनी बुद्धि से इनके स्थान पर दूसरे सहपान-अनुपान कल्पित कर सकता है अथवा इन्हींको उल्लिखित रोगों में प्रयोग कर सकता है॥२०३-२३४॥ अथ रससिन्दूरस्य मात्रा एकहायनदेशीयं बालकं वीक्ष्य रोगिणम् । गुञ्जायाः षोडशो भागस्तत्र मात्रा प्रकल्प्यते ॥२३५॥ तथा द्विवर्षदेशीये सप्तमो भाग इष्यते । रसहायनदेशीये तृतीयं भागमाहरेत् ॥२३६॥ द्वादशाब्दजदेशीये गुञ्जार्द्धं परिकल्पयेत् । गुञ्जामात्रािमता चास्य पूर्णमात्रा प्रशस्यते ॥२३७॥ अथास्य मात्रानिरूपणम्—एकहायनदेशीयमिति प्रकारे देशीयर् प्रत्ययः । एकवर्षकल्पमित्यर्थः । रसहायनदेशीये षड्वर्षवयस्के, अस्य च तरुणपुरुषयोग्या पूर्णमात्रा गुंजैकमिति ॥ २३५-२३७ ॥ भा.टी.—एक वर्ष की आयुवाले रोगी बालक के लिए रससिन्दूर की मात्रा रत्ती का सोलहवाँ भाग निश्चित करना चाहिये । दो वर्ष के बालक के लिए रत्ती का सातवाँ भाग समझना चाहिये । ६ वर्ष की आयुवाले बालक की रससिन्दूर मात्रा रत्ती का तीसरा भाग समझना चाहिये । बारह वर्ष

की आयु के बालक को रससिन्दूर आधी रत्ती की मात्रा में देना चाहिये । अधिक आयुवाले मनुष्यों के लिए इसकी पूर्ण मात्रा एक रत्ती की समझनी चाहिये ॥ २३५-२३७ ॥ मकरध्वजस्य निर्माणप्रकारः स्वर्णं तोलकसंमितं मृदुदलं युक्त्या विशुद्धीकृतं स्वर्णादष्टगुणोन्मितं रसवरं जीर्णाच्छसौगन्धिकम् । संस्कारैर्बहुभिर्विशोधितमथो सम्मेल्य सम्पेषयेत् गन्धं षोडशतोलकं सुविमलं कुर्यात्ततः कज्जलीम् ॥२३८॥ शोणैः कार्पासपुष्पैरथ मृदुविशदाङ्कोटमूलत्वचाद्भिः कन्यानीरैश्च घस्रं रसविधिचतुरो भावयेदामयज्ञः । सम्यक्पिष्टं सुशुष्कं त्वपि च रसवरं काचकूप्यां निदध्याद् बिल्वादीनाञ्च काष्ठैः सलिलविरहितैस्तापयेच्चाथ विद्वान् ॥२३६ पूर्वं यामद्वयं प्राज्ञः पचेन्मृद्वग्निना रसम् । मध्यमानलयोगाच्च ततो यामद्वयं पचेत् ॥२४०॥ प्रखरेणानलेनाथ पचेद्यामद्वयं भिषक् । अवशिष्टद्वियामञ्च पुनस्तीव्राग्निना पचेत् ॥२४१॥ यन्त्रे सिकतसंज्ञे च स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् । काचकूपीं विभिद्याथ सहकारसमप्रभम् ॥२४२॥ भङ्गेरक्तप्रतीकाशं पिष्टे रक्तोत्पलोपमम् । सौवर्णं मूर्च्छितं सूतं गृह्णीयाद्भिषजां वरः ॥२४३॥ नानेन जायते यस्मान्मकरध्वजसन्निभः । रसज्ञैः ख्यापितस्तस्मान्नाम्नायं मकरध्वजः ॥२४४॥ अथ मकरध्वजनिर्माणप्रकारः । स्वर्णमिति—मृदुदलं अत्यन्तमृदुदलमिति भावः । यथा पारदे सम्यङ्मेलनं स्यात् तथा पक्वं सत् स्थूलकणं नावशिष्यते इत्यभिप्रायः । युक्त्या शोधनं स्वर्णप्रकरणे वक्ष्यते । जीर्णाच्छसौगन्धिकं कच्छप- यन्त्रादिना जातगन्धकजारणम् । संस्कारैर्बहुभिः पूर्वोक्तैरष्टाभिरधिकैर्वा यथा- सम्प्रदायम् । शोणैः रक्तैः, घस्रम् दिवसमेकम् । बिल्वादीनाञ्च काष्ठैरिति विल्वादिकाष्ठग्रहणं समुचितापादनाय सलिलविरहितैरिति सुशुष्कैः, अवशिष्ट- द्वियामं पाकस्तीव्रानलेन, जीर्णगन्धकाचकूपीमुखमुद्रणोत्तरमिति द्योत्यते पुनः शब्देन । सिकतायन्त्रं बालुकायन्त्रं पूर्वोक्तम् । इदञ्च बहिर्धूमजारणप्रकारा- भिप्रायेण अन्तर्धूमजारणायै तु बालुकायन्त्रप्रकारान्तरं पूर्वमवोचाम । अधःसैकत-

