भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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१६४ रसतरङ्गिणी कदलीकन्दः, अञ्जनादक्षणोरिति शेषः। घनसारं कर्पूरम्, पुनर्नवायाः बीजं मूलं रसश्च गृह्यते। नागिनीरसद्वारा कांस्यके पिष्टेन नागरेण समन्वित इति योजना ॥ ४१-७४ ॥ भा.टी.—पारदभस्म को पित्तपापड़ा तथा मोथाक्वाथ से अथवा तुलसीक्वाथ या पिप्पलीक्वाथ के साथ सेवन किया जाय तो यह ज्वर को नष्ट करता है। लाक्षाचूर्ण, हरीतकीचूर्ण या वासाचूर्ण के साथ मिलाकर मधु से सेवन करने पर रक्तपित्त रोग नष्ट होता है। कास को नष्ट करने के लिये इसको छोटी कटैलीकषाय में पिप्पलीचूर्ण मिलाकर सेवन कराना चाहिये। पाण्डुरोग में इसको त्रिफला और हल्दी के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये। भीषण अतीसार में इसको पञ्चक्षीरी वृक्षकषाय अथवा पूर्वोक्त पञ्चपल्लव के स्वरस या कषाय से सेवन कराना चाहिये। प्रवाहिका को दूर करने के लिये पारदभस्म को, आम तथा जामुन के पत्तों के रस का बाल-बिल्वचूर्ण, सौंठ तथा गुड़ मिला अग्नि में पकाकर अवलेह सा बनालें, इस अवलेह के साथ सेवन करायें। पारदभस्म को हींग और पिप्पलीचूर्ण के साथ प्रयोग करने से भयंकर विसूचिका रोग नष्ट हो जाता है इसको हरीतकीचूर्ण और काञ्जी के साथ सेवन करने से बहुत शीघ्र ही अजीर्ण नष्ट हो जाता है। पुरातन तथा नवीन अर्श रोग के लिये पारदभस्म को पुट-पक्व जीमीकन्द में तिलतैल तथा सैन्धानमक मिलाकर इसके साथ सेवन करना चाहिये। बिजौरानींबू का रस तथा सौंचल नमक के साथ इसका सेवन करने से पाँचों प्रकार की हिक्का नष्ट हो जाती है। वमन और अन्तर्दाह के लिये खीलों के चूर्ण को जल में घोलकर उसमें मिश्री तथा मधु मिलाकर इसका सेवन कराना चाहिये। क्षतयुक्त क्षय में बकरी के दूध तथा पिप्पलीकल्कसिद्ध घृत में गन्धक मिलाकर उसके साथ सेवन करने से विशेष लाभ होता है। गोक्षुरादिकषाय अथवा मसूरक्वाथ में मधु मिलाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र रोग में आराम होता है। तिलों के क्वाथ में त्रिकटुचूर्ण मिला- कर इसके साथ पारदभस्म सेवन करने से आमजन्य शूल नष्ट होता है। शम्बूूक (क्षुद्र शंख घोंघा) भस्म और यवक्षार के साथ पारदभस्म परिणाम शूल को नष्ट करती है। शोथ में पारदभस्म को कुटकी तथा सौंठ के कषाय में गोमूत्र मिलाकर सेवन कराना चाहिये। दारूहल्दी तथा त्रिफलाक्वाथ के साथ पारदभस्म सेवन से कामला रोग में आराम आता है। नवीन थोहर के क्षारजल में हरीतकी की भावना देकर उसके चूर्ण के साथ पारदभस्म का प्रयोग करने से उदर रोग शान्त होते हैं। स्थूलता या मोटापा को दूर करने के लिये शुद्ध गूगल