भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२१८ रसतरङ्गिणी

संदेहास्पद ही रह जाती हैं। इसी संदेह कोटि में चपल भी है। इसका प्रयोग न जानने के कारण कोई भी वैद्य प्रयोग नहीं करता है, बात भी यथार्थ है। जब तक द्रव्य का पूर्णरूपेण ज्ञान न हो तब तक प्रयोग ही कैसे कोई करेगा ? कोई-कोई विद्वान् "विस्मथ" को चपल मानते हैं, किन्तु उनका ज्ञान भ्रमा- त्मक है। कारण कि न चपल का स्वरूप और न गुण ही विस्मथ में पाया जाता है। चपल सत्यतः कौन सा द्रव्य है इसके पूर्व प्राचीन रसग्रन्थ में इसका वर्णन कैसे और कहाँ पर मिलता है यह बताते हैं। सोमदेवकृत रसेन्द्रचूडामणि में बताया है कि कम्पिल्लचपल, गौरीपाषाण, नौसादर, कौड़ी, वह्निजार, गिरिसिन्दूर, हिंगुल, मुर्दाशंख यह साधारण रस हैं। और रसार्णव में माक्षिक, विमल, शैल, चपल, रसक, सस्यक, दरद, सौवीर इन आठों का नाम महारस में दिया गया है। चपल के गलने में—वङ्गधातु के द्रव समकाल ही काल लगता है। वङ्ग के द्रवीभाव में नवीन पाश्चात्य विद्वान् लोग २३२ तापांश समय लगता है ऐसा मानते हैं। अर्थात् चपल के भी द्रवं में २३२ तापांश लगेगा। सेलिनियम के द्राव में २१७ तापांश लगता है। यह कोई विशेष अन्तर नहीं है। प्राचीनकाल में यन्त्रों के सहारे तो यह ज्ञान प्राप्त नहीं किया गया था, अतः कुछ अन्तर पड़ना स्वाभाविक है। सेलि- नियम को खान से प्राप्त करते हैं तो इसमें ताम्र का संयोग रहता है, जिसको बिजली के द्वारा अलग करके साइनाइड् क्षार नामक सेलिनियम को अलग कर लेते हैं। इसकी शुद्धि ऊर्ध्वपातन विधान से करते हैं। इसका प्रयोग कीटाणु विज्ञान, प्राणिविज्ञान पुस्तकों में पाया जाता है। आयुर्वेद में—इसकी शुद्धि निम्न प्रकार से बतायी गयी है। सोरा, धनियाँ का मूल, उपविष और विषों को पीसकर पिण्ड सा बना उसी में चपल मिला ऊर्ध्वपातन विधान से पातन कर लें। पाश्चात्य विद्वान् भी मिश्रित धातुओं को पृथक् करने के लिए सोरा का प्रयोग करते हैं। अन्य प्रकार—जमीरी नींबू का रस, खेखसा, और अदरक की सात भावना से चपल की शुद्धि होती है। रसार्णव में बताया है कि सोरा से पुट देने पर चपल का मारण होता है। भस्म का दूसरा प्रकार—चपल के समभाग शुद्ध पारा को निर्गुण्डी के रस से भावना देकर बालुका यन्त्र द्वारा पाक करने पर रक्त भस्म हो जाता है।