१५० रस्तरङ्गिणी यन्त्रेण तलस्थरससिन्दूरोक्तविधिनापि मकरध्वजः साध्यते। षड्गुणबलिजारणार्थं षड् वारं सप्तवारं वा पाकः कार्यः। प्रतिपुटं गन्धकः सम एव देयः। षड्वारं पुटनेन यदि सम्यक् पाको न स्यात्तदा सप्तमे पाके गन्धकमदत्त्वैव मृदुः पुटो देयः। गन्धकोऽत्र सर्पिर्गन्धिरपि न स्यात्। अनेन विधिना सम्पादितो मकरध्वजः सुवर्णगर्भो भवति। "सहकारसमप्रभं भङ्गे रक्तप्रतीकाशं पिष्टे रक्तोत्पलोपमं सौवर्णं मूर्च्छितं सूतम्" इति तस्य लक्षणं ज्ञेयम्। सहकारः आम्रः। मूर्च्छितमिति रसस्य बन्धभेदः, पूर्वोक्तलक्षणः ना अनेन इति छेदः। ना पुरुषः मकरध्वज- सन्निभः कामदेवसुल्यसुन्दरः इति निरुक्तिः। स्पष्टमन्यत्॥ २३८–२४४॥ भा.टी.—आगे लिखी हुई सुवर्णशोधन विधि के अनुसार शोधित स्वर्ण के सूक्ष्म कंटकवेधी पत्र एक तोला, और अष्टसंस्कारों से शोधित तथा गन्ध- जारित शुद्ध पारद आठ तोला लेकर इन दोनों को दृढ़ चिकने पाषाण खरल में डालकर खूब मर्दन करें। जब सोना पारे में मिल जाय तो इसमें सोलह तोला शुद्ध गन्धक मिलाकर इसकी कज्जली बना लें। इस कज्जली को लाल कपास के पुष्पस्वरस, कोमल अंकोला वृक्ष की मूलस्वरस, तथा कुमारीस्वरस में एक या दो दिन तक मर्दन करके भावना दें। अब कज्जली को अच्छी तरह सुखाकर सात कपड़मिट्टी की हुई एक दृढ़ काँच की शीशी में भरदें और वालुकायन्त्र में रखकर चूल्हे में बेल, खदिर, बेर आदि की सूखी लकड़ी की अग्नि देकर पकायें। सर्वप्रथम दोपहर तक मृदु अग्नि द्वारा पाक करें, फिर छः घंटे मध्यम अग्नि द्वारा पकावें, इसके बाद फिर ६ घंटे तीव्र अग्नि से पकायें। जब गन्धक का रोचनावर्ण धुआँ निकलना बन्द हो जाय तब शीशी के मुख में डाट लगाकर चूने और गुड़ से इसको बन्द करदें, फिर चूल्हे में ६ घंटे तक तीव्र अग्नि देवें। बाद जब वालुकायन्त्र में ही शीशी स्वतःशीत हो जाय तो शीशी को निकाल तोड़कर भीतर से तोड़ने में रक्त वर्ण और पीसकर देखने में रक्त कमल के वर्ण सदृश मकरध्वज को निकाल लें और शीशी के तल- प्रदेश में स्वर्णभस्म होगी उसे भी निकाल लें। क्योंकि इस औषधि के सेवन से ही मनुष्य कामदेव के समान सुन्दर शरीरवाला हो जाता है। अतः रस- शास्त्रज्ञों नें इसका मकरध्वज नाम दे दिया है॥ २३८–२४४॥ वक्तव्य—मकरध्वज की यह बहिर्धूमविधि है, इसमें स्वर्ण मकरध्वज से पृथक् कूपी तलप्रदेश में पाया जाता है जो देखने में भस्म हुआ सा रहता है, परन्तु शुद्ध रूप से भस्मीभूत नहीं होता। अतः इसको पुनः शुद्धरूप से भस्म करने के लिए पारद गन्धक की कजली के साथ पाँच-सात पुट (लघु) देकर

ठीक भस्म कर लेना चाहिये । यदि मकरध्वज को अन्तर्धूम विधि से बनाया जाय तो इसमें स्वर्ण पृथक् न होकर मिश्रित रूप में ही होता है । यही अन्तर्धूम पाचित मकरध्वज वास्तव में गुणकारी होता है। यदि मकरध्वज को षड्गुण बलि- जारित बनाना हो तो इसे उक्तविधि से तीन या चार बार पकाना चाहिये । कई वैद्य पारद के समभाग शुद्ध गन्धक डालकर ६ बार पाक करते हैं और शीशी के तल प्रदेश में बची हुई स्वर्ण-भस्म को भी प्रत्येक बार मिला देते हैं । परन्तु अन्तर्धूम विधि से बनाने पर स्वर्ण प्रथम अथवा दूसरे पाक में ही मकरध्वज के साथ मिल जाता है और बहिर्धूम मकरध्वज की अपेक्षा कई गुणा अधिक शक्तिशाली होता है । अन्तर्धूम विधि के लिए अधोवालुकायन्त्र का वर्णन पहिले ही किया जा चुका है । अन्तर्धूमविधि शास्त्रों में पाई जाती है, किन्तु आज तक किसीने बनाया है ऐसा सुनने में नहीं आया । श्रीसिद्धमकरध्वजः पूर्वोक्तनिजमानाच्च कनकं चैच्चतुर्गुणम् । निर्दिष्टमानप्रमितौ भवतो रसगन्धकौ ॥२४५॥ पूर्ववद्भावयित्वापि पचेत्सिकतयन्त्रके । एवन्तु षड्गुणं गन्धं जारयेत्क्रमशो भिषक् ॥२४६॥ समर्पितो यतश्चायं सिद्धेभ्यः शूलपाणिना । ख्यातस्ततोऽयं जगति श्रीसिद्धमकरध्वजः ॥ २४७ ॥ अथ श्रीसिद्धमकरध्वजनिर्माणप्रकारः । पूर्वोक्तेति—पूर्वोक्तं स्वर्णपरिमाणं स्वर्णतोलकसम्मितमिति तस्माच्चतुर्गुणम् । अर्थात् स्वर्णं ४ तोलाः, पारदन्तु ८ तोलाः, गन्धकः १६ तोलाः, पूर्ववद् भावनं पाचनाञ्च । एवं षड्गुणगन्ध- कस्य ४८ तोलामितस्य जारणेन निष्पन्नो मकरध्वजः श्रीसिद्धमकरध्वजनाम्ना व्यवह्रियते । मकरध्वजगुणवर्णनं स्पष्टम् ॥ २४५–२४७ ॥ भा.टी.—यदि पूर्वोक्त मकरध्वज के निर्माणकाल में स्वर्ण एक तोले के स्थान पर चार तोला डाल दिया जाय, पारद आठ तोला तथा गन्धक सोलह तोला ही रहे, इसके सिवाय अन्य क्रियायें सब मकरध्वज के समान ही की जाँय, अर्थात् कपासपुष्परस आदि भावना, वालुकायन्त्र में पाक करते हुए मृदु, मध्य तथा तीव्र अग्नि प्रयोगादि सब पूर्ववत् करते हुए पारद में ६ गुणा गन्धक जारण क्रमशः किया जाय तो इसे सिद्धमकरध्वज कहा जाता है ।

१९२ रसतरङ्गिणी सर्वप्रथम शूलपाणि ( शिव ) ने इस रस को बनाकर सिद्धों को सेवन कराया था, अतः इसे सिद्धमकरध्वज संज्ञा दी गयी है ॥ २४५-२४७ ॥ अथास्य गुणाः क्षयक्षयकरः परं प्रबलकासकालानलः प्रमेहकुलमण्डनः प्रविततान्त्रशोषान्तकः समस्तगदभञ्जनः प्रमदकामिनीरञ्जनः सदैव मकरध्वजो विजयते रसाधीश्वरः ॥ २४८ ॥ भा.टी.-यह सिद्धमकरध्वजरस क्षयरोग को नष्ट करता है । भयंकर दुःखदायी कास को मिटाता है-। सम्पूर्ण प्रमेह रोगों को दूर करता है । आँतों में होनेवाले शोष ( क्षय ) रोग को मिटा देता है । साधारणतः यह सभी रोगों को नष्ट करनेवाला और यौवनमस्त स्त्री को रमण क्रिया से प्रसन्न करनेवाला गुण रखता है ॥ २४८ ॥ अथ सर्वाङ्गसुन्दरो रसः रसेश्वरः पलमितो गन्धकश्चापि तन्मितः । भूधात्रिकाहस्तिशुण्डीद्रवेणाथ निरन्तरम् ॥२४९॥ रसतन्त्रविशेषज्ञः पेषयेद्दिनसप्तकम् । संस्थाप्य संपुटे सूतं वालुकायन्त्रगं भृशम् ॥२५०॥ मन्दानलेन सुपचेदहोरात्रं भिषग्वरः । जाते पाके स्वाङ्गशीतं सम्पुटं त्ववतारयेत् ॥२५१॥ सम्पुटान्तश्च संलग्नं पीतं भस्म समुद्धरेत् । पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं नाम्ना सर्वाङ्गसुन्दरः ॥२५२॥ अथ सर्वाङ्गसुन्दरः (पीतभस्माख्यः)—भूधात्रिका तामलकी । स्पष्टमन्यत् । मात्रादिकं रससिन्दूरवत् ॥ २४९–२५२ ॥ भा.टी.-शुद्ध पारद एक पल ( आठ तोला ), शुद्ध गन्धक एक पल ( आठ तोला ) इन दोनों की कज्जली बनाकर इसको सात दिन तक भुई, आँवला और हस्तिशुण्डी के स्वरस से निरन्तर मर्दन करके सुखा लें और एक दृढ़ संपुट में बन्द करके अच्छी तरह सन्धिलेपकर सुखा लें । अब इस सम्पुट को वालुकायन्त्र में रखकर चौबीस घण्टे तक मन्द-मन्द अग्नि से पकावें।

जब पाक हो जाय तब स्वतः शीत सम्पुट के भीतर लगी हुई पीत वर्ण भस्म को निकालकर रख लें । इसको पूर्वाचार्य लोग सर्वांगसुन्दर रस या पीतभस्म कहते हैं ॥ २४६-२५२ ॥ अथास्य गुणाः हृदयप्रीतिजननो जठरामयनाशनः । बलवर्णप्रदाता च ज्वरद्विरदकेशरी ॥२५३॥ वातव्याधिहरश्चैष जाठराग्निप्रदीपनः । शूलद्विपाङ्कुशः शीघ्र प्रकामं कामवर्द्धनः ॥२५४॥ सहपानादिकञ्चास्य यथारोगं भिषग्वरः । रससिन्दूरवन्नित्यं वीक्ष्य दोषं प्रकल्पयेत् ॥२५५॥ इति मूर्च्छनाविज्ञानीयो नाम षष्ठस्तरङ्गः भा.टी.—यह सर्वाङ्गसुन्दर रस सेवन करने पर हृदय में अत्यन्त प्रसन्नता उत्पन्न करता है । उदय रोग अथवा अतीसार को नष्ट करता है । शरीर में बल तथा वर्ण को बढ़ाता है । ज्वर रूपी हाथी के लिए सिंह समान घातक है। सब प्रकार की वात व्याधियों को मिटाता है और पाचनशक्ति को प्रबल करता है । शूल रूपी हाथी के लिए अंकुश के समान नियामक है । कुछ काल तक नियमपूर्वक सेवन करने से शरीर में कामशक्ति को बढ़ाता है । इस रस के प्रयोग में शारीरिक दोषों का अच्छी तरह निर्णय करके रोगानुसार रससिन्दूर की भाँति सहपान तथा अनुपान की कल्पना करनी चाहिये ॥ २५३-२५५ ॥ इति मूर्च्छनाविज्ञानीय नाम षष्ठतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ पारदमारणविज्ञानीयः सप्तमस्तरङ्गः सामान्येन मारणस्य लक्षणम् विविधक्रमयोगेन गन्धकाद्यौषधैः सह । रसादीनाञ्च धातूनां रोगापनयनक्षमम् ॥१॥ गन्धकादियुतं वापि यदम्बरसुधान्वितम् । भस्मतापादनं यत्त मारणं तदिहोच्यते ॥ २ ॥ तत्रादौ मारणलक्षणं पूर्वाचार्य्यैरनिर्दिष्टप्रायं नव्यपरिभाषामम्मतमाह । विवि- धेति—विविधक्रमाः प्रकारभेदेन तत्र तत्रोक्ताः, रोगापनयनक्षमं सूक्ष्मतापत्त्या शरीरावयवव्याप्तिद्वारा तत्तद्व्याधिघातसमर्थम् । गन्धकाद्यौषधैरित्यादिना रसभ-

स्मादीनामपि ग्रहणम्। तथापि—"मारणं सर्वलोहानामुत्तमं रसभस्मना। मध्यमं मूलिभिः प्रोक्तमधमं गन्धकादिभिः॥" अम्बरसुधां विष्णुपदामृतं “औक्सीजन” इत्याख्यम् ॥ १–२ ॥ भा.टी.—पारद, अभ्रक, वैक्रान्त, हीरा आदि रस महारसों तथा स्वर्ण, रजत, ताम्र आदि धातुओं में गन्धक आदि द्रव्यों का मिश्रण करके विभिन्न प्रकार से पुटपाक आदि द्वारा उसके स्थूल कणों को सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में विभक्त करते हुए रोगनाशक शक्ति उत्पन्न करते हुए इसे भस्म कर लेना, अथवा पारद आदि द्रव्यों को गन्धक आदि द्रव्यों के साथ मिला उनका ओषजनीकरण (Oxidation) करके भस्म कर लेना मारण शब्द से कहा जाता है ॥१–२॥ अथ मृतपारदस्य लक्षणम् निर्धूमस्तेजसा हीनो गौरवेण समन्वितः। अङ्गारस्थापितो यश्च न प्रयाति विरूपताम् ॥ ३ ॥ न च लाघवमायाति चापल्यं विजहाति च। आधिव्याधिहरो यश्च मृतः सूतः स उच्यते ॥४॥ अथ मृतपारदलक्षणं निर्धूम इति—तेजसा हीनः चाकचक्यरहितः॥३-४॥ भा.टी.—जो पारदभस्म अग्नि में डालने पर धुआँ न देती हो, जिसमें चमक न हो, भार में गौरवयुक्त, जलते हुए कोयलों पर डालने से उसमें कोई परिवर्तन न आये, भस्म होने पर अपने पूरे तौल में हो और जिसमें चपलता न हो, और जिसमें उपयोग करने पर शारीरिक तथा मानसिक रोगनाशक शक्ति पूर्ण रूप से आ गयी हो उसे योग्य भस्म अथवा मृतपारद कहते हैं ॥३-४॥ अथ पारदमारणस्य प्रथमः प्रकारः सूतः पलद्वयमितः सुतरां विशुद्धः स्याद्गन्धकश्च विशदः पलसम्मितोऽत्र । द्रावेण मारकगणोक्तमहौषधानां सम्पेषयेद्दिवसमेकमिहामयज्ञः ॥ ५ ॥ मूषापुटे रसवरं विनिधाय युक्त्या सन्धिं विलिप्य खलु वह्निमृदा च कामम्। मूषां निधाय विपचेत् खलु भूधराख्ये यन्त्रे रसोऽथ नियतं मृतिमेति शीघ्रम् ॥६॥

सप्तमस्तरङ्गः १५५ अथ मारणप्रकारः—प्रथमः—सुतरां अत्यर्थम् , मारकगणो वक्ष्यमाणः । द्रवेण स्वरसेन क्वाथेन वा नियतं अवश्यम् ॥ ५-६ ॥ भा. टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ पारद दो पल और शुद्ध गंधक एक पल परिमाण में लेकर इनकी कज्जली करके इस कज्जली को आगे लिखे जानेवाले पारदमारकगण की औषधियों के रस से एक दिन अच्छी तरह मर्दन करें और सुखाकर मूषापुट में बन्द करके इस पुट की सन्धि को युक्ति- पूर्वक पूर्वकथित वह्नि-मृत्तिका से बन्द करके सुखा लें । अब इस मूषा को भूधरयंत्र में बंद करके पुट देवें तो शीघ्र ही इसकी भस्म हो जाती है ॥५–६॥ वक्तव्य—यदि मारकगण की औषधियों का स्वरस प्राप्त न हो सके तो उनका क्वाथ ले लेना चाहिये । इस प्रकार से बनी हुई पारदभस्म में यद्यपि मृतपारद के लक्षण पूर्ण रूप से नहीं मिलते हैं, फिर भी यह अत्यन्त उपयोगी औषधि बन जाती है । अथ वह्निमृत्स्नालक्षणम् खटी लवणकिट्टाढ्या महिषीदुग्धमर्दिता । वह्नितापसहात्यन्तं वह्निमृत्स्ना प्रकीर्तिता ॥ ७ ॥ मूषादीनां सन्धिलेपे वह्निमृत्स्ना प्रशस्यते । नागन्तुं क्षमते सूतो निरुद्धो वह्निमृत्स्नया ॥ ८ ॥ वह्निमृत्स्नालक्षणं खटीति । खटी—तदाख्या गौरमृत्स्ना, लवणं सैन्धवं, किट्टं मण्डूरम् । मर्दनं श्लक्ष्णतापर्यन्तम् । शिष्टं सुगमम् ॥ ७-८ ॥ भा.टी.—गौर वर्ण की खड़िया मिट्टी में समभाग सैन्धानमक, मण्डूर मिला भैंस के दूध से मर्दन करके रख लें । इसी को वह्निमृत्स्ना या वह्निमृत्तिका कहा जाता है । इस प्रकार बनाई हुई मिट्टी अत्यन्त तीव्र अग्नि को सहन कर सकती है । मूषा, पुट आदि के सन्धिलेप के लिए यह वह्निमृत्स्ना अत्यन्त उपयोगी है । इसके द्वारा बन्द किये हुए मूषा या संपुटों से पारद उड़कर बाहर नहीं निकल सकता है ॥ ७-८ ॥ अथ पारदस्य मारको गणः विष्णुक्रान्ता देवदाली सर्पाक्षी सहदेविका । लाक्षा पुनर्नवा सूर्यः सूर्यभक्ता च लांगली ॥६॥

१५६ रसतरङ्गिणी चांडालिनीकन्दसंज्ञः काकमाची विदारिका । बला समन्तदुग्धा च जयन्ती हस्तिशुण्डिका ॥१०॥ रम्भा कोषातकी शुण्ठी शशिलेखा निशाद्वयम् । काकजङ्घा काकनासा सुरसा बहुपुत्रिका ॥११॥ आखुकर्णी ब्रह्मदण्डी दूर्वा च शरपुङ्खिका । चक्रमर्दो नीपकणा वर्षाभूः कटुतुम्बिका ॥१२॥ इन्द्रवारुणिका हंसपादी च शङ्खपुष्पिका । जाती मूर्व्वा च लज्वालुः सर्षपस्तिलपर्णिका ॥१३॥ वन्ध्यकर्कोटकी धूर्तो गुडूची गिरिकर्णिका । प्रसारिणी भृङ्गराजो रामठं सोमवल्लरी ॥१४॥ शोभाञ्जनः पलाशश्च मत्स्याक्षी यमचिञ्चिका । मण्डूकपर्णी ज्वलनः शेफाली मुसली वचा ॥१५॥ पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं रसस्य मारको गणः । तत्तद्विधिप्रभेदेन सूतमारणसाधकः ॥१६॥ अथ पारदमारकगणः—सूर्य्यः अर्कः, सूर्य्यभक्ता "हुरहुर" इति ख्याता, समन्तदुग्धा सुधा, रम्भा कदली, शशिलेखा बाकुची, बहुपुत्रिका शतावरी, नीपं कदम्बः, कणा पिप्पली, वर्षाभूः पुनर्नवा, तिलपर्णी तिलसदृशपत्रा, गिरिकर्णिका श्वेतापराजिता, रामठं हिंगुः, ज्वलनः चित्रकः, शेफाली निगुण्डी ॥६-१६॥ भा.टी.—अपराजिता ( कोयला ), खेखसा, नाकुली, सहदेवी, लाख, पुनर्नवा, आक, हुलहुल, कलिहारी, मकोय, विदारीकन्द, खरेटी, थूहर, अरणी, हस्तिशुण्डी, कदली, कडुवीतरोई, सोंठ, बाकुची, हल्दी, दारुहल्दी, काक- जंघा, कौआठोड़ी, तुलसी, शतावर, मूषाकानी, ब्रह्मदण्डी, दूब, शरपोंका, चकवड़, कदम्ब, पिप्पली, श्वेतपुनर्नवा, कड़वीतुम्बी, इन्द्रायण, हंसपादी, शंखपुष्पी, चमेली, मूर्वा, छुईमुई, पीलीसरसों, वनतिल, बाँझककोड़ा, धतूरा, गिलोय, श्वेतापराजिता, प्रसारिणी, भाँगर्रा, हींग, सोमलता, सहंजना, ढाक, मछेछी, दोनों प्रकार की इमली, ब्राह्मी, चित्रक, संभालू , मुसली, वच—इन औषधियों को पूर्वाचार्यों ने पारदमारकगण कहा है । ये औषधियाँ अनेक विधियों से पारद भस्म करने में सहायक होती हैं ॥ ६-१६ ॥

सप्तमस्तरङ्गः १५७ अथ पारदस्य द्वितीयो मारणप्रकारः विष्णुक्रान्ता देवदालीमारनालेन मर्दयेत् । तयोरेव द्रवेणाथ भावयेत् सप्तवारकम् ॥ १७ ॥ मूर्च्छितञ्च सुविज्ञाय पारदं खर्परे न्यसेत् । दीप्तानलायां चुल्ल्याञ्च स्थापयेदथ खर्परम् ॥ १८ ॥ वारं वारं तयोस्तत्र द्रवं शीघ्रं विनिक्षिपेत् । एवं रसो दिनैकेन समुपेति हि पञ्चताम् ॥ १९ ॥ शीघ्रं क्षेपः पारदोड्डयनरोधाय । शिष्टं सुगमम् ॥ १७–१९ ॥ भा.टी.—नील अपराजिता तथा देवदाली को काञ्जी में अच्छी तरह मर्दन करें । इन दोनों औषधियों के स्वरस या कषाय से पारद को सात भावना देवें । जब औषधि स्वरस में घोटते-घोटते पारद मूर्च्छित (कल्क में नष्ट पिष्ट ) हो जाय तो इसे एक मिट्टी के दृढ़ खर्पर में थोड़ी-थोड़ी देर बाद दोनों औषधियों का रस डालते जायँ जब तक कि खर्पर में पारद भस्म न हो जाय । इस विधि से एक ही दिन में पारद की भस्म हो जाती है ॥ १७–१९ ॥ अथ पारदमारणस्य तृतीयः प्रकारः अङ्कोलमूलसलिलैः सूतं खल्वे विमर्दयेत् । सूतमानोन्मितं गन्धं शुद्धं तत्र विनिक्षिपेत् ॥ २० ॥ संस्थाप्य सूतं मूषायां विदध्याद् वह्निमृत्स्नया । सन्धिलेपं, ततः प्राज्ञः प्रदीप्तोपलपावके ॥ २१ ॥ यन्त्रे भूधरसंज्ञे च पचेद्यामचतुष्टयम् । एवं रसेश्वरः शीघ्रं नियतं याति भस्मताम् ॥ २२ ॥ पूर्वं कज्जली कार्या पश्चादङ्कोलमूलसलिलैर्मर्दनम् ॥ २०–२२ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारद को खरल में डालकर उसमें अंकोलमूल का स्वरस डालकर अच्छी तरह मर्दन करें, जब पारद मूर्च्छित हो जाय तो उसमें पारद समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब इसको मूषा में बन्द करके पूर्वोक्त वह्निमृत्स्ना से इसकी सन्धि लिप्त कर दें । अच्छी तरह सूखने के बाद इस मूषा को भूधरयन्त्र में रखकर चार पहर तक उपलों की तीव्र अग्नि देवें । इस विधि से भी पारद शीघ्र भस्म हो जाता है ॥२०–२२॥ अथ पारदमारणस्य चतुर्थः प्रकारः अपामार्गस्य बीजानि नूतनानि विचूर्णयेत् ।

१५८ रसतरङ्गिणी कल्कीकृत्य पुनस्तेन मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ॥ २३ ॥ अरिमेदः कृमिरिपुः द्रोणपुष्पीसुमं समम् । सञ्चूर्ण्य चूर्णमेतेषां मूषामध्ये निधापयेत् ॥ २४ ॥ काकोदुम्बरिकादुग्धे सूतं यत्नेन मर्दितम् । चूर्णोपरि तु संस्थाप्य पुनश्चूर्णं प्रदापयेत् ॥ २५ ॥ प्रलिप्य रसगोलञ्च मूषायां स्थापयेत्ततः । सन्धिलेपं ततः कुर्यादवश्यं वह्निमृत्स्नया ॥ २६ ॥ संशोष्य चातपे मूषां पुटेत् गजपुटे भिषक् । एकेनैव पुटनेवं रसो यातीह भस्मताम् ॥ २७ ॥ अरिमेदो विट्खदिरः, कृमिरिपुः विडङ्गः । अथ च सर्वत्र रसभस्मनिर्माणे यथायोग्यं मारकौषधप्रणमान्वते रसविदः ॥ २३-२७ ॥ भा.टी.—अपामार्ग के नूतन बीजों को लेकर उनका चूर्ण कर लें। फिर इस चूर्ण को जल से पीसकर गाढ़ा सा कल्क बनाकर उसकी दो मूषा बना लें। अब एक मूषा में दुर्गन्धित खदिर, वायविडंग, गूमाफूल, इन तीनों का समभाग चूर्ण भरकर इसके ऊपर, कठूमर के दूध में अच्छी तरह मर्दित किये हुए पारद की टिकिया रखकर फिर इसके ऊपर पूर्वोक्त खदिर आदि द्रव्यों का चूर्ण डाल दें और दूसरी मूषा से ढँक दें और वह्निमृत्स्ना से सन्धि के साथ सम्पूर्ण मूषा सम्पुट को लिप्त करके गोला सा बना लें। अब इस गोले को एक दूसरे मूषा सम्पुट में बन्द करके वह्निमृत्स्ना से इसका सन्धिलेप करके सुखा लें। फिर इसे गजपुट में रखकर पुट दें तो एके दिन में ही पारद की भस्म हो जाती है ॥ २३-२७ ॥ पारदमारणस्य पञ्चमः प्रकारः भुजङ्गवल्लीरसै रसेश्वरं विमर्दयेत् । ततश्च कर्कटीभवं सुपेषयेत्तु कन्दकम् ॥ २८ ॥ विधाय कल्कमुत्तमं क्षिपेद्रसं तदन्तरे । निधाय सम्पुटं पुटेत्पुटे तु वारणाह्वये ॥ २९ ॥ भुजङ्गवल्लरी ताम्बूलवल्ली, कर्कटी वन्ध्याकर्कोटी, यदाहुः-“नागवल्लीरसैर्मृष्टः कर्कोटीकन्दमध्यगः। मृन्मूषासम्पुटे पक्वः सूतोयात्येव भस्मताम्” इति ॥२८-२९॥ भा.टी.—पहिले पारद को पान के स्वरस के साथ मर्दन कर इसका गोला सा बना लें। अब बांझककोड़े के कंद को खूब मर्दन करके गाढ़ा सा कल्क बना

लें। अब इस कल्क के बीच में उक्त पारदगोलक को रख गोला बना लें। फिर इसे एक दृढ़ सम्पुट में बन्दकर वह्निमृत्स्ना का लेप करके गजपुट में फूँक दें तो पारद को भस्म हो जाती है ॥ २८-२६ ॥ अथ पारदस्य ( अनुभूतः ) षष्ठो मारणप्रकारः काकोदुम्बरिकादुग्धैर्भावयेद्रामठं भिषक्। तत्कालेन पुनः प्राज्ञो मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ॥३०॥ तद्दुग्धमर्दितञ्चैव सूतं तत्र विनिक्षिपेत् । मुद्रां कृत्वा सूतगोलं मृन्मूषायां निधापयेत् ॥३१॥ सन्धि विलेपयेद्वह्निमृत्स्नया चाथ शोषयेत् । पचेल्लघुपुटे सूतं स्वाङ्गशीतंसमुद्धरेत् ॥३२॥ मूषासन्धिं विलिख्याथ कालाञ्जनसमप्रभम् । लाघवादिगुणोपेतं गृह्णीयाद् भस्मसूतकम् ॥३३॥ तद्दुग्धमर्दितम् काकोदुम्बरिकादुग्धमर्दितम् , उक्तं हि—"काकोदुम्बर- दुग्धैर्यत्नाद्दिभावितो हिंगुः । मर्दनपुटनविधानात्सूतं भस्मीकरोत्येव ॥” इति । लाघवादिगुणोपेतं अगुरुस्तेजाः वह्निस्थायी स्थिरोऽधूमः इत्युक्तगुणमिति यावत्। भा.टी.-कठूमर के दूध से हींग को सात भावना देकर इसकी दो मूषा बना लें । अब इस मूषा में कठूमर के दूध के साथ मर्दन किया हुआ पारद रख कर दूसरा मूषा से बन्द करके सन्धिलॅप कर दें । अब इस मूषागोलक को एक दूसरी मिट्टी की मूषा या सम्पुट में बंद करके वह्निमृत्स्ना से इसका संधिलॅप करके सुखा लें । फिर इसे लावक-कुक्कुट आदि लघु पुट में रखकर पुट दें । स्वांगशीत होने पर मूषा को निकालकर सावधानी से सन्धि को खोलकर भीतर मूषा में से काले अञ्जन के सदृश कृष्ण वर्ण की पारदभस्म को निकाल लें ॥३०-३३॥ अथ पारदमारणस्य ( अनुभूतः ) सप्तमः प्रकारः सूतं हिंगुलसम्भवं पलमितं तुल्यं बलिञ्चाहरेद् युक्त्या कज्जलिकां विधाय वटजक्षीरैस्ततः पेषयेत् । मृद्भाण्डे विनिधाय तत्र नत्रभूदण्डेन संचालितो मृद्वग्नौ दिनपाचितो रसवरो याति ध्रुवं भस्मताम् ॥३४॥ रसेश्वरं सुमसूण कृष्णाञ्जनसमप्रभम् । निर्धूमादिगुणोपेतं गृह्णीयाद् भस्मतां गतम् ॥३५॥

१६० रसतरङ्गिणी तुल्यं पलमितमेव, बलिं गन्धकम्, नवभूर्वटपादपस्तस्यार्द्रदण्डेनेति भावः। अत्रादौ अत्यन्तमन्दाग्नि कार्पासशुष्कदंडादिकाष्ठैरग्निज्वालनीयो विधेयोऽन्यथ पारदनाश इत्यवधेयम् ॥ ३४-३५ ॥ भा.टी.-हिंगुलोत्थ पारद एक पल, शुद्ध गन्धक एक पल लेकर इनकी अच्छी तरह कज्जली बनाकर इसको वड़ के दूध से घोटकर एक मिट्टी के दृढ़ पात्र में डालकर चूल्हे में चढ़ा दें और इसके नीचे मन्द-मन्द अग्नि दें। मिट्टी के पात्र में पड़े हुए पारद को वड़ के एक हरे दण्डे से धीरे-धीरे चलाते रहें। इस तरह एक दिन तक अत्यन्त मन्द-मन्द अग्नि देकर पकाने से पारद की निश्चित भस्म हो जाती है। इस प्रकार से की गई भस्म काले अञ्जन के समान काली चमकीली होती है। इसमें निर्धूम, गौरव आदि गुण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ अथ मृतपारदस्य गुणाः ग्रहणीगजकर्षणदक्षतरं त्वतिसारहरं क्षयशोषहरम्। जठरानलमान्द्यविनाशकरं परिशीलय सूतभवं भसितम् ॥३६॥ प्रमदामदमर्दनगर्वधरं बलवीर्यविलाससमृद्धिकरम्। निजसेवक रक्षणदक्षतरं परिशीलय सूतभवं भसितम् ॥ ३७ ॥ क्षयं क्षीणनेत्रं क्षपयति च दीप्तिं वितनुते स्मृतिं सूते कामं द्रढयति च देहं द्रुततरम्। जरां वर्षेकेन त्वपनयति संशीलितमिदं गुणान् को वा वक्तुं प्रभवति रसेशस्य नियतम् ॥ ३८ ॥ रतिकेलिकलां भृशमुज्जवलयेल्ललितं ललनाकुलमाकुलयेत्। हृदि चोत्कलिकां कलयेत् कलितो रतिराघवतामयमेव सखा।३९॥ शृङ्गारस्य हि सर्वस्वं सुरतस्याधिदैवतम्। वशीकरणमन्त्रश्च प्रमदानां मृतो रसः॥४०॥ अथ गुणाः-भसितं भस्म, क्षीणं क्षेत्रं शरीरं यत्र एवम्भूतं क्षयं तदाख्यरोगं क्षपयतीति सम्बन्धः। उत्कलिकां उत्कंठां कामविषयाम्। स्पष्टमन्यत्॥३६-४०॥ भा.टी.-अच्छी तरह बनी हुई पारद की भस्म, ग्रहणी, अतीसार, क्षय, शोष रोग नष्ट करती है और पाचक अग्नि की दुर्बलता को दूर करती है। इस भस्म के सेवन करने से पुरुष यौवनमस्त स्त्री के मद को चूर करने का गर्व रख सकता है। इसके सेवन से शरीर में बल, वीर्य तथा आनन्द में वृद्धि होती है।

११ सप्तमस्तरङ्गः १६१ शरीर को क्षीण करनेवाले क्षय रोग को नष्ट करके उसमें क्रान्ति उत्पन्न करता है । स्मरणशक्ति को बढ़ाता हुआ शरीर को अत्यन्त मजबूत कर देता है । एक वर्ष तक इसका सेवन किया जाय तो शरीर का बुढ़ापा रोग नष्ट हो जाता है । इस रसभस्म के गुणों का वर्णन करना कठिन है । पारदभस्म सेवन पर स्त्री-रमण और बिहार की शक्ति बहुत बढ़ जाती है जिससे अनेक युवती स्त्रियों को पुरुष तृप्त कर सकता है। पारदभस्म मनुष्य के हृदय में विषयेच्छा रूपी कली को खिला देती है । अतः विषय से अधिक प्रेम करनेवाले मनुष्यों का मृतपारद ही एक मात्र औषधि है । मृतपारद शृङ्गार रस का सर्वस्व तथा सुरत (भोग) का अधिदेवता तथा स्त्रियों को वश में करने के लिये एक मंत्र है ॥३६-४०॥ अथ मृतसूतस्य आमयिकः प्रयोगः पांशुमुस्तकषायेण सुरसाकथितेन वा । कणाक्वाथेन वा युक्तो मृतः सूतो हरेज्ज्वरम् ॥ ४१ ॥ लाक्षया वा हरीतक्या तथा सिंहिकयान्वितः । माक्षिकेणापि वा युक्तो रक्तपित्तं व्यपोहति ॥ ४२ ॥ व्याघ्रीक्वाथेन कणया चापि कासकुलान्तकः । वरानिशाकषायेण पाण्डुरोगं विनाशयेत् ॥ ४३ ॥ क्षीरिबृक्षकषायेण पल्लवाङ्गजलेन वा। क्वाथेन शृतशीतेन हन्त्यतीसारमुद्धतम् ॥ ४४ ॥ रसालजम्बूदलजद्रवेण गुडान्वितेनाथ सुपाचितेन । बालेन बिल्वेन सनागरेण प्रवाहिकां हन्ति मृतो रसेशः ॥४५॥ हिङ्गुना सकणेनेह विषूचीं हन्ति दारुणाम् । पथ्यया काञ्जिकेनापि त्वजीर्णं हरति क्षणात् ॥ ४६ ॥ तैलसैन्धवसंयुक्तपुटपाचितसूरणैः । अर्शांसि नाशयत्याशु दीर्घकालोद्भवान्यपि ॥ ४७ ॥ बीजपूराम्भरुचकैः हिक्कापञ्चकनाशनः । सितालाजजलक्षौद्रैश्छर्दि दाहञ्च नाशयेत् ॥ ४८ ॥ अजादुग्धविपक्केन वैदेहीपाचितेन च । घृतेन गन्धकेनापि सक्षतं क्षपयेत् क्षयम् ॥ ४९ ॥ गोक्षुरादिकषायेण मसूरक्वथितेन वा । क्षौद्रेणापि युतः सूतो मूत्रकृच्छ्रं व्यपोहति ॥ ५० ॥

सव्योषेण तिलक्वाथेनामशूलं व्यपोहति । शम्बूकक्षारसहितः पक्तिशूलनिबर्हणः ॥५१॥ मूत्रयुतः कटुतिक्तकविश्वक्वाथयुतो हरतीह हि शोफम् । दारुनिशात्रिफलाक्वथिताढ्यः कामलिनां खलु मङ्गलकारी ॥५२॥ नवोद्धतस्नुहीक्षारद्रवभावितया भृशम् । हरीतक्या युतः सूतो जठरामयनाशनः । ५३॥ त्रिकटुत्रिफलामरिचप्रथितत्रिपुटीफलतैलयुतः पुरकः । मृतसूतयुतो नियतं त्वचिरात् चिरजां विनिहन्ति हि तुन्दिलताम् ॥५४॥ रसोनसिद्धेन तिलोद्भवेन तैलेन सार्द्धन्तु रसो निपीतः । वातोद्भवानत्र बहून् विकारान् निहन्ति घोरानपि वा चिरोत्थान् ॥५५॥ हरीतकी गुडूचिका जलं गुडः समं समम् । विचूर्णितेन योजितो हरेत्समीरशोणितम् ॥५६॥ विश्वभेषजरुबूकसंस्कृतः क्षीरकेण विनियोजितो रसः । गृध्रसीं हरति दीर्घकालजामन्धकारपटलीं यथा रविः ॥५७॥ शशाङ्कलेखया तथा फलत्रिकेण संयुतः । समार्कवो मृतो रसो निहन्ति वै किलासकम् ॥५८॥ कृमिघ्ननिम्बदाडिमत्रिपर्णचूर्णसंयुतः । समाक्षिकस्तु पारदो मृतो हरेत्कृमीन् द्रुतम् ॥५९॥ राजिकानलरसोननीलिकाभृङ्गराजमृदुपल्लवैः समम् । वीरवृक्षफलसंयुतं पचेत्तैलमत्र पयसा समन्वितम् ॥६०॥ अनेन तैलेन युतो रसेशः कुष्ठान्यशेषाणि निहन्ति शीघ्रम् । यथा मृगेन्द्रो वनमध्यचारी मृगानुपैतानिह निर्विशङ्कः ॥६१॥ वरोबलावाजिगन्धामोचामूलकषायकैः रसेश्वरो हरेत्कार्श्यं मासद्वयनिषेवितः ॥६२॥ सौवर्चलत्र्यूषणहिङ्गुमूत्रैर्विपाचितेनेह घृतेन युक्तः । रसेश्वरः सप्तदिनप्रयोगात् सर्वानपस्मारकफान्निहन्ति ॥६३॥ मधूकपारावतविड्-युतेन मनःशिलायाः खलु चूर्णकेन । रसाऽञ्जनाद्दारुणलक्षणान्यानुन्मादरोगान्विनिहन्ति शीघ्रम् ॥६४॥ मृतं रसेशं मधुना विलिह्य क्षौद्रान्वितं कोष्णजलं पिबेद्यः । स्थौल्यात्तु मेदःप्रभवान्नितान्तं चिरोत्थिताञ्चापि विमुच्यतेऽसौ ॥६५॥